रोजमर्रा की स्वाथ्य दिक्कतों का होम्योपैथी उपचार

संत समीर
होम्योपैथी दोतरफ़ा चिकित्सा पद्धति है। मरीज़ को जागरूक होना पड़ता है और चिकित्सक को समझदार। अबोध बच्चों और जानवरों की जहाँ तक बात है, तो इनकी बीमारियाँ सामान्यतः देह के तल तक सीमित रहती हैं। मानसिक लक्षण हों भी तो बता पाना सम्भव नहीं होता, इसलिए देह पर उभरे लक्षणों के आधार पर या कभी-कभी एक लक्षण से दूसरे लक्षण का अनुमान लगाकर दुधमुँहे बच्चों और जानवरों का इलाज करना पड़ता है। असल बात यह कि जिनका दिमाग़ चलता है, उन्हें अगर होम्योपैथी चिकित्सा चलानी हो तो अपनी बीमारी के प्रति जागरूक रहना चाहिए। बीमारी का मतलब बीमारी का नाम नहीं, शरीर में होने वाली तकलीफ़ या परेशानी की प्रकृति। हमें यह समझना चाहिए कि शरीर को सिर्फ़ तकलीफ़ होती है। हमने ही अपनी सुविधा के लिए तकलीफ़ों और लक्षणों के समूह बना-बनाकर उन्हें तरह-तरह की बीमारियों के नामों से पुकारना शुरू किया। बाक़ी पैथियों के लिए बीमारी का नाम जानने से सहूलियत हो जाती है, पर एक सफल होम्योपैथ बीमारी के नाम पर ज़्यादा ध्यान नहीं देता।
 
यह मैं होम्योपैथी के उन चिकित्सकों के लिए भी कह रहा हूँ, जो एलोपैथी के आतङ्क से ग्रस्त होकर उसी के ढर्रे पर कई-कई पुड़ियाएँ और शीशियाँ बना-बनाकर आजकल देने लगे हैं। होम्योपैथी सामान्यतः एक बार में एक दवा की एक ख़ुराक वाली चिकित्सा पद्धति है। लक्षण गड्डमगड्ड हों या एलोपैथी की भाषा में कहें कि ‘कम्प्लीकेशंस’ हों, तो ही एक से ज़्यादा दवाओं की कभी-कभार ज़रूरत पड़ती है।
अपने ही घर में गुज़रा एक वाक़या आपको बताता हूँ। क़रीब दस दिन पहले मेरी क़रीब पन्द्रह बरस की बेटी स्वस्ति को अचानक बुख़ार आ गया। कुछ परेशानी सवेरे से ही थी, जिस पर उसने ध्यान नहीं दिया था। बुख़ार चढ़ना शुरू हुआ तो कुछ ही देर में 104 के पार था। अचानक के इस तेज़ बुख़ार की सूचना मेरे लिए परेशानी की बात थी। स्वस्ति लक्षण ठीक से बता नहीं पा रही थी और दफ़्तर से तुरन्त घर मैं भी पहुँच नहीं सकता था। ऐसे में, फ़ोन पर पत्नी से मेरी बात हुई और हमने तय किया कि एलोपैथी दवा सूमो, टैक्सिम-ओ-200 और बेटनेसॉल की एक-एक गोली पहले दी जाय। बुख़ार कुछ घटा और मैं घर पहुँचा तो होम्योपैथी देनी शुरू की।
