चौपालियों के मन की बात : बरसाती नदियों का भविष्य

जया शर्मा
Jaya Sharma

हम केवल बड़ी नदियों के विषय में ही विचार करते हैं। उनके जल स्तर, रखरखाव, संरक्षण आदि के बारे में प्रयास करते हैं। हम उन छोटी नदियों के बारे में क्यों सोच विचार नहीं करते जो इन बड़ी नदियों के जल स्तर को बनाए रखने में खुद मिट जाती हैं। ठीक उसी तरह जैसे बड़ी मछली छोटी को खा जाती है।
हम जानते हैं मध्यप्रदेष में आठ प्रमुख नदियॉं हैं। केन, तवा, क्षिप्रा, नर्मदा, बेतवा, सोन, चंबल, मंदाकिनी। आइए एक नजर में देखें ये नदियॉं कितनी समृद्ध हैं और किन सहायक नदियों के कारण:-
केन 250 किमी. यमुना की एक उपनदी या सहायक नदी है जो बुन्देलखंड क्षेत्र से गुजरती है। मंदाकिनी तथा केन यमुना की अंतिम उपनदियाँ हैं। केन नदी जबलपुर, मध्यप्रदेश से प्रारंभ होती है, पन्ना में इससे कई धारायें आ जुड़ती हैं इस के बाद यमुना गंगा से जा मिलती है। और फिर बाँदा, उत्तरप्रदेश में इसका यमुना से संगम होता है। इस नदी के पत्थर प्रसिद्ध हैं। क्षिप्रा, मध्यप्रदेश में बहने वाली एक प्रसिद्ध और ऐतिहासिक नदी है। यह भारत की पवित्र नदियों में एक है। उज्जैन में कुम्भ का मेला इसी नदी के किनारे लगता है। द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर भी यहीं है।
तवा नदी भारत की एक प्रमुख नदी है। यह नर्मदा की सबसे बड़ी सहायक नदी है। यह सतपुड़ा श्रेणी की नदी है जो होष्ंागाबाद जिले में है। नर्मदा मध्य भारत के मध्य प्रदेश और गुजरात राज्य में बहने वाली एक प्रमुख नदी है। महाकाल पर्वत के अमरकण्टक शिखर से नर्मदा नदी की उत्पत्ति हुई है। इसकी लम्बाई प्रायः 1310 किलोमीटर है। यह नदी पश्चिम की तरफ जाकर खम्बात की खाड़ी में गिरती है। इस नदी के किनारे बसा शहर जबलपुर उल्लेखनीय है। इस नदी के मुहाने पर डेल्टा नहीं है। जबलपुर के निकट भेड़ाघाट का नर्मदा जलप्रपात प्रसिद्ध है। इस नदी के किनारे अमरकंटक, नेमावर, शुक्लतीर्थ आदि प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं जहाँ काफी दूर-दूर से यात्री आते रहते हैं। नर्मदा नदी को ही उत्तरी और दक्षिणी भारत की सीमारेखा माना जाता है।
बेतवा मध्य प्रदेश राज्य में बहने वाली एक नदी है। यह यमुना की सहायक नदी है। यह मध्य-प्रदेश में भोपाल से निकलकर उत्तर-पूर्वी दिशा में बहती हुई भोपाल, विदिशा, झाँसी, जालौल आदि जिलों में होकर बहती है। इसके ऊपरी भाग में कई झरने मिलते हैं किन्तु झाँसी के निकट यह काँप के मैदान में बहती है। इसकी सम्पूर्ण लम्बाई 480 किलोमीटर है। यह हमीरपुर के निकट यमुना में मिल जाती है। इसके किनारे सॉंची और विदिशा के प्रसिद्ध व सांस्कृतिक नगर स्थित हैं।
चंबल नदी मध्य भारत में यमुना नदी की सहायक नदी है। यह नदी ‘जानापाओ पर्वत, महू से निकलती है। इसका प्राचीन नाम चरमवाती है। इसकी सहायक नदिया शिप्रा, सिंध, कलिसिन्ध, ओर कुननों नदी है। यह नदी भारत में उत्तर तथा उत्तर-मध्य भाग में राजस्थान तथा मध्य प्रदेश से होकर बहती है। यह नदी दक्षिण मोड़ को उत्तर प्रदेश राज्य में यमुना में शामिल होने के पहले राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच सीमा बनाती है। इस नदी पर चार जल विधुत परियोजना चल रही है। गांधी सागर, राणा सागर, जवाहर सागर, कोटा वेराज (कोटा)। प्रसिद्ध चूलीय जल प्रपात चंबल नदी (कोटा) मंे है।
