फिर शर्मसार हुई भारतीय नारी मध्यप्रदेश के कटनी की सड़कों पर….

डॉ. शुभ्रता मिश्रा

स्वास्थ्य सुविधाओं और सेवाओं को लेकर लापरवाहीपूर्ण असंवेदनशील घटनाओं का हमारे देश में चलन बनता जा रहा है। रोज समाचारपत्रों में पढ़कर लोग भी आदि से हो गए हैं और शायद प्रशासन की घड़ाई चिकनाहट और चिकनी होती जा रही है, कि शर्म का पानी उस पर पड़ने के पहले ही कहीं संवेदनाओं का लहु बनकर बह जाता है और बिना दाग लगे वैसा का वैसा ही चमचमाता उजला दिखता रहता है प्रशासन और सरकार का घड़ानुमा सरकारी कलश। नीतियां, योजनाएं और भुगतान कागजों पर बहुत शोभा देते आए हैं। कितना अच्छा होता कि ये शोभाएं हकीकतें होतीं, तो आज एक बार फिर किसी मां को सड़कों पर प्रसवपीड़ा के खुलेआम प्रदर्शन पर यूं शर्मसार न होना पड़ता।

भारत में गरीबी को शर्माते सदियां हो रही हैं, पर वास्तव में शर्म जिनको आनी चाहिए, वे कितनी निर्लज्जता से तुरंत बहाने गढ़ लेते हैं कि मुंह बंद कर लेने के अलावा शायद कोई चारा ही नहीं रह जाता। मध्यप्रदेश के कटनी जिले के छोटे से बीरमनी गांव की युवती प्रसव पीड़ा की वेदना से छटपटाती लगभग 20 किमी. तक अपनी इच्छाशक्ति से चल तो लेती है, पर अस्पताल के कर्मचारियों के फोन न उठाने, एम्बुलेंस के न पहुंचने से भारतीय नारी की पीड़ाएं दम तोड़ देती हैं और टूट जाता है एक मां का मां बनने का सपना। सड़क पर पड़े विखण्डित नवजात के टुकड़ों में मृत पड़ी मासूम की सुप्त जिंदगी का मौन बहुत कुछ कहता सा पड़ा रह जाता है सड़कों पर। लोगों के लिए भयानक मंज़र बन जाती है वह घटना, समाचारों को कोसने के लिए बहुत से शब्द मिल जाते हैं। लेकिन उस बीना का क्या जो सड़क पर पड़े अपने बच्चे की तस्वीर के साथ सोशल मीडिया में लोगों का मसाला बन जाती है।

बेहद पीड़ा दे जाती हैं ये घटनाएं और हर बार प्रश्न छोड़ जाती हैं कब तक भारत वहीं अटका पड़ा रहेगा। योजनाएं कब कागजों और फाइलों से निकलकर सचमुच उन तक पहुंचेगी, जिनके लिए बनती हैं। ऐसे विज्ञापनों और प्रदर्शनशीलता का क्या अर्थ, जहां गरीब, स्त्रियां और अशिक्षित किसी न किसी रुप में अपने ही देश में हमेशा ठगा सा महसूस करने पर मजबूर हैं। आंकड़े और हकीकतें इतना बेमेल होती हैं, कि असंतुलन की मार से सिर्फ और सिर्फ असहाय भारतीय ही लुढ़कते पाए जाते हैं और कांटा आंकड़ों में सब कुछ सही बताने के लिए फिर सीधा खड़ा कर दिया जाता है। युवाओं को कहीं कोई मतलब सा नहीं दिखता, वे तकनीकों के खेलों में व्यस्त हैं। स्टार्ट अप की योजनाओं में थोड़ा थोड़ा भविष्य बनाने में व्यस्त कर दिए गए हैं और हम खुश हैं आंकड़ों में कि बेरोजगारी खतम हो रही है। हम खुश हैं आंकड़ों में कि महिला सशक्तिकरण हो रहा है, महिलाएं कैब में रात में महफूज हैं। लेकिन आंकड़े दिन के उजालों में मध्यप्रदेश की सड़क पर एक प्रसव करने को मजबूर उस युवती तक नहीं पहुंच पाते जो अपने उदर को संभाले बिना किसी कैब के पागलों की भांति किसी उबर की रख्तार से भी तेज भागने की क्षमता रखती है।

सोचना और सम्भलना बहुत जरुरी है, कागजों और फाइलों की नावों से कब तक देश खेया जाता रहेगा, सामाजिक सड़ांधों में भारतीय समाज कितना उबकाइयों से बचता रहेगा। कुछ ठोस कीजिए सरकार, वरना तो भारत इस पंद्रह अगस्त को अपना सत्तरवां स्वतंत्र जन्मदिन फिर रस्मीतौर पर मना ही लेगा। पर सही मायनों में स्वतंत्रता का जन्मदिन तब ही मन सकेगा, जब भारत का हर प्रसव सड़कों पर नहीं स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकतों में चिकित्सालयों की चारदीवारों के अंदर शालीनता की छाया में करवाया जा सकेगा।

 

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