आदर्श दिनचर्या से होगी स्वयं की रक्षा और देश की सुरक्षा

             सबसे पहले हमें यह समझ लेना होगा कि व्यक्ति के रूप में हम हैं, कौन यानी व्यक्ति क्या हैसृष्टि एक ही तत्व का विस्तार
है l श्रीमद्भागवत गीता में भगवान कहते हैं, अव्यक्त से अर्थात् ब्रह्म के सूक्ष्म शरीर से सम्पूर्ण चराचर भूतगण व्यक्त हुए I अव्यक्त ब्रह्म ही पेड़, पौधों, देवी, देवताओं और मनुष्य आदि के रूप में व्यक्ति के रूप में प्रकट हुए I अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात् मैं ब्रह्म हूं या ब्रह्म का अंश हूं अथवा सोऽहम् I इन सबका सीधा सरल अर्थ यही है कि प्रत्येक जीवात्मा में ईश्वर विद्यमान हैं I इसका स्पष्ट अर्थ है कि नारायण ही नर के रूप में अभिव्यक्त हुए हैं, इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि व्यक्ति के जीवन का लक्ष्य होना चाहिए नर से पुन: नारायण बनना, यह स्वाभाविक गंतव्य होना चाहिए I दुसरे शब्दों में जहाज के पंछी का पुनः जहाज पर लौटना ही व्यक्ति का अपने मूल स्वरूप में लौट जाना है I इससे कम में हम भला क्यों सन्तुष्ट हों ? भले ही हम नर से नारायण बनने का पथ नहीं अपनाएं परन्तु कम से कम दूसरे व्यक्तियों में स्थित नारायण का अनिष्ट तो नहीं करें .

प्रात:कालीनचर्या

  • प्रातः ब्रह्ममुहूर्त, 4 से पांच बजे के बीच में जाग जाना चाहिए I
  • बिस्तर में लेटे लेटे ही चार-पांच मिनट तक सभी अंगों को तानना, (अंगड़ाइयां लेना) शरीर के रक्त संचार की दृष्टि से अच्छा रहता है I
  • हाथों का दर्शन करते हुए, कराग्रे वसति लक्ष्मी मन्त्र का उच्चारण करें I
  • ईश्वर को सुखद और सन्तुष्टीदायक निद्रा के लिए धन्यवाद दें I
  • ईश्वर से प्रार्थना करें कि हे भगवान् ! मैं आज दिनभर में मन, वचन, कर्म से जो भी कार्य करूं, वे आपके श्रीचरणों में अर्पित करने योग्य हों, (ताकि जाने-अनजाने में भी अनुचित या परपीड़ा देने वाले कार्य न हो पाएं) I यह भी प्रार्थना करें कि मैं दिनभर में तन, इन्द्रियों, मन, बुद्धि से जो भी ग्रहण करूं, वे सभी मेरे लिए परम कल्याणकारी हों I इससे भगवान की अदृश्य अनुकम्पा से दूषित पदार्थ, दुष्ट विचार, प्रदूषित वायु, अनुचित और अश्लील दृश्य, दुर्गन्धयुक्त वातावरण, आदि से रक्षा सम्भव हो सकेगी I
  • सर्व कल्याण मन्त्र का कम से कम एक बार उच्चारण करें, सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया सर्वे भद्राणि पश्यन्तु ना कश्चित् दुःख भाग भवेत् I
  • धरती पर पैर रखते समय, विष्णु पत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे I हे धरती माता ! आप मुझे पाद (पांव) स्पर्श के लिए क्षमा करें I
  • सुबह उठते ही भगवान के चित्रों का दर्शन करें और दर्पण में स्वयं का मुखमंडल देखते हुए मुस्कुराते हुए अपने ह्रदय में विराजमान ईश्वर को नमस्कार करें I
