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कोरोना महामारी के खिलाफ भारत में जबर्दस्त मोर्चाबंदी

कोरोना वायरस के खिलाफ मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित करने के लिए नयी परियोजना

उमाशंकर मिश्र

Twitter handle: usm_1984

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) ने अपने न्यू मिलेनियम इंडियन टेक्नोलॉजी लीडरशिप इनिशिएटिव (एनएमआईटीएलआई) कार्यक्रम के तहत मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के विकास की एक नयी परियोजना को मंजूरी दी है, जो रोगियों में कोरोना वायरस के संक्रमण को बेअसर कर सकती है। इस परियोजना का उद्देश्य एक प्रभावी चिकित्सा रणनीति के जरिये अधिक प्रभावी और विशिष्ट मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी विकसित करना है। परियोजना का एक लक्ष्य वायरस के भविष्य के अनुकूलन का अनुमान लगाना भी है। इसके साथ ही, वैज्ञानिक मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी क्लोन तैयार करने का प्रयास भी करेंगे, जो रूपांतरित कोरोना वायरस को बेअसर कर सके। वैज्ञानिकों की इस पहल का लक्ष्य कोरोना वायरस के नये उभरते रूपों से लड़ने के लिए तैयारी करना भी है, ताकि भविष्य में इसके संक्रमण से मुकाबला किया जा सके।

मोनोक्लोनल एंटीबॉडी एक तरह का प्रोटीन होता है, जिसे प्रयोगशाला में बनाया जाता है। यह रोगी के शरीर में मौजूद दुश्मन कोशिका से जाकर चिपक जाता है। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी इम्यूनोथेरेपी का एक रूप है, जिसे किसी बीमारी के प्रति प्रतिरक्षा उत्पन्न करने या प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए डिजाइन किया जाता है।

अकादमिक संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच इस साझेदारी में नेशनल सेंटर फॉर सेल साइंस (एनसीसीएस), पुणे; भारतीय प्रद्यौगिकी संस्थान (आईआईटी), इंदौर; प्रीडोमिक्स टेक्नोलॉजीज, गुरुग्राम और भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड (बीबीआईएल), हैदराबाद शामिल हैं। टीकों और जैव-उपचार के विकास से जुड़ी कंपनी बीबीआईएल इस परियोजना का नेतृत्व कर रही है। बीबीआईएल परियोजना का वाणिज्यिक साझीदार है, जिसकी जिम्मेदारी मानव मोनोक्लोनल एंटीबॉडी के विकास और व्यवसायीकरण की भी होगी।

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे ने कहा है कि “नोवेल कोरोना वायरस (एसएआरएस-सीओवी-2) के बारे में अनुसंधान अपने शुरुआती चरण में है, और इस पर हमारी समझ हर दिन विकसित हो रही है। ऐसे में, यह महत्वपूर्ण है कि हमें वायरस से निपटने के लिए सभी संभावित रणनीतियों को अपनाने की आवश्यकता है। इसलिए, सीएसआईआर सभी रास्ते तलाश रहा है और हम उन नये विचारों का भी समर्थन कर रहे हैं, जिन पर अमल किया जा सकता है।”

कोरोना वायरस से लड़ने के लिए सीएसआईआर बहुआयामी रणनीति पर काम कर रहा है। एक ओर सीएसआईआर से संबद्ध प्रयोगशालाएं प्रौद्योगिकियों एवं उत्पादों का विकास कर रही हैं, तो दूसरी ओर देश का यह प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान इंडस्ट्री और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के साथ मिलकर भी काम कर रहा है। एनएमआईटीएलआई सीएसआईआर का एक फ्लैगशिप  कार्यक्रम है, जिसका उद्देश्य अकादमिक संस्थानों एवं इंडस्ट्री के नये विचारों और परियोजनाओं का समर्थन करना है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से कोविड-19 का पता लगाएंगे भारतीय वैज्ञानिक

