पानी बचाना है तो बिजली बचाइये

अरुण तिवारी

भारत में पानी पर बात करने के लिए दिवस और भी बहुत हैं। अक्षय तृतिया, गंगा दशहरा, कजरी तीज, देवउठानी एकादशी, कार्तिक पूर्णिमा, मकर संक्रांति आदि आदि। 22 मार्च को अंतरराष्ट्रीय जल दिवस तो होता है तो क्यों न बात अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में कर ली जाए। भारत के नये विज्ञापनों में पानी की बचत के नुख्से बर्तन धोने, गाड़ी धोने और सिंचाई में किफायत बरतने तक ही सीमित दिखाये जाते हैं। यह हम सब जानते हैं लेकिन आपको जानकर अच्छा लगेगा कि इस मामले में अंतरराष्ट्रीय नजरिया बेहद बुनियादी और व्यापक भी है।

images (1)वे मानते हैं कि पानी उर्जा है और उर्जा पानी। यदि पानी को बचाना है तो उर्जा बचाओ। यदि उर्जा बचानी है तो पानी की बचत करना सीखो। बिजली के कम खपत वाले फ्रिज, बल्ब, मोटरें उपयोग में लाओ। पेट्रोल की बजाय प्राकृतिक गैस से कार चलाओ। कोयला व तैलीय ईंधन से लेकर गैस संयत्रों तक को ठंडा करने की ऐसी तकनीकि उपयोग करो कि उसमें कम से कम पानी लगे। उन्हें हवा से ठंडा करने की तकनीकि का उपयोग करो। उर्जा बनाने के लिए हवा कचरा तथा सूर्य का उपयोग करो। फोटोवोल्टिक तकनीकि अपनाओ। पानी गर्म करने, खाना बनाने आदि में कम से कम ईंधन का उपयोग करो। उन्नत चूल्हे तथा उस ईंधन का उपयोग करो जो बजाय किसी फैक्ट्री में बनने के हमारे आसपास हमारे द्वारा तैयार व उपलब्ध हों।

पानी और आग का यह रिश्ता सचमुच बेहद दिलचस्प है। इससे असहमत होना मुश्किल है कि बिजली और ईंधन की बढ़ती खपत के इस युग में उर्जा बचाने पर विचार किये बगैर पानी बचाने की दृष्टि में समग्रता का आना असंभव है। सोचिए, यदि गैस, ईंधन व बिजली जैसे स्रोत ही नहीं होंगे तो हमारी गाड़ियां, ट्यूबवेल, रसोईं के स्टोव कैसे चलेगे? उर्जा न हो तो गर्म पानी की लांड्री में कपड़ा धुलवाना सपना ही रह जाएगा। बिना उर्जा के सालभर तक आलू फल व दूसरे उत्पादों की सुरक्षा कैसे संभव होगी? बर्फ व आइसक्रीम कहां संभव होगी? दूसरी तरफ का नजारा यह है कि यदि ताजे पानी की कमी हो गई तो हम पेट्रोल, प्लास्टिक, लोहा, बिजली, गैस जैसे तमाम जरूरी हो चुके उत्पादनों से मरहूम रह जाएंगे।

हकीकत यही है कि पानी के बिना न बिजली बन सकती है और न ही ईंधन व दूसरे उत्पाद बनानेवाले ज्यादातर उद्योग चल सकते हैं। किसी भी संयंत्र को ठंडा करने तथा कचरे का शोधन करने के लिए पानी चाहिए ही। कोयले से बिजली बनानेवाले थर्मल पॉवर संयत्रों में इलेक्ट्रिक जनरेटर को घुमाने के लिए जिस भाप की जरूरत पड़ती है वह पानी के बिना कहां संभव है? परमाणु उर्जा संयत्र 25 से 60 गैलन पानी प्रति किलोवाट घंटा की मांग करता है। तेल को साफ करके पेट्रोल बनाना बिना पानी के संभव नहीं है। बायो डीजल भी क्या बिना पानी के संभव है?

