राजा भोज की सांस्कृतिक चेतना

(अनिल सौमित्र) आज का मध्यप्रदेश अगर सांस्कृतिक रूप से चैतन्य है तो इसका करण यहां की सांस्कृतिक विरासत भी है। मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत की बात विक्रमादित्य और परमार वंश के राजा भोज के अवदानों को याद किए बिना नहीं की जा सकती। ऐसा शासक जिसकी इतिहास में उपस्थिति के स्पष्ट और सबल प्रमाण मौजूद हों, जिसके स्व रचित ग्रंथ हों, जिसकी रचना की प्रमाणिकता समकालीन और परवर्ती विद्वानों ने बार-बार की हो, जिसे जनमानस ने विविध ज्ञान धाराओं के मार्गदर्शक के रुप में स्वीकार किया हो, ऐसा सर्वाधिक प्रचलित नाम राजा भोज का है।  भोज, लोककथाओं और अनुश्रुतियों के भी पात्र बन गए। ‘‘कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली’’ ऐसी ही लोक प्रचलित कहावत है।

राजा भोज ने सुरक्षा, संरक्षण और वीरता की संस्कृति का पोषण किया। भोज ने सुरक्षा की दृष्अि से अपनी राजधानी उज्जैन से हटाकर धारा नगरी में बनाई। इसे नए सिरे से बनाया-बसाया। धारा नगरी का धारागिरी लीलोद्यान तो आश्चर्यजनक नवीन यन्त्रों से भरपूर था। इस नगरी का वर्णन स्वयं राजा भोज ने अपनी रचना ‘श्रृंगारमंजरीकथा’ में किया है। धारा को परमार वंश के यशस्वी राजा ने उज्जयिनी से भी अधिक वैभवशाली बनाया। दुर्भाग्यवश धारा नगरी वैभवशाली नगरी नहीं रही। परमार वंश के शासन काल में भी कई बार आक्रमणकारियों ने इस क्षेत्र में मार-काट और लूट मचाई। मुसलमान लुटेरों ने तो धार नगरी को तहस-नहस ही कर दिया। समकालीन संस्कृति, शिक्षा और कला का सर्वश्रेष्ठ केन्द्र ‘‘भोजशाला’’ ध्वस्त कर मस्जिद में तबदील कर दिया गया। अनेक हिन्दू और जेन मंदिरों को भंजित कर मस्जिद का रूप दे दिया गया। हालांकि इन ध्वंसावशेषों को पुनर्जिवित करने का अभियान शुरु हो चुका है। चाहे भोजशाला हो या भोजपुर का मंदिर या फिर भोपाल को भोजपाल बनाने की काशिश, ये सब प्रयास इस्लामिक विध्वंसकारियों का जवाब ही है। यद्यपि आज की धार नगरी उतनी वैभवशाली या सम्पन्न नहीं है। लेकिन वहां मौजूद अवशेष आज भी धार नगरी की वैभव, सम्पन्नता और विराटता की गवाही देते हैं। धारा नगरी में स्थित भोजशाला आज भी मुसलमान शासकों की सांस्कृतिक संवेदनहीनता, निष्ठुर धार्मिक असहिष्णुता और क्रूर व्यवहार की याद दिलाता है।

भोजशाला के स्तंभों पर आज भी वर्णमाला एवं व्याकरण संबंधी सूत्र और नक्काशी देखने को मिल जाते हैं। जो शिलालेख क्षत-विक्षत नहीं किए जा सके उन्हें ज्यों का त्यों औंधा कर दीवारों पर लगा दिया गया है। 1902 में ऐसे दो शिलालेख जब उखडे तो उनके भीतर की महत्वपूर्ण जानकारी प्रकट हुई। 1903 में तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन की आज्ञा से उन्हें सीधा कर फ्रेम में लगाकर भोजशाला में लगाया गया, वे आज भी वैसे ही लगे हैं। इसमें एक पर भोजकृत ‘‘अवनिकूर्मशतक’’ और दूसरे में ‘‘पारिजात-मंजरी’’ अथवा ‘‘विजय श्री’’ नाटिका के अंश हैं। यह नाटिका परमार वंश के राजा अर्जुनवर्मनदेव की विजय श्री से संबंधित है।

