डंके की चोट पर तकनीक

आर एल फ्रांसिस

यह जो नया मीडिया है वह नया नया ही भारतमें आया है. यही कोई बीस साल पहले. लेकिन इन बीस सालों में पिछला एक दशक ही ऐसा है जिसमें नये मीडिया या सोशल मीडिया जबर्दस्त उभार दिखाई दे रहा है. नये मीडिया के इस उभार से लोगों को अभिव्यक्ति का अवसर जरूर मिला है लेकिन क्या हम नये मीडिया की पूर्ण संभावनाओं का अपने समाज के दोहन कर पा रहे हैं. भोपाल में नये मीडिया और विज्ञान प्रौद्योगिकी पर आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लेकर लौटे आरएल फ्रांसिस मान रहे हैं कि नये मीडिया में अभी तकनीकि तौर पर बहुत कुछ किये जाने की जरूरत है.

भारत में इंटरनेट को आए अभी दो दशक भी नही हुए कि इसकी सफलता का डंका बजने लगा है। सफलता का डंका बजे भी क्यों नहीं? इसने काम ही ऐसा किया है। अपने इतने कम समय के सफर में इंटरनेट के मध्यम से जितनी सुविधाएं आम आदमी की पुंहच में आयी है वह किसी करिश्मे से कम नही है। इसने विचारों और विचारधराओं के अदान-प्रदान को बेमिसाल गति दी है। इंटरनेट की पुहंच कितनी तेजी से बढ़ रही है इसका अंदाजा ‘इंटरनेट वर्ल्ड स्टैट्स, और रसरंग रिसर्च’ की इस रिपोर्ट से लगाया जा सकता है कि 55.5 करोड़ वेबसाइट पिछले साल तक थी और इनकी तदाद इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हर एक मिनट में 531 नई वेबसाइट बन जाती है।

दुनिया के विभिन्न देशों में इंटरनेट का प्रयोग करने वालो की एक बड़ी संख्या है। अकेले अमेरिका में 24.5 करोड़, ब्रजील में 8.1 ब्रिटेन में 5.2 फ्रांस में 5.0 जर्मनी में 6.7 चीन में 51.3 और भारत में 12.1 करोड़ लोग नेट से जुड़े हुए है। 3 अरब 14 करोड़ लोगो के ईमेल अकाउंट है। इंटरनेट अभिव्यक्त की आजादी का सबसे बड़ा मध्यम बनकर उभरा है।

भारत में इंटरनेट के फैलते इस विशाल जाल ने प्रिंट और इैल्ट्रोनिक मीडिया से अलग एक नये मीडिया को जन्म दिया है। जहां प्रिंट और इैल्ट्रोनिक मीडिया अपने और सरकारों द्वारा बनाये गए नियम कानूनों से बंधे हुए है वही इस न्यू मीडिया की जबावदेही की बात उठने लगी है। न्यू मीडिया और सोशल मीडिया के नाम से जाने जाते इस मध्यम पर साप्रदायिक हिंसा भड़काने और नफरत का कारोबार करने जैसे गंभीर आरोप लगने लगे है।

हाल ही में असम दंगों के बाद मुंबई में हुई हिंसा में सोशल मीडिया की भूमिका पर एक गैर सरकारी संगठन सिटिजंस फॉर जस्टिस एंड पीस ने स्वाल उठाए है, संगठन के मुताबिक तकनीक का साहारा लेकर कुछ बनावटी फोटो के जरिये यह संदेश दिया गया कि म्यांमार और असम में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अत्याचार किये गए है जबकि वह फोटो थाईलैड, चीन और तिब्बत की प्राकृतिक आपदाओं के दौरान मारे गए लोगों के है। संगठन के मुताबिक इन फोटो को देखकर कोई भी गुस्से से उबल सकता है लेकिन यह जानना बेहद जरुरी है कि वे कहां के है और उनका मुसलमानों से कोई लेना देना नही है।

इस नये मीडिया/सोशल मीडिया को नई दिशा देने का एक सकरात्मक प्रयोग मध्य प्रदेश करने जा रहा है। जिस दिन इस सोशल मीडिया की तथाकथित साजिश के कारण मुंबई का शांत वातावरण विस्फोटक बन गया था उसी दिन मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में न्यू मीडिया को जवाबदेही के साथ समृद्व बनाने का ताना-बाना बुनने के लिए देश भर के सैकड़ों न्यू मीडिया संचारकों का जमवाड़ा लग रहा था। सामाजिक संगठन ‘स्पंदन’ के अनिल सौमित्र के प्रयासों से ‘मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद’ ने इसे विज्ञान के साथ जोड़ने पर जोर दिया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह संपर्क प्रमुख राम माधव ने नये मीडिया पर अपना मत रखते हुए कहा कि यह मीडिया का लोकतंत्रीकरण है. आज के दौर में अभिव्यक्ति के लिए मुख्यधारा के माध्यमों में आम आदमी के लिए स्थान कम है जिसकी भरपाई यह बखूबी कर रहा है इसे किसी दायरे में सीमित करने से इसका पैनापन समाप्त हो सकता है। एक तरह से यह मिशनरी मीडिया है इसलिए इसकी जबावदेही अधिक है इसमें स्वछंदता को रोकने के लिए आत्मनियंत्रण की जरुरत है। यह मुख्यधारा के मीडिया के लिए बेहतर रिसोर्स है। ऐसे साधनों से जनता सशक्त हुई है।

साइबर मामलों के जानकार पीयूष पांडे ने अपने एक लेख में कहा है कि इंटरनेट के विस्तार की यह तस्वीर सुनहरी है लेकिन सच यह है कि 121 करोड़ की आबादी वाले भारत में अभी इंटरनेट क्रांति का घटना बाकी है। सरकार और निजी क्षेत्रों की बड़ी कंपनियों को अपनी वैश्विक हैसयित बढ़ाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना होगा। सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती गा्रमीण इलाकों तक इंटरनेट पहुंचाना है। साल 2009-10 के खर्च पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के मुताबिक इंटरनेट क्रांति से ग्रामीण दुनिया अभी बाहर है।

डिजीटल एमपॉवर फाउंडेशन के संस्थापक ओसामा मंजर ने अपने एक लेख में कहा है कि पंचायती राज मंत्रालय के मुताबिक भारत में अभी 2,45,525 पंचायती दफतर है। इनमें 582 जिला पंचायत, 6,299 बलॉक पंचायत और 2,38,644 ग्राम पंचायत शामिल है। लेकिन, इन में इंटरनेट की बात तो दूर कंप्यूटर भी सिर्फ 58,291 पंचायतों में है।

मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद’ द्वारा न्यू मीडिया को विज्ञान के साथ जोड़ने का विचार अच्छा है लेकिन इसे अमली जामा पहनाने के लिए हमें भारतीय भाषाओं में अपनी खुद की तकनीक विकसित करनी होगी आज कोई बड़ी सोशल नेटवरकिंग साइट या सर्च इंजन ऐसा नही है जिसे किसी भारतीय कंपनी ने बनाया हो। जबकि सच्चाई यही है कि विदेशी कंपनियों के इन उत्पादों को तैयार करने में अहम भूमिका भारतीय सॉफ्टवेयर प्रोफेशनलल्स से निभाई है।

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