आयुर्वेद के हिसाब से फल-सब्जिओं के गुण-धर्म

घिया यानि लौकी शीत स्निग्ध है, बलकारक व ज्वरनाशक है.

ककड़ी शीत रुक्ष ग्राही तथा पित्तशामक है और मूत्रल है.

परवलगरम, तर है पाचक है, दीपन है, बलकारक है, हल्का है व रुचिकारक है.

तोरी शीत है तर है और कफ-वात कारी है.

“बैंगन” गरम रुक्ष है (कोई-कोई गरम तर कहते हैं ) परंतु शोषण अवश्य हैं, सुपाच्य है.

“सहजन की फली” गरम रुक्ष है, अति सुपाच्य, शूलनाशक व गुल्महती है.

“सेम की फली” शीत है, भारी है, विदाही है, देर से पचती है व वातकारक है.

करेला रुक्ष है, गरम है, वायुकारक है, शीत-ज्वर नाशक है और प्रमेह में हितकारी है.

“सुरण” अर्थात जमीकंद गरम रुक्ष है, दीपन है, देर से पचता है. बवासीर के रोगियों के लिए हितकारी है, चिकनाई बिना खुजली करता है.

“रतालू” गंडूपिडालू कचालू आदि सब शीतल हैं, भारी हैं, देर से पचते हैं पर बल-वीर्य बढाते हैं.

“आलू” गरम है, रुक्ष है, कचालू आदि के बराबर गरिष्ठ नहीं है.

“मूली” चरपरी है, शीतल पाक में गरम है, रोचक है.

“गाजर” लघु शीतल है, रक्त-पित्त नाशक और बलकारक है.

“अरुई” के गुण कुछ-कुछ कचालू के समान है.

“लहसून” तीक्ष्ण गरम व रुक्ष है, रोचक, कफ-वात नाशक पर पित्त कोप करता है.

“प्याज” गरम, तीक्ष्ण, पाचन व संक्रामक रोगों का हर्ता है.

“टिंडे” शीत, रुक्ष वातल है तथा पथरी रोगनाशक है.

“एकबारक” यानि अरियाफूट शीतल, भारी, वातकारक पर देर से पचनेवाला है.

“ग्वार फली” शीतल, वातल, विष्टम्भी, अफरा पैदा करनेवाली, बलकारक और बाजीकरण है.

“भिंडी” सरद है, तर है, बलकारक है, वीर्यकारक व पुष्ट है पर गरिष्ठ भी है.

“तिंडोरी” परवल के समान फल है, रोचक है, सरद है और तर है.

“वाकले की फली” शीतल है, रुक्ष है, वातल है व पेट में अफरा करती है.

“ककोडे” गरम है, रुक्ष है, सुपाच्य है व रुचिकारक है.

“कच्चा आम” अर्थात केरी खट्टा, कसैला, गरम व रुक्ष है पर रुचिकारी है.

“पेड़ का पका आम” खटाई युक्त मीठा होता है, गरम है, स्निग्ध व वायुनाशक है.

“पाल का पका आम” अत्यंत मीठा सुखादु लघु कफ-पित्त कारक व बलवीर्यवर्धक है.

“पाल में ज्यादा पका आम” उतरा हुआ, कम मीठा व वातकारक होता है.

पैबंदी आम” अति मधुर पर भारी कफ-पित्त कारक होता है.

– पतले रस का मीठा आम श्रेष्ठ होता है और गाढ़े रस का गरिष्ठ और भारी होता है.

– आम के रस की खुश्क पथरी भारी, देर से पचाने वाली पर वातनाशक होती है.

– अधिक आम खाने से मंदाग्नि विषम ज्वर, रुधिरविकार, कब्जियत, अफारा तथा नेत्र रोग होने का अंदेशा होता है. ये दोष खट्टे निकम्मे आम के हैं. उत्तम मीठे आम गुणकारी ही होते हैं.

– आम का रस दूध के संग खाने या आम खा कर दूध पीना बहुत गुणकारी है. यह वीर्य और रूप को बढ़ाता है.

– आम खाने से पेट फूले  तो सोंठ की फंकी ले कर दूध पीना चाहिए.

