स्मरण शेष ! अटल बिहारी वाजपेयी की संवाद दृष्टि

डा. अनिल सौमित्र

25 दिसंबर, 1924  से 16 अगस्त, 2018 . विश्व इतिहास में महापुरुषों की परम्परा विद्यमान है l प्रत्येक व्यक्ति अपने विशेष गुण, कर्तृत्व  और व्यक्तित्व के कारण महान बनता है l विश्व के श्रेष्ठ व्यक्तियों ने विद्वता, वीरता, पराक्रम, बौद्धिकता, मधुरता, कोमलता आदि गुणों के कारण महानता अर्जित की है l आध्यात्म, ज्ञान-विज्ञान, राजनीति, रणनीति-कूटनीति, विदेशनीति आदि के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के कारण अनेक व्यक्ति लब्ध-प्रतिष्ठित, ख्यात और लोकप्रिय हुए l इन्हीं व्यक्तित्वों की श्रृंखला में एक नाम पं. श्री अटल बिहारी वाजपेयी का है l श्री वाजपेयी का व्यक्तित्व बहुआयामी है l वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक-प्रचारक, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि-साहित्यकार, राजपुरुष, मंत्री-प्रधानमंत्री के रूप में समाज में मान्य हैं l मंत्री-प्रधानमंत्री के रूप में भले ही वे भूतपूर्व हो गए, लेकिन स्वयंसेवक-प्रचारक, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि-साहित्यकार और राजपुरुष के रूप में वे अभूतपूर्व योगदान के साथ हमारे बीच विद्यमान हैं l

अनेक गुणों से संपन्न होने के कारण श्री वाजपेयी का व्यक्तित्व वैविध्यपूर्ण और अनुकरणीय है l उनके व्यक्तित्व में हर व्यक्ति के लिए कुछ-न-कुछ है l कोई चाहे तो सरलता ले ले, कोई चाहे तो कवित्व ! राजनीति में रूचि रखने वाले राजनीति, कूटनीति की चाह रखने वाले कूटनीति सीख सकते हैं l राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लिए वे स्वयंसेवक और राजनेता के श्रेष्ठ उदाहरण हैं l कवि-साहित्यकार और पत्रकार के रूप में भी अनुकरणीय हैं l वे इस दृष्टि से भारतीयता के, भारत की संवाद-संचार परम्परा के वाहक हैं l श्री अटल बिहारी वाजपेयी के बहुआयामी व्यक्तित्व का अनेक दृष्टियों से विश्लेषण होता रहा है l यह सर्वथा समीचीन है कि अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के संचारक पहलू का विश्लेषण हो l यह विश्लेषण संचार क्षेत्र में कार्यरत पत्रकारों, संपादकों, संवाददाताओं, सम्प्रेषकों आदि के लिए प्रेरक हो सकता है l दरअसल व्यक्ति के विचार, वचन और व्यवहार को संचार की प्रक्रिया और माध्यम दे द्वारा संरचित किया जाता है l देवर्षि नारद मुनि से लेकर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण, श्री भारत मुनि, श्री विदुर और श्री संजय जैसे आदि पुरुषों की संचार शैली का विश्लेषण करने पर एक विशिष्ट संचार-संवाद की परम्परा का ज्ञान होता है l यहाँ इस आलेख में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के संचार-संवाद पक्ष का विश्लेषण किया गया है l

