Author Archives: Anil Saumitra

देश में “जल क्रांति” की जरूरत, सब जुट जाओ

राकेश दुबे  देश गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहा है | आगामी वर्षों में इसके और अधिक गहराने की सम्भावना है | वर्तमान में भी देश के कई इलाके गंभीर जल संकट से जूझ रहे हैं और  मॉनसून बहुत कमजोर दिख रहा है | महानगरों में बरसते पानी का ... Read More »

भाषा नीति: ढुलमुल छोड़ मजबूती से आगे बढ़ने की बेला

विनोद बब्बर   भाषा जीव के मानव बनने की दिशा में प्रथम कदम कहा जा सकता है। आरंभ में संकेतों की भाषा रही होगी जो कालांतर में शब्द संवाद में परिवर्तित हुई। हर परिस्थिति परिवेश एक दूसरे से अपरिचित और भिन्न था इसलिए हर मानव समूह ने अपने ढ़ंग से कुछ ... Read More »

भाषाई समरूपता से अखण्डित राष्ट्र की परिकल्पना

डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’ माँ, माटी और मातृभाषा की अनिवार्यता और यथोचित सम्मान की चाह होना हर भारतवंशी का कर्तव्य भी है और नैतिक जिम्मेदारी भी।राष्ट्र केवल लोग नहींबल्कि वहाँ का समाज, संस्कृति, लोगों के अंदर की भावनाएं, वहाँ की भाषा, वहाँ की जिम्मेदारव्यवस्था मिल कर बनाते है। और राष्ट्र के सम्पूर्ण तत्व की व्याख्या उस राष्ट्र का उपलब्ध ज्ञान भंडार ही कर सकता है, वहाँ की शिक्षा व्यवस्था से उसकी प्रासंगिकता प्रचारित होती है। उस राष्ट्र की आंतरिक अखण्डता और उसे एक सूत्र में बंधे रहने कीआवश्यकता का एकमात्र समाधान भाषाई समरूपता है, यानी ‘एक देश-एक जनभाषा’ की अनिवार्यता होने से सम्पूर्ण राष्ट्र में सामान्य लोक व्यवहार का सहज और सरल हो जाना निहित है।ऐसा इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि विभिन्न भाषाभाषियों के मध्यआपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिए किसी एक बिंदु का एक जैसा होना जरूरी है। किंतु जहाँ बात संवाद की आती है वहाँ संवाद का प्रथम सूत्र ही भाषा का एक होना है। वर्तमान में हिंदुस्तान में लगभग 500 से अधिक बोलियाँ व 22 भाषाएँ उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में जब तमिलनाडु से व्यवहार करना हो तो व्यक्ति को तमिल सीखना होगी और जब पंजाबी से व्यवहार करना हो तो पंजाबी। ऐसे में सामान्य बोलचाल की भाषाएक जैसी नहीं होने से संवाद की स्थापना असंभव है, और बिना संवाद के व्यापार, विनिमय, रिश्तेदारी आदि सभी ताक में रह जाते है। अन्य प्रान्त के लोगों में संवाद की सफलता के लिए एक मध्यस्थ भाषा का होना अत्यंत आवश्यक है।इस कमी को अंग्रेजी भी पूरा कर सकती है किंतु अंग्रेजी स्वभाषा नहीं है, और भारत चूँकि ग्राम प्रधान राष्ट्र होने से आज भी अंचल में अंग्रेजी प्रासंगिक और सहज नहीं है। इसीलिए हिंदी भाषा ही जनभाषा के रूप में एकमात्र श्रेष्ठ विकल्प उपलब्ध है। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा है कि- ‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय को शूल।’ निजभाषा का महत्व सदा से ही अपनेपन के साथ संस्कार सींचन हेतु आवश्यक माना गया है। आरंभिक दौर में प्राकृत, पाली से सजा राष्ट्र का तानाबाना देवभाषा संस्कृत के प्रचारित होने के बाद सज नहीं पाया, संस्कृत भी आज के दौर में जनभाषा नहीं हैक्योंकि उसे बोलने-समझने वाले लोग अब मुट्ठीभर शेष है। प्राकृत-पाली के साथ संस्कृत निष्ठ हिन्दी का जन्म हुआ और यह हिन्दी ने जनता के बीच क्षेत्रीय भाषाओं से अधिक स्थान प्राप्त किया।क्षेत्रीय भाषाओं का अपना एक सीमित दायरा है इसमें कोई संशय नहीं है, और आज हिंदुस्तान के 57 प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी ही है। शेष 43 प्रतिशत लोग भी हिंदी से अपरिचित नहीं है, वे जानते-समझते है किंतु उनकी स्थानीय भाषाओं में वे ज्यादादक्ष है, ज्यादा प्रवीण है। इसीलिए जनभाषा के तौर पर हिन्दी की अस्वीकार्यता नहीं हो सकती,रही बात हिन्दी के विरोध की तो यह केवल भ्रम से उत्पन्न या कहे राजनैतिक प्रेरित विरोध के स्वर है।