  • जलपान – यथासम्भव मात्रा में सुबह सुबह बिना कुल्ला किए पानी पीना चाहिए I यदि ताम्बे के पात्र में रात को ही पानी भरकर लकड़ी की मेज या पटिए पर उसे रख दिया जाए और उस जल का सेवन फर्श पर आसन बिछाकर बैठकर धीरे-धीरे किया जाए तो अच्छा रहेगा I किसी बीमारी से ग्रस्त व्यक्ति पानी को गर्म कर उसमें आधे नीम्बू का रस निचोड़कर तथा एक चम्मच शहद डाल कर उस जल का सेवन करें तो बीमारी के लिए जिम्मेदार दूषित तत्वों का शरीर से निष्कासन होने लगता है और इसीलिए शरीर शुद्धि की दृष्टि से श्रेष्ठ माना गया है I
  • मुखमंडल एवं नयन प्रक्षालन – मुंह और आंखों पर ठण्डा जल डालें I
  • शौच – यदि किसी प्रकार का शारीरिक कष्ट न हो तो भारतीय शैली में शौच करें, शौच करते समय दांतों को भींचे I शौच करते समय यह विचार बार बार दोहराएं कि आंतों में पड़ा समस्त मल निकल रहा है I यदि टॉयलेट शीट पर पहले से एक मग्गा पानी डाल देंगे तो फ्लश करते समय कम पानी बहाना पड़ेगा I शौच के बाद साबुन से हाथों को अच्छे से धोना चाहिए I
  • बड़ों का सम्मान – घर के सभी बड़ों को प्रणाम करें और उनका आशीर्वाद लें I अपनी संतानों को गले से लगाएं और इसतरह उन्हें आश्वस्त करें कि हर स्थिति में आप उनके साथ हैं I उन्हें खुलकर आशीर्वाद भी दें I
  • दातौन – दातौन करते समय यह ध्यान रखें कि टूथ ब्रश ज्यादा पुराना न हो, दो माह में ब्रश बदलना चाहिए I अपना ब्रश परिजनों के ब्रश से अलग रखें और टॉयलेट में ना रखें I सप्ताह में एक या दो बार किसी मंजन से मध्यमा अंगुली से दांतों को रगड़ें I अन्यथा कपड़े से छने एक चुटकी हल्दी के चूर्ण में एक चुटकी महीन पीसा हुआ सेंधा नमक मिलाकर थोड़ा-सा सरसों का तेल डालकर उस पेस्ट से दांतों और मसूढ़ों को रगड़ें I दातौन के बाद कुल्ला अच्छे से करें I सप्ताह में एक दो बार नीम की कोमल टहनी से दातौन करें I  यदि प्रतिदिन ब्रश करने के बाद मध्यमा ऊंगली से दांतों को रगड़ें I
  • तेल का गंडूश -सप्ताह में एक बार 10-15 ग्राम शुद्ध सरसों के तेल को मुंह में भरकर उसे पूरे मुंह में पांच से दस मिनट तक घुमाएं और बाद में उसे थूक दें, याद रहे, निगलना नहीं है I
  • व्यायाम – प्रतिदिन 30 मिनट का व्यायाम अनिवार्य रूप से करें I चाहें तो किसी बगीचे में तेज गति से टहलें, सूर्य नमस्कार करें, घर का झाडू पौंछा करें, साइकल चलाएं, योगासन करें या शरीर संचालन करें I सूर्योदय के पश्चात प्रात: भ्रमण करें I
  • प्राणायाम – साथ ही कम से कम पांच से दस मिनट तक अनुलोम विलोम तथा कपालभाति प्राणायाम करें I प्रतिदिन सुबह सुबह 20-20 कपालभाति तीन बार करने से शरीर में सकारात्मक परिणाम दिखने लगता है I
  • ताली – प्रतिदिन 15 सेकण्ड के लिए जोर जोर से ताली बजाने से रक्तसंचार अच्छा होने लगता है और विजातीय रसायनों का निष्कासन सरलता से होने लगता है I
  • खुलकर हंसने से मुखमंडल की अधिकांश मांसपेशियों का व्यायाम हो जाता है और मन से तनाव भी निकल जाता है I  दिनभर में एक बार दो चार मिनट ही बिना कारण हंसे I
  • सूर्यकिरण दर्शन – सूर्योदय से एक घंटे तक की धुप का कुछ देर के लिए सेवन अवश्य करें I
