भारत के पुरुषार्थ ने विश्व को, तो मोदी ने विनम्रता से चिर-निंदकों को भी चुप कराया !

रामभुवन सिंह कुशवाह
कल रात जब सारा देश सुख की नींद  सो रहा था तब भारत के प्रधानमंत्री, अपने राष्ट्रीय रक्षा सलाहकार अजीत डोभाल तथा जल,थल वायु सेना के प्रमुखों  के साथ देश के पुरुषार्थ का अभूतपूर्व प्रदर्शन कर प्रत्येक भारतीय को आश्वस्ति दे रहे थे कि “आप आराम से सोइए, मैं  हूँ तो  किसी को भी चिंता करने  की जरूरत नहीं है ।  रात साढ़े तीन बजे के करीब भारतीय वायुसेना के जाबांज सैनिक पाकिस्तान के अंदर बालाकोट और उसके आसपास तीन कुख्यात आतंकी संगठन का सबसे बड़ा अड्डा और  ट्रेनिंग केंप को पूरी तरह ध्वस्त कर मसूद अज़हर के खानदान को 21 मिनट में खत्म करके लौट आए और पुलवामा के पाक प्रेरित कायरना हमले का बदला लेकर सीआरपीएफ के शहीद जवानों को त्रियोदशी  तर्पण देकर अपने दायित्वों का  शानदार निर्वहन किया। जागते ही सारा देश खुशियों से झूम उठा। इस हमले में 300 के करीब आतंकवादी मारे गए जिसकी खास विशेषता ही यह थी कि दुश्मन देश के एक भी सिविलियन को नुकसान नहीं पहुंचाया गया और न हमारे किसी भी जवान या जहाज को नुकसान हुआ । प्रधानमंत्री इस अभियान को अपनी  पूरी निगरानी में संचालित् कर रहे थे और इस बात की चिंता कर रहे थे कि पाकिस्तान का एक भी व्यक्ति नहीं मारा जाना चाहिए जबकि ऐसे हवाई हमलों में इसकी  संभावना कम ही होती है परंतु यह हम भारतीयों का सहज स्वभाव है ,हम बनें ही उस मिट्टी के हैं जिसमें युद्ध जैसी विभीषिका में भी हम मानवता का भाव नहीं भूलते। 
सबसे बड़ी बात यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसके बाद जो सहज , स्वाभाविक, निरभिमानी आदर्श  व्यवहार किया जिसका दुनिया में शायद ही कहीं दूसरा उदाहरण मिलेगा। सारा अभियान सफलता पूर्वक समापन  करके अपने आवास पर सुरक्षा मामले की केबिनेट कमेटी की बैठक लेकर आगे किसको क्या करना है इसका सबको निर्देश देकर राष्ट्रपति भवन की ओर चल दिये। मीडिया चेनल्स के संवाददाताओं को लगा कि वे राष्ट्रपति महोदय को इस सफलता की औपचारिक जानकारी देने के लिए  जा रहे है, क्योंकि राष्ट्रपति सेना के तीनों अंगों के प्रमुख होते है,इसलिए औपचारिक रूप से उन्हें अवगत कराना उनका दायित्व होता है परंतु  यह क्या ? वे तो अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम ‘ गांधी शांति पुरस्कार’ समारोह में भाग लेने राष्ट्रपति भवन गए थे।जैसे कुछ हुआ ही न हो ,उन्होने अपने विलंब से आने के लिए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी ।  पूरा देश विलंब का कारण समझ रहा था किन्तु  उन्होने केवल इतना ही कहा –  “माफ कीजिये मैं दूसरे कामों में व्यस्त था।” समारोह में  समीप बैठे भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लाल कृष्ण आडवाणी ने उनकी पीठ थपथपाई तो उन्होने अत्यंत विनम्र भाव से चरण ही स्पर्श किए और कहा कुछ नहीं। जब विवेकानन्द केंद्र कन्याकुमारी के अत्यंत बुजुर्ग अध्यक्ष श्री पी ,परमेश्वरन को पुरस्कार प्रदान किया तब भी अत्यंत विनम्र भाव से झुककर उन्हें प्रणाम करते देखा गया। वे इसके  के बाद भी पूर्व निर्धारित कार्यक्रम चुरू राजस्थान की जन सभा को संबोधित करने गए तो जन सागर के अपार समर्थन का उत्तर जनता को ही श्रेय देकर दिया और अपनी एतिहासिक महान सफलता के बारे में  बिना कुछ बताए ‘ सब कुछ ‘ बता दिया ।
