किसानों को मिले मेहनत का दाम

भारतीय कॉपरेरेट सेक्टर के अधिकतर वर्गो ने उदारीकरण की प्रक्रिया को किंचित अनिच्छा के साथ स्वीकार किया था, जबकि किसानों के संगठन 1970 के दशक से ही राज्यतंत्र के नियंत्रण से मुक्ति पाने के लिए लड़ाई लड़ते आ रहे थे। अनमने उदारीकरण के बावजूद महज डेढ़ दशक में ही भारतीय कॉपरेरेट का एक बड़ा वर्ग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में आ गया। उसी तरह भारत के किसानों में भी यह क्षमता है कि वे गरीबी के पाश से मुक्त हों और संपदा निर्माता बनें, बशर्ते सरकार उनकी आर्थिक आकांक्षाओं की राह में गैरजरूरी रोड़े न अटकाए। लेकिन हो यह रहा है कि सरकार कृषि क्षेत्र में आर्थिक सुधारों को नए मुकाम पर ले जाने से कतरा रही है और राज्यतंत्र का नियंत्रण किसानों की प्रेरणा और उनके प्रोत्साहन को निरंतर क्षति पहुंचा रहा है। इसलिए हैरानी नहीं होनी चाहिए कि लाखों की संख्या में किसान आर्थिक शरणार्थियों की तरह शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। किसानों पर लादे गए बेकार के नियंत्रणों को हटाना तो दूर, यूपीए सरकार ने नौकरशाहीपूर्ण समाजवाद को एक और अवसर प्रदान करते हुए ऐसी योजनाएं बना दीं, जो ऊपर से तो किसानों की हितैषी मालूम होती हैं, लेकिन वास्तव में वे भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली हैं और उन्हें नेता-नौकरशाह गठजोड़ का समर्थन प्राप्त है।

दुनिया में ऐसा कहीं भी नहीं होता कि किसी अर्थव्यवस्था में श्रम शक्ति की किल्लत हो, इसके बावजूद सरकारें व्यापक पैमाने पर रोजगार गारंटी मुहैया कराती हों। मनरेगा जैसी योजनाओं ने कृषि क्षेत्र की मुश्किलें और बढ़ाई हैं, जो कि पहले ही श्रमशक्ति की कमी और उच्च मजदूरी दरों की समस्या से जूझ रहा है। पिछले तीन साल में कृषि क्षेत्र में मजदूरी की दर में ७क् फीसदी का इजाफा हुआ है, जबकि उपज की कीमतों में इस तरह की बढ़ोतरी नहीं हुई। मुख्यत: अपने परिवार के सदस्यों से सहायता लेने वाले किसान भी अब कृषि से मुंह मोड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त श्रम शक्ति नहीं मिल पाती। पंजाब जैसे राज्यों में किसान बड़े पैमाने पर कृषि के मशीनीकरण की ओर बढ़ रहे हैं या फिर व्यावसायिक उपयोग के लिए अपनी जमीनें बेच रहे हैं। हर साल ४क् हजार करोड़ रुपए खर्च कर देने के बावजूद मनरेगा का लक्ष्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थायी संपत्तियों का निर्माण नहीं है। यह योजना कुशल कारीगरों और किसानों को अकुशल श्रमिकों में तब्दील करती जा रही है। साथ ही मनरेगा ने भ्रष्टाचार के लिए संगठित प्रयासों को भी बढ़ावा दिया है, जिससे लड़ना और कठिन है, क्योंकि वे अपने पीछे किन्हीं तरह के दस्तावेजी साक्ष्य नहीं छोड़ जाते। मिसाल के तौर पर मनरेगा के फंड्स को नियंत्रित करने वाले ग्राम प्रधान अपने परिवार के सदस्यों को ही लेबर कांट्रेक्टर बना देते हैं और फिर वे काम मांगने वालों से सौदेबाजी करने लगते हैं कि यदि वे धनराशि में फलां-फलां सीमा तक साझा करने को तैयार हैं, तो उन्हें न के बराबर काम करना पड़ेगा। चूंकि मनरेगा उत्पादन या परिणाम केंद्रित योजना नहीं है, इसलिए इस तरह की धांधलियां चल जाती हैं। यह योजना भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों की कार्य संस्कृति को भी क्षति पहुंचा रही है।