उमाशंकर मिश्र

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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से कोविड-19 की पहचान के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने अब एक नई पहल की है। लखनऊ स्थित डॉ एपीजे अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय (एकेटीयू) एवं किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) की इस पहल के अंतर्गत कोविड-19 की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित डायग्नोसिस टूल विकसित किया जा रहा है। दोनों संस्थानों की इस संयुक्त परियोजना के तहत कोविड-19 रोगियों की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉडल विकसित किये जा रहे हैं, जिसमें विश्लेषण के लिए एक्स-रे इमेज का उपयोग किया जाएगा। एकेटीयू के कुलपति प्रोफेसर विनय कुमार पाठक एवं केजीएमयू के कुलपति प्रोफेसर एम.एल.बी. भटट् के संयुक्त वक्तव्य में यह जानकारी दी गई है।

प्रोफेसर पाठक ने बताया कि “हमारी कोशिश एक सटीक डायग्नोसिस टूल विकसित करने की है, जिसके लिए उपयुक्त डेटासेट की उपलब्धता महत्वपूर्ण हो सकती है।” प्रोफेसर एम.एल.बी. भटट् ने बताया कि “इस अध्ययन के दौरान डेटासेट से संबंधित आंकड़े केजीएमयू द्वारा प्रदान किए जाएंगे। जबकि, एकेटीयू के वैज्ञानिक मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से मॉडल को विकसित करेंगे। इस मॉडल को विकसित करने के बाद इसकी मदद से कोविड-19 मरीजों की पहचान की जा सकेगी।”

शोधकर्ताओं का कहना है कि डिस्क्रीमनेट्री फीचर्स के उपयोग से इस मॉडल को प्रशिक्षित किया जाएगा। अध्ययन के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स मॉडल में छाती की एक्स-रे इमेज के लेबल किए हुए डेटासेट का उपयोग किया जाएगा। डेटासेट में कोविड-19, निमोनिया, सार्स, सामान्य फ्लू जैसे रोगों से ग्रस्त मरीजों तथा सामान्य लोगों के चेस्ट एक्स-रे छवियों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे यह प्रणाली कोविड-19 को अन्य बीमारियों से अलग कर सके। इस मॉडल में स्वचालित वर्गीकरण के लिए डीप लर्निंग सीएनएन नेटवर्क का भी उपयोग किया जाएगा।

प्रोफेसर पाठक ने बताया कि “कुछ अन्य संस्थान भी इस आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल को विकसित करने के लिए  मेडिकल  इमेज आधारित नमूने उपलब्ध कराने में सहयोग कर रहे हैं। इन संस्थानों में उत्तर प्रदेश आयुर्विज्ञान विश्वविद्यालय, इटावा; राजकीय मेडिकल कॉलेज, कोटा और सरोजनी नायडू मेडिकल कॉलेज, आगरा शामिल हैं। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 के खिलाफ शुरू हुआ आयुर्वेविदक दवाओं का परीक्षण

उमाशंकर मिश्र

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नई दिल्ली, 08 मई (इंडिया साइंस वायर): वैज्ञानिक एक तरफ सेप्सिस, टीबी, मलेरिया और अन्य बीमारियों में उपयोग होने वाली दवाओं का परीक्षण कोविड-19 के मरीजों के उपचार के लिए कर रहे हैं, तो दूसरी ओर इस महामारी से निपटने के लिए अब चार आयुर्वेदिक यौगिकों का परीक्षण भी शुरू किया गया है। जिन चार आयुष (आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) यौगिकों का कोविड-19 के खिलाफ परीक्षण किया जा रहा है, उनमें अश्वगंधा, यष्टिमधु, गुडुची, पिप्पली और मलेरिया-रोधी दवा आयुष-64 शामिल हैं।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण व आयुष मंत्रालय द्वारा यह परीक्षण वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ मिलकर किया जा रहा है। आईसीएमआर के दिशा-निर्देशों के अनुसार कोरोना संक्रमण के शिकार मरीजों के परिजनों और उनका इलाज करने वाले स्वास्थ्यकर्मियों को हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (एचसीक्यू) दिया जा रहा है, ताकि उन्हें कोविड-19 के प्रकोप से बचाया जा सके। अब एचसीक्यू के साथ-साथ कुछ लोगों को अश्वगंधा, यष्टिमधु, गुडुची व पिप्पली और आयुष-64 देकर उसके प्रभावों का भी पता लगाया जाएगा।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा है कि “कोविड-19 के उपचार में इन दवाओं की उपयोगिता का पता लगाने के लिए स्वास्थ्य और आयुष मंत्रालय ने आईसीएमआर और सीएसआईआर के साथ मिलकर संयुक्त अभियान शुरू किया है, जिसमें वैज्ञानिक  परीक्षणों के जरिये पता लगाया जाएगा कि ये दवाएं किसी व्यक्ति को कोरोना से बचाने में कितनी कारगर हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों पर यह परीक्षण किया जाएगा।” हाल में, फार्मास्यूटिकल्स और चिकित्सा उपकरणों के लिए राष्ट्रीय स्तरीय नियामक संस्था- सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन ने आयुर्वेद और होम्योपैथी चिकित्सकों को कोविड-9 बीमारी की बेहतर समझ विकसित करने के लिए संगरोध (क्वारांटाइन) केंद्रों में शोध करने की अनुमति दी थी।

