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बदलनी होगी मनोवृति एवं जीवन शैली…!

प्रो. रामदेव भारद्वाज

कोरोना संकट तो समाप्त हो ही जएगा, पर्याप्त् वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी शीघ्र ही वैक्सीन खोज लेंगे। परन्तु क्या मानव-मानव एवं मानवता के प्रति विश्व समुदाय की सोच बदलेगी? क्योंकि कोरोना संकट से उत्पन्न पर्यावरण में लंबे अंतराल तक हमें वायरस के साथ रहना सीखना होगा और वांछित निर्देशों के अनुरूप जीना होगा तभी इस वायरस से मुक्ति मिलेगी। ठीक इसी प्रकार जीवन में कटु अनुभवों के उपरांत अब विश्व के राष्ट्रों को मानवता और मानवीय मूल्यों, नैतिक निर्देशों के साथ रहना आरम्भ करना होगा तभी हम और मानवता संरक्षित रह पाएगी। क्योंकि आज कोरोना से भी बड़ी समस्या हमारी स्वयं की आंतरिक संकीर्णताएं हैं जिनमें मानवीय मूल्यों, मानवीय हितों और मानवीय स्वतन्त्रता के संवर्धन का कोई स्थान शेष नहीं है। मानसिक संकीर्णताओं के कारण, स्वयम्भू विश्व के मुखिया के भ्रम की स्थिति के कारण स्थिति भयावह बनी हुई है। जो सदैव ही मानवता के लिए खतरा है। संकट के इन क्षणों में भी विभिन्न राष्ट्रों के नेतृत्वकर्ताओं में, प्रतिस्पर्धा और प्रतिशोध के ज्वालामुखी धधक रहे हैं, राष्ट्रों में परस्पर समन्वय की भावना का अभाव है। आज इस कोरोना संकट के दौर में संत्रस्त मानव जाति के प्रति करुणा, संवेदना और उदारता के भाव निर्मूल प्रतीत हो रहे हैं, ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व के मन में, नीतियों और आचरण में कल्याणकारी राज्य की दृष्टि और योजनाओं को परिमार्जित एवं विकसित करने की आवश्यकता है। परन्तु यथार्थ तो यह है कि हम आज भी षड्यंत्रों की परिकल्पना में लगे हुए हैं? राष्ट्रों के मध्य परस्पर घृणा, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की पृष्ठभूमि मजबूत हुई है। राष्ट्र सर्वशक्तिमान, सर्वशक्ति सम्पन्न बनने का प्रयास कर रहे हैं। इन्हीं सन्दर्भों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गटरेस ने तो कोरोना संकट और राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा की वर्तमान स्थिति को देखते हुए कहा है कि ‘वैश्विक महामारी नफरत और विदेशियों के खिलाफ द्वेष की भावना, दूसरों को बलि का बकरा बनाने और डर फैलाने की सुनामी आ रही है। क्योंकि इंटरनेट और विविध संचार माध्यमों के द्वारा विदेशियों के विरुद्ध भावना बढ़ी है।”

वस्तुस्थिति तो यह है कि राष्ट्रों में सदैव शक्ति सम्पन्न बने रहने की लालसा के साथ राष्ट्रों में राष्ट्रों के प्रति शंका और भ्रम की स्थिति की दृष्टि को मजबूती प्रदान कर रहे हैं। राष्ट्रों की सामर्थ्य और संपन्नता का यही मानदण्ड होता जा रहा है, राष्ट्र कोरोनोत्तर विश्व में सर्वाधिकारवादी शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में स्थापित होने और विश्व प्रणालियों को नियंत्रित करने की कूटनीति में लगे हैं। वैश्विक परिदृश्य में अंतरराष्ट्रीय नैतिकता नगण्य प्रायः है और राष्ट्र आज भी अंतरराष्ट्रीय मानवीय सरोकारों से दूर है और राष्ट्र पूर्व प्रतिस्थापित राजनयिक, कुटनीतिक, अंतरराष्ट्रीय तानेबाने को पुनः बुनने और मजबूत करने में लगे हुए हैं। यह एक प्रकार के मानसिक विकार की अवस्था है। व्यक्ति और राष्ट्र फ्रेडरिक नीत्शे का ‘महामानव’ अर्थात् ‘लास्ट मैन’ बनना चाहता है। वह महर्षि अरविंद के ‘अतिमानव’ नहीं बनना चाहता। अतः जो फ्रेडरिक नीत्शे और महर्षि अरविंद में अंतर है, जो महामानव और अतिमानव में अंतर है, विरोध है वही आज विश्व पर्यावरण में परिलक्षित है।