यह एक बारहमासी नदी है। इसका उद्गम स्थल जानापाव की पहाड़ी (मध्य प्रदेश) है। यह दक्षिण में महू शहर के, इंदौर के पास, विंध्य रेंज में मध्य प्रदेश में दक्षिण ढलान से होकर गुजरती है। चंबल और उसकी सहायक नदियांॅ उत्तर पश्चिमी मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र के नाले, जबकि इसकी सहायक नदी, बनास, जो अरावली पर्वतों से शुरू होती है इसमें मिल जाती है। चंबल, कावेरी, यमुना, सिन्धु, पहुज भरेह के पास पचनदा में, उत्तर प्रदेश राज्य में भिंड और इटावा जिले की सीमा पर शामिल पॉंच नदियों के संगम समाप्त होता है।
सोन नदी या सोनभद्र नदी भारत के मध्य प्रदेश राज्य से निकल कर उत्तर प्रदेश, झारखंड के पहाडि़यों से गुजरते हुए वैशाली जिले के सोनपुर में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है। यह बिहार की एक प्रमुख नदी है। इस नदी का नाम सोन पड़ा क्योंकि इस नदी की रेत पीले रंग की है जो सोने की तरह चमकती है। इस नदी की रेत पूरे बिहार में भवन निर्माण के लिए उपयोग में लाया जाता है तथा रेत उत्तर प्रदेश के कुछ शहरों में भी निर्यात की जाती है। गंगा और सोन नदी के संगम स्थल सोनपुर में एशिया का सबसे बड़ा सोनपुर पशु मेला लगता है।
मन्दाकिनी नदी, मध्य प्रदेश के सतना जिले में बहने वाली एक नदी है। इस नदी के तट पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल चित्रकूट स्थित है। इस नदी पर एक बार सफाई अभियान हो चुका है। रामचरित मानस मंे इस नदी का उल्लेख दोहे में होता है।
नदी शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा के कई अर्थों में लिया गया है, इस शब्द को दरिया, प्रवहणी, सरिता, निरन्तर चलने वाली कहा गया है। वैदिक कोष में भी नदी शब्द को कुछ इस प्रकार परिभाषित किया गया है- ‘‘नदना इमा भवन्ति‘‘ अर्थात् नदी कलकल की ध्वनि करने वाली होती है। हमारे देश में नदियों को माता का संज्ञा मिला हुआ है और नदियों के किनारे ही हमारी संस्कृति पनपी। लोग अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए नदियों के किनारे ही अपना घर बनाकर रहने लगे। लेकिन अब मानव समाज अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए इन नदियों को औद्योगिक कचरा, शहरों के गंदे नाले का सीवर डालकर तथा नदियों को पाटकर मार रहा है।
इसका एक उदाहरण है कृष्णी नदी। सहारनपुर के खैरी गांव से कृष्णी नदी का उद्गम हुआ है। यह नदी सहारनपुर से निकलकर जिला शामली, मुजफ्फरनगर से होती हुई बागपत के बरनावा में हिडंन नदी में मिल जाती है। भारत उदय एजूकेशन सोसाइटी के कार्यकर्ता जिला बागपत के बरनावा गांव में भ्रमण के दौरान इस नदी के क्षेत्र में संगम को भी देखने गये थे। यहॉं पर हिंडन व कृष्णी नदी का संगम है। जो सिमट कर एक नाली का रूप ले लिया है।
इस नदी के किनारे महाभारतकालीन लाक्षागृह भी खंडहर हो चुका है इसके बारे में जनश्रुति है कि महाभारत के समय कौरवों ने पांडवों को जलाकर मारने के लिए लाख का घर बनाया था। लाख ज्वलनशील होता है जो बहुत तेजी से जलता हैं। लेकिन पांडवों को दुर्योधन के इस षड़यंत्र का पता चल गया था और वे जलते हुए इस घर से सुरंग के माध्यम से निकट बहती हुई कृष्णी नदी को पारकर जान बचाने में सफल रहे थे। इस प्रकार यह नदी महाभारत काल से भी जुड़ी हुई है। आज भी इन नदियों के संगम के पास लाक्षागृह में एक गुरुकुल का संचालन होता है। जो आज भी प्राचीन संस्कृति को संजोये हुए है। इसमें विद्यार्थियों को संस्कृत, वैदिक शिक्षा, गौ सेवा आदि का संचालन किया जाता है।
