डाइटिंग के बाद पैदा हुए हारमोन बदलाव ही दोबारा से आपको मोटापे की ज़द में ले आते हैं

डाइटिंग के बाद पैदा हुए हारमोन बदलाव ही दोबारा से आपको मोटापे की ज़द में ले आते हैं फिर से आपका वजन बढ़ जाता है. ऐसे में अतिरिक्त निगरानी की ज़रुरत होती है डाइटिंग के बाद कम हुए तौल को बनाए रखने में, भूख से लड़ने के तमाम जतन सारे नुश्खे आजमाने पड़ते हैं. तमाम तरह के पापड बेलने पडतें हैं रिसर्चरों का यही कहना है.

माहिरों के अनुसार भूख से जुड़े हारमोन अपना बदला हुआ स्तर डाइटिंग के एक साल बाद तक बनाए रह सकतें हैं. जिस अनुपात में बॉडी फैट फ़ीसदी शरीर में जमा चर्बी कमतर होती है उसी के अनुरूप कुछ हारमोनों के स्तर में भी बदलाव दर्ज़ होतें हैं.
वेट लोस रिसर्च भूख शमन कारी तत्वों भूख शामक चीज़ों की तलाश करेगी देर सबेर. बात साफ़ है. तौल कम करना मुश्किल काम है लेकिन और भी मुश्किल है उस तौल माप को बनाए रखना. यही वजह है साल भर के भीतर भीतर ८० फीसद लोग डाइटिंग संपन्न कर लेने के बाद फिर से पुरानी तौल पर लौट आतें हैं.
और हाँ मात्र इच्छा शक्ति का अभाव इसकी एक अकेली वजह नहीं बनती है. न्यू इंग्लैण्ड जर्नल ऑफ़ मेडिसन में छपी एक रिसर्च के मुताबिक़ डाइटिंग जिन भूख से जुड़े हारमोनों में बदलाव ला देती है, विछिन्न कर देती है जिन हारमोनों को वह वेट लोस से पैदा हुए बिखराव तकरीबन एक साल तक वैसे ही कायम रहतें हैं. ऐसे में भूख पर काबू रखना बे-काबू हो जाता है. ला पता हो जातें हैं वह हारमोन जो पेट भरने और भूख शांत होने पर तृप्ति का एहसास करातें हैं. ऐसे में डाईटर के मंसूबे धरे के धरे रह जातें हैं.
ऐसा जैविक परिवर्तनों की वजह से होता है न की अदबदाकर खाने पीने की पुरानी आदतों पर लौट आने की वजह से. यही कहना बूझना है माहिरों का.
बरसों से वाकिफ है विज्ञानी इस तथ्य से कि हमारी अंतड़ियों,(गट), अग्नाशय (पैनक्रियाज़) तथा चर्बी के ऊतकों (फैटी तिश्युज़ )में मौजूद हारमोन ही हमारी भूख प्यास तथा ऊर्जा को जलाने केलोरियों को उड़ाने की कूवत का विनियमन करतें हैं. असरदार होता है इन हारमोनों का असर. लेकिन इसका विलोम भी उतना ही सही है. यानी शरीर में ज़मा चर्बी में आये बदलावों का प्रतिशत, जमा चर्बी में आई फीसद गिरावट भी लेप्टिन जैसे हारमोनों में आई गिरावट की वजह बनती है. ऐसे हारमोन ही दिमाग को यह इत्तला देते हैं कि बस करो भाई साहब ठूंसा ठांसी अब पेट भर गया नीयत भर गई तृप्त हो गया मन.
दूसरी तरफ वसा के फीसद में आई गिरावट Ghrelin जैसे कुछ और हारमोनों के स्तर को बढा देती है. भूख को हवा देतें हैं ये बाद वाले हारमोन. अलबत्ता इस शोध से पहले इस बात का इल्म नहीं था कि ऐसे बदलाव वेट लोस के बाद भी बने रहतें हैं .कायम रहते हैं.
इसका पता तब चला जब माहिरों ने तकरीबन पचास ऐसे औरत मर्दों को दस हफ्ते तकबहुत ही कम केलोरी वाली खुराक पर रखा जो सभी के सभी या तो ओवरवेट थे या फिर मोटापे क़ी ज़द में थे ओबेसी थे. अब इसके एक साल बाद तक इनके हारमोनों के स्तर का पता लगाते रहे.
