भारतीय वैज्ञानिक नोबल पुरस्कार को लक्ष्य करके अपना शोध कार्य नहीं करते

(राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस के तृतीय दिवस की गतिविध‍ि पर नवनीत कुमार गुप्ता की रिपोर्ट)

राष्ट्रीय विज्ञान कांग्रेस_National Science Congress के तीसरे दिन का आरंभ नोबल पुरस्कार विजेता प्रो. सर्ज हेरोके_Serge Haroche के व्याख्यान से हुई। उन्होंने क्वांटम भौतिकी_Quantum Physcis पर रोचक व्याख्यान दिया। प्रो. सर्ज को सन् 2012 में प्रो. डेविड जे. विटेलैंड_David J. Wineland के साथ उनके द्वारा प्रकाश कणों पर आधारित विशिष्ट क्वांटम सिस्टम के मापन और मेनिपुलेशन संबंधी कार्य के लिए नोबल पुस्कार से सम्मानित किया गया था।

pm-speech-at-science-congress-embed-1-pti1-3-2017-000174bउन्होंने अपने व्याख्यान (Power and Strangeness of the Quantum) में कहा कि किस प्रकार माइक्रोस्कोप सिस्टम को समझ कर प्रौद्योगिकी के माध्यम से विभिन्न नवाचार किए जा सकते हैं। उन्होंने यह भी समझाया कि किस प्रकार से माइक्रो और मैक्रो स्तर पर सिस्टम विभिन्न प्रकार से व्यवहार करते हैं। उन्होंने समझाया कि किस प्रकार से प्रायोगिक साक्ष्यों के आधार पर क्वांटम पर आधारित विभिन्न अनुप्रयोग जैसे एमआरआई एवं लेसर आदि अस्तित्व में आए।
दूसरे दिन का एक प्रमुख व्याख्याम भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार डा. राजगोपाला चिदंबरम_Rajagopala Chidambaram का था। उन्होंने ‘विज्ञान में अंतर्राष्ट्रीय भागीदारी’ विषय पर अपना व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी दोनों संयुक्त रूप से असंभव को संभव करने की क्षमता रखते हैं। आज भारत अनेक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक कार्यक्रमों में भागीदारी कर रहा है। भारत जेनेवा स्थित सर्न परियोजना, तीस मीटर टेलिस्कोप आदि में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। आज भारत अनेक देशों के उपग्रहों का प्रक्षेपण कर रहा है। उन्होंने कहा कि आज भारत ने सुनामी चेतावनी प्रणाली केन्द्र को स्थापित करने के साथ ही पूर्वानुमान क्षेत्र में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है। इसी तरह विज्ञान से संबंधित अनेक क्षेत्रों में भारत आज अंतर्राष्ट्रीय परियोजनाओं में भागीदारी कर रहा है।
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इसी दिन एक सत्र क्लाउड कम्प्यूटिंग और वर्चुअलाइजेशन_Cloud Computing and Virtualization पर था। इस सत्र में केलिफोर्निया विश्वविद्यालय_California University के प्रोफेसर विश्वनाथ मुखर्जी_Vishwanath Mukherjee ने अपने व्याख्यान में क्लाउड कम्प्यूटिंग को समझाते हुए डाटा को सुरक्षित रखने में फायरवॉल के उपयोग में इसकी भूमिका को समझाया। इसके अलावा उन्होंने क्लाउड क्म्प्यूटिंग के क्षेत्र से संबंधित विभिन्न चुनौतियों का भी जिक्र किया।
इनके बाद नेशनल इंफारमेशन केन्द्र, चेन्नई_National Informatics Centre के प्रधान सिस्टम विश्लेषक प्रो. एस. गोपीनाथ ने नेशनल नॉलेज नेटवर्क को विस्तार से समझाया और शोध एवं शि‍क्षा में इसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