क्या राष्ट्र आज नीत्सेवादी मानसिकता और दर्शन में जकड़े हुए नहीं है? क्या राष्ट्र, राष्ट्रों की पराजय और मानवीय मूल्यों के क्षरण में सहभागी बने हुए नहीं है? दूसरे राष्ट्रों को दुःखी देखकर, उनके समक्ष प्रतिकूल और नकारात्मक वातावरण निर्मित कर, उन्हें कष्ट देखकर खुशी होने की मानसिकता से ग्रसित नहीं है ? कोरोना की महामारी में इतना सबकुछ देखने और भोगने के बाद भी सकारात्मक राजनीतिक इच्छाशक्ति और निर्णयों में समग्रता और व्यापकता का अभाव नजर आता है। ऐसा लगता है कि बदलते परिवेश में जिस प्रकार विविध क्षेत्रों में संस्कारों से औऱ नैतिकता विषयक शिक्षा के जैसे पाठ्यक्रम बनाए गए हैं उसी प्रकार अंतरराष्ट्रीय नैतिकता के पाठ्यक्रम बनाकर कठोरता के साथ उनका पालन किया जाना और करवाया जाना जरूरी है। यह हमें महर्षि अरविंद के दर्शन के अनुकरण से ही मिलेगा।

चर्चिल और शक्ति अर्जन—
यह विचार करना इसलिए महत्वपूर्ण हो गया है कि आज सभी राष्ट्र शक्ति संचय में संलग्न है। शक्ति का स्वरूप कोई भी हो अर्थात् आर्थिक, राजनीतिक, सामरिक, कुटनीतिक, सैनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, परमाणु और जैविक शक्ति संपन्नता….। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने एक वार शक्ति के अर्जन और प्रयोग से संबंधित जो विचार व्यक्त किए वे आज भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का आधार बने हुए हैं। चर्चिल ने यह विचार तब व्यक्त किए जब द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के सोवियत संघ की सेनाओं का पूर्वी यूरोप पर नियंत्रण मजबूत हो रहा और कम्युनिष्ट साम्राज्य स्थापित हो गया था। चर्चिल ने कहा था कि “उन्हें इस बात का विश्वास दिलाना होगा कि तुम्हारे पास श्रेष्ठतर सैन्य बल है…औऱ यही है शक्ति का महान अवसर, शान्ति कायम करने की सुनिश्चित राह…। परन्तु आज जिस तरह चीनी कोरोना वायरस संक्रमण पूरी दुनिया में बढ़ रहा है और अपना विस्तार और एकाधिकारी साम्राज्य स्थापित कर रहा है तब इससे निपटने के लिए हमारे पास कौन-सा बल है, कौन सी शक्ति है?? अभी तक किसी को ज्ञात नहीं है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद उभरी दो महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा में जिस शक्ति और क्षमता का विस्तार हुआ उसने मानवीयता और मानव संबंधित सरोकारों की निर्लज्ज अवहेलना की। राष्ट्रों द्वारा सैन्य शक्ति का विस्तार किया, सैनिक संगठन बनाए, सामूहिक सुरक्षा की गारंटी दी गई। नाटो, सीटो, सेंटो, वारसा, बगदाद और ऐसे ही अनेकों सैन्य संगठन अस्तित्व में आए। राष्ट्र स्वयं अपराजेय रहें, इसके लिए अत्याधुनिक हथियार, अणु-परमाणु बम और रासायनिक हथियार बनाए, दूर-दूर तक मारक क्षमता के प्रक्षेपास्त्र और तरह-तरह की मिसाइलें बनाई, ज्ञान-विज्ञान की समस्त ऊर्जा का उपयोग इन्हीं से संबंधित उपलब्धियों में लगाई। अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं और उपकरण बनाए। अर्जित धन सम्पदा का अधिकांश उपयोग विश्व में अपनी धाक स्थापित करने में लगाया। तृतीय विश्व के राष्ट्रों को उनकी सम्प्रभुता के खतरों का जाल बिछाकर हथियारों को बेचा गया। हथियारों का व्यापार, तकनीकि के स्थानान्तरण का खेल चलता रहा। सामरिक, रणनीतिक, कूटनीतिक एकाधिकार और साम्राज्य स्थापित करने के सभी प्रयोजन किए। इतना होने पर भी विध्वंस की चाबी कहीं न कहीं किसी न किसी के नियंत्रण में रही है। राष्ट्रों में परस्पर प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वन्द्विता अपने चरम पर पहुंची परन्तु कहीं न कहीं यह डर था कि हमारे विरूद्ध यदि इन हथियारों का उपयोग हुआ तो विनाश सुनिश्चित है अतः एक अदृश्य संतुलन रहा।

सर्वाधिकारवादी मानक जीवन को घातक…..