एलोपैथी और होम्योपैथी साथ-साथ देने के नुक़सान और फ़ायदे दोनों हैं। नुक़सान यह है कि एलोपैथी दवाएँ अक्सर बीमारी के लक्षणों को दबा देती हैं और होम्योपैथी के हिसाब से निदान करना मुश्किल हो जाता है। फ़ायदा यह है कि तेज़ बुख़ार जैसी स्थिति हो और लक्षण समझ में नहीं आएँ तो अललटप्प की होम्योपैथी दवा का असर नहीं होता और मरीज़ ख़तरे की तरफ़ बढ़ता है। ऐसे में एक बार एलोपैथी देकर तापमान को कुछ घटा लेना बेहतर है। इसके बाद इतमीनान से आप लक्षणों पर ध्यान दे सकते हैं और सही दवा का चुनाव कर सकते हैं। सही दवा का चुनाव हो जाए तो होम्योपैथी का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि यह एलोपैथी की तरह मरीज़ को हफ़्तों परेशान नहीं करती। हो सकता है कि आप एक ही दिन में चङ्गे हो जाएँ। सही दवा के चुनाव का सबसे बड़ा पैमाना यह जानना है कि दवा लेने के बाद मरीज़ को मानसिक रूप से कैसा महसूस हो रहा है। होम्योपैथी दवा लेने के बाद बीमारी भले ही बढ़ती हुई दिखे, पर मरीज़ कहे कि उसे मन के स्तर पर अच्छा महसूस हो रहा है तो समझिए कि आप सही रास्ते पर हैं और मरीज़ ख़तरे से बाहर हो रहा है।
यह भी समझने की बात है कि लक्षण स्पष्ट हों तो तापमान कितना भी हो जाए, घबराने की क़तई ज़रूरत नहीं है और न ही एलोपैथी का सहारा लेने की। होम्योपैथी दवा दीजिए और बहुत ज़रूरत हो तो माथे पर ठण्डे पानी की पट्टियाँ रखिए, दवा का काम शुरू होते ही सब कुछ क़ाबू में होगा।
मेरी बेटी के मामले में हुआ यह कि बुख़ार तो उसी दिन शान्त हो गया, पर दूसरे दिन से उल्टियाँ शुरू हो गईं। जैसे-जैसे लक्षण उसने बताए, उस हिसाब से नक्स, रसटॉक्स, आर्सेनिक, फॉस्फोरस जैसी दवाएँ मैंने दीं। फेरम मेट से कुछ फ़ायदा हुआ, पर देर रात फिर उल्टी हुई। तीसरे दिन उल्टियाँ तो बन्द हो गईं, पर कुछ भी खाने-पीने की उसकी हिम्मत नहीं थी। पत्नी डाँट-डपटकर कुछ खिलातीं तो एक-दो टुकड़े खाकर मना कर देती। अगले दिन मैंने दफ़्तर से जल्दी छुट्टी ली और तय किया कि एक बार कुछ ज़रूरी जाँचें करा ली जाएँ। डायग्नोसिस सेण्टर जाने के पहले मैंने यों ही पूछा कि तुम्हारा खाने का मन ही नहीं कर रहा है या डर के मारे नहीं खा रही हो? स्वस्ति ने कहा—‘पापा, खाऊँ कैसे, एक-दो कौर खाते ही लगता है जैसे पेट ही भर गया है?’ यह सुनते ही दिमाग़ में कुछ कौंधा और डायग्नोसिस सेण्टर जाने का इरादा मैंने स्थगित कर दिया। दवाओं की रैक से लाइकोपोडियम-200 निकाली और जीभ पर दो बूँद टपका दी। कुछ देर बाद हाल पूछा, तो बिटिया बोली कि मन में कुछ अच्छा महसूस हो रहा है। कुछ देर बाद भूख वापस आने लगी और दूसरे दिन तक वह एकदम चङ्गी हो गई। यह चमत्कार था। लक्षणों की सही पहचान पर सही दवा पड़ जाए तो होम्योपैथी जादू है, अन्यथा कौड़ी बराबर भी नहीं। चिकित्सकों से ज़रूर कहूँगा कि आप ऐसे मामलों में लाइकोपोडियम-200 के बजाय लाइकोपोडियम-30 को प्राथमिकता दें। मेरे पास 200 पॉवर की दवा थी तो इससे काम चलाना मेरी मजबूरी थी।