श्री अटल बिहारी वाजपेयी के व्यक्तित्व के किसी ख़ास पहलू का विश्लेषण करने के पूर्व उनके जीवन के महत्वपूर्ण पक्षों को उद्धृत करना आवश्यक है l  श्री वाजपेयी का जन्म 25 दिसंबर, 1924 को ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ l आपके पिता का नाम श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी था l एक भरे-पूरे परिवार के सदस्य अटल बिहारी वाजपेयी ने विक्टोरिया (अब लक्ष्मीबाई) कालेज, ग्वालियर और डी.ए.वी. कालेज, कानपुर में अपनी पढाई पूरी की l आपने राजनीतिशास्त्र में एम.ए. तक पढ़ाईकी l सन 1942 के स्वतंत्रता आन्दोलन में गिरफ्तार होकर अंग्रेजी हुकूमत की जेल में रहे l एक पत्रकार के रूप अपने जीवन की शुरुआत करते हुए 1947-50 तक ‘राष्ट्रधर्म’, 1948-52 के दौरान ‘पांचजन्य’ (साप्ताहिक), 1949-50 के बीच ‘स्वदेश’ (दैनिक), 1950-52 तक ‘वीर अर्जुन’ के सम्पादक के रूप में अपना योगदान दिया l [1]

1951 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने l 1968-73 के दौरान आप जनसंघ के अध्यक्ष रहे l 1977 में जब जनता पार्टी का गठन हुआ तब आप इसके संस्थापक सदस्यों में थे l जनता पार्टी के नेतृत्त्व में गठित सरकार में आपने भारत सरकार के विदेश मंत्री के रूप में दायित्व का निर्वहन किया l भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य और 1980-86 के बीच इसके अध्यक्ष रहे l आप 1980-84 तथा 1986-91 के बीच भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल के नेता रहे l सन 1985 को छोड़ कर 1957 से 1914 तक निरंतर भारतीय संसद के सदस्य रहने का सौभाग्य आपको प्राप्त है l 1991-96 के बीच आप दसवीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे हैं l 11वीं लोकसभा के गठन के तुरंत बाद आप 16 मई, 1996 से 28 मई, 1996 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे l जून 1996 से फरवरी, 1996 तक 11 वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे l मार्च 1998 में गठित 12वीं लोकसभा के गठन के बाद आप पुन: भारत के प्रधानमंत्री बने l राष्ट्र के प्रति आपकी समर्पित सेवाओं के लिए 1992 में ‘पद्म विभूषण’तथा 2015 में “भारत रत्न” से विभूषित किये गए l

विचार का निर्माण और उसकी अभिव्यक्ति संचार का मूल उद्देश्य है l संचार और संवाद के माध्यम से ही मनुष्यों के विचार, वचन और व्यवहार को नियोजित और परिवर्तित किया जाता
है l संचार के द्वारा भावों-संवेगों को निर्दिष्ट किया जाता रहा है l भारतीय परम्परा में हमें लोक-कल्याण से लेकर व्यवहार-परिवर्तन, युद्ध, शान्ति, सद्भाव, आन्दोलन और विकास कार्यक्रमों आदि के लिए अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति निर्मित करने में संचार की प्रविधियों के उपयोग के अनेक उदाहरण मिलते हैं l संचार के द्वारा व्यक्ति में उत्साह, सद्भाव, प्रेम, सरलता, सामंजस्य, सजगता, सतर्कता, संतुष्टि, संयम, सेवा, संवेदनशीलता आदि का भाव पैदा करने तथा इसके विपरीत निराशा, दुर्भावना, क्रोध, ईर्ष्या-द्वेष, आलस्य, उदासीनता, आक्रोश आदि को नष्ट या कम करने प्रयास किया जाता रहा है l भारतीय दर्शन में ध्वनि और अक्षर को ब्रह्म का रूप माना गया है l जैसे विद्या हमें मुक्त करती है, वैसे ही संचार की भारतीय प्रक्रिया व्यक्ति को अज्ञानता सहित कई बंधनों से विमुक्त करती है l यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि परम्परा, संस्कृति, संस्कार, ज्ञान-विज्ञान, विद्या, शिक्षा आदि की ही तरह इतिहास, दर्शन, संचार-संवाद इत्यादि की भारतीय अवधारणा है जो अन्य अवधारणाओं से सर्वथा भिन्न है l अध्येताओं और व्याख्याकारों के लिए इस अवधारणात्मक वैशिष्ट को समझना जरूरी है l इसके बिना भारत-बोध और भारत को समझना कठिन होगा l

