डिजिटल मीडिया और हिंदी : संभावनाएँ और चुनौतियाँ

 
( देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के अंतर्गत पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी )

इंदौर। पत्रकारिता के भी दो पहलू होते हैं एक सकारात्मक दूसरा नकारात्मक और वर्तमान समय में डिजिटल मीडिया ने पत्रकारिता को सुदृढ़ किया है। पत्रकारिता सुगंध की तरह होना चाहिए ना की दुर्गंध की तरह, जिस प्रकार से सुगंध सकारात्मक वातावरण का निर्माण करने का कार्य करती है वैसे ही आज की पत्रकारिता को भी वास्तविकता, विश्वसनीयता और सकारात्मकता का निर्माण करने पर कार्य करना चाहिए। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला में चल रही अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम दिन बतौर मुख्य अतिथि पधारे मध्य प्रदेश शासन के जनसंपर्क आयुक्त पी नरहरि ने अपने विचार व्यक्त किए। श्री नरहरि ने कहा कि पत्रकारिता में हमारा नजरिया पुस्तक का नहीं बल्कि व्यावहारिक होना चाहिए। डिजिटल मीडिया व मोबाइल मीडिया ने प्रत्येक व्यक्ति को पत्रकार बना दिया है। हम कह सकते हैं कि आज वह व्यक्ति जिसके हाथ में मोबाइल है वह पत्रकार है। प्रिंट मीडिया के स्थान पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आधिपत्य किया था लेकिन अब डिजिटल मीडिया ने इन दोनों पर अधिपत्य करने के लिए तैयार हो गया है। आज के दौर में जिसके पास स्वयं के विचार और अभिव्यक्त करने का तरीका है सही मायने में वहीं पत्रकार है। अंत में उन्होंने कहा कि मीडिया में आधुनिकता के साथ सकारात्मकता लाने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है।

संगोष्ठी में इंग्लैंड से आये मार्क लिंडले द्वारा शोध प्रस्तुत किया गया जो कि 8000 लोगो पर किये गए एक सर्वे पर आधारित था, शोध के जरिये उन्होंने जर्मन राजनीति में पत्रकारिता की भागीदारी को समझाया, उन्होंने बताया कि पत्रकारिता को सोशल मीडिया के जरिये पूरे विश्व में पुनर्स्थापित किया गया है।

जोशुआ जो कि केन्या के शोधार्थी है तथा भारत मे रहकर यहाँ की संस्कृति को जान रहे है ने बताया कि सोशल मीडिया को सीखने की जरूरत नही होतीं। इस विषय का कोई टीचर नही होता है। फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप जैसी एप्प को हम खुद चलाना सीखते है। बाबा साहेब अंबेडकर यूनिवर्सिटी में पढ़ा चुके जोशुआ बताते है कि सोशल मीडिया और इंटरनेट ने सब कुछ बहुत आसान बना दिया है। मनुष्य का दिमाग किसी लाईब्रेरी के समान होता है तथा डिजिटल सदी में हम सभी सोशल मीडिया को अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना चुके है।

यहाँ तक की  राजनेताओं ने भी अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए सोशल मीडिया पर  प्रोपोगंडा रचना शुरू कर दिया है। 3 व्हाट्सएप ओर 3 फेसबुक एकाउंट हैंडल करने वाले जोशुआ ने बताया कि आज के बच्चे भी सोशल मीडिया पर एक्टिव है। उन्होंने बताया कि भारत ने अपनी संस्कृति को अब तक सहेज के रखा है और जोशुआ को भारत की इसी खासियत ने यहाँ रहने के लिए बाध्य किया है। अफ्रीकन देश अपनी संस्कृति को बचाने के लिए जो लड़ाई लड़ रहे है जोशुआ भी उसी का एक हिस्सा है।

विगत 2 दिनों से चल रही अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में 32 शोधार्थियों द्वारा अपने शोध पत्रों का वाचन किया गया। जबकि 70 से ज्यादा शोधपत्र प्राप्त हुए। जिनमें सोशल मीडिया में हिंदी का बढ़ता हुआ प्रभाव: एक अध्ययन, न्यू मीडिया के दौर में हिंदी समाचार पत्रों के समक्ष चुनौतियों का अध्ययन, रोमन बनाम देवनागरी लिपि का महत्व, राजनीतिक लेखन में हिंदी भाषा में सोशल मीडिया की उपयोगिता जैसे अन्य विषयों पर अपने शोध पत्र का वाचन शोधार्थियों द्वारा किया गया ।

