बच्चों का निर्माणाधीन संसार

कौशलेंद्र प्रपन्न


यदि हमें यह देखना-समझना हो कि बच्चों का संसार कैसा और कैसे बनाया जा रहा है, तो हम किसी भी स्कूली कक्षा चाहे पहली कक्षा हो या कक्षा आठ, में बैठ कर अनुमान लगा सकते हैं। वयस्कों द्वारा निर्माणाधीन बच्चों के संसार को समझने के लिए शिक्षकों की ओर से बरतने वाले निर्देशों, भाषा और उदाहरणों को देखना होगा। क्या कक्षा में स्थानीय भाषा, मानक भाषा, मातृभाषा की अवधारणा, विचार की अवधारणा के साथ शिक्षक कैसे बरताव कर रहा है। इसे समझने की आवश्यकता है। यह निदर्शन हमें  किसी भी विषय को पढ़ाने के दौरान मिल सकता है। शिक्षक की खुद की शिक्षा-शिक्षण की झलक भी हमंे कक्षाओं में मिलेंगी। स्वयं का पूर्वग्रह और चीजों को देखने की अवधारणा भी साफतौर पर देखने को मिलेंगी। स्कूली कक्षा की खिड़की से पूरी बच्चों की निर्माणाधीन दुनिया को देख सकते हैं। कक्षा में होने वाली गतिविधियों से लेकर स्कूल में होने वाली प्रार्थनाएं भी काफी कुछ बयां करती हैं। मसलन स्कूल में किस प्रार्थना को समूह में गाया जा रहा है? क्या वह प्रार्थना एक ख़ास धर्म,संप्रदाय के विचारों को पोषित करने वाला है और दूसरे संप्रदाय के बच्चों को हाशिए पर खड़ा करने वाला है। कुछ स्कूलों में गायत्री मंत्र को प्रार्थना के तौर पर प्रयोग किया जाता है। अब विमर्श का मुद्दा यह हो सकता है कि यदि उस स्कूल में मुस्लिम, सिख, क्रिश्चियन बच्चे भी पढ़ते हैं तो क्या वे बच्चे सहज महसूस कर पाते हैं। यहां तक कि कक्षाओं और हॉल्स के नाम यदि ख़ास धर्म, विचार के पुरुषों के नाम पर रखे गए हैं तो निश्चित ही स्त्रियों, वंचितों और अन्य संप्रदाय के मानने वालों को बड़ी ही साफगोई से बाहर कर दिया गया है। इन्हीं कुछ ईट, मिट्टी, गारों से ही तो बच्चों का संसार निर्मित होता है। यदि हम बचपन में  निर्माण कार्य पर ध्यान नहीं देंगे तो वह भवन बन कर कैसे होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
कक्षा में किसी भी विषय को पढ़ाते वक्त शिक्षक के निर्देश की भाषा, शब्दों का चयन कैसे है, इसपर भी ठहर कर विचार करने की आवश्यकता है। क्या शिक्षा बच्चों की परिवेशीय भाषा को कमतर आंकता है या उनकी परिवेशीय भाषा को वही सम्मान और पहचान देने के लिए उदारता बरतता है जिस मातृभाषा और स्वयं की भाषायी परिवेश से वह आता है। या कि किसी ख़ास भाषा के प्रति पूर्वग्रह का व्यवहार करता है। यह कहीं न कहीं बच्चों में भाषायी निर्माण को प्रभावित करता है। फ़र्ज कीजिए यदि मुस्लिम बहुल बच्चों की कक्षा है तो जहिरानातौर पर कक्षा में  उर्दू के शब्द, वाक्य निर्माण की झांकी मिलेगी। क्या ऐसे में शिक्षक उन बच्चों की सहज भाषायी समझ और प्रवाह को विकसने और निकसने का अवसर देता है या कि विशेष शुद्धतावादी के तौर पर स्वयं को पेश करता है। माना जाता है कि एक बच्चे की भाषायी दुनिया के निर्माण में उनकी परिवेशीय प्रकृति तो काम करती ही है उससे भी कहीं ज्यादा और बड़ी भूमिका कक्षा और स्कूली भाषायी संसार की होती है। जहां बच्चों को अपनी भाषा को मांजने, परिष्कृत करने का अवसर मिलता है।