श्री अटल बिहारी वाजपेयी की कृतियों, विचारों, वक्तव्यों, भाषणों, संबोधनों, ज्ञापनों, पत्रों आदि का विश्लेषण करने पर भारतीय संचार परम्परा की स्पष्ट झलक दिखती है l श्री वाजपेयी की ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ के बारे में प्रखर विद्वान श्री विष्णुकान्त शास्त्री लिखते हैं – वज्र से भी कठोर अडिग सकल्प-संपन्न राजनेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी के कुसुम कोमल हृदय से उमड़ पड़ने वाली कविताएँ गिरी-हृदय से फूट निकलने वाली निर्झरियों के सदृश्य एक ओर जहाँ अपने दुर्दान्त आवेग से किसी भी अवगाहनकर्ता को बहा ले जाने में समर्थ है, वहीं दूसरी ओर वे अपनी निर्मलता, शीतलता और प्राणवत्ता से जीवन के दुर्गम पथ के राहियों की प्यास और थकान को हरकर  नई प्रेरणा की संजीवनी प्रदान करने की क्षमता से भी संपन्न हैं l इनका सहज स्वर तो देशभक्तिपूर्ण शौर्य का ही है, किन्तु कभी-कभी नव-सर्जना की वेदना से ओत-प्रोत करुणा की रागिनी को भी ये ध्वनित करती हैं l[2]इसी पुस्तक की प्रस्तावना में स्वयं श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने लिखा है – ..जब राजनीति में आया तब कविता क्या, गद्य लेखन भी कठिन हो गया l सारी ऊर्जा भाषणों में खर्च होने लगी l 1957 में पहली बार लोकसभा का सदस्य चुना गया, भाषण ही अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन बन गया l यदाकदा ही लेख या कविता लिखने का अवसर निकाल पाता l सच्चाई यह है कि कविता और राजनीति साथ-साथ नहीं चल सकती l ऐसी राजनीति, जिसमें प्राय: प्रतिदिन भाषण देना जरूरी है और भाषण भी ऐसा जो श्रोताओं को प्रभावित कर सके l इस कविता संग्रह के सम्पादक श्री चन्द्रिका प्रसाद शर्मा सम्पादकीय में लिखते हैं – कवि (श्री अटल बिहारी वाजपेयी) की प्राप्त सभी कविताओं को मैंने रचना की प्रकृति, तासीर और तेवर को देखकर चार भागों में विभक्त किया है – अनुभूति के स्वर, राष्ट्रीयता के स्वर, चुनौती के स्वर तथा विविध स्वर l ‘अनुभूति के स्वर’ में कवि की नई तर्ज पर नए कथ्य और नए शिल्प के साथ दार्शनिकता के पुट से युक्त रचनाएँ हैं l ‘राष्ट्रीयता के स्वर’ में राष्ट्रभक्ति, राष्ट्र-प्रेम और राष्ट्राराधन की रचनाएँ राखी गई हैं l इसी प्रकार ‘चुनौती से स्वर’ में वे कविताएं हैं जिनमें राष्ट्र के पौरुष और गौरव के वर्णन के साथ उन सभी को चुनौतियां दी गईं हैं, जो राष्ट्र के मान-मर्यादा में बट्टा लगाना चाहते हैं l कविता संग्रह के इस विश्लेषण से श्री वाजपेयी की संचार दृष्टि स्पष्ट होती है l