पानी बचाने के लिए उर्जा बचाने का यह नजरिया मुख्यरूप से अमेरिका में ही पनपा है लेकिन उनका यह नजरिया एक खास अनुभव के बाद आया है। यूनियन आफ कंसर्न सांइटिस्ट की एक रिपोर्ट बताती है कि बिजली बनाने में अमेरिका प्रतिदिन इतना ताजा पानी खर्च करता है जितना न्यूयार्क जैसे 180 शहर मिलकर एक दिन में खर्च करते हैं। यह आंकड़ा 40 बिलियन गैलन प्रतिदिन का है। अमेरिका में पानी की कुल खपत का मात्र 5 प्रतिशत उद्योग में, 13 प्रतिशत घरेलू उपयोग में, 37 प्रतिशत खेती में, 5 प्रतिशत अन्य कामों में और सबसे ज्यादा 41 प्रतिशत उर्जा के उत्पादन में खर्च होता है। एक ओर उर्जा के उत्पादन में ताजे पानी का खर्च बढ़ रहा है तो दूसरी तरफ किसान उद्योग और शहर के बीच की खपत व बंटवारे के विवाद बढ़ रहे हैं। आंकलन यह है कि कम होती बारिश व सूखा मिलकर 2025 तक लास वेगास, साल्ट लेक, जार्जिया, टेनेसी जैसे इलाकों के पानी प्रबंधन पर लाल निशान लगा देंगे। चेतावनी यह भी है कि 2050 तक कोलरेडो जैसी कई प्रमुख नदी के प्रवाह में भी 20 प्रतिशत की कमी आयेगी।

बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होनेवाले इन संयंत्रों से जो गरम पानी बाहर आता है उससे पूरा जैविक तंत्र प्रभावित होता है। पानी की शुद्धता के लिए जरूरी मछलियां व अन्य जीव तथा वनस्पति नष्ट हो जाते हैं। आसपास की मिट्टी की गुणवत्ता भी खत्म होती है और खेती भी प्रभावित होती है। इतना ही नहीं थर्मल पॉवर प्लांट से निकलनेवाले आर्सेनिक, पारा, सीसा जैसे खतरनाक रसायन पूरे जीवन चक्र को बुरी तरह से प्रभावित करते हैं। अमेरिका के थर्मल पॉवर प्लांट से 120 मिलियन टन कचरा छोड़ने का आंकड़ा है। भारत की सरकार ऐसे आंकड़ों को शायद ही कभी सार्वजनिक करे। खैर, इस पूरे परिदृश्य का परिणाम यह है कि 2004 के बाद से अब तक अमेरिका के 12 बड़े बिजलीघर बंद हो चुके हैं। अमेरिका के कई राज्यों में बांधों का बंधन ही खत्म कर दिया गया है।

पानी से बिजली बनाने की योजनाओं के मामले में भारत की पनबिजली परियोजनाएं पानी की मार झेल रही हैं। केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण के मुताबिक भारत की 89 प्रतिशत पनबिजली परियोजनाएं अपनी स्थापना से कम बिजली उत्पादन कर रही हैं। सैंड्रप के अनुसार टिहरी की क्षमता 2400 मेगावाट है लेकिन व्यवहार में वह औसतन 436 मेगावाट बिजली उत्पादन ही कर रही है। टिहरी में आज तक अधिकतम उत्पादन 700 मेगावाट से अधिक कभी नहीं हुआ। वाष्पन, गाद निकासी, मलवा निष्पादन और कुप्रंधन को देखें तो पनबिजली परियोजनाएं लाभ का सौदा कम ही रहती हैं। बावजूद इसके विकास के नये पैमनों पर अमेरिका के नजीर के रूप में पेश करनेवाले हमारे नेता अफसर, योजनाकार और खुद नागरिकों ने अमेरिका और खुद के अनुभवों से कुछ नहीं सीखा।

नेता, अफसर और योजनाकार भले ही कुछ सीखें न सीखें लेकिन हमारे शहरी समाज को अमेरिका से कम से कम एक बात जरूर सीख लेनी चाहिए कि अगर वे पानी बचाना चाहते हैं तो उन्हें बिजली बचत का संकल्प लेना पड़ेगा।

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