– आम खाने से अतिसार हो तो आम की गुठली ही भूनकर खाएं.

– आम खाने से गरमी अधिक हो और सर-आँखों में जलन महसूस हो या चक्कर मालूम पड़े तो मिश्रीयुक्त गाय का दूध पिएं.

“केला” शीतल है, स्निग्ध है, विष्टम्भी यानि काबिज है, वृष्य है, नेत्र रोग और प्रमेह नाशक है.

“कच्चा केला” शीतल है.

नारियल का जल शीतल है, स्निग्ध है, कफकारक और वस्तिशोधक है.

सुखा खोपरा गरम, रुक्ष और पित्तकारक है. यह खांसी करता है, अधिक खाने से दाह और श्वास पैदा करता है. पर मिश्री के संग नारियल खाना पुष्टिकर्ता और बल-वीर्य बढ़ाता है. अधिक खोपरा खाने से विकार हो तो मिश्री खाएं और ताजा दूध पिएं.

“खरबूजा” तुरसी लिए हो तो विशेष गरम होता है और ऐसे में रक्त, पित्त, और मूत्र खराब करता है.

खरबूजा मीठा अति गरम नहीं है, स्निग्ध है, कोठे को शुद्ध करता है मूत्रल भी है.

“तरबूजा” शीतल है, दाह, तृषा, पित्त सबको शांत करता है और दूर्जर है.

“संतरा” खट्टा हो तो दीपन, शीतल और रुचिकारक है पर बल घटाता है.

“संतरा” मीठा शीतल है, तर है, शरीर का रंग-रूप निखारने वाला और दाहनाशक व बलकारक है.

“जामुन” शीतल है, रुक्ष है, काबिज है, और भारी कफ,पित्त और दाहक है.

“ बड़े बेर” शीतल है, भारी है, तर है. यह मीठे वीर्यवर्धक पर खट्टे वीर्य को क्षति देते हैं.

“कर्कधु” अर्थात झाड़ी बेर शीतल, तर, वात-पित्त नाशक होते हैं. सूखे बेर हलके तृषा दाहशामक तथा भेदक होते हैं. सुखी झाड़ी बेरों का छिलका श्रमदाह और रक्तविकार को दूर करता है.

“करोंदे” कच्चे खट्टे गरम भारी रोचक हैं और कफनाशक हैं.

“ पके करौंदे” मीठे रोचक हैं. ये शीतल, रुक्ष और ग्राही होते हैं.

“पियाल” चिरोंजी का फल तुर्शी लिए मीठा होता है. यह गर्म होता है, तर और कफनाशक होता है.

चिरोंजी पियाल के फल की गुठली होती है. यह गरम है, तर है, पुष्ट है, बाजीकरण है, खांसी वाले के लिए अहितकर है.

– ताजे “कमलगट्टे” शीतल है, स्निग्ध है (कुछ रुक्ष भी कहते हैं ), बलकारी, गरिष्ठ, काबिज तथा गर्भजनक है.

“सिंघाड़े” शीतल, तर, गरिष्ठ, वीर्यकारक, काबिज, कफकारक और पित्तशामक है.

– सुखा हुआ “महुए का फूल” मीठा होता है, शीतल, क्षतक्षय और रक्तदोष नाशक है.

“ फालसे” तुर्शी लिए मीठे होते हैं, शीतल, रुक्ष और हृदय होते हैं. ये पित्त और दाहशामक होते हैं.

शहतूत” गरम, तर होते हैं. ये कंठ रोग में हितकारी हैं.

“कैंथ का फल” खट्टा होता है. शीतल, रुक्ष और ग्राही व रोचक होता है.

“अनार” मीठा पर गरम होता है. यह रोचक है, प्यास दाहक, ज्वर और ह्रदय के रोग को दूर करता है.

– अंगूर कई तरह के होते हैं. बड़े अंगूर सूखकर मुनक्का कहलाते हैं. छोटे सुखकर किसमिस या दाख कहलाते हैं. ये रुक्ष हैं और रक्त-पित्त पैदा करता है.

– पक्का मीठा अंगूर मातदिल है और दस्तावर है. यह बलकारी है और शुद्ध रक्त पैदा करता है.

