वैदिक वांग्मय के अभिन्न अंग श्रुति धर्मग्रंथ उपनिषद

-अशोक “प्रवृद्ध”

पुरातन भारतीय महत्वपूर्ण श्रुति धर्मग्रंथ वैदिक वांग्मय के अभिन्न अंग उपनिषदों में परमेश्वर, परमात्मा ,ब्रह्म , आत्मा, जीव, जगत आदि के सम्बंध में अत्यंत दार्शनिक, रहस्यमय व ज्ञानवर्द्धक विवरणी अंकित हैं ।अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्मविद्या को उपनिषद (उपनिषद्) कहते हैं। वेदान्त व सांख्य दर्शन, जैन व बौद्ध धर्म आदि समस्त भारतीय दर्शनों के मूलस्रोत उपनिषद ही हैं। भारतीय सभ्यता-संस्कृति की विश्व को अमूल्य धरोहर उपनिषद को दार्शनिक सर्वाधिक उत्तम ज्ञानकोष मानते हैं।वेद के पश्चात भारतीय संस्कृति में उपनिषदों का महत्वपूर्ण स्थान आता है । उपनिषदों को वेद के व्याख्या ग्रन्थ के रुप में जाना जाता है । इसलिए इनके अन्दर की धारणा का मूल वेद ही है।

वेद के ज्ञान काण्ड के रूप में प्रसिद्ध उपनिषद चिर प्रदीप्त वह ज्ञान दीपक है जो सृष्टि के आदि से प्रकाश देता चला आ रहा है और जो शाश्वत है, सनातन है, अक्षर है। इसके प्रकाश में वह अमरत्व है, जिसने सनातन धर्म के मूल का सिंचन किया है। यह जगत कल्याणकारी भारत की अपनी निधि है।यह सत्य है कि उपनिषदों को समझे बिना भारतीय इतिहास और संस्कृति का सूक्ष्म ज्ञान पाना असंभव है। ऐसा कोई पूर्ण विकसित भारतीय आदर्श नहीं जिसका उद्गम उपनिषदों में खोजने पर न मिले। उपनिषद् शक्ति और सृजनामत्मकता के सनातन स्रोत हैं। उपनिषदों का एक अपना ही कर्म है। वे अमर साहित्य हैं। हम उन सत्यों को इन्द्रियों और इन्द्रियबद्ध मन के परे, लोकातीत अनुभूति में पाते हैं, किंतु शुद्ध मन द्वारा वे अनुभवगम्य हैं। ये उपनिषद् सत्य, सार्वभौमिक और शाश्वत हैं तथा मानवता को सदैव प्रेरित करने वाले हैं। ये मनुष्य को सर्वोच्च की प्राप्ति के लिए सतत संघर्ष करने के लिए बुलाते हैं, जीवन और अनुभव में नित्य चिरस्थायी, अमृत तत्त्व की उपलब्धि के लिए संघर्ष करने के लिए बुलाते हैं।

उपनिषद गुरु-शिष्य परम्परा के आदर्श उदाहरण हैं। प्रश्नोत्तर के माध्यम से सृष्टि के गूढ़ रहस्यों का उद्घाटन उपनिषदों में सहज ढंग से किया गया है। विभिन्न दृष्टान्तों, उदाहरणों, रूपकों, संकेतों और युक्तियों द्वारा आत्मा, परमात्मा ब्रह्म आदि का स्पष्टीकरण इतनी सफलता से उपनिषद ही कर सके हैं। उपनिषद न होते तो वेदों का गूढ़ अर्थ हम नहीं समझ पाते।

उपनिषद का संधि विच्छेद होता है- उप+ नि +षद्। उप अर्थात पास में, नि अर्थात निष्ठापूर्वक और षद् अर्थात बैठना। इस प्रकार उपनिषद का शाब्दिक अर्थ हुआ – तत्त्वज्ञान के लिए गुरु के पास निष्ठावान होकर बैठना।उप-समीप, निषद्-निषीदति-बैठनेवाला। जो उस परम तत्त्व के समीप पहुँचकर चुपचाप बैठ जाता है, वह उपनिषद है। परम तत्त्व अवर्णनीय है। उपनिषद हमें उस अवर्णनीय परम तत्त्व-परब्रह्म-का साक्षात् ज्ञान कराते हैं। परम तत्त्व तक पहुँचने की कुंजी हैं उपनिषद।