क्योंकि हिन्दी के प्रचारकों ने जिस तरह हिन्दी को एकसंस्कृति ही बना कर प्रस्तुत किया यह बहुत गलत है। हिन्दी एक भाषा है, न कि अकेली एक संस्कृति या धर्म। हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की सोच से ही हिन्दी भाषा का हश्र बिगड़ा हुआ है। भाषा महज अभिव्यक्ति का माध्यम और जनसंवाद का केंद्र है। यह कदापि सत्य नहीं है कि यदि हिंदी भाषा होगी तो हिन्दूराष्ट्र बनेगा। आज चलन में अंग्रेजी भाषा का प्रभाव ज्यादा है ,तो क्या हम यह मान ले कि देश फिर इंग्लिशतान या ईसाईयत की तरफ बढ़ गया? या देश पुनः गुलाम हो चुका? भारत एक गणतांत्रिक राष्ट्र है, यहाँ प्रश्न अपनी जनभाषा के सम्मान का है न कि किसी धर्म के आधिपत्य का। भाषा किसी धर्म या पंथ की प्रतिलिपि नहीं होती, भाषा तो संवाद और संचार का माध्यम है। यहाँ बात स्वभाषा की स्थापना की है, न कि धर्म के साथजोड़ कर भाषा की हत्या की। हाल बुरा तो इसी सोच के चलते उर्दू का भी हुआ है। उर्दू के उम्दा फनकार राहत इंदौरी जी का शेर है- क़त्ल उर्दू का भी होता है और इस निस्बत से, लोग उर्दू को मुसलमान समझ लेते हैं जब हिन्दी को हिन्दू और उर्दू को मुसलमान माना जाता है तो इन्ही खोखले आधारों से भाषा के कारण युद्ध और विरोध का जन्म होता है।इसी पर तथाकथित लोगों को राजनीति करने का मौका मिल जाता है, इसे वे एक संस्कृति या धर्म को थोपना बताकरएक जनभाषा की हत्या कर देते है। भाषा मनोवैज्ञानिक प्रभाव का कारक हो सकती है पर वो कभी भी किसी धर्म की ठेकेदार नहीं होती। विखण्डनवादी सोच के चलते हिन्दुस्तान में आज सांस्कृतिक अखण्डता खतरे में है। क्योंकि हिन्दी कही थोपी नहीं जा रही, जो लोग कहते है कि आप हमारी दक्षिण भारतीय भाषा सीखिए, तो वे भी ये बताएं कि कितने प्रतिशत लोगों तक संवाद उससे सहज होगा, मात्र 8 से 10 प्रतिशत लोगों से और हिन्दी के कारण कम से कम 57 प्रतिशत और अधिकतम सम्पूर्ण हिंदुस्तान से । क्योंकि वर्तमान समय में यह कटु सत्य है कि अहिन्दी भाषी भारतीय भी हिन्दी तो समझते बोलते है। बस चूँकि यह राजनीति प्रेरित एजेंडा बना इसीलिए हिंदी के बहाने हिंदुस्तान का विरोध शुरू हुआ। वैश्विक लोकभाषा सर्वेक्षण विभाग की रपट कहती है कि ‘जो बच्चें एक से अधिक भाषाओं में  दक्ष होते है वे अन्य बच्चों की तुलना में 67 प्रतिशत अधिक बुद्धिमान होते है । इसीलिए माँ-पिता को यह चाहिए कि बच्चों को मातृभाषा, राजभाषा हिंदी व अन्यविदेशी भाषा यानी अंग्रेजी, फ्रेंच, या चाइनीजभाषा सीखना चाहिए। कश्मीर या अन्य जिन राज्यों की आय का मूल स्रोत पर्यटन है वे इस बात से भली-भाँति परिचित है कि उनकर राज्य में ज्यादातर पर्यटक हिंदी पट्टी से आते है, और यदि आपके यहाँ के स्थानीय दुकानदार, रहवासी लोग यदि हिन्दी नहीं समझेंगे, बोलेंगे तोपर्यटकों को कैसे आकर्षित कर पाएंगे, इससे तो उनका धंधा चौपट होगा, साथ ही पर्यटकों की संख्या में गिरावट आएगी और इससे राजस्व की हानि होगी यह तय है। एक भाषा के कारण यदि ऐसा भी होता है तो यह राज्य के लिए नुकसानदायक है। इसीतरह बातयदि संस्कारों की है तो भारत की सामाजिक व्यवस्था में संस्कारों का बीजारोपण दादा-दादी व नाना-नानी की कहानियों के माध्यम से होता है, और दादा-दादी व नाना-नानी प्रायः मातृभाषा में दक्ष होते है जिससे उन बच्चों को मिलने वाली संस्कार शाला अपनीमातृभाषा की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसीलिए भारत की मेधा को बच्चों को हिंदी या मातृभाषा में दक्ष रखना ही होगा।  23 साल बाद राज्यसभा पहुंचे एमडीएमके नेता वायको ने भाषाई अलगाववाद की राजनीति को संसद से हवा ... 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रोजमर्रा की स्वाथ्य दिक्कतों का होम्योपैथी उपचार