डाइटिंग के दौरान औसतन सभी का वजन ३० पोंड कम हुआ जो उनके शुरूआती वजन का तकरीबन १०%के करीब था. ऐसे सात लोगों को अध्ययन से बहिष्कृत कर दिया गया जो इस तौल माप की इस सीमा में नहीं आ सके थे.
शेष सभी के रक्त परीक्षणों से पता चला कई हारमोनों का औसत स्तर बदल गया है जिनमे लेप्टिन, ghrelin तथा इंसुलिन भी थे. इस बदलाव की वजह तौल में आई गिरावट ही बनी थी. उम्मीद के अनुरूप यह भी पता चला नाश्ते के पहले और बाद में भी इन्हें भूख पहले से कहीं ज्यादा उग्र रूप लिए लगती थी.
दस साप्ताहिक अध्ययन के बाद सभी प्रतिभागियों को अपनी सामान्य खुराक पर लौट जाने के लिए कहा गया इस हिदायत के साथ कि रोजाना बिना नागा उन्हें आधा घंटा कसरत भी करनी हैं. खुराक के माहिरों से संपर्क भी बनाए रखना है. साल भर बीतने पर सभी का तौल १२ पोंड बढ़ गया तथा भूख बेतहाशा लगती थी. हारमोनों का स्तर भी आंशिक तौर पर ही तबदील हुआ था.
माहिरों के अनुसार हारमोनों के स्तर की आंशिक भरपाई तथा बदलाव का कायम रहना एक विकासात्मक जीवन की निरंतरता को बनाए रखने वाली रणनीति है जो युगों युगों में विकसित हुई है. खोये हुए वजन की पुनर्प्राप्ति इसी सर्वाइवल टेकटिक के तहत होती है, अनेकानेक तरकीबें कुल मिलाकर दिमाग को बत्लारी रहतीं हैं, भूख लगी है खाओ, खाना नहीं छोड़ना है जीवन की कायमी के लिए यह ज़रूरी है.
But now that we live in a world where calories are so easily consumed and physical exercise — the best way to burn off those calories — is largely unnecessary for day-to-day survival, these biological drives are backfiring and contributing to obesity, Burant says.
इसका मतलब यह भी नहीं है कि वेट गें अपरिहार्य है होनी ही होनी है पुराने तौल की वापसी. इसका मतलब यह भी नहीं है कि व्यक्ति के इच्छा शक्ति का कोई अर्थ नहीं है. व्यक्तित्व और मनोविज्ञान मनोजगत से चस्पां बातों का असर होता है लेकिन हारमोनों में होने वाले बदलाव असली हैं भौतिक परिघटना हैं. जिनके असल भौतक प्रभाव भी हैं. यही वजह है कुछ लोग तौल को देर तक बनाए रहतें हैं लेकिन कुछ और जल्दी ही वेट गेन कर लेते हैं. सचेतन सायास जतन करने पडतें हैं खबरदारी रखनी पड़ती है भूख का शमन करना पड़ता है कम हुई तौल को बनाए रखने में जो हरेक के बसकी बात नहीं.
रिसर्च ज़ारी है तमाम कोशिशें चल रहीं हैं कैसे हारमोनों का स्तर जल्द से जल्द वेट लोस के बाद कायम (स्थिर) रखा जाए. लेप्टिन हारमोन पुनर्स्थापन भी आजमाया गया है घटी हुई तौल को बनाए रखने में. जैसे मधुमेह ग्रस्त व्यक्ति को बाहर से इंसुलिन दी जाती है ताकि ग्लूकोज़ का मान्य स्तर बना रहे ऐसा ही कुछ तौल घटाके उस पर कायम रहने वालों के लिए भी किया जाना है. हारमोन और ओबेसिटी रिसर्च में भूख शमन कारी चीज़ों का अन्वेषण भी होता ही रहेगा.
साभार : साइंस ब्लोगर्स एसोसिएशन औफ इंडिया

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