कुपोषण के मूल कारण

दस साल पहले अप्रैल 2001 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने एक गोष्ठी में कहा था, ‘लोकतंत्र और भूख साथ-साथ नहीं चल सकते। आधुनिक युग में भूख और गरीबी का कोई स्थान नहीं है, जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने पर्याप्त और समतामूलक विकास की अवस्था तैयार की है।’ और उनकी सरकार ने जो कुछ किया वह यह कि सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को सशक्त करने के लिए महज इसका नाम बदल दिया और ‘खाद्यान्न भंडार को कल्पनाशीलता और उद्देश्यपूर्ण तरीकों से इस्तेमाल किया’ ताकि दाम स्थिर हो सकें और इनका निर्यात बढ़ सके। उनके कार्यकाल में और उसके बाद भी भूख और कुपोषण का कहर बढ़ता चला गया।

जब मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कुपोषण को राष्ट्रीय शर्म कहते हुए सुनता हूं, तो मुझे जरा भी हैरानी नहीं होती। पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पूरी कवायद चुनाव संदर्भित नजर आ रही है। भूख और कुपोषण पर रिपोर्ट जारी करते हुए वह कहते हैं, ‘हमारी जीडीपी में प्रभावी वृद्धि के बावजूद देश में कुपोषण का स्तर अस्वीकार्य रूप से ऊंचा है।’ इससे भी बड़ी शर्म की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री ने सात साल बाद छह साल से छोटे बच्चों के कुपोषण की सुध ली है।

एक साल पहले ‘सेव द चिल्ड्रेन’ नामक संगठन ने कुपोषण और भुखमरी के संदर्भ में चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की थी, जिस पर प्रधानमंत्री का ध्यान नहीं गया था। आखिरकार, हम प्रधानमंत्री कार्यालय पर दोष नहीं मढ़ सकते कि उसने उच्च विकास और गरीबी उन्मूलन के सह-संबंध पर प्रधानमंत्री को अंधेरे में रखा। न ही हमें योजना आयोग द्वारा सुरेश तेंदुलकर समिति की अनुशंसा पर बीपीएल रेखा को ऊपर उठाने में कुछ असामान्य लगा। यह सब इसलिए हुआ क्योंकि समग्र नीति योजना अधिकाधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जुटाने, उद्योगों के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण के उपाय करने और उद्योग जगत को कर में तरह-तरह की छूट और प्रलोभन देने पर केंद्रित है।

संभवत: प्रधानमंत्री राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-3, 2005-06 रिपोर्ट को पढ़ना भी भूल गए थे, जिसमें लिखा था कि देश के आधे से अधिक बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सितंबर 2010 में जारी एक और रिपोर्ट ‘ए फेयर चांस ऑफ लाइफ’ भी शायद उनकी नजर के सामने से नहीं गुजरी। यह रिपोर्ट प्रमुख समाचार पत्रों के मुखपृष्ठ पर स्थान नहीं पा पाई क्योंकि इसे सांसदों के किसी समूह का समर्थन हासिल नहीं था। रिपोर्ट के अनुसार, हर साल पैदा होने वाले 2.6 करोड़ बच्चों में से करीब 18 लाख पांचवें जन्मदिवस से पहले ही मर जाते हैं और मरने वाले बच्चों में से आधे तो अपने जन्म के बाद एक माह भी नहीं जी पाते। यह मां और बच्चों के स्वास्थ्य और कुपोषण का स्पष्ट संकेतक है। नवजात शिशु का स्वास्थ्य अपनी मां के स्वास्थ्य पर ही निर्भर करता है। अत: नवजात शिशुओं की मौत से जाहिर तौर पर गरीबों और जरूरतमंदों तक खाद्यान्न पहुंचा पाने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की अक्षमता और अयोग्यता की पोल खुल जाती है। भूख और कुपोषण का गहरा नाता है। जनसंख्या को स्वस्थ बनाए रखने के लिए उसका पेट भरना पहली शर्त है। एकीकृत बाल विकास योजना जैसे पूरक पोषण कार्यक्रम तभी प्रभावी हो सकते हैं जब बच्चों का पेट भरा हो।