वेद मंत्रों के भाष्य अथवा विवेचना की दृष्टि से सम्पूर्ण वेद तीन भागों -उपनिषद भाग, मंत्र भाग और ब्राह्मण भाग, में विभक्त हैं। उपनिषद भाग वेद के ज्ञान काण्ड का प्रकाशक है। वर्तमान मन्वंतर में वेद की 1180 शाखाएँ आविर्भूत हुईं। इतनी ही संख्या में उपनिषद, ब्राह्मण और मंत्र भाग भी प्रकट हुए। पुराणों और उपनिषदों में वेद की यह संख्या पाई जाती है। वर्तमान में इसका सौवाँ अंश भी नहीं मिलता।उपनिषद एक व्यापक अर्थों वाला शब्द है जिसका मुख्य अर्थ है-विद्या और गौण अर्थ है-पुस्तक। उपनिषद वेदों के अंतिम भाग हैं, अतः इन्हें वेदांत भी कहते हैं। सत्य की खोज करने की उत्सुकता, उपनिषदों की एक आनंदमयी और प्रशंसनीय विशिष्टताओं में से एक है। इन्हें वेदों के समान ही श्रुत्ति कहा गया है।

उपनिषदों में ज्ञान काण्ड की प्रधानता है इसलिए इनमें ब्रह्म के स्वरूप, जीव एवं ब्रह्म के आपसी संबंध और ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग आदि से संबंधित ज्ञान का विस्तृत वर्णन है। इसके अतिरिक्त इसमें वेदों के गूढ़ रहस्य भी निहित है। उपनिषद शब्द की उत्पत्ति उप एवं नि उपसर्ग और षद् धातु के मिलने से हुई है। स्पष्ट है कि वह ज्ञान जो परब्रह्म को प्राप्त करने का मार्ग दिखाए वह उपनिषद है।उपनिषदों को रहस्यमय ग्रंथ भी कहा गया है। रहस्यात्मक तत्त्वज्ञान गुरु और शिष्यों के मध्य चर्चा का विषय रहा है। शिष्यों के तत्त्वज्ञान से संबंधित प्रश्नों के उत्तर गुरु देते आए हैं और वे ही प्रश्नोत्तर, गुरु-शिष्य के मध्य के संवाद, उन ग्रंथों में संकलित हैं। शंकराचार्य ने इन्हें ब्रह्मविद्या का प्रतीक कहा है। उपनिषद निश्चित रूप से वैदिक संहिताओं में से ही उद्धृत हैं। ये अनुप्राणित हैं।गुरु और शिष्यों के मध्य जो प्रश्नोत्तर होते थे वही इनमें संग्रहित होते गए और इस प्रकार उपनिषद संज्ञान में आए।प्राचीनकाल में उपनिषदों का ज्ञान सभी को नहीं करवाया जाता थाऔर सिर्फ योग्य लोगों को ही कराया जाता था और वे अयोग्यों के लिए रहस्य रहते थे। यही कारण है कि इन्हें रहस्य भी कहा गया।

उपनिषदों की संख्या कहीं 108 और कहीं 200 से अधिक बताई जाती है, किंतु सर्वमान्य और महत्वपूर्ण उपनिषदों की संख्या बहुत कम है। एक प्रचलित श्लोक में दस सर्वमान्य उपनिषदें गिनाई गई हैं –

ईश-केन-कठ-प्रश्न-माण्डूक्य-तैत्तिरि:।

ऐतरेयश्व छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा।।

अर्थात – ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक-ये दस उपनिषद हैं। कुछ लोग कौषीतकि और श्वेताश्वरतर को भी, मुख्य उपनिषदों में गणना करते हैं।

ब्राह्मणों और आरण्यकों की भाँति उपनिषद भी पृथक-पृथक संहिताओं से संबंधित हैं। सबसे अधिक उपनिषद कृष्ण युजुर्वेद से संबंधित हैं।उपनिषदों के रचनाकाल का अलग-अलग निर्णय करना सर्वथा असम्भव है। कई विद्वानों ने वेदों, उपनिषदों के रचनाकाल के विषय में खोज की है लेकिन इनकी रचना कब हुई, इसका कोई ठोस एवं निश्चित प्रमाण प्राप्त नहीं हो सका है।विभिन्न भारतीय व विदेशी विद्वानों ने उपनिषदों का रचना काल भिन्न – भिन्न माना है। प्रारम्भ से ही जिज्ञासु मनुष्य इस खोज में लगा रहा है कि कब, क्या, कैसे, क्यों आदि। उपनिषदों में भी ऐसे ही ज्ञान का गहन चिंतन वर्णित है। श्वेताश्वर और कठोपनिषद में जगत,ब्रह्म, प्राण , इन्द्रिय आदि के सम्बन्ध में प्रश्नोतर प्रस्तुत की गई है। परमात्मा सूक्ष्म एवं वृहत्तम सभी रूपों में विद्यमान होता है एवं मनुष्य जीवन का उदेश्य भी विश्वात्मा से जीवात्मा का संबंध जानना और उनके महत्त्व को मानना या समझना ही होता है। उपनिषदों का उद्देश्य भी मनुष्य को ब्रह्म ज्ञान देना एवं आत्मा के तत्त्व को जानना है। क्योंकि यदि वह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है तो जन्म-मृत्यु की लीला को भूल जाता है। उस ब्रह्म में ही खोया रहता है और मोक्ष प्राप्त करता है। क्योंकि जब मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हो जाता है तो वह इस नश्वर शरीर में विद्यामान आत्मा को समझ जाता है। आत्मा ही ब्रह्म है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता। वही ईश्वर है। जब मनुष्य की मृत्यु होती है तो उसका शरीर तत्त्व में विलीन हो जाता है। लेकिन आत्मा ईश्वर में मिल जाती है और दूसरी देह प्राप्त करती है अर्थात् एक शरीर को त्यागकर दूसरे शरीर को प्राप्त करती है।उपनिषदों में आत्मज्ञान के संदर्भ में मनुष्य की चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है-जागृतावस्था, स्वप्नावस्था,सुसुप्तावस्था और चौथा तुरीयावस्था।