  • तीन चार तुलसी की पत्तियां निगलें I
  • पूजा बनाम आत्म साक्षात्कार – प्रतिदिन 10-20 मिनट की पूजा या ध्यान, प्रार्थना अथवा ईश आराधना को जीवन का अनिवार्य दिनक्रम बनाएं, प्रभु के नाम की माला गिन सकते हैं, माला गिनने से एक्यूप्रेशर के कुछ बिंदु भी उद्दीप्त होते हैं I मंत्रोच्चार के तहत ॐ, राम, ॐ गणपतये नम:, गायत्री मन्त्र, महामृत्युंजय मन्त्र, विट्ठल, श्रीकृष्ण शरणम् मम, नवकार मन्त्र आदि का जाप करें I
  • मालिश – सप्ताह/ 15 दिन में एक बार स्वयं या अन्य व्यक्ति से अपने शरीर की सरसों के तेल से मालिश करें/ करवाएं I
  • स्नान – प्रतिदिन पांच से छह बजे के बीच स्नान करें, ठण्डे अथवा गुनगुने जल से स्नान करें I स्नान करते समय पवित्र नदियों का स्मरण करें I आधी बाल्टी जल से स्नान करें, प्रतिदिन पूरे शरीर में साबुन न लगाएं I शेम्पू का उपयोग कम से कम करें I अधोवस्त्र पहन कर ही स्नान करें, पतले तौलिए से शरीर को रगड़ कर सूखाएं I  तौलिए को प्रतिदिन धुप में सूखाएं I अपने अधोवस्त्र स्वयं ही धोएं I
  • स्वच्छता – दिवाली के पूर्व सम्पूर्ण भारत में घरों-दुकानों में स्वेच्छा से स्वच्छता अभियान इसलिए चलता है, क्योंकि धन एवं ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी का वास स्वच्छता में है, अतएव अपने घर के भीतर और बाहर स्वच्छता को प्राथमिकता दें I अंगों, वस्त्रों, बैठक के फर्नीचर की स्वच्छता, शयन कक्ष के गादी-बिस्तर आदि की स्वच्छता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें I

भोजन, अल्पाहार आदि

 आसन बिछाकर या कुर्सी पर बैठकर ताजा बना अल्पाहार करें, अल्पाहार में छाछ, ग्रीन टी, फल, दही, पोहा, उपमा, इडली, पराठा लिया जा सकता है I

  • स्थानीय और देशज तथा मौसमी फल और सब्जियों का सेवन पूर्णतया हितकर होता है I असमय और विदेशी फल-सब्जियों का सेवन शरीर के लिए उतना अनुकूल नहीं होता है I
  • दस से पन्द्रह ग्राम सींकी हुई अलसी का चूर्ण पानी के साथ ग्रहण करें, यह सुपर फ़ूड के नाम से विश्व में विख्यात है, कई रोगों का निवारण करता है और इसके नियमित सेवन से कई रोगों से बचाव भी होता है I
  • सुबह का भोजन (लंच) यदि सम्भव हो तो 9 से 10 के मध्य करें, हाथ-पैर-मुंह धोकर,आसन पर बैठकर भरपेट भोजन करें I चबा चबा कर खाएं I प्रसन्नचित्त होकर भोजन करें I भोज्य पदार्थों की प्रशंसा अवश्य करें I भोजन में अत्यधिक अम्लीय पदार्थों का सेवन ना करें, अचार, नमकीन, अधिक मिठाई आदि से बचें I रसायनों से युक्त विदेशी खाद्यपदार्थों से बचें I
  • भोजन के पश्चात ठण्डा कदापि न लें I
  • सुबह के भोजन के बाद सम्भव हो तो छाछ अवश्य लें, गैस से बचने के लिए थोड़ा सा गुड़ अवश्य लें  और भोजन के पश्चात 15 मिनट तक बायीं करवट लेकर विश्राम करें I
  • सम्भव हो तो देशी गाय के शुद्ध घी का उपयोग अवश्य करना चाहिए I मूंगफली, सरसों और तिल का छना हुआ यानी फिल्टर्ड तेल श्रेष्ठ होता है I