श्री वाजपेयी की साहित्यिक व वैचारिक अवदानों का विश्लेषण करने से उनके संचार-संवाद दृष्टि का व्यापक परिदृश्य स्पष्ट होता है l श्री अटल बिहारी वाजपेयी को ‘’कैदी कविराज की कुण्डलियाँ’’, ‘’न्यू डाइमेंशंस आफ एशियन फारेन पालिसी’’, ‘मृत्यु या ह्त्या’, ‘जनसंघ और मुसलमान’, और ‘मेरी इक्यावन कविताएं’ नामक पुस्तकें लिखने का श्री प्राप्त है l 1992 में प्रकाशित ‘संसद में तीन दशक’ के तीन खंडों को समाहित करते हुए और उनमें सम्मिलित होने से रह गए और उसके बाद उनके सन 1957 से अब तक लोकसभा और राज्यसभा में जितने भी महत्वपूर्ण भाषण दिए हैं, वे सब ‘मेरी संसदीय यात्रा’ के चार खण्डों में प्रकाशित हुए हैं l ‘अटलजीचे आह्वान’ नाम से मराठी में उनके द्वारा सार्वजनिक मंचों, सदन और पार्टी बैठकों के चुनिन्दा संभाषणों का संग्रह कई वर्ष पहले प्रकाशित हो चुके हैं l 22 मार्च, 1998 को प्रधानमंत्री के रूप में श्री वाजपेयी ने दूरदर्शन पर राष्ट्र के नाम प्रथम संबोधन में ही विपक्ष के साथ ही सभी का आह्वान किया[3]– आइये, मिलकर काम करें l उन्होंने सन्देश देते हुए कहा- आपकी सरकार बन गई l आइये, अब काम पर लग जाएँ l उनके लगभग सभी भाषणों में सहयोग, साहचर्य, तालमेल, साझे प्रयासों के आधार पर साथ चलने का आह्वान दिखाई देता है l यही साहचर्य और साझेदारी तो भारतीय दृष्टि है l उनके कुछ भाषणों के शीर्षकों पर गौर करें – आइये, मिलकर काम करें ; शिक्षा का विकास तालमेल से होगा, हम अपराधियों को दण्डित करेंगे, ध्यान विकास पर केन्द्रित करें, राष्ट्रीय विकास बनाम ग्रामीण विकास, साझे प्रयासों से रूकेगी मूल्य-वृद्धि, समाज में सद्भावनाओं का लोप, सर्वे सन्तु निरामया:, नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता, न दैन्यम न पलायनम, वाद-विवाद नहीं, संवाद चाहिए l नमूने के तौर पर उद्धृत इन शीर्षकों से स्पष्ट है कि श्री वाजपेयी के भाषणों में साझेदारी, तालमेल, संवाद, सद्भावना की आकांक्षा स्वाभाविक है l श्री वाजपेयी के भाषणों में नकारात्मकता बिरले ही मिलते
हैं l

12 जुलाई, 1998 गोविन्दगढ़ (पंजाब) में नॅशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट के 11 वें अधिवेशन में भाषण देते हुए श्री वाजपेयी ने जो कहा वह संचार की भारतीय परम्परा की पुनराभिव्यक्ति थी l उन्होंने कहा- खबरों के लिए, मनोरंजन के लिए बहुत सामग्री रहती है l लेकिन खबरों का चयन इस तरह का होना चाहिए कि जिससे समाज का हित हो, राष्ट्र का हित हो l कभी-कभी अखबार नकारात्मक रवैया अपना लेते हैं l दृष्टिकोण रचनात्मक होना चाहिए l 17 दिसंबर, 1998 को क्षेत्रीय मीडिया प्रतिनिधिमंडल को प्रधानमंत्री निवास पर संबोधित करते हुए श्री वाजपेयी ने कहा- मीडिया में बड़ी शक्ति है – प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया में l सूचना अपने में एक ताकत है l