इसी तरह खाद्य सुरक्षा योजना का लक्ष्य है 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और ५क् प्रतिशत शहरी आबादी को अत्यधिक सब्सिडी पर खाद्यान्न प्रदान करना। मौजूदा सार्वजनिक वितरण प्रणाली पहले ही भ्रष्टाचार की अतल खाई साबित हुई है और 80 हजार करोड़ से अधिक के वार्षिक बजट वाली खाद्य सुरक्षा योजना के साथ यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यह योजना भी भ्रष्टाचार से मुक्त रह पाएगी। योजना की परिकल्पना करने वालों की नेक मंशा पर भले ही कोई संदेह न हो, लेकिन इसकी आर्थिक बुनियाद ही दोषपूर्ण है। फसल किसान उगाते हैं, सरकार नहीं। सरकार का यह दावा धृष्टतापूर्ण है कि वह उन किसानों का भरण-पोषण करती है, जो कि स्वयं अन्नदाता हैं। यदि सरकार ही कृषि उत्पादों की इकलौती खरीदार होगी तो इससे बाजार और प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचना ही है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का दायरा खाद्य सुरक्षा योजना की तुलना में कहीं सीमित है, लेकिन इसके बावजूद हमने देखा कि किस तरह लगातार सरकार और किसानों के बीच संघर्ष की स्थिति निर्मित होती रही, क्योंकि किसान समर्थन मूल्य चाहते थे और सरकार कीमतें कम रखना चाहती थी। सरकार की योजना अनुत्पादकता को बढ़ावा देने वाली है। यदि गेहूं और चावल का दाम दो या तीन रुपए प्रतिकिलो होगा तो किसान इनकी उपज लेने के लिए पसीना क्यों बहाएंगे? वे अन्य लाभदायक फसलें क्यों नहीं लेंगे?

किसानों को भीख नहीं, उनकी मेहनत का दाम चाहिए। उन्हें मुफ्त भोजन नहीं, अपनी उपज पर बेहतर समर्थन मूल्य और उच्चतर उत्पादन चाहिए। ऐसा तभी हो सकता है, जब किसानों की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक मुक्त पहुंच होगी। साथ ही ग्रामीण बुनियादी ढांचे में सुधार करने और एग्रो प्रोसेसिंग इंडस्ट्रीज, स्टोरेज सुविधाओं आदि में आने वाली प्रशासनिक अड़चनों को समाप्त करने की जरूरत है। सिंचाई परियोजनाओं पर ध्यान देते हुए उत्पादकता बढ़ाना भी जरूरी है। ऊर्जा क्षेत्र में भी सुधारों की जरूरत है। उत्तम गुणवत्ता के बीज, उर्वरक, कीटनाशक वगैरह किसानों की संपन्नता के साधन हैं। अभी तो यह स्थिति है कि कृषि तकनीक में सुधार की सारी पहल निजी क्षेत्र की ओर से हो रही है, शासकीय संस्थाओं की ओर से नहीं। उल्टे सरकार निजी क्षेत्र की राह में कई तरह के रोड़े अटका रही है। किसानों को शहरी क्षेत्रों से अच्छी कनेक्टिविटी और रिटेल में बड़े पैमाने पर निवेश की दरकार है, ताकि उसे अपने उत्पादों के लिए अधिक से अधिक खरीदार मिल सकें। किसानों के लिए अच्छी स्टोरेज सुविधाएं बहुत जरूरी हैं, ताकि उन्हें औने-पौने दाम पर अपनी उपज बेचने को बाध्य न होना पड़े।

संक्षेप में कहें तो किसानों को अनुदान या राहत या सब्सिडी की जरूरत नहीं है। उन्हें सरकार के दुर्भाग्यपूर्ण नियंत्रण से मुक्ति की जरूरत है। महात्मा गांधी ने भी कहा था : ‘शीर्ष का दबाव केवल उन्हीं की कमर तोड़ता है, जो सबसे पीछे खड़े हैं, जबकि जरूरत इस बात की है कि उन्हें प्रशासनिक दबावों से मुक्त किया जाए।’

मधु किश्वर
लेखिका प्रख्यात समाज शास्त्री और सीएसडीएस में प्रोफेसर हैं।

साभारः दैनिक भास्कर

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