  • भोजन करते समय दो काम करें, एक तो जूठा बिलकुल भी नहीं डालें, दूसरा ईश्वर से प्रार्थना करें कि जैसे मुझे भोजन दिया है, वैसे ही सभी प्राणियों को भोजन देने की कृपा करें I
  • भोजन के बाद अपनी उम्र जितने मेथीदाने निगलने से पाचन में लाभ मिलता है I
  • आहार लेते समय विपरीत प्रकृति के खाद्यों को एक साथ लेने से बचें, हितकर और अहितकर आहार का भी ध्यान रखें I जैसे दूध के साथ गुड़, दूध के साथ नमकीन पदार्थ खाने का भी निषेध किया गया है I संध्या के समय दही के सेवन का निषेध है I
  • पानी सदैव बैठकर पीएं और दूध खड़े-खड़े I
  • कम उम्र में गम्भीर बीमारियों के प्रकोप को देखते हुए सावधानी की दृष्टि से चाय, काफी, कोल्डड्रिंक, फास्टफूड, ब्रेड, मैदे से बनें पदार्थ, बिस्कीट, चाकलेट, शराब, बीयर, मांस-अंडा-मछली आदि का उपयोग कदापि न करें I रिफ़ाइन्ड तेल और माइक्रोवेव ओवन में बनें पदार्थों का सेवन कदापि ना करें I बाजारू खाद्य पदार्थों से यथासम्भव बचें I
  • गुड़ और चने का मिश्रण अत्यधिक पौष्टिक होता है I शकर की तुलना में गुड़ अधिक पौष्टिक होता है, समुद्री नमक की अपेक्षा सेंधा या काला नमक अधिक सुरक्षित होता है I
  • रात में भिगोकर रखी गई, बादाम और मुनक्का किशमिश मस्तिष्क और ह्रदय के लिए अच्छी होती है I
  • संध्या भोजन (डिनर) कम से कम मात्रा में करें, सुपाच्य (दलिया, उपमा, खिचड़ी आदि) भोजन का सेवन करें I सूर्यास्त के पूर्व ही सांध्यकालीन भोजन ग्रहण करें I
  • संध्या भोजन के पश्चात कम से कम तीन सौ कदम टहलें I
  • नाक में थोड़ा गर्म किया हुआ देसी गाय का घी प्रतिदिन रात सोते समय डालने से अनेक रोगों से बचाव और मुक्ति मिलती हैं I
  • एलोविरा आदि का नित्य सेवन नहीं करें, जानकार की सलाह पर ही निर्धारित अवधि तक ही लें I
  • प्रातः खाली पेट एक गिलास पानी में तुलसी अर्क की एक बूंद माह में दस दिन तक लेने से अनेक रोग दूर रहते हैं I

 

अन्य दैनिक गतिविधियां

 

  • सत्य बोलें स्वस्थ रहें – अमेरिका में सम्पन्न एक नवीनतम वैज्ञानिक अनुसंधान का निष्कर्ष है कि सत्य बोलने से स्वस्थ रहते हैं I
  • कर्तव्य और दायित्व – जीविकोपार्जन हेतु जो भी काम करें, पूरी प्रामाणिकता और प्रसन्नता के साथ करें I काम को बोझ नहीं मानें और दायित्वों का अनिच्छा से निर्वहन नहीं करें I
  • सौन्दर्य प्रसाधन के घातक रसायनों से बचें – शेविंग क्रीम और अन्य सौन्दर्य प्रसाधन के रसायनों का उपयोग नहीं करें I पसीना हमारे शरीर के भीतर के दूषित और जहरीलें पदार्थों के विसर्जन का माध्यम है, इसे रोकने की कोशिश नहीं करें I खोपरे का तेल शेविंग क्रीम और आफ्टर शेव लोशन के रूप में उपयोगी होता है I पानी अथवा दूध भी शेविंग क्रीम का काम करता है I
  • तंग वस्त्रों के कारण पसीने का विसर्जन और वाष्पीकरण भी प्रभावित होता है और त्वचा का श्वसन भी बुरीतरह प्रभावित होता है तथा पसीने से निकलें यूरिया जैसे रसायन और नमक तंग वस्त्रों के कारण कोमल त्वचा पर बार बार रगड़े जाते हैं और त्वचा रोगग्रस्त होने लगती है I शरीर के सभी अंगों की गतिविधियां संकुचन-फैलाव से ही सम्भव होती हैं, अतएव त्वचा से चिपकने (स्किन टाइट) तंग  कपड़ों का उपयोग बहुत सोच समझकर ही करें I