श्रीमती प्रमिला कुमार ने डिजिटल भारत विषय पर बोलते हुए नयी प्रौद्योगिकी की स्वीकार्यता संबंधी चुनौतियों संबंधी विचार रखे। उन्होंने कहा कि क्लाउड कम्प्यूटिंग सूचना प्रौद्योगिकी का आधार है। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में आप बिना क्रेडिट कार्ड या नगद के भी अंगूठे की थाप को मशीन पर लगा कर अपने फोन के माध्यम से लेन-देन कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि भारत सरकार की डिजिटल इंडिया पहल समाज को डिजिटल सशक्त बनाकर ज्ञान अर्थव्यवस्था के विकास में मददगार होगी। उन्होंने कहा कि आम जनता की सोच ऐसी बनी है कि वह जल्द ही नयी प्रौद्योगिकी को स्वीकार नहीं करती है। हालांकि कुछ प्रौद्योगिकी को भारतीय आवश्यकताओं के अनुसार डिजाइन नहीं किया जाना भी एक कारण हो सकता है। हमें इस क्षेत्र में आगे बढ़ना होगा क्योंकि आज हमें हमारे विभिन्न वैज्ञानिक प्रयोगों जैसे मंगलयान आदि के डाटा केन्द्र की आवश्यकता होती है।
एक अन्य सत्र फाइवजी और इंटरनेट विषय पर था, जिसमें डा. ऋशि भटनागर ने फाइवजी को समझाते हुए कहा कि यह फोरजी का अलग वर्जन है। असल में फाइवजी फोर से तेज होगा।
इसके अलावा एक और सत्र विज्ञान में सदस्यता और नेटवर्किंग पर था। जिसमें बोलते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के प्रो. ए. मुखोपाध्याय ने इंस्पायर अवार्ड_Inspire Awards के बारे में विस्तार से बताया। इंस्पायर एक वार्षिक आयोजन है, जिसमें वैज्ञानिक कैम्पों का आयोजन करने के साथ ही उच्च अध्ययन के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है। उन्होंने इस अवसर पर अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक एवं अन्य विज्ञान आयोजनों की जानकारी दी, जिनके माध्यम से विद्यार्थियों के नवाचारों को प्रोत्साहित किया जाता है।
नेहरू प्लाजा-द्वितीय में आयोजित सत्र में शांति स्वरूप भटनागर सम्मान_Shanti Swarup Bhatnagar Award प्राप्त वैज्ञानिकों का व्याख्यान था। असल में यह सत्र एक प्रयोग के तौर पर आयोजित किया गया, जिसमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में उपलब्धि प्राप्तकर्ता वैज्ञानिकों एवं प्रौद्योगिकीविदों को व्याख्यान के लिए आमंत्रित किया गया था।
इस व्याख्यान में कहा गया कि भारतीय वैज्ञानिक नोबल पुरस्कार को ध्यान में रखकर अपना वैज्ञानिक शोध कार्य नहीं करते। असल में भारत में पोस्ट-डॉक्टरेट को लेकर ग्लैमर नहीं है। इसके अलावा यहां नवाचार की कमी है। साथ ही यहां जो वातावरण है उसमें कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता। असल में नवाचार बिना जोखिम के नहीं हो सकता। हमारे सामने एडीसन सहित अनेक वैज्ञानिकों के उदाहरण हैं, जो अनेक बार असफल हुए लेकिन एक दिन उन्हें सफलता मिल ही गयी। उन्होंने कहा कि हमारे यहां शोध के निवेश की भी कमी है। यदि किसी समीक्षक को आपका शोध प्रस्ताव पसंद नहीं आता तो वह आपके शोध कार्य को स्वीकृत नहीं करेगा।
जेएनयू के प्रो सुमन कुमार धर ने कहा कि हमारे इतिहास में जेसी बोस, सीवी रमन, पीसी रे आदि वैज्ञानिकों का योगदान उल्लेखनीय है। स्वतंत्रता के बाद भी हमने कार्यक्रमों को लक्ष्य करके शोध कार्य को आगे बढ़ाया। पिछले 30 वर्षों में शोध कार्य केवल संस्थानों तक सिमट गए हैं। आज विश्वविद्यालयों में अधिक से अधिक शोध कार्य होना चाहिए, जो अभी मुख्यतया अध्यापन तक सीमित है।
डा. वेंकटानारायण पदनाभन ने कम्प्यूटर क्षेत्र से संबंधित अपने अनुभव के आधार पर कहा कि अपने शोध का लक्ष्य ऐसा होना चाहिए कि उसे लोग करने की सोचे। शोध के लिए एक विशिश्ट सोच होनी चाहिए। असल में आज कम्प्यूटर साइंस में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। कुछ सालों पहले कोई वाई-फाई के बारे में सोच भी नहीं सकता था।