“पिंड खजूर” शीतल है, तर है, रोचक है, भारी है.

“छुहारे” सूखे गरम हैं, तर हैं, कोष्ट गत वायु को शांत करता है.साथ ही क्षय, ज्वर, अतिसार, मद को नाश करता है.

“कागजी निम्बू” खट्टा, शीतल, तर है. यह दीपन, पाचन और रोचक है. यह उदर पीड़ा, मन्दाग्नि, हैजा को दूर करता है.

“जंबीरी नींबू” गरम है, अति पाचन है, शूल वामन, तृषा, कृमि मन्दाग्नि नाशक है.

– “बिजौर नींबू” कुछ मिठास लिए खट्टा होता है. यह परम दीपन, पाचन है. यह हिचकी, भ्रम नाशक है.

– “मीठा नींबू” शीतल, तर है. यह दाह, तृषा व पित्त को नाश करता है. यह रुचिकारक और विषनाशक है.

“कमरख” शीतल, रुक्ष, ग्राही और कफ-वायु नाशक होता है.

“इमली” रुक्ष, गरम परन्तु दस्तावर, वात-पित्त नाशक है. हालाँकि इसका पत्ता गरम नहीं होता है.

“नाशपाती” तुर्शी हो तो सर्द है पर खुश्की हो तो मीठी मातदिल होती है पर देर से पचती है.

– “नाक” कश्मीरी नाशपाती से छोटा फल है पर मीठा, मातदिल और सुपाच्य होता है.

“सेव” मीठा, तर पर गारा होता है. यह ह्रदय को बल देता है. उन्माद आने और जी घबराने को दूर करता है. यह शुद्ध  रक्त पैदा करता है.

“काबुल का सेव” तुर्शी होता है. यह सरद और खुश्क होता है और थोडा कब्ज भी पैदा करता है.

“अमरूद” सरद है, तर है और देर से पचता है और ज्यादा खाने से अजीर्ण करता है.

“ आडू” विनायक तुर्श होता है और पककर मीठा हो जाता है. यह शीतल, तर है. ज्यादा खाने से जी मिचलाता है और पेट दर्द करता है.

शरीफा” गरम होता है, वीर्य पैदा करता है और उन्माद और जी घबराने में हितकारी है.

शकरकंद” गरम है, तर है. यह वीर्य पैदा करता है, पुष्ट है तथा गरिष्ठ  भी होता है.

“लौकाट” सरद है, दाह और प्यास को बुझाता है. सहारनपुर के उम्दा होते हैं.

“पपीता” सर्द, तर (कुछ लोग गरम, तर कहते हैं ) होता है. यह बवासीर और तिलिवाले के लिए हितकारी है.

“बादाम” गरम, तर है. यह दिमाग के लिए बलदायक है, पुष्टि करता है.

पिस्ता” गरम, तर है. यह परम पुष्टिकर्ता है. यह उत्तेजक भी है. सर्दियों में एक तोला पिस्ता खाकर दूध पीना बहुत बल और पुरुषार्थ देता है.

“अखरोट” गरम, तर है पर सुखी खांसी वाले के लिए हानिकारक है.

“गूलर” सरद है, रुक्ष है और स्त्रियों के श्वेत और रक्त प्रदर के लिए हितकर है. यह प्रमेह के लिए भी हितकर है.

“अंजीर” गरम, रुक्ष है. यह वात-कफ नाशक है.

“आंवले” शीतल, रुक्ष, काबिज हैं,वृष्य हैं. ये सर और नेत्रों के लिए हितकर हैं. इसका मुरब्बा पित्त दाह शामक है और बलकारक है.

“अन्नास” सरद है, तर, है और हृदय व यकृत को बल देता है.

“बेल” गरम, रुक्ष और ग्राही है. कच्चा दवा बनाने के काम आता है और पक्का लोग खाते भी हैं. यह पेट के लिए उत्तम है.

“मोथा” सरद, तर है. यह गरिष्ट पत उन्माद नाशक है.

“पोदीना” गरम, रुक्ष, सुपाच्य है. यह जी मिचलाने और वमन में हितकारी है.

(पंडित मुरलीधर शर्मा की “आरोग्य शिक्षा” पुस्तक से साभार)

 

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