वर्ष 1944 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की वाद-विवाद प्रतियोगिता में विशेष अनुमति के आधार पर शामिल हुए 20 वर्षीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जब बोलना शुरू किया और १० मिनटों के अन्दर ही उनके तर्कों को सुनकर सम्पूर्ण श्रोता रोमांचित हो उठे और श्री वाजपेयी सर्वश्रेष्ठ वक्ता चुने गये l वे डी ए वी कालेज से स्नातकोत्तर हुए थे l 1946 में श्री बालकृष्ण त्रिपाठी कानपुर की एक विशाल जनसभा को संबोधित करने वाले थे l हमेशा की तरह कुछ युवा नेता मुख्या वक्ता के पहले भाषण देने आये, जिनमें श्री वाजपेयी भी थे l इनका भाषण इतना प्रभावशाली था कि बालकृष्ण त्रिपाठी ने निर्णय लिया कि वे भाषण नहीं देंगे l उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि इस युवक ने वह सब कुछ कह डाला है जो मैं कहना चाहता था l[4]

श्री वाजपेयी के आलोचक व विरोधी भी उनकी संवाद शैली एवं आत्मविश्वास के प्रशंसक रहे हैं l एक बार प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत की यात्रा पर आये ब्रिटेन की प्रधानमंत्री से परिचय कराते हुए कहा था- यह विपक्ष का युवा नेता हमेशा मेरी आलोचना करता है, पर मुझे इसमें भारत के उज्ज्वल भविष्य की झलक मिलती है l[5] राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के निवृत्तमान सरसंघचालक प्रो. राजेन्द्र सिंह ‘रज्जू भैया’ ने उनके बारे कहा था- अटल जी के व्यक्तित्व के तीनों रूप – स्वयंसेवक, कवि और राजनेता सामान रूप से आकर्षक और महत्त्वपूर्ण हैं l उनके सहधर्मी रहे श्री लालकृष्ण आडवाणी ने लिखा[6]– देश में आज अटल जी के लाखों प्रशंसक हैं l हालांकि उन्हें बहुत करीब से जानने के कारण मेरा मानना है कि उनकी ओजस्वी वाणी और भाषा के ऊपर पूर्ण नियंत्रण, उनकी नेतृत्त्व क्षमता की खूबियों में शामिल है l यह नेतृत्त्व क्षमता निश्चित ही देश और इसके नागरिकों के प्रति उनके गहरे समर्पण का प्रतिफल है l अटल जी अपने राजनीतिक जीवन में अधिकतर समय विपक्ष में रहे l लम्बे समय तक विपक्ष में रहने वाले अधिकतर नेता तीखे आलोचक और कटु बोलने वाले हो जाते हैं l नकारात्मक सोच उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है, लेकिन अटल जी को सभी पार्टियों के मानने का एक कारण यह भी है कि वह इस तरह की नकारात्मक सोच से पूरी तरह अलग हैं l मैंने उन्हें सत्ता पक्ष पर कई बार गंभीर आक्रमण करते देखा है, लेकिन वह व्यक्तिगत हमले एकाध बार ही करते हैं और कभी ऐसा होने पर उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं होती l’

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और भाजपा के विभिन्न दायित्वों में रहे मध्यप्रदेश के पूर्व राज्यपाल डा. भाई महावीर ने श्री वाजपेयी के व्यक्तित्व को उनकी ही कविता से अंकित किया
है l वे लिखते हैं – अटल जी के भाव हमेशा उनकी कविता की इन पंक्तियों – हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा, काल के कपाल पर लिखता मिटाता हूँ, गीत नया गाता हूँ l’ के सामान ही रहे l

संसद या जनसभा कहीं भी अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण काफी गंभीरता से सुने
गए l इन भाषणों में विद्वता और देशभक्ति दोनों भाव प्रदर्शित होते हैं l वे आलोचना या चेतावनी के अवसर पर दो टूक बातें कहने से कभी नहीं चुके l हितकर कहने के लिए सदा आग्रही रहे l वे आलोचनाओं या विपक्ष की तर्कसंगत कटु बातों को भी पूरी तल्लीनता से सुनते और स्वीकार करते दिखते हैं l उनकी वाणी में संयम, ओज व तेज स्वाभाविक रूप से दिखता है l उनके संवाद में समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठा व् प्रतिबद्धता स्पष्ट दिखती है l 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय श्री वाजपेयी ने सम्पूर्ण देश का दौरा किया और जगह-जगह पर अपने भाषणों व कविताओं के द्वारा जनता का मनोबल बढाया l वे पत्रकारों की अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य के प्रबल पक्षधर रहे हैं l लेकिन वे इस स्वतन्त्रता का समाज व राष्ट्रहित में उपयोग के आग्रही भी रहे हैं l