परन्तु आज कोरोना संक्रमण के काल में (चाहे यह कोरोना वायरस लैब में बनाया गया हो अथवा प्राकृतिक हो) इसको पराजित करने में ये सारी सैन्य सामग्री कोई काम नहीं आ रही। दूसरों को आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, अनुदान प्रदाय करने वाले और अपनी शर्तों पर तकनीकी स्थानान्तरण करने वाले राष्ट्र भी स्वयं अपने जीवन को मुहताज है। अहंकारी एवं सर्वाधिकारवादी मानसिकता से ग्रसित है। यह बात अलग है कि वे स्वयं जीवन की भीख मांग रहे हैं, जिंदगी को मुहताज है। कौन है जो देगा उन्हें जीवन दान? कैसे जिंदा रहेंगे ये राष्ट्र और कैसे रहेंगे सुरक्षित, कैसे संरक्षित रहेगी यह मानवता?? इस अदृश्य शत्रु और घातक विषाणु पर नियंत्रण की कुंजी किसके पास है?
हमने राष्ट्रों को नीचा दिखाने, अपमानित करने और युद्ध के माध्यम से सरकारों के तख्तापलट किए, अपने हितों और मन के अनुकूल सरकारों का पतन कर, स्थापित राजनीतिक प्रणालियों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया, मनचाहे राजनेताओं का, राष्ट्राध्यक्षों का चयन किया। अन्य दूसरे राष्ट्रों की गृहनीति और विदेशनीति को जब चाहा तब परिवर्तित किया, मानवता को त्रस्त ध्वस्त किया। यह नहीं सोचा था कि बिना युद्ध के भी सबकुछ ध्वस्त हो सकेगा। आज न पैसा काम आ रहा है, न कूटनीति, न व्यापार, न सैन्य शक्ति परन्तु विनाश ही विनाश हो रहा है, हम सब साक्षी है और किसी सीमा तक किसी न किसी रूप में संलग्न भी है, जिम्मेदार भी है।
हम भौतिक युद्ध और मारक अस्त्र शस्त्रों के निर्माण और घातक हमलों से सुरक्षा में लगे रहे परन्तु मौजूदा अदृश्य हमले और महामारी के विकराल खतरों के संबंध में सोच भी नहीं पाए। यह अदृश्य वायरस और प्रकोप हमारी ही सोच और नीतियों का प्रतिफल है। अब भी समय है, अपनी सोच बदलने का, अपनी दृष्टि बदलने का, मानसिकता बदलने का, मानवता से प्रेम करने का, कृत्रिम शक्ति और अहंकार को नष्ट करने का?? परन्तु यह प्रश्न है कि क्या हम ऐसा सोचेंगे, करेंगे..? यह विवेचना शमशान घाट के वैराग्य नहीं है?? हमें यथार्थवादी होना होगा।
आज सभी राष्ट्रों का ध्यान इस बात पर ही केंद्रित है कि जिंदा कैसे रहेंगे ? क्या करना होगा जीने के लिए?? बाहर का ज्ञान, बाहर ही रह बिखरा हुआ है। लौकिक, भौतिक, आधुनिक, अत्याधुनिक जीवन शैली में जीने की मानसिकता ने जो उपकरण और उपक्रम निर्मित किए वे बाहर के ही भर रह गए और अंदर प्रविष्ट हुए एक वायरस को नष्ट करने में ये आधुनिक उपकरण, ज्ञान कोई काम नहीं आ रहा। ऐसा नहीं हैं कि यह अवस्था सदैव ऐसी ही बनी रहेगी। वैज्ञानिक अनुसंधानों के माध्यम से सकारात्मक उपचार, मार्ग निकालेंगे ही। परन्तु विचार का विषय यह है कि ये हालात क्यों और कैसे बने?? यह विवाद और तनाव का विषय हो सकता है कि इस वायरस के लिए जिम्मेदार किसे ठहराया जाए??