देश के 25 राज्यों में आयुष मंत्रालय के तहत चार अनुसंधान परिषदों, विभिन्न राष्ट्रीय संस्थानों और कई राज्य सरकारों के साथ मिलकर यह अध्ययन किया जाएगा। इसके साथ ही, सरकार ने एक ऐप – ‘संजीवनी’ भी लॉन्च किया है, जिसकी मदद से आयुष मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के आधार पर हर्बल दवाओं के सेवन से जुड़े अनुभवों से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए जाएंगे। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 के खिलाफ हर मोर्चे पर लड़ रहा है सीएसआईआर 

उमाशंकर मिश्र

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नई दिल्ली, 30 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर):  इतिहास गवाह है कि कुशल रणनीतिकारों ने अपनी व्यूह रचना के दम पर मुश्किल चुनौतियों पर भी जीत हासिल की है। मौजूदा दौर में कोविड-19 महामारी के संकट से निपटने के लिए भी कुछ इसी तरह की एकीकृत व्यूह रचना की आवश्यकता है, जिसमें सुरक्षात्मक और आक्रामक उपायों के साथ-साथ बहुआयामी रणनीति का समावेश हो। विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने, अपनी 38 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, 39 आउटरीच केंद्रों, तीन इनोवेशन कॉम्प्लेक्सों और पाँच इकाइयों के विस्तृत नेटवर्क के साथ सभी मोर्चों पर कोविड-19 की चुनौती से लड़ रहा है।

अगर सुरक्षात्मक रणनीतियों की बात करें तो एक निश्चित शारीरिक दूरी बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण बचाव माना जा रहा है। लेकिन, सिर्फ इतने भर से 135 करोड़ की आबादी वाले देश में इस गंभीर चुनौती से निपटना आसान नहीं है। यह भी सही है कि सख्ती से लागू की गई लॉकडाउन व्यवस्था बीमारी के प्रसार को धीमा कर सकती है। पर, यह भी इस महामारी से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके अलावा, हमें जो कुछ करने की जरूरत है, उसमें संक्रमित लोगों का परीक्षण, उन्हें अलग-थलग रखने और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करना महत्वपूर्ण हो सकता है। कोविड-19 से निपटने के लिए सीएसआईआर ने इन सभी आयामों में अपनी उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज करायी है।

कोविड-19 से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर परीक्षण करना एक अहम रणनीति हो सकती है। कोरोना वायरस के खिलाफ छिड़े देशव्यापी अभियान के आरंभिक दौर में ही सीएसआईआर की दो प्रयोगशालाओं में जांच केंद्र खोले गए और उनके प्रशिक्षण के साथ, देशभर में एक दर्जन से अधिक सीएसआईआर प्रयोगशालाएं वायरस के परीक्षण में धीरे-धीरे शामिल हो गईं, और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। सीएसआईआर-इंस्टीट्यूट ऑफ जीनोमिक्स ऐंड इंटिग्रेटिव बायोलॉजी (आईजीआईबी) ने क्रिस्पर-कैस9 आधारित अनूठी पेपर किट विकसित की है, जो परीक्षण की मौजूदा विधियों की लागत को कम कर सकती है।

कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने में मास्क, पर्सनल प्रोटेक्टिव सूट, सैनिटाइजर, फेस-शील्ड जैसे व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण भी मददगार हो सकते हैं। सीएसआईआर ने कोविड-19 महामारी के खिलाफ लड़ रहे अग्रिम पंक्ति में तैनात डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों तथा पुलिसकर्मियों जैसे योद्धाओं के लिए सुरक्षात्मक सामग्री डिजाइन करके यह संभव कर दिखाया है। इनमें आम जनता के साथ-साथ अस्पताल के कर्मचारियों के लिए व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण शामिल हैं।

इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे विशाल देश की विस्तृत आबादी के बीच कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी का संकट खड़ा हो तो सिर्फ सुरक्षात्मक उपाय काफी नहीं हो सकते हैं। ऐसे में, आक्रामक रणनीतियां अपनाना भी जरूरी हैं। व्यक्तिगत स्वच्छता वायरस से लड़ने का एक मजबूत अस्त्र हो सकता है। बार-बार साबुन और पानी से हाथ धोना और विशेष रूप से बाहर जाने पर किसी संभावित दूषित सतह के संपर्क में आने पर सैनिटाइजर का उपयोग आवश्यक है। यह न केवल अस्पताल के कर्मचारियों, बल्कि पुलिस जैसे अग्रिम पंक्ति में तैनात कर्मचारियों के साथ-साथ आम लोगों के लिए भी आवश्यक है।

कई गैर सरकारी संगठनों के कर्मचारी आश्रय-घरों में काम कर रहे हैं और उन्हें भी खुद को संक्रमण से सुरक्षित रखने के लिए सैनिटाइजर की आवश्यकता होती है। यही नहीं, आश्रय-गृहों में रह रहे लोगों, आवश्यक सामानों की बिक्री करने वाले विक्रेताओं और अन्य लोगों को भी सैनिटाइजर की आवश्यकता है। विज्ञान को समाज की जरूरत के लिए उपयोग करने का सही अर्थों में उदाहरण पेश करते हुए सीएसआईआर की प्रयोगशालाओं ने स्वच्छता बनाए रखने और संक्रमण से बचाव के लिए तत्काल सैनिटाइजर बनाना और उसे निशुल्क वितरित करना शुरू कर दिया। जब सैनिटाइजर की उपलब्धता कम हो तो यह पहल निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कही जाएगी।

यह बात सही है कि रोकथाम इलाज से बेहतर है और सीएसआईआर की रक्षात्मक और आक्रामक रणनीति में इसका ध्यान रखा गया है। कहना नहीं होगा कि इसके लिए दूरगामी रणनीतिक उपायों की जरूरत है। इन दीर्घकालीन रणनीतियों में वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग के लिए शुरू किया गया सीक्वेंसिंग मिशन एक अहम कड़ी साबित हो सकता है। इसके तहत देशभर में बड़े पैमाने पर वायरल नमूनों की सीक्वेसिंग का लक्ष्य रखा गया है। सीक्वेंसिंग से वायरस के जेनेटिक कोड का खुलासा हो सकता है, जिससे वायरस के वेरिएंट्स, उसके जीवन चक्र और ड्रग बाइंडिंग पैटर्न को समझने में मदद मिल सकती है।

दीर्घकालीन रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी परीक्षण को बढ़ाना है, जिससे बीमारी के प्रसार की निगरानी में मदद मिल सकती है। सीएसआईआर की रणनीति में सामुदायिक स्तर पर परीक्षण शामिल है है, जो बीमारी के प्रकोप पर नजर रखने और उसके फैलने पर नजर रखने में मदद कर सकती है। इसमें नई थेरैपियों, वैक्सीन व दवाओं का विकास और रिपर्पजिंग शामिल है। अस्पतालों के सहायक उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करने, आपूर्ति और लॉजिस्टिक सपोर्ट मुहैया कराने के लिए भी देश का यह प्रमुख वैज्ञानिक संस्थान काम कर रहा है। इस तरह यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि देश का यह वैज्ञानिक वटवृक्ष हर मोर्चे पर कोविड-19 को शिकस्त देने के लिए तैयार खड़ा है। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 के खिलाफ तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है आईआईटीआर

