बौद्धिक क्षेत्र मे हीन भावना से कब उभरेगी भाजपा ?

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज
भारत के मध्य वर्ग को जिस प्रकार के घोषणा पत्रों को देखने की आदत पड़ गई है ,उस दृष्टि  से देखें तो भारतीय जनता पार्टी का 2019 ईस्वी का घोषणा पत्र बहुत ही अच्छा है। इसमें प्रौद्योगिकी ,आर्थिक और कृषि तथा व्यापार के क्षेत्रों में बहुत सी उम्मीदें जगाने वाली बातें कही गई हैं और श्री नरेंद्र मोदी जी के अब तक के कार्यकाल और उपलब्धियों को देखते हुए उन बातों पर सहज ही विश्वास हो जाता है। परंतु मुख्य प्रश्न यह उठता है कि यदि औद्योगिक दृष्टि से और सुरक्षा के स्तर पर  समर्थ बनना तथा कृषि क्षेत्र में और निर्माण क्षेत्र में उन्नत  बनना  ही महत्वपूर्ण है , तो ऐसे घोषणापत्र का भारत राष्ट्र से विशेष संबंध क्या होता है?  इस बात को समझने के लिए हमें कांग्रेस के घोषणा पत्र की बातों को स्मरण करना होगा और तब उसके संदर्भ में यह बात समझी जा सकेगी । कांग्रेस का घोषणा पत्र बहुत स्पष्ट है: वह  भारत में हिंदू धर्म और हिंदू समाज को तथा राष्ट्रीयता की भावना को पूरी तरह समाप्त कर देने और दबाकर रखने की घोषित योजना के साथ प्रस्तुत किया गया है । अन्य बातें तो इस भयंकर लक्ष्य को छिपाने के लिए आवरण की तरह रखी गई है । 
कांग्रेस के घोषणा पत्र से स्पष्ट हो जाता है कि वह मुख्यतः भारत राष्ट्र के लिए , इसे गैर हिंदुओं के लिए प्रशस्त क्रीडा क्षेत्र बनाने के लिए और भारत राष्ट्र में विशेषकर हिंदू धर्म को सब प्रकार से कमजोर करने के लिए और दबाने के लिए तथा अल्पसंख्यकों के नाम पर इस्लाम और ईसाइयत के ऐसे तत्वों को जो हिंदू धर्म से और हिंदू समाज से द्वेष रखते हैं , निरंकुश बनाने और शक्तिशाली बनाने के स्पष्ट प्रयोजन  से प्रेरित घोषणा पत्र है । कांग्रेस इतने खुले रूप में हिंदू द्रोही 1989 ईस्वी तक कभी भी नहीं थी ,जितनी कि वह श्रीमती सोनिया गांधी के कांग्रेस की बागडोर संभालने के बाद से हुई है और लगातार है।
ऐसी स्थिति मे भारतीय जनता पार्टी को अपने घोषणापत्र से यह संकेत देना चाहिए था कि वह उस भारत राष्ट्र के विषय में जारी घोषणा पत्र है जिसका बहुसंख्यक समाज हिंदू है और जो सार्वभौम मानव मूल्यों में श्रद्धा रखने वाला समाज है । अतः  जो गहरे अर्थ में मानव धर्म को मानने वाला समाज है और जिस समाज को ऐसे पंथ और ऐसे विचारों से भयंकर  खतरा है जो किसी एक मत विशेष या पंथ विशेष को ही विश्व में सर्वाधिक प्रभावशाली बनाने के लिए संकल्पित हैं और विश्व की आड़ में भारत को पूरी तरह अपने मज़हबी विश्वासों के अधीन लाने की जिनकी खुली घोषणाएं हैं और जिनको लगातार कांग्रेस के शासन में शक्तिशाली किया गया है।  परंतु भाजपा के घोषणा पत्र में औद्योगिक प्रगति, तकनीकी प्रगति,  कृषि क्षेत्र की प्रगति,  व्यापार की प्रगति,  फसल बीमा योजना,  प्रधानमंत्री आवास योजना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की आधुनिकतम तकनीकी आदि आदि को ही रखा गया है  जो बहुत सुंदर है  पर वे घोषणाएँ भारतवर्ष को विशेष लक्ष्य करके की गयी कैसे मानी जा सकती हैं ?