नीत्सेवादी मनोवृत्ति त्यागनी होगी….
इन परिस्थितियों में हमें स्वयं को ही बदलना होगा। फ्रेडरिक नीत्शे के महामानव अर्थात् ‘लास्ट मैन’ की धारणा पर आधारित नीतियां बनाने का मार्ग त्यागना होगा। नीत्से कहता था कि मैं इसलिए दुःखी नहीं हूँ कि तुमने मुझसे झूठ बोला, मैं इसलिए दुःखी हूँ कि अब मैं तुम पर यकीन नहीं कर सकता। इस यकीन का टूटना ही नकारात्मकता का कारक बनता है और जीवन को अवसादग्रस्त बनाता है। यहीं से जन्म की लड़ाई है प्रतिस्पर्धा और शक्ति प्राप्त करने उसे संचित करने और प्रयोग कर एकाधिकारवादी, सर्वाधिकारवादी होने की महत्वाकांक्षा और मानवीय मूल्यों को अनदेखा करने का क्रम। प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध काल में और फिर शीतयुद्ध, साम्राज्यवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, विस्तारवाद और सैनिक गठबंधन काल में दूसरों को प्रताड़ित कर दुःखी देखकर अपनी सफलता के उत्सव मनाने की मानसिकता बदलनी होगी।क्योंकि नाजी जर्मनी के यातना कैम्पों में जीवन का अर्थ खोजने के उत्साह की हिटलरी मानसिकता का प्रयोग हम देख चुके हैं। हिटलर और मुसोलिनी जैसे अमानवीय मानवद्रोही जीवन शैली को महिमामंडित करने की जरूरत नहीं। जैसा की विश्व में कुछ राष्ट्र करते आए हैं। परन्तु कोरोना माहमारी के समय में कुछ-कुछ ऐसे ही लग रहा है।
आज चीन की स्थिति नीत्शेवादी मानसिकता जैसी ही है। चीन ने घरेलू स्तर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक अपनी सैन्य क्षमताओं को व्यापक पैमाने पर बढ़ाया है। चीन का राष्ट्रीय व्यक्तित्व मूलतः परपीड़न कामुकतामय (sadistic pleasure) और उसके आचरण (sadistic behavior) भी दूसरे व्यक्तियों के दर्द से खुशी या आनंद प्राप्त करते रहने के हैं। तभी तो चीन आक्रामक क्रूर कृत्यों में आनन्द लेता है। चीन की इस भावनात्मक क्रूरता को चीन में घरेलू स्तर पर भी सैन्य क्षमताओं को व्यापक स्तर पर बढ़ाने की नीति एवं यथार्थ में देखा जा सकता है। चीनी “ऑरवेलियॉन सर्विलांस राष्ट्र” के जैसा राष्ट्र निर्मित हुआ लगता है। जार्ज ऑरवेल ने राष्ट्र के संबंध में जो परिकल्पना की वह चीन पर सही प्रतीत होती है। (जार्ज ऑरवेल मूलतः बिहार के पूर्वी चंपारण के मोतिहारी शहर में 1903 बिहार के मोतिहारी में जन्मे अंग्रेज़ी लेखक तथा लोक प्रचारक थे। उनके पिता ब्रिटिश राज के भारतीय सिविल सेवा के अधिकारी थे। ऑरवेल का मूल नाम ‘एरिक आर्थर ब्‍लेयर’ था) ऑरवेल के अनुसार भविष्य में ऐसा समाज बनेगा जिसमें शासन द्वारा राज्य में ऐसी स्थिति पैदा की जाएगी जो मुक्त समाज के कल्याण के प्रति विध्वंसकारी हो। इस दृष्टि से चीन को देखे तो चीन ने 10 लाख से अधिक चीनी अल्पसंख्यक नागरिकों को ‘re-education camps’ में भेज दिया है। वैश्विक सिर पर चीन द्वारा बौद्धिक सम्पदा की चोरी भी की है। विश्व स्वास्थ्य संगठन पर अपना नियंत्रण स्थापित किया है। अपने लाभ के लिए घातक ऋण समझौतों को गरीब राष्ट्रों पर थोपा है।
ऑरवेल ने अपनी पुस्तक “Nineteen Eighty-Four” में, (जो मूल रूप से दिसंबर 1954 में बीबीसी टेलीविजन पर प्रसारित किया गया था।) एक ऐसे वक्त की कल्पना करते हुए की है जिसमें राज सत्ता अपने नागरिकों पर नजर रखती है। ऑरवेल ने लिखा है कि भविष्य में एक ऐसा समय आएगा, वह तकनीक से भरा होगा।उसमें आम आदमी की निजता का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। जॉर्ज ऑरवेल नाजीवाद, फासीवाद और स्टालिनवाद के आलोचक थे, क्योंकि उनकी नजर में ये सभी विचारधाराएं मानवता के लिए संकट हैं।

अंतरराष्ट्रीय सर्विलांस के विरुद्ध…..