उमाशंकर मिश्र

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नई दिल्ली, 01 मई (इंडिया साइंस वायर): कोविड-19 के खिलाफ जारी संघर्ष में परीक्षण एक प्रमुख घटक है, जो इस महामारी के प्रसार की निगरानी और उसे प्रतिबंधित करने में सहायक हो सकता है। यही वजह है कि कोविड-19 का परीक्षण बढ़ाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है। लखनऊ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (आईआईटीआर) अब कोरोना वायरस के खिलाफ वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) द्वारा अपनाए गए पांच में से तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है, इनमें 2 मई से शुरू हो रही एक नई कोविड-19 परीक्षण सुविधा शामिल है।

आईआईटीआर वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) से संबद्ध एक प्रमुख प्रयोगशाला है। सीएसआईआर ने कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई में पांच-स्तरीय रणनीति तैयार की है। इनमें कोविड-19 के मामलों की निगरानी, रैपिड और सस्ते डायग्नोसिस, नई थैरेपियों एवं दवाओं का विकास, दवाओं का नये रूप में पुनः उपयोग,  अस्पतालों के सहायक उपकरण और आपूर्ति एवं लॉजिस्टिक्स शामिल हैं। कोरोना से लड़ने के लिए सीएसआईआर द्वारा चलाए जा रहे मिशन में शामिल पांच कार्यक्षेत्रों में से आईआईटीआर जिन तीन कार्यक्षेत्रों पर काम कर रहा है उनमें रोकथाम, निदान और उपचार शामिल हैं।

कोरोना वायरस के संक्रमण की रोकथाम में सैनिटाइजर और निजी सुरक्षा उपकरण उपयोगी हो सकते हैं। इस बात को केंद्र में रखते हुए सीएसआईआर-आईआईटीआर अब तक लखनऊ, वाराणसी तथा रायबरेली में कोरोना के विरुद्ध अग्रिम पंक्ति में तैनात कार्यकर्ताओं को 2500 लीटर से अधिक हैंड सैनिटाइजर वितरित कर चुका है। इस पहल को विभिन्न कॉरपोरेट्स के कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व योगदान से पूरा किया गया है। आईआईटीआर के दूसरे कार्यक्षेत्र के तहत राष्ट्रीय मानदंडों के अनुसार कोविड-19 परीक्षण हेतु अत्याधुनिक सुविधा को स्थापित किया गया है। लगभग 24 कर्मियों की एक टीम इस अभियान में शामिल है। इन सभी को जैव-सुरक्षा एवं अन्य विषयों पर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) द्वारा प्रशिक्षण दिया गया है।

उत्तर प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्री, सुरेश खन्ना के साथ हुई बैठक में प्रोफेसर आलोक धवन, निदेशक, सीएसआईआर-आईआईटीआर ने परीक्षण की तैयारी से अवगत कराया। डॉ धवन ने कोविड-19 की परीक्षण क्षमता बढ़ाने का आश्वासन दिया है। प्रमुख सचिव, चिकित्सा शिक्षा ने कहा है कि 2 मई से सीएसआईआर-आईआईटीआर को परीक्षण के लिए नमूने भेजे जाएंगे। केजीएमयू के सुझाव के अनुसार सीएसआईआर-आईआईटीआर में प्रारंभ में प्रति दिन 50 नमूनों का परीक्षण किया जाएगा, जिसे कुछ समय बाद बढ़ाया जा सकता है। महानिदेशक, सीएसआईआर तथा आईसीएमआर, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने सीएसआईआर-आईआईटीआर, लखनऊ को कोविड-19 के परीक्षण हेतु मंजूरी प्रदान कर दी है। (इंडिया साइंस वायर)

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