मान लीजिए कि भारतवर्ष मुस्लिम या ईसाई राष्ट्र हो जाएगा ,तब  भी वह ये  सब बातें कर सकता है ।  तो भारतवर्ष की जो विशेष समस्या है, उसको भारतीय जनता पार्टी कभी भी संबोधित क्यों नहीं करती?  उदाहरण के लिए , भारतीय जनता पार्टी यह घोषणा कर सकती थी कि वह सर्व धर्म सम्मान विधेयक लाएगी जिसके द्वारा भारत में किसी भी धर्म के प्रति अनादर व्यक्त करने को दंडनीय अपराध के साथ ही संज्ञान  मे लाकर विधिक कार्यवाही के योग्य अपराध माना जाएगा ।  इसी तरह वह एक ऐसा विधेयक ला सकती है कि भारत के किसी भी नागरिक को भारतीय समाज की किसी भी जाति की निंदा करने का अधिकार नहीं होगा और सार्वजनिक रूप से किसी भी जाति या वर्ग या संप्रदाय या समूह की  निंदा को संज्ञान लेने योग्य  अपराध माना जाएगा ।
इसके साथ ही वह  धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक लाने की घोषणा कर  सकती थी ।  इसमें किसी भी व्यक्ति को अपना मजहब या रेलिजन  कभी भी त्याग कर अपने लिए विवेकपूर्ण लगने वाले पंथ  को चुनने की स्वतंत्रता होगी।  आज स्थिति यह है कि भारत के अधिकांश हिंदू इस बात का अर्थ ही नहीं समझेंगे। इसका संदर्भ यह है कि इस्लाम छोड़ने वाले व्यक्ति के लिए इस्लामी कानून मे मृत्यु दंड  की व्यवस्था है और ईसाइयत का पंथ  त्याग करने के लिए भी ईसाइयों के विश्वास के अनुसार मृत्यु दंड का प्रावधान है । यूरोप मे आधुनिक प्रबुद्ध  लोगों का  शासन जब से आया , तब से लगभग 60 वर्षों से ऐसे मृत्यु दंड का कानून समाप्त है अन्यथा वहाँ यह कानून था ।
ऐसे बहुत से लोग जिनका ऐसे मजहबों से रिश्ता है और वहाँ उनका दम घुटता है ,   जो या तो जन्म से या किसी परिस्थिति वश उनसे जुड़ गए हैं और उन से मुक्त होना चाहते हैं ,वे सब उनको त्याग कर सार्वभौम  मानव मूल्यों वाले किसी मत को अपनाने से डरते हैं । स्पष्ट रूप से यह सार्वभौम मानव मूल्य है सत्य , किसी भी प्राणी या प्रकृति से द्रोह नहीं करना (जिसे भारतीय शास्त्रों में अहिंसा कहा गया है),  सदाचार संपन्न जीवन जीना,  दूसरे के धन या वस्तुओं की चोरी नहीं करना , अपनी मर्यादा में जीवन जीना  अर्थात संयम से रहना  और अवैध या अनुचित तरीकों से वस्तु और धन का संग्रह नहीं करना तथा दूसरों के साथ सभ्य और शिष्ट आचरण करना,  क्रोध की सार्वजनिक अभिव्यक्ति नहीं करना, घृणा का भाव  नहीं रखना , क्षमा भाव रखना और कोमल सुसभ्य  व्यवहार करना ।
भारतीय शास्त्रों में इन्हे ही सामान्य धर्म या मानव धर्म या सार्ववर्णिक  धर्म कहा गया है । आधुनिक पदावली में इसे सार्वभौम मानव मूल्य और सार्वभौम जीवन मूल्य कहा जा सकता है।  आज तक विश्व में कहीं भी धार्मिक स्वतंत्रता नहीं हैं और सार्व भौम  जीवन मूल्य , सार्व भौम मानव मूल्य को संपूर्ण विधिक अधिकार कहीं भी प्राप्त नहीं है यद्यपि संयुक्त राष्ट्र संघ का मानवाधिकार घोषणा पत्र और यूनेस्को का घोषणा पत्र सार्व भौम  मानव मूल्यों की ही बात करता है परंतु किसी भी nation-state के संविधान में उनकी बात नहीं कही गई है।