चीन में बढ़ती हुई नीत्सेवादी संस्कृति, जर्मनी के यातना कैम्पों का वातावरण और विस्तारवाद की मानसिकता, एकाधिपत्यवादी नीतियां कोरोना संक्रमण से भी कहीं ज्यादा खतरनाक है। घरेलू मामलों में जन निगरानी राष्ट्र सर्विलांस स्टेट (surveillance state) का समर्थक चीन विदेशी मामलों में अंतरराष्ट्रीय सर्विलांस स्टेट के रूप में रुपांतरित होता जा रहा है जो विश्व राजनीति में भी घातक होता जा रहा है। क्योंकि चीन हांगकांग की स्वतंत्रता सहन नहीं कर पाता, ताइवान में अत्याचार सामान्य प्रक्रिया है, दक्षिण चीन सागर पर अधिकार जताता है, जो कि चीन का नहीं है, बौद्विक सम्पदा की व्यापक स्तर पर चोरी, गरीब देशों पर औऱ अंतरराष्ट्रीय संगठनों पर हावी होने के प्रयास, परमाणु अस्त्रों का जखीरा बढ़ाना और रासायनिक हथियारों का कृत्रिम निर्माण करना विश्व समुदाय की शान्ति और मानवता के लिये घातक है।
यह सब चीन की विस्तारवादी एवं एकाधिकारवादी नीतियों को प्रदर्शित करता है। परन्तु चीन के इस विस्तार को रोकेगा कौन? अमेरिका इस प्रकार की चुनौतियों को रोकने के प्रयास में है। यद्दपि अमेरिका सोवियत संघ, जर्मनी आदि देशों के साथ शीतयुद्ध में रहा। परन्तु यह वर्तमान चुनौतियों को अकेला अमेरिका रोक पाएगा सोचना कठिन है। सभी स्वतन्त्र राष्ट्रों को इसका सामना करने के लिये एकजुट होना होगा? प्रशांत क्षेत्र में जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया वहीं के खतरों को पहचानते हैं। यद्यपि यूरोपियन मित्र राष्ट्रों की प्रक्रिया धीमी रही, परन्तु कोरोना वायरस पर चीन के दोहरे चरित्र ने विकसित राष्ट्रों को भी सचेत कर दिया है।
समसामयिक अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण में राष्ट्रों की मानसिकता औऱ विश्व व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हमें दो प्रकार के जीवन दर्शन और जीवन शैलियों में एक को चयन करने की आवश्यकता है। शक्ति अर्जन और शक्ति के प्रयोग की धारणाओं के सन्दर्भो और शक्ति के ऋणात्मक और धनात्मक अर्थात् नकारात्मक और सकारात्मक स्वरूपों एवं परिणामों की विवेचना करें तो महर्षि अरविंद के ‘अतिमानव’ के दर्शन पर आधारित विश्व स्वरूप की आवश्यकता है।

मानवता केंद्रित हो जीवन दृष्टि––
महर्षि अरविंद ने एक ऐसे अतिमानव का दर्शन दिया जो शक्ति संपन्न तो हो पर धनात्मकता और सकारात्मकता से भरपूर हो। ऐसी दृष्टि की आवश्यकता है जो सरोकार युक्त नीतियों पर केंद्रित हो। ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो व्यक्ति के नैराश्यपूर्ण मन में नकारात्मकता, विनाश और विध्वंसक के विचारों के स्थान पर विश्वास, श्रजन और संभावनाओं से संपन्न जीवन लक्ष्य को सार्थक समझे और निर्मित कर सके। मानवता केंद्रित ऐसी नई संस्कृति और जीवन मूल्यों की प्रभावोत्पादकता स्थापित हो जिसमें जीने के अर्थ और सेवा, समर्पण, त्याग के संकल्पों से आत्मसातीकरण का विस्तार हो और यही अतिमानव की सृष्टि की शक्ति और प्रेरणा बने।