टीआईएफआर से आए डा. अमोल दिघे ने शोध संबंधी मॉडल को एक पिरामिड के रूप में समझाया कि आज हमारे देश में वैज्ञानिक साक्षरता की आवश्यकता है। वैज्ञानिकों को टॉप डाउन एप्रोच के साथ काम करना होगा। वैज्ञानिक क्या कर रहे हैं इसके बारे में आम जनता को पता होना चाहिए। अधिक से अधिक लोगों को विज्ञान से जोड़ना होगा। इंस्पायर जैसी योजनाएं इसी उद्देश्य के साथ शुरू की गयी हैं जो विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करती हैं। यह वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी है कि वो अपने काम को जनता तक पहुंचाएं।
भारतीय विज्ञान संस्थान, बैंगलोर से आए डा सुधीर कुमार वेमपति ने कहा कि विगत तीस-चालीस सालों के दौरान शोध की प्रकृति बदल गयी है। अब शोध वैश्विक हो गयी है। शोधकर्ता के सामने नयी चुनौतियां हैं। हमें रचनात्मकता पर ध्यान देना होगा। विज्ञान को समाज तक पहुंचाना होगा। हमें युवा पीढ़ी को विज्ञान की ओर आकर्षित करना होगा। अध्यापन के क्षेत्र में लगे लोग ही यदि नवाचार नहीं करेंगे तो वह छात्र से कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि वह कोई नवाचार करे। विश्वविद्यालय को शोध कार्य में आगे आना होगा। आज अनेक संस्थाएं मिल कर काम कर रही हैं। विभिन्न परियोजनाओं में विज्ञान से संबंधित विभिन्न विभागों को साथ रहकर ही काम करना होगा तभी परिणाम बेहतर आएंगे। क्या कारण है कि आज भी हम मलेरिया किट के लिए विदेशों पर निर्भर हैं।
इसके बाद आयोजित सत्र स्मॉर्ट सिटी_Smart City पर था। जिसमें कहा गया कि स्मॉर्ट सिटी की कोई निश्चित अवधारणा नहीं है। असल में यह क्षेत्र आधारित विकास है। हर शहर की टिकाऊ विकास के लिए अपनी-अपनी आवश्यकताएं हैं। फिर भी हमारा ध्यान तीन जी पर रहता है। स्मॉर्ट सिटी का लक्ष्य है नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना। एक स्मॉर्ट शहर यदि अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है तो उसके द्वारा उपयोग की गयी तकनीकों, नीतियों, नवाचारों का उपयोग कर दूसरे शहर का भी विकास किया जा सकता है। कचरे के निपटान, प्रदूषण से निपटने, स्वास्थ्य सेवाओं, जल एवं विद्युत आपूर्ति सहित अनेक ऐसे क्षेत्र है जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका है।
स्मॉर्ट सिटी के विकास के लिए तीन बातों को आधार बनाया गया है। जिसमें एक पहलू है किसी शहर में ऐसा माध्यम हो जिसकी पुनः स्थापना शहर के विकास में सहायक हो तो उसे लागू किया जाए। दूसरा पुनःविकास है जिसके माध्यम से आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर शहर को बेहतर बनाया जा सके। तीसरा बिन्दु क्षेत्र को हरित क्षेत्र बनाने से है ताकि पर्यावरण के साथ ही लोगों को स्वास्थ्य का भी ख्याल रखा जा सके। स्मॉर्ट सिटी में ऐसी प्रौद्योगिकियां उपयोगी होंगी जो जल एवं विद्युत आदि संसाधनों का सरंक्षण करने में सफल हो सकें।
तीसरे दिन विज्ञान संचारक सम्मेलन की शुरूआत हुई। इस कार्यक्रम का शुभारंभ श्री वेंकटेश्वरा विश्वविद्यालय के उपकुलपति प्रो. दामोदरन ने किया। इस कार्यक्रम में देश भर से आए अनेक विज्ञान संचारक एवं वैज्ञानिक उपस्थित रहे। 
navneetलेखक परिचय: नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दस वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन आदि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए प्रयासरत हैं।  आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से सम्बंद्ध हैं।

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