कहने का कुल अर्थ इतना ही है कि आपको होम्योपैथी इलाज कराना हो तो बीमारी के लक्षणों को ठीक से समझकर बताएँ। बीमारी कैसे बढ़ती या घटती है, इसे जितना ठीक-ठीक आप बता पाएँगे, उतने ही बेहतर इलाज की सम्भावना बनेगी। कोई मानसिक असामान्य लक्षण घटित हो तो समझिए कि होम्योपैथी आपके लिए चामत्कारिक सिद्ध हो सकती है। किसी दुःखद समाचार से शॉक लग जाए, मन बेक़ाबू होने लगे तो ‘इग्नेशिया’ की सिर्फ़ एक ख़ुराक भी उबार लेती है। अगर कोई मरीज़ कहता है कि वह विषाद से भरा हुआ है और उसकी इच्छा बार-बार बस आत्महत्या करने की होती है तो समझदार चिकित्सक समझ जाएगा कि यह ‘ऑरम मेट’ का रोगी है। इस दवा की कुछ ख़ुराकें उसे जीवन दे सकती हैं। ‘ऑरम मेट’ यानी गहने वाला सोना। ग़ज़ब है कि सोने को पोटेण्टाइज़ करके होम्योपैथी दवा बनाइए और स्वस्थ व्यक्ति को कुछ दिन नियमित खिलाते रहिए तो वह आत्महत्या पर आमादा हो जाएगा।
होम्योपैथी दवा का रहस्य यही है कि यह किसी पागल को अगर ठीक कर सकती है तो स्वस्थ आदमी को पागल बना भी सकती है। इसकी सारी दवाएँ, किसी जानवर पर नहीं, स्वस्थ मनुष्यों पर परीक्षण करके बनाई गई हैं। होम्योपैथी के आविष्कारक हनीमैन ने कितने ख़तरे उठाए, इसी से आप समझ सकते हैं। परीक्षण के लिए ख़ुद को प्रस्तुत करने वाले कुछ बेचारे तो ज़िन्दगी भर के लिए ही विकार के शिकार हो गए।
सच तो यह है कि होम्योपैथी की सैद्धान्तिक समझ ठीक से हो जाए तो कई बार आप सामने वाले की मानसिकता तक का अन्दाज़ा लगा सकते हैं। जिसे थोड़ी फ़ुरसत हो, उसे होम्योपैथी पढ़नी चाहिए। शुरू में आप घनचक्कर हो सकते हैं। लग सकता है कि हर दवा ही आप पर फिट बैठ रही है, पर काम एक भी नहीं कर रही है। थोड़ा वक़्त लगेगा, पर दवा के चुनाव का रहस्य आप जान जाएँगे तो अपने साथ-साथ बहुतों का भला करेंगे। इलाज तो एक तरफ़, आप यह भी समझ पाएँगे कि ज़िन्दगी सिर्फ़ उतनी ही नहीं है, जितनी कि सामने से आपको दिखाई दे रही है। होम्योपैथी विज्ञान के एक दूसरे ही पहलू का दर्शन कराती है।
आपको इस पैथी पर भरोसा न हो, तो एक प्रयोग कर सकते हैं कि एक-दो दिन देर रात तक जगें और जब ज़्यादा जगने की वजह से सिर में दर्द और भारीपन का एहसास होने लगे तो नक्स वोमिका-30 या 200 की एक-दो बूँद जीभ पर टपका लें। पाँच-दस मिनट में सिरदर्द ग़ायब हो जाएगा तो आपके लिए होम्योपैथी पर विश्वास करना आसान हो जाएगा। नक्स वोमिका यानी कुचला, एक तरह का विष। आयुर्वेद में भी इसका व्यवहार होता है।
एक और आसान प्रयोग कर सकते हैं। अक्सर ऐसे लोग मिल जाते हैं जो भोजन की थाली नमक अलग से रखवाते हैं। सामान्य से ज़्यादा नमक खाने की आदत वाला कोई मिले तो उसे नमक से ही बनाई गई दवा नेट्रम म्यूर-200 की एक ख़ुराक दे दीजिए। दो-चार दिन बाद नतीजा देखेंगे तो आप आश्चर्यचिकत हुए बिना न रहेंगे।
