आधारभूत विज्ञान आधारित नवाचार पर हो विज्ञान और प्रौद्योगिकी का जोर

नवनीत कुमार गुप्ता

@NavneetKumarGu8

स्वतंत्रता के बाद से ही देश के नीति-निर्माताओं ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के महत्व को समझ लिया था। अब आवश्यकता है कि वैज्ञानिक अपने शोध कार्य का लक्ष्य सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए निश्चित करें। वैज्ञानिकों और शोध संस्थाओं को लोगों की समस्याओं के समाधान से जुड़े लक्ष्य निर्धारित करने होंगे और उद्योगों को विज्ञान की ओर आकर्षित करना होगा। शोध को समाज की जरूरतों के मुताबिक भी ढालना मौजूदा वक्त की जरूरत है।’

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के 47वें स्थापना दिवस के अवसर पर नई दिल्ली में बृहस्पतिवार को आयोजित एक संगोष्ठी में ये बातें नीति आयोग के सदस्य एवं डीआरडीओ के पूर्व सचिव वी.के. सारस्वत ने कही हैं। वह नई दिल्ली के टेक्नोलॉजी भवन में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा आयोजित संगोष्ठी में बोल रहे थे।

इस अवसर बोलते हुए प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर एम.एम. शर्मा  ने आधारभूत विज्ञान से संबंधित शोध के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ”किसी भी नई खोज की बुनियाद विज्ञान में आधारभूत शोध ही होता है। इसलिए नवाचार के साथ आधारभूत विज्ञान में शोध कार्यों को बढ़ावा देना होगा। शोध के आरंभ में ही परिणाम का प्रश्न नहीं करना चाहिए। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिनमें विज्ञान के क्षेत्र में शोध संपन्न होने के बाद कई वर्षों बाद भी उस शोध पर आधारित नवाचार होते रहे हैं। ”

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने कहा कि “विगत चार वर्षों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी क्षेत्र का बजट लगभग दोगुना हुआ है। शोधकर्ताओं को पोस्ट डॉक्टरेट के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नई योजना आरंभ की गयी है। शोधकर्ताओं को समाज से जोड़ने के लिए पीएचडी छात्रों को अपने शोध क्षेत्र से संबंधित लोकप्रिय लेख लिखने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। नवोन्मेष को बढ़ावा देने संबंधी योजनाएं आरंभ की गयी हैं। कई अंतराष्ट्रीय परियोजनाओं में भागीदारी भी की गई है, जिनमें तीस मीटर टेलिस्कोप, लिगो एवं लार्ज हेड्रान कोलाइडर प्रमुख हैं।”

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व सचिव प्रोफेसर पी. रामाराव ने अंतर्विषयक और अंतर-संस्थानिक तालमेल पर जोर देते हुए कहा कि अकादमिक और औद्योगिक संबंधों को बढ़ावा देना जरूरी है। प्रसिद्ध नाभिकीय वैज्ञानिक एवं विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व सचिव प्रोफेसर वी.एस. रामामूर्ति ने कहा कि भारत को अंतर-विश्वविद्यालय जैसे अन्य संस्थानों की आवश्यकता है, इससे उच्च स्तरीय शोध के लिए वैज्ञानिक शोध संस्थान मिलकर कार्य कर सकेंगे। पुणे स्थित अंतर-विश्वविद्यालय केंद्र खगोल-विज्ञान और खगोल भौतिकी (आयुका) का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इस संस्थान के वैज्ञानिकों ने गुरुत्वीय तरंगों की शोध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश को ख्याति दिलायी है। हमें ऐसे ही और संस्थानों की आवश्यकता है, जहां शोध के लिए उत्कृष्ट माहौल हो।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर के निदेशक प्रोफेसर प्रार्था प्रतिम चक्रवर्ती ने संगोष्ठी में बोलते हुए कहा कि “वैज्ञानिकों को समाज की समस्याओं को समझकर उनका समाधान करने के लिए प्रयास करना होगा। इसके साथ ही उन्होंने समाज में वैज्ञानिक दृष्टिाकोण के प्रसार की भी बात कही। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया की विज्ञान के क्षेत्र में शोध कार्य के लिए आवेदनों को प्रस्तुत करने एवं समीक्षा में डिजिटल प्रणाली का उपयोग होना चाहिए, जिससे समय की बचत होगी और दोहराव की संभावना भी कम होगी।”

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर रामगोपाल राव ने कहा कि “भारत को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निरतंर आगे बढ़ते रहने के लिए शोध पत्रों की संख्या बढ़ाने के स्थान पर शोध के प्रभाव को व्यापक रूप देने की दिशा में कार्य करना होगा। सशक्त नीतियां बनाकर, अधिक छात्रवृत्तियां देकर, उच्च स्तरीय सुविधाएं एवं उपकरण उपलब्ध कराकर विज्ञान में शोध कार्यों को बढ़ावा देने और वैज्ञानिकों को बेहतरीन शोध कार्यों के लिए सक्षम बनाने में मदद मिल सकती है।” (इंडिया साइंस वायर)

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