संत समीर होम्योपैथी दोतरफ़ा चिकित्सा पद्धति है। मरीज़ को जागरूक होना पड़ता है और चिकित्सक को समझदार। अबोध बच्चों और जानवरों की जहाँ तक बात है, तो इनकी बीमारियाँ सामान्यतः देह के तल तक सीमित रहती हैं। मानसिक लक्षण हों भी तो बता पाना सम्भव नहीं होता, इसलिए देह पर ... Read More »

नई तकनीक से चुनौतियों के हल खोजने वाले उद्यमियों को पुरस्कार

उमाशंकर मिश्र Twitter handle : @usm_1984 किसी दिव्यांग को ऐसा कृत्रिम अंग मिल जाए जो दिमाग के संकेतों से संचालित हो तो इसे तकनीक पर आधारित एक महत्वपूर्ण सामाजिक योगदान माना जाएगा। बिट्स पिलानी के कंप्यूटर साइंस के दो छात्रों उज्ज्वल कुमार झा और सिद्धांत डांगी ने ऐसे ही बायोनिक ... Read More »

रसायन मुक्त चाय उत्पादन में मददगार हो सकते हैं सूक्ष्मजीव

उमाशंकर मिश्र Twitter handle : @usm_1984 भारत में उत्पादित चाय का एक बड़ा हिस्सा निर्यात किया जाता है और यह अर्थव्यवस्था में अहम स्थान रखती है। लेकिन, रसायनों से मुक्त चाय की मांग बढ़ने से इसके निर्यात में गिरावट हो रही है। भारतीय वैज्ञानिकों ने अब चाय के पौधों की ... Read More »

भारतीय शोधकर्ताओं ने विकसित किया जहरीले रसायनों का डेटाबेस

दिनेश सी. शर्मा Twitter handle: @dineshcsharma पर्यावरण या फिर दैनिक जीवन से जुड़े उत्पादों के जरिये हर दिन हमारा संपर्क ऐसे रसायनों से होता है, जो सेहत के लिए हानिकारक होते हैं। इस तरह के रसायन उपभोक्ता उत्पादों से लेकर कीटनाशकों, सौंदर्य प्रसाधनों, दवाओं, बिजली की फिटिंग से जुड़े सामान, ... Read More »

कालाजार से उबरने के बाद भी मरीजों से फैल सकता है संक्रमण

उमाशंकर मिश्र Twitter handle : @usm_1984 कालाजार से उबरने के बावजूद कई बार इसके मरीजों में त्वचा संबंधी लीश्मेनियेसिस रोग होने की आशंका रहती है, जिसे चमड़ी का कालाजार भी कहते हैं। ड्रग्स फॉर नेग्लेक्टेड डिजीजेज इनिशिएटिव (डीएनडीआई) और बांग्लादेश स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर डायरियल डिजीज रिसर्च के शोधकर्ताओं द्वारा ... Read More »

गाँधी के देश में आन्दोलन का अधिकार

राकेश दुबे मध्यप्रदेश के इंदौर -३ से निर्वाचित भाजपा विधायक आकाश विजयवर्गीय ने जमानत पर रिहा होते ही गाँधी को अर्थात मोहनदास करमचंद गाँधी को याद किया | एक कहावत है “मजबूरी का नाम ——“ | वैसे इस मामले में यह नजीर काम नहीं करेगी| क्योंकि गाँधी के इस देश ... Read More »

भाजपा : शेर-शेरनी को बख्शा और तोते का टेटुआ दबा दिया

राकेश दुबे भाजपा में एक तरफ सदस्यता अभियान जोरों पर है, दूसरी तरफ उसके भीतर हुए निर्णयों के चर्चा जोरों पर है l भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व द्वारा या उनके इशारे पर लिए गये निर्णय उस कहानी की ही पुष्टि कर रहे हैं कि सब कुछ ठीक नहीं ... Read More »