पश्चिमी यूरोप के प्रत्येक नेशन स्टेट में ईसाइयत  के किसी ना किसी पंथ  को राज्य का विशेष संरक्षण प्राप्त है और शिक्षा , विधि तथा संचार माध्यमों में उस विशेष पंथ  का ही एकाधिकार मान्य है ।  सभी मुस्लिम देशों में इस्लाम को राज्य का विशेष संरक्षण प्राप्त है और  बौद्ध देशों में बौद्ध धर्म को राज्य का विशेष संरक्षण प्राप्त है । भारत में अल्पसंख्यकों  के मजहब को  तो राज्य का विशेष संरक्षण प्राप्त है परंतु बहुसंख्यकों  के धर्म को राज्य का कोई विधिक संरक्षण प्राप्त नहीं है ,केवल अभिव्यक्ति की स्वाधीनता के स्तर पर ही उसकी सामान्य स्वीकृति है।  उसके संरक्षण के लिए भारत का राज्य  कुछ भी नहीं करेगा जबकि भारत   का राज्य अल्पसंख्यकों के मजहब के लिए बहुत कुछ करेगा । ऐसी विचित्र स्थिति भारतवर्ष में है । यहां धार्मिक स्वतंत्रता का कानून बनाने की घोषणा करना अथवा किसी भी धर्म या पंथ की निंदा को संज्ञान योग्य   अपराध घोषित करना अथवा किसी भी जाति के लिए अपमान सूचक शब्दों के प्रयोग को संज्ञान योग्य  अपराध घोषित करना, विशेषकर सार्वजनिक रूप से ऐसे शब्दों के प्रयोग को ऐसा अपराध घोषित करना एक बहुत बड़ा बौद्धिक निर्णय होगा । परंतु भारतीय जनता पार्टी में बौद्धिक क्षेत्र में गहरी हीन भावना है और वह 70 वर्षों में विकसित धर्मनिरपेक्ष और धर्म शून्य बौद्धिको  के गहरे बौद्धिक दबाव में हैं इसलिए वह सारे संसार में स्वागत किए जाने योग्य ऐसी सुंदर घोषणाओं को करने का भी साहस नहीं करती।
यद्यपि इस बार भारतीय जनता पार्टी ने धारा 35a और 370 को समाप्त करने की घोषणा करके बहुत बड़ा संकल्प व्यक्त किया है और अधिकांश हिंदुओं का मन उसने इस से जीत लिया है परंतु उसने इसके विस्तार में जम्मू कश्मीर के गैर स्थाई निवासियों और महिलाओं से ही भेदभाव होने की बात कही है तथा इस विश्व विदित सत्य को छुपा लिया है कि जम्मू कश्मीर के मूल निवासियों के साथ सुनियोजित नरसंहार किया गया जो भयंकर अपराध है और उसकी क्षतिपूर्ति के लिए तथा भविष्य में कभी इस प्रकार का नरसंहार , जाति संहार  संभव ना हो,  इसके लिए सुनिश्चित प्रबंध करने को भाजपा कृत  संकल्प हो ,  इतनी सी बात करने का भी साहस भारतीय जनता पार्टी में नहीं है और वह अपनी राष्ट्रीय भावनाओं को भी दबे स्वर में छिपकर अभिव्यक्त करती है।
इससे स्पष्ट होता है कि बौद्धिक क्षेत्र में भाजपा अभी भी हीन भावना का शिकार है । जहां तक प्रौद्योगिकी आदि के विकास की बात है , वह एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घटित हो रहा घटना चक्र है और उसमें कोई nation-state बाधा तो डाल सकता है ,परंतु अगर वह उसमे साझीदारी  चाहे तो उसमें निरंतर उन्नति सुनिश्चित ही है । अतः उसकी बात करना किसी राष्ट्र के लिए कोई विशेष बात नहीं है । वह तो अंतरराष्ट्रीय घटना चक्र का एक सामान्य अंग है ।

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