राहुल को यू ही नही मिल सकता गठबंधन का नेतृत्व

कृष्णमोहन झा
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने नई कार्यकारिणी की घोषणा कर दी है। इस नई कार्यकारिणी ने अपनी बैठक में यह फैसला लिया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष को ही प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। कार्यकारिणी में समान विचारधारा वाले विपक्षी दलों से भी यह अपील की गई है कि भाजपा को हराने के लिए बनने वाले महागठबंधन में प्रमुख विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस को केंद्रीय भूमिका में रखा जाए। इसके साथ ही भावी प्रधानमंत्री के रूप में राहुल गांधी को प्रॉजेक्ट करने के लिए सभी दल सहमति प्रदान करे।
गौरतलब है कि कर्नाटक के विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने स्वयं ही यह घोषणा कर दी थी कि आगामी लोकसभा चुनाव में यदि कांग्रेस सबसे बड़े दल के रूप में उभरती है तो वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने में कोई संकोच नही करेंगे। राहुल गांधी चूंकि कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष है, इसलिए यह तो पहले से तय था कि कार्यकारिणी की बैठक में उनकी इच्छा को सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया जाएगा। औऱ हुआ भी वही। अब आगे सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि भाजपा विरोधी दल महागठबंधन बनाने की जो योजना बना रहे है, क्या उसका नेतृत्व राहुल गांधी को सौपने को सहर्ष तैयार हो जाएंगे।
कर्नाटक में जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने वाली कांग्रेस पार्टी के इस प्रस्ताव का सबसे पहले समर्थन किया है। कुमारस्वामी एवं उनके पिता एचडी देवेगौड़ा ने घोषणा कर दी है कि उनकी पार्टी को राहुल के नेतृत्व से कोई एतराज नही है। इसके अलावा शरद पवार की अध्यक्षता वाली राष्टवादी कांग्रेस पार्टी भी कह चुकी है कि कांग्रेस को यदि सबसे अधिक सीटें मिलती है तो पार्टी राहुल गांधी का पीएम पद के लिए समर्थन करेगी। हालांकि संभावित महागठबंधन के अन्य दलों समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस व बहुजन समाज पार्टी ने अभी तक सहमति नही दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव तो पीएम पद लोकसभा चुनाव के पहले किसी भी तरह की दावेदारी को खारिज कर चुके है, वही बसपा सुप्रीमों मायावती भी कह चुकी है कि यदि गठबंधन में उन्हें सम्मानजनक सीटें नही मिली तो वे अकेले चुनाव लड़ना पसंद करेंगी। तृणमूल कांग्रेस अध्यक्षा ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल होने को तो तैयार है, लेकिन राहुल गांधी के नाम पर अपनी सहमति के कोई संकेत उन्होंने नही दिए है।उड़ीसा में सत्तारूढ़ बीजू जनता दल के मुखिया नवीन पटनायक  विपक्षी गठबंधन एवं केंद्र की राजग सरकार से सामान दूरी बनाकर चल रहे है। उधर राष्ट्रीय लोकदल सहित अन्य दलों ने भी अभी तक कोई संकेत नही दिए है।
इन सभी बातों से यह तय माना जा सकता है कि भाजपा को हराने के लिए यदि महागठबंधन बन भी जाता है तो उसके नेता के चुनाव का मसला आसानी से सुलझने वाला नही है ,जब तक अखिलेश ,मायावती व ममता बनर्जी जैसे विपक्षी दिग्गज राहुल गांधी के नाम पर एकमत नही होते। उधर यदि ये तीनों स्वयं को पीएम पद के दावेदार के रूप में पेश करते है तो इन्हें कांग्रेस का समर्थन मिलना मुश्किल होगा। राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव जरूर राहुल गांधी के प्रशंसक है और उन्होंने हाल ही में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी द्वारा पीएम को गले लगाने पर प्रसन्नता व्यक्त की थी। अतएव यह माना जा सकता है कि राजद को राहुल के नाम पर कोई आपत्ति नही होगी। कांग्रेस साम्यवादियों की तरफ से भी पूरी तरह आश्वस्त है कि वे भी राहुल के नाम सहमति प्रदान कर देंगे।
कुल मिलाकर जो तस्वीर उभरकर सामने आ रही है उसके अनुसार राहुल गांधी की राह फिलहाल आसान नही लग रही है। अभी यह सवाल भी खड़ा है कि क्या कोई दल सत्तारूढ़ राजग के सबसे बड़े दल भाजपा से अधिक सीटें जीतने की स्थिति में है। कांग्रेस की मौजूदा स्थिति को देखने के बाद तो यह अनुमान भी नही लगाया जा सकता है कि वे डेढ़ सौ से अधिक सीटें जीतने की स्थिति में आ सकती है। इसलिए आज की स्थिति में किसी भी भाजपा विरोधी दल को इतना भरोसा नही है कि राहुल गांधी आगामी लोकसभा चुनाव के पहले नरेंद्र मोदी के मुकाबले करिश्माई नेता बनकर उभर सकते है। यह संभव तभी हो सकता है जब राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस आगामी तीन राज्यो के चुनावों में भाजपा को हराने में कामयाब हो जाए।

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