ध्यान, ज्ञान-भक्ति आदि साधना के अनेक मार्गों का उपनिषदों में वर्णन भी किया गया है। साधना के मार्ग पर चलने वाले मनुष्यों के भीतर भौतिक गुणों का उद्भव स्वतः ही होता है। उपनिषदों में सत्य को ब्रह्म का आधार कहा गया है। ओऽम् को ब्रह्म का सूक्ष्म प्रतीक बताया गया है। ब्रह्मज्ञान के अन्यतम साधन के रूप में ओऽम् की उपासना अर्थात प्रणव की उपासना करना वर्णित है। उपनिषदों में परब्रह्म के अनेक स्वरूपों का वर्णन और उनकी व्याख्या करते हुए ब्रह्म चेतना के जीव में परिवर्तित होने की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है। वह किस प्रकार अपना स्वरुप प्राप्त करता है ? उसके लिए क्या-क्या आहुतियाँ दी जाती हैं तब जाकर जीव उत्पन्न होता है।इस प्रकार उपनिषदों में ऋषियों के चिंतन-मनन का गूढ़ रहस्य वर्णित है जोकि मनुष्य का परब्रह्म से साक्षात्कार करवाता है, उन्हें सत्य का ज्ञान करवाता है।

उपनिषदों की भाषा प्रायः गद्यात्मक है, लेकिन कुछ उपनिषद् पद्यात्मक भी हैं। गद्यात्मक उपनिषदों में विषय को आख्यानों द्वारा वर्णित किया गया है। शिष्यों की शंकाओं को आचार्यों ने सिद्धांतों के अनुसार ही समाधान किया है। याज्ञवल्क्य और उनकी पत्नी मैत्रेयी के मध्य के जो संवाद हैं वे मनुष्यों के मन में धन आदि के मोह के प्रति वैराग्य उत्पन्न करते हैं।इस प्रकार उपनिषदों में वर्णित आख्यानों में गूढ़ रहस्यों को दार्शनिक दृश्यों द्वारा बताया गया है जिनका सहज वर्णन है।भारतीय दर्शन की लगभग सभी धाराएँ उपनिषदों में मिलती हैं। उपनिषदों का मुख्य उद्देश्य मनुष्यों को सत्य ज्ञान का दर्शन कराना है। मनुष्यों के मन में उठने वाले प्रश्नों-ब्रह्म, मनुष्य, जन्म- मृत्यु, जगत, जगत का संचालन कर्ता, मोक्ष आदि के सम्बन्ध में समस्त सभी जिज्ञासाओं का समाधान ये उपनिषद ही करते हैं।अतः कहा जा सकता है कि उपनिषद ज्ञान के भण्डार हैं और ये ब्रह्म से साक्षात्कार के माध्यम हैं।उपनिषदों का महत्त्व इससे ही स्वतः सिद्ध है कि उसमें उपस्थित सत्य को पढ़कर ही अनुभव किया जा सकता है। उपनिषदों में ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। उपनिषद आत्मा-परमात्मा का अनुभव करवाते हैं। ये सत्य से परिचित करवाते हैं लेकिन फिर भी मनुष्य के लिए यह शरीर, मात्र उपभोग का साधन ही है। यह शरीर मनुष्यों को चौरासी लाख योनियों की नैया पार करने पर प्राप्त होता है और मनुष्य दुष्कर्मों में लगा रहता है। कारण मात्र एक है-सत्य का ज्ञान न होना। यदि मनुष्य को मोक्ष प्राप्त करना है तो वह ज्ञान उपनिषदों में है। उपनिषदों में मानव-शरीर का वर्णन करते हुए बताया गया है कि मानव-शरीर पाँच कोशों के आवरण से ढका है और व्यक्ति तभी मोक्ष प्राप्त कर सकता है जब वह इन आवरणों को भेदकर पार पा जाए ।

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