शोध पत्र का विश्लेषण करते हुए माखनलाल विश्वविद्यालय भोपाल के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.श्रीकांत सिंह ने कहा कि सूचना एक शक्ति है और जिसके पास शक्ति होगी वहीं विश्व प्रशासन करेगा जब हमारे देश में खाद्यान्न की कमी हुई तो हमारे देश के वैज्ञानिकों ने नए उपक्रम तैयार किए और आज खाद्य संपन्न देश बनाया ऐसे ही सूचना के क्षेत्र में भी हम सक्रिय है आज की स्थिति से आगे बढ़ने के लिए पांच बातें अति आवश्यक है टेक्नोलॉजी संपन्न होना नए विचार भाषा स्तुति करण एवं सामग्री

औरंगाबाद के एमजीएम पत्रकारिता महाविद्यालय की प्राचार्या रेखा शेल्के ने अपने विश्लेषण में हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है और उसे आगे बढ़ाना हमारा दायित्व है वही मीडिया बढ़ रहा है लेकिन फेक न्यूज़ भी बढ़ रही है उन्हें रोकना बड़ी चुनौती है आज पूरी पत्रकारिता मोबाइल आधारित हो गई है इसलिए डिजिटल मीडिया के इस दौर में हमें हमारी कार्यकुशलता एवं योजना मोबाइल आधारित ही बनाना होगी

इंदिरागांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय अमरकंटक से आये डॉ.राघवेंद्र मिश्रा ने विश्लेषण में बोलते हुए कहा कि अब लड़ाई युद्ध के मैदान में नहीं दूसरे माध्यम से होगी यूएसए का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जीडीपी में तीसरा बड़ा योगदान पत्रकारिता एवं मनोरंजन का है वहीं भारत में आर एन आई एन आई के रजिस्टर्ड पब्लिकेशन के 90% से ज्यादा क्षेत्रीय भाषाओं में है और लगभग 10% ही ऑनलाइन आप आए ऑनलाइन आप आए हैं और डिजिटल मीडिया पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल मीडिया में बहुत बड़ी संभावना है अभी भी अभी भी है 2021 तक डिजिटल मीडिया मैं क्षेत्रीय भाषाएं हावी होगी और उसमें सबसे बड़ा सबसे बड़ा हिस्सा हिंदी का होगा और अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि आज रोटी कपड़ा मकान के बाद डिजिटल मीडिया हमारी मूलभूत आवश्यकता बन गई है

चतुर्थ तकनीकी सत्र में विश्लेषक के रूप में मुम्बई विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.सुंदर राजदीप, कुशाभाऊ ठाकरे विश्वविद्यालय रायपुर से प्रो. शाहिद शेख और आशा देशपांडे मौजूद रहे सुंदर राजदीप ने अपने विश्लेषण में बताया कि मैं मुंबई से हूं और हमने काम करते समय हिंदी को चुनौती नहीं माना पढ़ाने में या मीडिया में काम करते हुए वहीं शाहिद शेख शेख ने बताया कि जो लिटरेट है उनमें से जानकारी पाने की जिज्ञासा कितने लोगों में है और उनमें से कितने लोग उपयोग कर रहे हैं यह महत्वपूर्ण है और रिसर्च पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि तथ्यात्मक आंकड़ों का शोध में होना बहुत जरूरी है और उससे शोध मजबूत होता है।

मुंबई से पधारे समापन सत्र के अतिथि डॉ एम.एल.गुप्ता आदित्य जो कि हिंदी वैश्विक सम्मेलन के निदेशक हैं, उन्होंने हिंदी भाषा की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम हिंदी भाषियों ने हिंदी को केवल साहित्य भाषा बन रखा है। जब तक हम हिंदी को ज्ञान,विज्ञान,तकनीक,वयापार और व्यवहार की भाषा नही बनाएंगे तब तक हिंदी की साख ऐसे ही दिन प्रति दिन काम होती जाएगी। उन्होंने कहा कि यदि हम भाषा – प्रौद्योगिकी से बचेंगे तो हमारी भाषाएँ बच नहीं पाएँगी। बेंगलुरु के शेषाद्रिपुरम महाविद्यालय की हिंदी विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. उर्मिला पोरवाल व समागम पत्रिका के संपादक श्री मनोज कुमार भी बतौर अतिथि उपस्थित थे। सभी अतिथियों के द्वारा शोधार्थियों और सहयोगियों को प्रमाण पत्र वितरित किये गए। अंत मे संगोष्ठी की समन्वयक और पत्रकारिता एवं जनसंचार अध्ययनशाला की

विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली नारगुंडे ने आभार मानते हुए कहा कि हिंदी का घटता हुआ प्रभाव निश्चित रूप से चिंतनीय है। इस संगोष्ठी में हुआ चिंतन-मनन हिंदी भाषा को अपना गौरव दिलवाने में सार्थक साबित होगा। सभी शोधार्थी और अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि आगे भी इस प्रकार के शोध की देश और समाज को जरूरत है जिससे जागरूकता आ पाए। संगोष्ठी का संचालन कुलदीप पंवार और अदिति मोटे ने किया।

 

 

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