परमार वंश के प्रारंभिक शासक उपेन्द्र, वैरिसिंह प्रथम, सियक प्रथम, वाक्पति प्रथम तथा वैरिसिंह द्वितीय के संबंध में बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। प्राप्त जानकारियों के अनुसार संभवत परमार वंश सीयक द्वितीय (दसवीं शती) तक राष्ट्रकूटों के प्रतिनिधि के रूप में शासन करता रहा था। बाद में सीयक द्वितीय का पुत्र वाक्पति मुंज (974-997 ई.) मालवा का स्वतंत्र शासक हो गया। उसने अपने पड़ोसी क्षेत्रों पर अधिकार कर पर्याप्त राज्य विस्तार किया। सीयक द्वितीय ने सौराष्ट्र के चालुक्यों तथा मालवा के उत्तर-पश्चिम में स्थित हूणों को भी पराजित किया। मुंज का छोटा भाई सिंन्धुराज (997-999ई.) था। उसने कुन्तल तैलप द्वितीय को पराजित किया। हूणों को पराजित कर उसने वागड़ (वांसवाड़ा-डूंगरपुर) क्षेत्र पर विजय प्राप्त की। बाद में उसने कौशल (छत्तीसगढ़) पर अधिकार किया। तदन्तर लाट, अपरांत आदि के बाद दक्षिण में चोल, मुरल (केरल)ःपर अधिकार प्राप्त किया। ऐतिहासिक प्रमाणों पर ध्यान देने से यह तथ्य भी ज्ञात हो जाता है कि मुंज के छोटे भाई सिंधुराज ने तैल द्वितीय के उतराधिकारी सत्याश्रय पर आक्रमण करके अपने भाई की अवमानना का प्रतिकार लिया था और अपने राज्य का विजित प्रदेश चालुक्यों से वापस भी लिया। उसने लाट के शासक को हराया किन्तु गुजरात के चालुक्य मुंडराज से वह पराजित हो गया। सिन्धुराज ने एक नागवंशी शासक शुखपाल (संभवतःबस्तर क्षे़त्र में स्थित) की पुत्री शशिप्रभा से विवाह किया। राजा भोज (999-1055 ई.) इसी सिन्धुराज का पुत्र था।

सिंधुराज के पुत्र तथा उतराधिकारी भोज को मध्ययुग के सुप्रसिद्ध शासकों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। राजा भोज प्रतापी राजा थे। उन्हें युद्ध, वीरता तथा साहित्य-संस्कृति सभी क्षेत्रों में यश प्राप्त हुआ। निश्चित तौर पर भोज परमार एक पराक्रमी सेनानायक और योग्य शासक थे। अनवरत परिश्रम के द्वारा उन्होंने अपने राज्य का विस्तार किया। उनके साम्राज्य में मालवा, कोंकण, खानदेश, भिलसा, डुंगरपुर, बांसवाड़ा, चित्तौड़ और गोदावरी घाटी का कुछ हिस्सा शामिल था। भोज एक वीर योद्धा होने के साथ ही महान् निर्माता, अद्वितीय विद्या-विज्ञान अनुरागी तथा विद्वानों का एक अत्यन्त उदार आश्रयदाता थे। वे स्वयं भी बहुमुखी प्रतिभा के धनी कलाधर्मी थे। उन्होंने धारा नगरी को अनेकानेक मनोरम तथा भव्य कृतियों से शोभायमान किया। भोजपुर उनके ही नाम पर बसा है। इसी के आसपास उन्होंने विशालकाय जलसंरचना भोजसर तालाब का निर्माण करवाया। उनके अनेक निर्माण कार्यों का उदयपुर प्रशस्ति में विवरण मिलता है। इसी प्रशस्ति के अनुसार राजा भोज ने केदारेश्वर, रामेश्वर, सोमनाथ, सुंडार आदि अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया। समरांगण सूत्रधार, सरस्वतीकंठाभरण, सिद्धांत संग्रह, राजमार्तंड, योगसूत्रवृत्ति, विद्याविनोद, युक्ति-कल्पतरु, चारू-चर्चा, आदित्यप्रताप सिद्धांत, आयुर्वेद सर्वस्व आदि ग्रंथों की रचना का उन्हें श्रेय है। भोज रचित ये रचनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि साहित्य-शास्त्र, काव्य, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, चिकित्साशास्त्र, वास्तुकला, व्याकरण, राजनीति-शास्त्र, वनस्पति-शास्त्र आदि विषयों में उनकी कितनी रुचि और विद्वत्ता थी। आइने ए अकबरी में प्राप्त उल्लेखों के अनुसार भोज की राजसभा में पांच सौ विद्वान थे। इन विद्वानों में नौ (नौरत्न) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भोज के उत्तराधिकारी जयसिंह तथा उदयादित्य दोनों ही कल्याणी के चालुक्य तथा गुजरात के चालुक्य शासकों से अपने राज्य की रक्षा के लिए युद्धरत रहे। उनके बाद लक्ष्मणदेव (जगद्देव), नरवर्मन, जयवर्मन, विन्ध्यवर्मन, सुभटवर्मन आदि शासक हुए। किन्तु धीरे-धीरे परमार-शक्ति का हृास होता गया। 1305 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने मालवा पर कब्जा कर लिया।