यह नदी सहारनपुर के गॉंव खैरी से निकलकर नानौता व शामली के पास से 150 किलोमीटर की दूरी तय कर औद्योगिक कचरों को ढोती हुई बरनावा में हिंडन नदी में मिल जाती है। लेकिन अब इस नदी की क्षमता औद्योगिक कचरों को ढोने की भी नहीं रह गयी है। चन्देनामल, धकौड़ी, जलालपुर, सिक्का आदि गांॅव इस नदी के जल से बुरी तरह प्रभावित हैं। चन्देनामल गांॅव में प्रदूषण की वजह से सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार भी किया था। बरसात के मौसम में जब नदियों के उफान से बाढ़ आ रही है, गंगा व यमुना नदी भी अपने उफान पर होती हैं, तब भी कृष्णी एक छोटी नाली के रूप में बहती है। यह इस नदी की करूणादायिक कहानी है। जो हम सबके लिए चिंता का विषय है।
पहले यही स्वच्छ जल से कल-कल करते हुए बहती थी। नदी के किनारे बसने वाले गांॅव के लोग इस नदी में नहाते थे, पशुओं को इसका पानी पिलाते थे तथा इस नदी के जल से फसलों की सिंचाई भी किया करते थे। उसके बाद यह नदी शुगर मिल, गत्ता कारखाने, शराब बनाने के कारखाने आदि के प्रदूषण की चपेट में आ गयी। जिस कारण लोग इसके पानी को छूने से भी डरने लगे। क्योंकि इसके जल को छूने मात्र से ही त्वचा सम्बन्धी रोग होने लगे। इसके किनारे बसने वाले गॉंवों को पानी की बदबू झेलनी पड़ी। भूजल के स्तर में भी गिरावट आयी, भूजल भी प्रदूषित हो गया और लोग पेट की बीमारियों से ग्रसित हो गये। इसका पानी धीरे-धीरे कम होने लगा और अब यह नदी अब मृत होने की कगार पर है। आने वाले वर्षों में हो सकता है कि नदी भूगोल के नक्शे से ही समाप्त हो जाये।
यदि यही हाल रहा तो हम आने वाली पीढ़ी को बतायेंगे कि यहॉं एक कृष्णी नामक नदी बहती थी। जो अब पूर्णतः समाप्त हो गयी। चौगामा क्षेत्र की यह इकलौती नदी है जिससे लोग पहले अपनी प्यास बुझाते थे। अगर इस प्रकार एक-एक कर नदी समाप्त होती गयी तो हमारे पास नदी शब्द ही बचेगा, जल स्रोत नहीं। लेकिन अब हम उस नदी को क्या नदी कहेंगे जिसमें प्रवाह नहीं बचा हो। नदियों में ध्वनि एवं निरन्तर बहना मुख्य गुण समाप्त होते जा रहे हैं। मेरी अपने नदी प्रेमी साथियों से अपील है कि एक-एक नष्ट होती नदियों को हम सबको मिल कर बचाना है।
सागर जिले में प्रमुख रूप से धसान, बेबस, बीना, बामनेर और सुनार नदियांॅ निकलती हैं। इसके अलावा कड़ान, देहार, गधेरी व कुछ अन्य छोटी बरसाती नदियांॅ भी हैं। अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सागर जिले को समृद्ध नहीं कहा जा सकता लेकिन वास्तव में जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनका बुद्धिमत्तापूर्ण दोहन शेष है। कृषि उत्पादन में सागर जिले के कुछ क्षेत्रों की अच्छी पहचान हैं। खुरई तहसील में उन्नत किस्म के गेहॅूं का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है।
बड़ी नदियांॅ तो वर्ष भर जल से तर रहती हैं परंतु बरसात में जल से भर कर बड़ी नदियों को जल देने का महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। बरसात बीतते तक उनका जलस्तर कम होते होते सूख जाता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि उनके गहरीकरण की ओर कभी किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।
यदि एक एक कर इन बरसाती नदियों को गहरा कर संरक्षित किया जाए तो जो वर्षा का जल बेकार बहकर समुद्र में समा जाता है वह गॉंव वालों को पूरे साल पानी दे सकता है।
जया शर्मा

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