राष्ट्रभाषा विहीन राष्ट्र भारत

राकेश दुबे

१९४७ से २०१९, हिंदी का पखवाडा हर साल की तरह अपने अंतिम पायदान पर है | इतने सालों के बाद  आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति। दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक सब कुछ पराई भाषा में होरहा  है और कब तक होता रहेगा कोई कह नहीं सकता । । महात्मा गांधी ने हिंदुस्तानी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव किया था। उनके प्रयास से १९२५  में संपन्न हुए कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन में कांग्रेस की सारी कार्यवाहियां हिंदुस्तानी में किए जाने का प्रस्ताव पास हुआ था। वे जिसे हिंदी कहते थे उसके स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा था  “ ऐसी दलील दी जाती है कि हिंदी और उर्दू दो अलग-अलग भाषाएं हैं। यह दलील सही नहीं है।

उत्तर भारत में मुसलमान और हिंदू एक ही भाषा बोलते हैं। भेद पढ़े-लिखे लोगों ने डाला है… मैं उत्तर में रहा हूं, हिंदू-मुसलमानों के साथ खूब मिला-जुला हूं और मेरा हिंदी भाषा का ज्ञान बहुत कम होने पर भी मुझे उन लोगों के साथ व्यवहार रखने में जरा भी कठिनाई नहीं हुई है। जिस भाषा को उत्तरी भारत में आम लोग बोलते हैं, उसे चाहे उर्दू कहें चाहे हिंदी, दोनों एक ही भाषा की सूचक हैं। यदि उसे फारसी लिपि में लिखें तो वह उर्दू भाषा के नाम से पहचानी जाएगी और नागरी में लिखें तो वह हिंदी कहलाएगी।“ सही मायने में इस दिशा में किसी ने कोई काम नहीं किया | चंदा बटोर कर इमारत बनाने और उस इमारत को समारोह स्थल में बदलने से इतर हुआ ही क्या है ? खैर……!

संस्कृत साहित्य को छोड़ दें तो हिंदी का पहला व्याकरण हालैंड निवासी जॉन जोशुआ केटलर द्वारा डच भाषा में १६९८  ईस्वी में लिखा गया मिलता है , जिसका शीर्षक है, ‘हिंदुस्तानी ग्रामर’। बेंजामिन शुल्जे द्वारा लैटिन में लिखे गए और १७४५  ईस्वी में प्रकाशित ग्रंथ का नाम है, ‘ग्रामेटिका हिंदोस्तानिका’। जॉन फार्गुसन की पुस्तक है-‘ए डिक्शनरी आफ हिन्दुस्तानी लैंग्वेज,’ (१७७३ ईस्वी) और जॉन गिलक्रिस्ट के व्याकरण ग्रंथ का नाम है, ‘ए ग्रामर आफ द हिंदुस्तानी लैंग्वेज’ (१७९०  ईस्वी)। गार्सां द तासी द्वारा लिखित तथाकथित हिंदी साहित्य का पहला इतिहास वास्तव में हिंदुई और हिंदुस्तानी साहित्य का इतिहास है। इससे भी पहले १८००  में कलकत्ता में जो फोर्ट विलियम कॉलेज बना था, उसमें भी हिंदी विभाग नहीं, अपितु हिंदुस्तानी विभाग खुला था जिसके पहले अध्यक्ष जॉन गिलक्रिस्ट थे। जॉन गिलक्रिस्ट के अनुसार उस समय हिंदुस्तानी की तीन शैलियां प्रचलित थीं। एक, फारसी या दरबारी शैली, दूसरी- हिंदुस्तानी शैली और तीसरी हिंदवी शैली। गिलक्रिस्ट दरबारी या फारसी शैली को अभिजात वर्ग में प्रचलित और दुरूह मानते थे और हिंदवी शैली को ‘वल्गर’। उनकी दृष्टि में हिंदुस्तानी शैली ही ‘द ग्रेंड पापुलर स्पीच आफ हिंदुस्तान’ थी। आगे चल कर इसी हिंदुस्तानी की लड़ाई राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद ने भी लड़ी, जिसे वे ‘आमफहम और खास पसंद’ भाषा कहते थे। गांधीजी को अपने अनुभवों से वे भली-भांति समझ चुके थे कि इस देश की एकता को कायम रखने में हिंदुस्तानी बड़ी भूमिका अदा कर सकती है और इसी में निर्विवाद रूप से इस देश की राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता है।

संविधान सभा में होने वाली बहस के पहले ही गांधीजी की हत्या हो गई। देश का विभाजन भी हो गया था और पाकिस्तान ने अपनी राष्ट्रभाषा उर्दू को घोषित कर दिया था। इन परिस्थितियों का गंभीर प्रभाव संविधान सभा की बहसों और होने वाले निर्णयों पर पड़ा। हिंदुस्तानी और हिंदी को लेकर सदन दो हिस्सों मे बंट गया। गांधीजी के निष्ठावान अनुयायी जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित दक्षिण के डा. पी सुब्बारायन, टीटी कृष्णामाचारी, टीए रामलिंगम चेट्टियार, एनजी रंगा, एन गोपालस्वामी आयंगर, एसबी कृष्णमूर्ति राव, काजी सैयद करीमुद्दीन, जी. दुर्गाबाई आदि ने हिंदुस्तानी का समर्थन किया, तो दूसरी ओर राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ गोबिंद दास, रविशंकर शुक्ल, अलगूराय शास्त्री, संपूर्णानंद, केएम मुंशी आदि ने हिंदी का। बहुमत हिंदी के पक्ष में था और संविधान सभा ने हिंदी को संघ की राजभाषा तय कर दिया। आज सत्तर वर्ष बाद जब हम संविधान सभा के उक्त निर्णय के प्रभाव का मूल्यांकन करते हैं तो हमें लगता है कि हिंदी को इसके लिए बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। दक्षिण के हिंदी विरोध का मुख्य कारण यही है। जो लोग पहले गांधीजी के प्रभाव में आकर हिंदी का प्रचार कर रहे थे, वे ही बाद में हिंदी के विरोधी हो गए। संविधान सभा में होने वाली बहसों को पलट कर देखने पर तो यही लगता है। हिंदी या हिन्दुस्तानी राजभाषा  से राष्ट्रभाषा होने की राह में खड़ी है और न जाने कब तक खड़ी रहेगी |

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