उन्होंने देश की खुशी में अपनी खुशी मिलाकर पूरे भाषण में  बार -बार यही संकल्प दोहराया कि कुछ भी हो जाए वे देश को झकने नहीं देंगे,मिटने नहीं देंगे।(जाहिर है कुछ लोग मिटाने को तुले हुए हैं पर उनके इरादों पर  तो रात में ही बम गिर  चुका था! )  वापस दिल्ली लौटकर उन्हें हरे कृष्ण मिशन के एक धार्मिक कार्यक्रम में जाना था । वे मेट्रो ट्रेन में सामान्य नागरिक की तरह यात्रा करते हुये सामान्य यात्रियों से सहज सामान्य  रूप से चर्चा करते हुये , सेल्फी लेते और देते हुये  बच्चों  को खिलाते हुये , अल्पसंख्यक बुजुर्गों का आशीर्वाद लेते हुये पहुंचे । तब तक सभी जान गए थे,उनको बताने की कोई  आवश्यकता ही नहीं थी। कार्यक्रम स्थल पंहुचे तो उपस्थित हजारों देशी विदेशी प्रतिभागी स्त्री पुरुषों ने तालियाँ बजाकर उनका भारी स्वागत किया । उन्होने अपना भाषण  ही यह कहकर शुरू किया ” आज उनके लिए अत्यंत विशेष दिन है” इतना सुनते ही फिर तालियों की गड़गड़ाहट शुरू हो गई। लोगों को लगा कि मोदी जी आज के पुरुषार्थ भरे विजयी अभियान के कारण ‘ विशेष दिन’ बता रहे हैं परंतु यह क्या ? वे तो दूसरा ही कारण बताने लगे ! उन्होने कहा कि आज सुबह विवेकानन्द केंद्र सहित कुछ संस्थाओं को गांधी शांति पुरस्कार देनेवाले कार्यक्रम में सहभागिता करने के बाद  वे इस धार्मिक कार्यक्रम जिसमें श्रीमदभगवद्गीता की अनुपम कृति के लोकार्पण कार्यक्रम में शामिल हो रहे हैं ।
पूरे दिन प्रधानमंत्री श्री मोदी ने अपनी और देश की  सफलता का जिक्र कतई नहीं किया था तो इस आध्यत्मिक कार्यक्रम में कैसे करते? उन्होंने गीता के इस एक श्लोक से बता दिया कि हुआ क्या है ? “परित्राणाय साधुनाम,विनाशाय दुष्कृताम” और उसकी व्यख्या करके सब समझ गए। इतनी बड़ी सफलता पर सारा विश्व जब भारत के पुरुषार्थ और मोदी के कुशल नेतृत्व की प्रशंसा कर रहा था तब भारत के चिर दुश्मन पाकिस्तान में वहां के नेतृत्व के बारे में हाय हाय के नारे लग रहे थे।तो फिर भारत में भी उनके विरोधियों की स्थिति समझी जा सकती है।
अब प्रश्न यह है कि पुलवामा के कायराना कृत्य का पर जब नरेंद्र मोदी कड़ी चेतावानी दे रहे थे तब पाकिस्तान यह समझ क्यों नहीं पाया कि भारत और मोदी को उसके प्रतिक्रिया में कुछ करना ही पड़ेगा ?ऐसा पाकिस्तान में सब बोल भी रहे थे ,तैयारियां भी चल रहीं थीं फिर भी वह असाबधान कैसे रहा ? इसका भी मेरे पास उत्तर है। युद्ध की भाषा में उसे ‘केमोफ्लाई’ कहते हैं।मोदी  जी ने जब कश्मीर घाटी में दस हजार से ज्यादा सुरक्षाकर्मी भेजे, वहां के अलगाववादियों का हुक्कापानी बन्द किया।कुछ को जेल में डाल दिया तब मीडिया ने कहना शुरू किया कि भारत सरकार अनुच्छेद 35(ए)और 370 को समाप्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले या फिर अध्यादेश की प्रतिक्रियाओं का मुकाबला करने के लिए माकूल व्यवस्था कर रही है तब मैंने अपने मित्रों से कहा था कि हम पाकिस्तान के विरुद्ध कोई बड़ी कार्यवाही करने जा रहे हैं।अमरीका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी कहा पर कश्मीर के नासमझ नेताओं और भारत के स्वार्थी विपक्ष ने अपनी औकात दिखाना शुरू कर दी।प्रतिक्रियाएं देते समय वे यह भूल गए कि इसका अंजाम क्या होगा ? उनकी अपनी भड़ास और राष्ट्रविरोधी बयानों से  पाकिस्तान भी झांसे में आ गया।वहां से भी बयान आने शुरू हो गए कि भारत सरकार जम्मू कश्मीर की मौजूदा स्थिति बदलेगी तो वे भी चुप नहीं रहेंगे।पूरा मीडिया इन्हीं बयानों से पट गया और भारत के कुछ विपक्षी नेताओं को लगा कि अब उसकी मन की मुराद पूरी होनेवाली है। यही उपयुक्त  अवसर था भारत के लिए  पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों के अड्डों पर हमला करने का और मोदी ने वही किया । ऐसा करके उन्होंने देशी- विदेशी, सभी प्रकार के अपने विरोधियों को सदैव के लिए चुप करा दिया है।

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