इसमें कोई संदेह नहीं कि अगर मां स्वस्थ होगी तो उसके नवजात शिशु के जिंदा रहने की संभावना बढ़ जाएगी। प्रधानमंत्री का यह कहना सही है, ‘हमारा विश्वास है कि मां की शिक्षा का स्तर, परिवार का आर्थिक स्तर, साफ-सफाई, परिवार और समाज में महिलाओं का दर्जा और स्तनपान आदि बच्चों के पोषण को प्रभावित करते हैं।’ प्रत्येक सर्वे में इन सहसंबंधों का उल्लेख किया जाता है। किंतु कुपोषण से बचने के लिए युद्धस्तरीय राष्ट्रीय कार्यक्रम कहीं नजर नहीं आता। दोषपूर्ण आंगनबाड़ी व्यवस्था से सहायता प्राप्त आइसीडीएस कार्यक्रम की ओर सरकार का ध्यान नहीं जा रहा है। इस कार्यक्रम को शुरू हुए 37 साल हो गए हैं किंतु यह बच्चों के स्वास्थ्य व पोषण के अपने लक्ष्यों के करीब भी नहीं पहुंच सका है। इसकी विफलता इसी तथ्य से उजागर हो जाती है कि जिन सौ जिलों में हंगामा सर्वेक्षण किया गया था उनमें आइसीडीएस कार्यक्रम चल रहा था। आइसीडीएस कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य की दशा सुधारने से पहले इस कार्यक्रम की बिगड़ती सेहत को संभालना जरूरी है।

बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने अगले पांच साल के लिए सरकार से दो लाख करोड़ रुपयों की मांग की है। बजट का बढ़ा हुआ प्रावधान भी पर्याप्त साबित नहीं होगा जब तक कि पोषक तत्वों के दैनिक मानक को पांच रुपये प्रति व्यक्ति से बढ़ाया नहीं जाएगा। यह समझ से परे हैं कि आज की महंगाई में एक बच्चे के लिए पांच रुपये में कौन से पोषक तत्वों को खरीदा जा सकता है। यह राशि बिल्कुल बेमानी है और इसे व्यावहारिक बनाया जाना चाहिए। इसी प्रकार अधिकतम 1800 रुपये माहवार पाने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की प्रोत्साहन राशि बढ़ाए बिना उनसे यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे माताओं को प्रोत्साहित करेंगी और उन्हें सलाह देंगी। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता खुद ही बीपीएल रेखा से नीचे रह रही हैं और उन्हें परिवर्तन की संवाहक मानना बेहूदा है।

अधिक महत्वपूर्ण आर्थिक नीतियों और बढ़ती भूख व कुपोषण के बीच के नाजुक रिश्ते को समझना है। भूख दोषपूर्ण आर्थिक नीतियों का परिणाम है, जो संपन्न और वंचितों के बीच की खाई को चौड़ी कर रही हैं। यह उन नीतियों का परिणाम है जो जल, जंगल और कृषि भूमि जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक नियंत्रण हासिल करती हैं और यह उन नवउदारवादी नीतियों की उपज है जो सामाजिक दायित्वों से मुंह चुराकर कृषि को उद्योग घरानों को सौंपती हैं। सरकार जितना अधिक कृषि के बुनियादी आधारों को ध्वस्त करके किसानों को खेती छोड़ने और उन्हें शहर में पलायन करने को मजबूर करेगी, भूख और कुपोषण का कहर उतना ही अधिक विकराल होगा। गरीबों और भूखों की सहानुभूति में केवल जबानी जमाखर्च करने से कुछ नहीं होगा, अगर प्रधानमंत्री वास्तव में कुपोषण से शर्मिदा हैं तो उन्हें आर्थिक नीतियों में बदलाव कर इन्हें जनवादी और पर्यावरण अनुकूल बनाना होगा।

[देविंदर शर्मा: लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]

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