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह कई मुद्दों पर श्री वाजपेयी का विरोध करते रहे, लेकिन वे भी उनके व्यक्तित्व के कायल हैं l वे सम्मानवश श्री वाजपेयी को ‘गुरुदेव’ संबोधित करते हैं l एक साक्षात्कार में श्री दिग्विजय सिंह कहते हैं [7] – किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्त्व का उसके कार्य पर अलग प्रभाव दिखता है l अटलजी कवि हृदय तथा संवेदनशील जननेता हैं l निश्चित ही उनके विचारों और गुणों का लाभ राजनीति में सौहार्द्र का वातावरण निर्मित करने में मिला l अनेक अवसरों पर उनके विचारों और उनकी कार्य-प्रणाली से विपरीत परिस्थितियों को बदलने के उदाहरण मिले हैं l’

जैसा कि आलेख के प्रारम्भ में उल्लेख किया गया है कि विश्व के अनेक व्यक्ति अपने गुणों के कारण महापुरुष के रूप में स्थापित और ख्यात हुए l श्री अटल बिहारी वाजपेयी भी अपने विलक्षण गुणों के कारण श्रेष्ठ पुरुष बन गए l सहजता, सरलता, पारदर्शिता, मृदुभाषिता, वक्तृत्व, सौम्यता, विद्वता के अनेक गुण उनके व्यक्तित्व में हैं l अध्येता और शोधार्थी उनके व्यक्तित्व के किसी गुण या पहलू पर अध्ययन कर सकते हैं l किसी भी आयाम से उनके व्यक्तित्व का विश्लेषण करने पर एक विराट व विलक्षण व्यक्तित्व का प्रकटीकरण होता है l हालांकि इस आलेख में श्री वाजपेयी के विभिन्न गुणों का उल्लेख मिल सकता है, किन्तु प्रयासपूर्वक उनके कवि, साहित्यकार, पत्रकार, वक्ता, अभिभाषक, उत्प्रेरक, संचारक और संप्रेषक गुण की विशेष चर्चा की गई है l इस विश्लेषण का अभिप्राय यही है कि संचार की भारतीय दृष्टि के परिप्रेक्ष्य में श्री अटल बिहारी वाजपेयी के अवदानों को उद्धृत किया जाए l इस आलेख में उद्धृत सन्दर्भों और टिप्पणियों के आधार पर यह कहना तर्कसंगत होगा कि अपने लेखों, भाषणों, उद्बोधनों, संबोधनों के द्वारा श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाठकों व श्रोताओंके साथ ही आमजन को सकारात्मक रूप से प्रेरित, प्रभावित, संवेदित, नियोजित, उद्वेलित, उद्भासित, जागरुक व चैतन्य किया l वे हताश-निराश व्यक्तियों में संवाद के द्वारा आशा व उत्साह का संचार करते रहे l वे भारत के सुमंगल अतीत की समीक्षा करके उज्ज्वल भविष्य की संरचना का प्रयास करते रहे l श्री वाजपेयी ने प्रत्येक स्तर पर अपने संचार और संवाद कौशल का उपयोग तथा विनियोग करते हुए जन-जागरण का प्रयास किया l सदैव सुमंगल पक्ष को प्रचारित करते रहे l भारतीय पत्रकारिता में अगर राष्ट्रीयता, सामाजिकता और लोक-कल्याण का भाव किंचित मात्र भी विद्यमान है तो इसमें श्री वाजपेयी का योगदान उल्लेखनीय है l वे सदैव मिथ्यावाचन, उन्माद-तत्त्व, अराजक तत्त्व, उग्रवादी-व्यक्ति, असंगत-तथ्य को हतोत्साहित किया, उसका निषेध किया l वहीं प्रत्येक घटना, तथ्य और विचार के उज्जवल पक्ष को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया ताकि समाज में सत्यं, शिवम् सुन्दरम् बोध का प्रसार हो सके l उन्होंने अपने संचार-कर्म से व्यक्ति के जीवन को उज्ज्वल करने का हरसंभव प्रयास किया l अपने लेखन के माध्यम से उन्होंने यह कोशिश की कि अत्याचारी या दुष्टों का विरोध हो, किसी प्रकार के अन्याय का महिमामंडन न हो l उनकी लेखनी ने सदैव सुमंगल के लिए आवश्यक वातावरण का निर्माण करने का ही यत्न किया l अटल बिहारी वाजपेयी ने पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों के समक्ष एक आदर्श दिशा प्रस्तुत की l संभव है कि एक संचारक के रूप में श्री वाजपेयी तटस्थ न होकर पक्षपाती रहे हों l लेकिन उनके आलोचक भी यह स्वीकार करते हैं कि वे मानवता, भारतीयता, हिंदुत्व, सज्जनता, उत्कर्ष, श्रेष्ठता आदि के प्रति पक्षपाती रहे l भारत की ऋषि, संत और संचार परम्परा यही सन्देश देती है, जिसमें सज्जनता का विकास, और दुष्टता का नाश लक्षित है l सुमंगल की कामना है l सत्यं, शिवम् सुन्दरम् का बोध है l श्री अटल बिहारी वाजपेयी की संवाद दृष्टि संचार की भारतीय अवधारणा व परम्परा से पोषित थी l वे इसी परम्परा के वाहक हैं l उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व भारतीयता को परिलक्षित करता है l यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि श्री अटल बिहारी वाजपेयी में देवर्षि नारद, भगवान श्री कृष्ण, ऋषि भरतमुनि, श्री विदुर, श्री संजय आदि के संचार गुणों के अनेक लक्षण परिलक्षित होते हैं l