  • मातृभाषा की महत्ता – जब भी समय मिलें अपनी मातृभाषा अथवा संस्कृत में लिखी पुस्तकों को पढ़ें, इससे मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध का विकास होता है I यदि नियमितरूप से किसी धार्मिक ग्रन्थ के कुछ अंश को पढने की आदत डालेंगे तो अच्छा रहेगा I
  • अभिवादन – अभिवादन के लिए हाथ मिलाने से बचें, हाथ जोड़कर नमस्ते अथवा प्रणाम करना, सर्दी-खांसी जैसे वायरल अथवा अन्य बैक्टीरियल संक्रामक रोगों के आदानप्रदान की वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक स्वास्थ्यकारी है I
  • सामाजिकता – दिन में कोई ना कोई सामाजिक कार्य अवश्य करें I अड़ोस-पड़ोस के लोगों से हाल चाल पूछें, सहायता करने के लिए तत्पर रहें I अपने सीमित दायरे से निकल कर अच्छे लोगों से मित्रता करें I जो लोग सामाजिकता में विश्वास करते हैं, वे अनेक रोगों से बचे रहते हैं I
  • व्यसन से दूर रहें – चूंकि हम अव्यक्त ब्रह्म के अंश हैं, तथा हमारे भीतर परमात्मा विराजमान है, अतएव हमें हर स्थिति में व्यसनों और गन्दी आदतों से दूर रहना है I
  • परमात्मा की उपस्थिति को अनुभव करें – कोई भी कार्य (मन, वचन, कर्म से) करते समय यह बात दृढ़तापूर्वक ध्यान रखें कि भीतर विराजमान परमात्मा आपको देख रहे हैं I
  • उपहास ना करें – उपहासात्मक, तंज, टान्ट भरे वाक्यों के प्रयोग से अपने आपको बलपूर्वक और ध्यानपूर्वक रोकें I याद रखिए ! आपके ऐसे शब्द सालोंसाल तक मन में खटकते रहते हैं और वे उस व्यक्ति के भावी व्यवहार में प्रकटरूप में अथवा परोक्ष रूप में छलकते ही हैं I अतएव कटू वचनों का उपयोग कदापि ना करें I यदि आप अध्यापन से जुड़े हैं तो यह याद रखिए कि आपका प्रमुख दायित्व विद्यार्थी के भीतर विराजमान प्रतिभा के प्रकटीकरण का है, उसमें अन्तर्निहित प्रतिभा का प्रस्फुटिकरण आपके माध्यम से ही होना है, इसलिए नकारात्मक टिप्पणियों से उस प्रस्फुटिकरण के मार्ग को अवरुद्ध न करें I इसके विपरीत सकारात्मक टिप्पणियों और प्रोत्साहन भरे वाक्यों से उसके (प्रतिभा के) प्रकट होने के मार्ग को प्रशस्त करना है I
  • देश के प्रति दायित्वबोध – हमें हर समय इस बात का बोध रहे कि राष्ट्र, समाज और अन्य नागरिकों के प्रति हमारा क्या दायित्व है I
  • अच्छा काम अवश्य करें – दिन भर में कम से कम एक अच्छा कार्य करने का प्रयास करें I
  • पर्यावरण संरक्षण हेतु पौधरोपण करें, उनकी देखरेख करें I लम्बी उम्र के देसी पेड़-पौधें लगाएं I
  • पारिवारिकता को प्राथमिकता दें – परिवार के सदस्यों के साथ बैठें, बातचीत करें I
  • व्यक्तिसत्ता का सम्मान करें – पारिवारिक, वैवाहिक और सामाजिक सुख-शान्ति-सम्बन्धों की दृष्टि से किसी को भी अपने जैसा बनने के लिए बाध्य न करें, हरेक को परमात्मा ने एक विशिष्ट प्रभुसत्ता (इंडिविजुलिटी) के तहत रचा है I