एक मज़ेदार बात यह जानिए कि जब मैं 30 या 200 पॉवर की बात कर रहा हूँ, तो दरअसल मात्रा-विहीन दवा की बात कर रहा हूँ। होम्योपैथी में पोटेंसी या पॉवर बढ़ते जाने का मतलब है, दवा की मात्रा का कम होते जाना। जो बूँदें आपकी जीभ पर टपकती हैं, उनमें दवा का एक भी परमाणु नहीं होता। 9 या 10 पोटेंसी के बाद दुनिया के किसी भी सूक्ष्मदर्शी से होम्योपैथी दवा में दवा का एक भी परमाणु नहीं तलाशा जा सकता। पानी में दवा बनी होगी तो सिर्फ़ पानी मिलेगा और एल्कोहल में बनी होगी तो एल्कोहल ही मिलेगा और कुछ नहीं। यह भी याद रखिए कि पानी या एल्कोहल सिर्फ़ आधार या बेस है, क्योंकि होम्योपैथी दवा हवा में नहीं रह सकती। एल्कोहल में दवा इसलिए बनाई जाती है, क्योंकि शुद्ध एल्कोहल सौ साल भी ख़राब नहीं होता…और इसी नाते होम्योपैथी दवा (मदर टिञ्चर को छोड़कर) की कोई एक्सपायरी डेट नहीं हो सकती। सरकार ने एलोपैथी के अन्दाज़ में होम्योपैथी के लिए एक्सपायरी डेट लिखने की जो अनिवार्यता शुरू की थी, वह मूर्खता के अलावा कुछ नहीं थी।
यहीं पर आपके ज़ेहन में एक सवाल कौंध सकता है कि जब होम्योपैथी दवा में, जिस चीज़ से दवा बनी है, उसका एक भी परमाणु नहीं होता, तो भला यह दवा हो भी कैसे सकती है? होम्योपैथी से जब मेरा परिचय हुआ था, तो यही सवाल शुरू में मेरे भी मन में आया था। आधुनिक विज्ञान और एलोपैथी के जानकार के लिए होम्योपैथी दवा बनाने का पूरा तरीक़ा टोना-टोटका या मज़ाक़ के अलावा और कुछ नहीं लगेगा, लेकिन याद रखें कि यह संसार जितना सामने से दृश्य है, उससे कई गुना ज़्यादा अदृश्य है। समझिए कि किसी अणु-परमाणु जैसे ब्लैकहोल में कितने सूरज-चाँद-सितारे समा सकते हैं।
होम्योपैथी दवा बनाने का तरीक़ा जानना दिलचस्प है। इस पर फिर कभी बात होगी। हाँ, यह रहस्य जान जाने के बाद आप अपने मन में विज्ञान के नाम पर पाले गए कुछ अन्धविश्वासों की शिनाख़्त ज़रूर कर पाएँगे। इसके अलावा, कुछ समझदारों की कुछ मूर्खताओं को भी समझना आसान हो जाएगा।
बात बहुत लम्बी हो गई, इसलिए अन्त में घर में रखने लायक़ दो-चार दवाओं के नाम जानिए, अच्छा रहेगा—
1. आर्निका-30 या 200—कोई भी चोट, जिसमें ख़ून न निकला हो, बस मांसपेशियाँ कुचल गई हों, ख़ून जमकर काला पड़ रहा हो, तो ऐसी चोट पर यह ज़बर्दस्त काम करेगी। कुचलन वाला दर्द किसी भी बीमारी में हो, यह काम करेगी। मसलन, ज़्यादा काम करके आप थक गए हों और शरीर में कुचलने जैसा दर्द महसूस हो, तो आपकी थकान भी यह थोड़ी ही देर में उतार देगी।