( लेखक जनसंचार के अध्येता और मध्यप्रदेश भाजपा के मीडिया संपर्क प्रमुख हैं.)

[1]घटाटे डा. ना. मा. (सं.), 2014, अटल बिहारी वाजपेयी संकल्प-काल, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृ.

[2]शर्मा डा. चंद्रिका प्रसाद, 2015, मेरी इक्यावन कविताएं, किताबघर प्रकाशन, नयी दिल्ली

[3]घटाटे डा. ना. मा. (सं.), 2014, अटल बिहारी वाजपेयी संकल्प-काल, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 19

[4]सिंह प्रो. राजेन्द्र ‘रज्जू भैया’, 2000, अमृत अटल (विशेषांक), स्वदेश, भोपाल, पृ. 17

[5]सिंह प्रो. राजेन्द्र ‘रज्जू भैया’, 2000, अमृत अटल (विशेषांक), स्वदेश, भोपाल, पृ. 19

[6]आडवानी लालकृष्ण, 2000, अमृत अटल (विशेषांक), स्वदेश, भोपाल, पृ. 23

[7]झा प्रभात, (सं.) 2015, हमारे अटलजी, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली, पृ. 157-158

3 comments

  1. महाप्राण अटल जी के व्यक्तित्व व कृतित्व का विस्तृत विश्लेषण …. वे अपने महान विचारों के रूप में हमारे बीच हमेशा – हमेशा रहेंगे।

  2. अटल जी भारत रत्न ही नहीं विश्व रत्न भी थे

  3. बहुत सुंदर लेख! अटल जी अपने प्रेरक शब्दों के माध्यम से जनमानस के द्वारा याद रखे जायेंगे।

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