भाषा के साथ ही बच्चों का संसार उनके व्यक्तित्व निर्माण से भी जुड़ा मसला है। स्कूल मंे जिस प्रकार का परिवेश मुहैया कराया जाता है वैसे ही बच्चों का व्यक्तित्व विकास भी निर्भर करता है। यदि स्कूल व कक्षा में ख़ुद को अभिव्यक्त करने के अवसर को ध्यान में  रखते हुए गतिविधियों को निर्माण किया गया है तब बच्चों में स्वयं को प्रकट करने के लिए न केवल भाषायी मदद मिलती है, बल्कि उन्हें कई पाठ्य सहगामी क्रियाओं के मार्फम स्वयं को गढ़ने, बनने मे मदद सहायक होती हैं। बच्चों के संसार की रणनीति और भूगोल को तय करने वाले कई बार पाठ्यचर्याओं और पाठ्यपुस्तकों के जरिए कक्षा और स्कूल मंे प्रवेश करते हैं। जो आगे चल कर अभिभावकों की अपेक्षाओं को आकार देती है। आज की तारीख में  हर अभिभावक की कामना होती है कि उसका बच्चा फलां फलां जैसे एक्टर बन जाए। वैसे ही डांस करें, वैसे ही स्टेज पर खड़ा हो। जबकि नाट्यमंचों के जानकारों  की मानें तो बाल नाट्यमंच इस दर्शन से ही इत्तेफाक नहीं रखता। बल्कि बाल-नाट्यमंच मानता है कि बच्चों को सहज और सरल तरीके से खुद के अंदर छुपी छटपटाहटों को कैसे प्रकट कर पाए इसके लिए नाटकों का इस्तमाल किया जाए। जबकि होता इससे बिल्कुल उलट है। अभिभावक और स्कूल प्रबंधक, प्रधानाचार्य आदि की मांग होती है कि नाट्य कार्यशाला के बाद कम से कम एक धमाकेदार शो कर दिया जाए ताकि अभिभावक देख पाएं कि एक माह में उनके बच्चों ने क्या सीखा। यह महज मौज मस्ती के लिहाज से ठीक है। जबकि नाटक बच्चों को वह परिवेश प्रदान करने की कोशिश करते हैं जिसमें बच्चा परियों, तिलस्मी कहानियांे से बाहर निकल कर समाज के वर्तमान चुनौतियों का भी स्वाद ले सकें। इस क्षेत्र में काम करने वाले रंगमंच के जानकार और रंगकर्मी के अनुभव एकदम अलग हैं। उन्होंने नाटक के जरिए कक्षाओं में पढ़ने,समझने और लिखने के कौशल विकास पर काफी काम किया। इसके परिणाम भी काफी सकारात्मक मिले। लेकिन हम बच्चों के संसार को बड़ों के संसारीय प्रतियोगिताआंे, छल प्रपंचांे और तात्कालिक लाभ-हानि के चक्कर में एक बड़ी भारी गलती करने लगते हैं।
बच्चों के निर्माणाधीन संसार को हम अपनी निगाहों ने देखी घटनाओं के तर्ज पर जब भी गढ़ने की कोशिश करते हैं वहीं गलतियों होने लगती हैं। यदि आज भी हम परियों, भूत-प्रेत, कल्पनालोक के हिस्सा बनाने में लगे रहेंगे तब उन बच्चों का संसार कैसे निर्मित होगा क्या इसका अनुमान हम लगा सकते हैं। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम अपने बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में  पुरानी अपने समय मंे सुनी पढ़ी कहानियों से बाहर निकल कर युगीन चुनौतियों से सामना करने वाली कहानियों का निर्माण करें और बच्चों को उसका सहभागी बनाएँ l
राष्टीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा मानती है कि बच्चों के बाहरी संसार को कक्षायी संसार के साथ जोड़ना होगा। इसका अर्थ स्पष्ट है कि जहां जिस परिवेश से बच्चे आते हैं, जहां की भाषायी संस्कार, संस्कृति, सहभागिता के भाव लेकर कक्षा में आ रहे हैं उनके बाहरी संसार को कक्षायी संसार से एकीकृत करना बेहद जरूरी है। बच्चों को यह महसूस न हो कि वे जहां से आ रहे हैं वह और कक्षायी दुनिया अगल है। दरअसल यह काम शिक्षा के जिम्मे है लेकिन विविध कारणों की वजह से शिक्षा के पैरोकारों के हाथ से यह काम