कोरोना वायरस से लड़ने के लिए ऐसी ही शक्ति का संकल्प और शक्ति की धारणा चाहिए जो शाश्वत सत्य के लिए, क्रांति के लिए समर्थ हो। आध्यात्मिक शक्ति द्वारा ही हम शाश्वत परिवर्तन के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन करने योग्य होंगे और यह शक्ति का जागरण योग अभ्यास द्वारा सम्भव है। असहज विश्व को और हमें हमारे जीवन शैली में ऐसा ही बदलाव चाहिए, जो सिर्फ सरकारों द्वारा सम्भव नहीं। हमें स्वयं ही जीवन की इस दिशा में आगे बढ़ना होगा और इसे अपने जीवन की सहज प्रवृत्ति बनानी होगी।
आज हमें अपने साथ-साथ अन्य मानवों के प्रति सेवा औऱ समर्पण के भाव को विकसित करना होगा। हमें स्वयं एवं समाज को महर्षि अरविंद की दृष्टि से देखना होगा। समाज की और मनुष्यों की सेवा करते हुए अपने मानस को अति मानस (supermind) तथा स्वयं को अति मानव (Superman) में परिवर्तित किया जा सकता है। इसके लिए हमे ऐसी शिक्षा और दीक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा यह विचार एवं दर्शन प्राप्त करना सम्भव हो। अतः आत्मज्ञान, सर्जनात्मकता और बुद्धिमता की शक्ति के परस्पर समन्वय की आध्यात्मिक आभा से मानव को सुसज्जित करना सम्भव है।
महर्षि अरविन्द ने इन्हीं आध्यात्मिक शक्तियों के विकास करने पर जोर दिया। इस दृष्टि से मानवता के प्रति व्यापक पुनर्जागरण के लिए भी इन्हीं आध्यात्मिक अस्त्रों से विश्व के राष्ट्रों और विश्व मानवता को प्रशिक्षित किए जाने की आवश्यकता है। ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण कर मानव अतिमानव बन जाता है अर्थात् मानव सत, रज व तम की प्रवृत्ति से ऊपर उठ जाता है। अतिमानव की इस स्थिति में मानव सभी प्राणियों में अपना रूप देखता है। महर्षि अरविन्द ने इन्हीं आध्यात्मिक शक्तियों के विकास के बल पर भारतीय पुनर्जागरण करना चाहा और सकारात्मक परिणाम भी प्राप्त हुए। इसी परिदृश्य औऱ परिकल्पना को अंतरराष्ट्रीय संकट के दौर में लागू किया जा सकता है। इस कार्य के लिए ज्ञान सुर शिक्षा को अरविंद ने शिक्षा को पुनर्जागरण का माध्यम बनाया। दुनिया हमारी नहीं है। यह तो हम है जो दुनिया से संबंध रखते हैं क्योंकि दुनिया में हुए परिवर्तन कभी भी हमारे लिए अनुकूल और समायोजित नहीं होते हैं। “स्वयं को शक्तिशाली बनाना और अंदर से परिपूर्ण करना” एक विकल्प है। यदि हम कुछ और अर्थात् प्रकृति से पृथक चाहते हैं तो हमें विश्व में हुए, परिवर्तनों की उपस्थिति को स्वीकार करने के लिए अधिक तैयार होना चाहिए।

कुलपति
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल

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