2. कैलेण्डूला-क्यू (मदर टिञ्चर)—कटने-फटने-चोट लगने से ख़ून बहने लगे तो थोड़े पानी में कैलेडूण्ला मिलाकर रुई भिगोकर लगाएँ। थोड़ी देर में ख़ून बन्द हो जाएगा। घाव पर कुछ दिनों तक इसे नियमित दिन में दो-तीन बार लगाते रहें, कोई सङ्क्रमण नहीं होगा और घाव जल्दी ठीक हो जाएगा।
3. नक्स वोमिका-30 या 200—ज़्यादा देर तक कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों की बीमारियों के लिए यह काम की दवा है। आजकल की ऐसी जीवनशैली में पेट ख़राब होना आम बात है। अगर दोपहर से पहले कई बार शौच जाने की आदत हो, देर तक शौचालय में जमे रहते हों, तो सोने से पहले कुछ दिन नक्स की एक ख़ुराक लीजिए। 30 पोटेंसी हो तो हर दिन, अन्यथा 200 पोटेंसी हो तो हर तीसरे दिन। सोने से पहले लेने पर यह दवा बढ़िया काम करती है। ज़्यादा पौष्टिक खाना खा लेने से पेट ख़राब हो जाए तो यह समझिए कि इस दवा में प्रभु का वास है। पक्का काम करेगी। ज़्यादा तेल वाली चीज़ें खाने से पेट गड़बड़ हो तो पल्साटिल्ला बढ़िया काम करती है। 
4. एकोनाइट-30—अचानक कोई बीमारी आक्रमण कर दे, कुछ वजह समझ में न आए, जैसे कि अचानक की छींके और तेज़ सर्दी-जुकाम, यकायक आने वाला बुख़ार…तो इस दवा की कुछ ख़ुराकें दीजिए। एकोनाइट की बीमारी का आक्रमण अचानक होता है। बेचैनी, मौत का डर, पसीना न आना वग़ैरह इसके लक्षण हैं।
5. कालीफॉस-3 एक्स या 6 एक्स—यह घर में रखने की नहीं समय-समय पर नियमित इस्तेमाल में लाने की दवा है। जो लोग दिमाग़ी काम ज़्यादा करते हैं, वे कुछ दिन लगातार दिन में तीन-चार बार चार-चार घण्टे के अन्तराल पर चार-चार गोलियाँ खा लें तो दिमाग़ को थोड़ी ऊर्जा मिल जाएगी। बिना किसी बीमारी के दिमाग़ी टॉनिक के तौर लेना हो तो महीने भर लगातार लें, फिर हफ़्ते-दस दिन के लिए बन्द कर दें। कालीफॉस वास्तव में एक तरह की नर्व टॉनिक है। इसका सही उपयोग हो जाए तो दुनिया के आधे पागलख़ाने बन्द हो जाएँगे। बुख़ार बढ़ जाए और दिमाग़ पर चढ़ने का ख़तरा पैदा हो जाए तो कालीफॉस सञ्जीवनी का काम करती है। किसी भी बीमारी में, मसलन सड़न या सङ्क्रमण वग़ैरह की स्थिति में, तेज़ दुर्गन्ध आए तो भी यह दवा बढ़िया असर दिखा सकती है। जिन लोगों को मानसिक तनाव के कारण नींद न आ रही हो, वे भी सोने से पहले इसकी एक-दो ख़ुराक ले सकते हैं।
ये दवाएँ सैकड़ों तरीक़े से इस्तेमाल होती हैं, पर मैंने महज़ कुछ लक्षणों का ही ज़िक्र किया है। बस इतने से सन्तोष कीजिए। आपकी दिलचस्पी रही और मुझे मौक़ा मिला तो कई और मज़ेदार बातों की चर्चा की जा सकती है।

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