निकल चुकी है। हमें बड़ी ही शिद्दत से बच्चों के निर्माणाधीन संसार को पूरा करना है। तभी हम एक बेहतर नागर समाज की परिकल्पना कर सकते हैं। उस संसार की सृजना कर सकेंगे जहां बच्चे सुरक्षित रहे सकें और समाज के विकास में अपनी सहभागिता सुनिश्चित कर सकेंगे। बच्चों की दुनिया को बनाने में अध्यापकीय सत्ता और पाठ्यपुस्तकीय ताकत की बड़ी अहम भूमिका होती है। कुछेक सालों में यह देखा गया है कि किस प्रकार एक ख़ास मत, विचारधारा को पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यचर्याओ के जरिए स्कूली बच्चों के जीवन-निर्माण वैचारिक ईट गारों का प्रयोग किया जा रहा है। हमें सवाधान होना रहना होगा कि किस प्रकार की तालीम हमबच्चों को दे रहे हैं। क्योंकि इस निर्माण की प्रक्रिया में हम अनजाने ही कई ऐतिहासिक गलतियां कर बैठते हैं जिसका परिणाम आने वाले दस बीस सालों के बाद दिखाई देता है। विभिन्न राज्य के स्कूलों में राज्य शासित पाठ्यपुस्तकों और पाठ्यक्रमों के माध्यम से अपने तात्कालिक हित साधने के प्रयास किए गए हैं। वह चाहे राजस्थान, बिहार, बंगाल राज्य क्यों न रहे हों वहा पर शैक्षिक औजारों का इस्तमाल एक ख़ास मकसद से किया गया है। परिणाम यह होता है कि जब भी सत्ता बदलती है वैसे ही पाठ्यपुस्तकों, पाठ्यचर्याओं में तब्दीली शुरू हो जाती है।
बाहरी दुनिया तय करने में लगी है कि हम बच्चों के संसार को 2030 तक गुणवत्तापूर्ण, समान और समतामूलक बुनियादी एवं उच्च शिक्षा मुहैया करा देंगे। इसे हम सतत् विकास लक्ष्य के नाम से जान रहे हैं। यहां सवाल उठ सकता है कि क्या बच्चों के संसार को इस लायक बनाने की कोशिश भी होगी कि वे शिक्षा के साथ ही जीवन मूल्यों और जीवन के कौशल भी हासिल कर पाएंगे। क्योंकि जीवन कौशल के नाम पर कौशल विकास के परचम तो फहराए जा रहे हैं, लेकिन इस कौशल विकास का लक्ष्य सतत् विकास लक्ष्य से अलग है। हमारा कौशल व दक्ष भारत के विकास का लक्ष्य और प्रक्रिया अभी भी संदिग्ध ही है। क्योंकि यह पूरी योजना बड़ी ही चतुराई से लाखों बच्चों से उच्च प्राथमिक और उच्च शिक्षा से महरूम रखने की कोशिश है। फर्ज कीजिए जब बच्चे को कक्षा छह या आठ में कामपरक शिक्षा जिसे हुनर आधारित शिक्षा व कौशल कहा जा रहा है, क्या वह कहीं न कहीं उन लाखों बच्चों के संसार से शिक्षा हासिल करने की ललक को खत्म करने का प्रयास नहीं है। पहली नजर में यह साफतौर पर दिखाई नहीं देती किन्तु ठहर का विचार करें तो पाएंगे कि वास्तव में लाखों बच्चों के संसार से शिक्षा के वृहद उद्देश्य को सीमित ही किया जा रहा है। जीवन और शिक्षा का लक्ष्य बेहतर जीवन जीने की तैयारी माना गया है। लेकिन जब बच्चों को काम करने के विकल्प दिखाए जाएंगे तो क्या इसकी संभावना से इंकार कर सकते हैं कि बच्चे आसान और सहज रास्ते को चुनें।
कौशलेंद्र प्रपन्न
भाषा एवं शिक्षा पैडागोजी विशेषज्ञ
‘बच्चे भाषा और शिक्षा,’ ‘कहने का कौशल’ किताब के लेखक। दर्जनों आलेख प्रकाशित, संपादन एवं शिक्षक-प्रशिक्षक के तौर पर देशभर में सरकारी एवं निजी संस्थानों में  भाषा,बच्चे, शिक्षा शिक्षण से संबद्ध।
डी 11/25 सेकेंड फ्लोर रोहिणी सेक्टर 8
दिल्ली 110085, 9891807914

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