त्वरित कार्यवाही की आवश्यकता है मुरार नदी को

ग्वालियर मीडिया चौपाल से लौटकर प्रतिभा कटियार 

Pratibha Katiyarग्वालियर : ना तो  हम किसी अभियान में शामिल होने जा रहे, और ना किसी परियोजना का हिस्सा बनने, मुद्दा है मुरार नदी का जिस पर कोई दीर्घकालीन योजना नहीं, बल्कि त्वरित कार्यवाही करने की आवश्यकता  है।  मामला नदी सरंक्षण व् पुनर्जीवन से जुड़ा है और इन दोनों बातों का जिक्र इसलिए करना पड़ रहा ताकि हम  इन दोनों बातों का अर्थ समझ सकें। बात मुद्दे से भटकाने की नहीं है, बल्कि उसके इर्द-गिर्द जमी परत को हटा कर मुद्दे के और करीब जाने की है।
११ अक्टूबर, २०१५ तथा पूर्व से  ही निर्धारित समय ठीक ९ बजकर ३० मिनट। हम ग्वालियर शहर की एक खास नदी जो आज की तारीख में एक गंदे नाले की तरह दिखाई दे रही थी उसका भ्रमण करने आये थे।  नदी इसलिए कहना पड़ रहा क्योंकि हमें इस नाले का परिचय नदी के रूप में दिया गया और विलुप्ति की ओर अग्रसर इस नदी के अतीत का किस्सा सुनाया गया। बताया गया कि यह नदी आज से करीब सत्तर वर्ष पूर्व अपने भव्य रूप में हुआ करती थी तथा शहर के बीचों-बीच शान से बहा करती थी, इसका धार्मिक और ऐतिहासिक जुड़ाव यहाँ के नागरिकों के स्मृति पटल पर यादों के रूप में है। हम जिससे भी मिले सबने इसके प्राचीनतम भव्य रूप की गाथा सुनाई और बताया नदी हमारे रीति-रिवाजों, संस्कृति व् पर्व परंपरा से किस तरह जुड़ी रही है। Media Chaupal Murar Nadiपर इन सत्तर वर्षों में ऐसा क्या हुआ इसे जानने को उत्सुक उस भ्रमण में शामिल सभी लोग थे, बताते चलें कि एक गैर सरकारी संस्था स्पंदन द्वारा नदी सरंक्षण व पुनर्जीवन विषय पर राष्ट्रीय मीडिया कार्यशाला का आयोजन जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर में था। कार्यशाला को मीडिया चौपाल नाम दिया गया। इस चौपाल में करीब ३०० से अधिक लोगों ने अपनी भागीदारी दी थी, जिसमें मीडिया से जुड़े तमाम लोग शामिल थे, जाने माने पत्रकार, मीडिया की पढ़ाई कर रहे  विद्यार्थी, शिक्षक, शोधार्थी, विषय के जानकार विशेषज्ञ ।
Murar Nadi Gwa 2 नदी के हालात का जायजा लेते हुए तथा आस-पास बसे स्थानीय लोगों से जानकारी लेते हुए हम लोग उस जगह एकत्रित हुए जहाँ इस नदी के बारे में गंभीर चर्चा होनी थी तथा सामूहिक रूप से इस मसले का हल निकाला जाना था। कई लोगों ने इस पर अपने व्यक्तिगत विचार रखे, नदी से जुड़े संस्मरण व् इसकी वजह से आस-पास फ़ैल रही बीमारी के बारे में बताया, बाद में हमें एक ऐसे व्यक्ति से मिलाया गया जो ७० साल के बुजुर्ग थे और इन्होंने स्थानीय स्तर से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक नदी बचाने की लड़ाई लड़ी थी। आज भी वो ये लड़ाई लड़ रहे। एक प्रेस कांफ्रेंस मंच के माध्यम से हम लोगों ने उनकी बात सुनी व सबाल जवाब किये। हरिशंकर जी नाम के ये बुजुर्ग काफी ज्ञानी व ज्योतिष के जानकार भी हैं। उन्होंने बताया कि यह नदी कभी महानदी हुआ करती थी। साफ़ स्वच्छ व पवित्र पानी था, जिसमें लोग आचमन करते थे, श्रावण के महीने में मेला लगता था, कुछ दूर आगे चलके एक गुफा थी जिसमें महात्मा रहते थे, गणेश विसर्जन होता था व अक्टूबर -नवंबर माह में पंडित लोग तर्पण करते थे , पानी इतना साफ़ था कि पैसे डालने से दिखाई देते थे।
नदी को शहर की पुरानी धरोहर समझकर इसके बचाव के लिए वो आगे आये। शुरुआत में उन्हें सबने आश्वासन दिया, किन्तु कोई कार्यवाही नहीं हुई तो वो इसे आगे कोर्ट में ले गए,  ग्वालियर से भोपाल, भोपाल से दिल्ली व् दिल्ली से फिर ग्वालियर मामला लटकता रहा। प्रशासन ने इसे अहमदाबाद की साबरमती की तरह बनाने का आश्वासन दिया। साढ़े तीन करोड़ का प्रोजेक्ट बना पर पैसा एक नहीं लगाया गया।  बस काम हुआ तो इतना कि सीवेज लाइन डाल दी गयी और मकान तोड़ने की बात की गयी, सीवेज लाइन तो बनी पर इसके ट्रीटमेंट का कोई प्लांट नहीं लगा।

आज स्थिति यहाँ तक पहुँच गई कि सारे शहर का सीवेज व कूड़ा-कचरा इन पाइपों के जरिये सीधे नदी में गिरता है , यहाँ तक कि गाय-भैंस के गोबर को लोग ट्रकों में भरकर नदी किनारे डाल जाते हैं, नदी के आस -पास उन लोगों ने अवैध कब्ज़ा कर लिया है। इसमें वे लोग भी शामिल हैं जो भू माफिया हैं। नदी के किनारे की जमीन को घेरकर उसमें सब्जियाँ व अन्य फसलें उगा  रहे। इन्हीं के बीच गरीब लोगों की झोपड़पट्टी भी है।  नदी के दोनों ओर के लोगों में इससे जुड़े कई मुद्दों पर आपसी तनातनी दिखाई दी।
बुजुर्ग हरिशंकर जी ने मीडिया चौपाल की इस सहभागिता को लेकर आभार भी व्यक्त किया और बताया कि उन्हें मीडिया के लोगों से काफी सहयोग भी मिला । शहर से निकलने वाले अखबार का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि जागरूकता फ़ैलाने में इसकी अहम भूमिका रही। तीन घंटे तक चले इस नदी भ्रमण सत्र में नदी के प्रति जागरूकता बढ़ाने ,इसे पुनर्जीवित करने व सरंक्षण देने के लिए कार्यशाला में शामिल सभी लोगों से रिपोर्टिंग की भी अपील की गई और कहा गया कि पत्रकार इस पर आवाज उठायें और अपनी भूमिका का निर्वाह करें।

नदी से जुड़े कुछ तथ्य 

 40 किमी तक शहर में बहती है नदी

नदी का उद्गम रमौआ बांध से बताया जाता है

डैम बनाने के चलते ठीक से प्रवाहित ना हो पाने को भी एक कारण मानते हैं यहाँ के स्थानीय निवासी

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