राजा भोज से संबंधित 1010 से 1055 ई. तक के कई ताम्रपत्र, शिलालेख और मूर्तिलेख प्राप्त होते हैं। इन सबमें भोज के सांस्कृतिक चेतना का प्रमाण मिलता है। एक ताम्रपत्र के अन्त में लिखा है – स्वहस्तोयं श्रीभोजदेवस्य। अर्थात् यह (ताम्रपत्र) भोजदेव ने अपने हाथों से लिखा और दिया है। भोज के बारह ताम्रपत्र या शिलालेख प्राप्त हैं। भोज ने यह उल्लेख किया है कि आयुधवेत्ता होने के बावजूद भी राजा को स्वयं युद्ध नहीं करना चाहिए। क्योंकि यह पाया जाता है कि युद्धों में कमजोर भी ताकतवर को मार डालते हैं – स्वयं राज्ञा न योध्दव्यं येपि शस्त्रास्त्रकोविदाः। मृता युध्देषु दृश्यन्ते शक्तेभ्यः शक्तिमत्ताराः।। युक्तिकल्पतरु, नीतियुक्त, 58.
राजा भोज के समय मालवा क्षेत्र में निर्माण क्रांति आ गई थी। अनेक प्रसाद, मंदिर, तालाब और प्रतिमाएं निर्मित हुई। मंदसौर में हिंगलाजगढ़ तो तत्कालीन अप्रतिम प्रतिमाओं का अद्वितीय नमूना है। आज मालवा क्षेत्र में जो कुछ निर्मितियों के प्राचीन रूप दिखाई देते हैं, उनमें से अधिकांश परमारकालीन और उनमें भी बहुधा भोज कालीन हैं। राजा भोज ने शारदा सदन या सरस्वती कण्ठभरण बनवाये।  वात्स्यायन ने कामसूत्र में इस बात का उल्लेख किया है कि प्रत्येक नगर में सरस्वती भवन होना चाहिए। वहां गोष्ठियां, नाटक व अन्य साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियां होते रहना चाहिए। राजा भोज ने संभवतः इन परंपराओं के अनुसरण के लिए ही धार, माण्डव तथा उज्जैन में सरस्वतीकण्ठभरण नामक भवन बनवाये थे। भोज के समय ही मनहर वाग्देवी की प्रतिमा संवत् 1091 (ई. सन् 1034) में बनवाई गई थी। गुलामी के दिनों में इस मूर्ति को अंग्रेज शासक लंदन ले गए। यह आज भी वहां के संग्रहालय में बंदी है। भोज ने वाग्देवी स्त्रोत भी रचा था और सरस्वतीकण्ठभरण के आरंभ में भी वाग्देवी की ही स्तुति की गई है। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। यहां का विशाल किन्तु खंडित शिवमंदिर आज भी भोज की रचनाधर्मिता और इस्लामिक जेहाद और विध्वंस के उदाहरण के रूप में खड़ा है। यहीं बेतवा नदी पर एक अनोखा बांध बनवाया गया था। इसका जलक्ष्ेात्र 250 वर्गमील है। इस बांध को भी होशंगशाह नामक आक्रंता ने तोड़ कर झील खाली करवा दी थी। यह मानवनिर्मित सबसे बड़ी झील थी जो सिंचाई के काम आती थी। उसके मध्य जो द्वीप था वह आज भी दीप (मंडीद्वीप) नाम की बस्ती है।

राजा भोज की काव्यात्मक ललित अभिरुचि, सूक्ष्म व वैज्ञानिक दृष्टि उन्हें दूरदर्शी और लोकप्रिय बनाता रहा। इसके अनेक ऐतिहासिक प्रमाण है कि राजा भोज विद्वानों का अप्रतिम आश्रयदाता था, अनोखा काव्यरसिक था तथा अद्भुत अकादमिक प्रतिभा का धनी भी। सरस्वतीकण्ठाभरण के टीकाकार अजड़ के अनुसार भोज ने स्वयं चौरासी ग्रंथों की रचना की है। लगभग इतनी ही उनकी उपाधियां भी हैं। यह उपाधि भोज के ताम्रपत्रों, शिलालेखों तथा ग्रंथों से प्राप्त होते हैं। मालवमण्डन, मालवाधीश, मालवचक्रवर्ती, सार्वभौम, अवन्तिनायक, धारेश्वर, त्रिभुवननारायण, रणरंगमल्ल, लोकनारायण, विदर्भराज, अहिरराज या अहीन्द्र, अभिनवार्जुन, कृष्ण आदि कितने विरूदों से भोज विभूषित थे।

भोपाल में राजा भोज की मूर्ति स्थापित की जा रही है। संभव है आने वाले दिनों में भोपाल को भोजपाल के नाम से जाना जाये। भोजशाला को इस्लामिक ध्वंस के कलंक से मुक्त करने और उसे भोज की प्रेरणाओं से युक्त करने की कोशिश भी हो ही रही है। यह भी संभव है कि शीध्र ही वाग्देवी गुलामी के संग्रहालय से मुक्त होकर अपने मंदिर में विराजमान होंगी। यह तभी संभव है जब राजा भोज की सांस्कृतिक चेतना हमारे भीतर भी व्याप्त हो। राजा और प्रजा दोनों धर्मयुक्त हों। राजनैतिक नेतृत्व सेक्युलरिज्म का जामा उतारे और धर्मध्यजा उठाए, तभी प्रदेश और देश में सांस्कृतिक पुनर्जागरण का वास्तविक उद्घोष संभव है।
(लेखल सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया एक्टिविस्ट हैं )
ई-31, 45 बंगले, भोपाल – 462003, मध्यप्रदेश

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