  • प्लास्टिक से बचें – खाद्य सेवन हेतु प्लास्टिक की सामग्री का उपयोग अपरिहार्यता की स्थिति में ही करें I सम्भव हो तो बिलकुल नहीं करें I
  • मूत्र त्याग – आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के शारीर कार्यिकी विषय के अनुसार मूत्रत्याग बैठकर करने से मूत्राशय पूर्णरूपेण खाली (कम्प्लीट एम्प्टिंग ऑफ यूरिनरी ब्लेडर) हो जाता है I
  • प्रकृति के साथ सहजीवन – पशु-पक्षियों को दाना-पानी देने की आदत डालें I
  • ऊर्जा बचत –विद्युत् का उपयोग सोच-समझकर करें, जरूरत नहीं होने पर स्वीच बन्द करें I
  • चरित्र निर्माण को प्राथमिकता दें – अपनी सन्तानों का हित चाहते हैं तो भविष्य निर्माण की बजाय चरित्र निर्माण पर ज्यादा ध्यान दें I भविष्य निर्माण के चलते वे धन कमाने की मशीन बन रहे हैं, निरोगी काया उनके लिए प्राथमिकता की बजाय दूसरे-तीसरे  दर्जे की बात हो चुकी है, न तो उन्हें पौष्टिक, रोगरक्षक, रोगहारी और निरापद आहार मिल पा रहा है और न ही स्वस्थ शरीर के लिए अनिवार्य दैनिक व्यायाम के लिए समय मिल पा रहा है I तनिक सोचिए, कैरियर बनाने के नाम पर कहीं, उन्हें अपने से अलग करने के उपरान्त भी आप आगे होकर उनके लिए रोग, तनाव और भागमभाग भरे असंतुष्ट जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के दोषी तो नहीं हैं I आपके पोते-पोती मां-बाप का प्यार पाने की बजाय स्नेह और ममत्वहीन आयाओं के भरोसे पले-बढ़ेंगे, क्या यही आपका अपनी सन्तान और पोते-पोतियों के लिए सोचा सपना था, जो पूरा हुआ है I भविष्य निर्माण और धन कमाने की मशीन बनाने का अर्थ है, आम की अपेक्षा के साथ बबूल का पौधारोपण करना है I जीवन के चार पुरुषार्थ क्रमशः धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बताएं गए हैं, नैतिकता के साथ (दूसरों का अनिष्ट किए बिना) और माता-पिता के प्रति कृतज्ञता के भाव के साथ धन का उपार्जन और उस निष्पाप धन से कामनाओं-सुख सुविधाओं का उपभोग और परमार्थ की दृष्टि भी उपयोग करने की शिक्षा देंगे, तो उनकी संतानें लाड़, प्यार, दुलार के अभावों के बीच आयाओं और झुलाघरों में नहीं पलेंगी और वे आपके कुल के दीपक बन सकेंगे I ऐसा अक्सर होता है कि व्यक्ति अपनी सन्तानों के वेतन-पैकेज को बड़े गर्व के साथ बताता है कि दस लाख या 2 करोड़ का सालाना वेतन है I परन्तु क्या अपनी संतान को अपने से बहुत दूर और कभी-कभार ही मिलने की पीड़ा या बीमारी आदि के समय उसका अभाव आपको सुख देता है? क्या अपने माता-पिता से दूर रहने की विवशता उसके अन्तर्मन को नहीं सालती है? क्या उसके दुःख दर्द, अथवा जब उन्हें आपकी आवश्यकता अनुभव हो और वे आपके सानिध्य को नहीं पा सकें तो क्या वे तनावहीन रह सकते हैं ? क्या ऑफिस जाने वाले माता-पिता के बच्चें दादा-दादी की उपस्थिति में मनोशारीरिक, सामाजिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक स्वस्थ रहते हैं, उनमें निराशा, अवसाद, आत्महत्या जैसे विचारों की सम्भावना कम रहती है? इन प्रश्नों के व्यावहारिक समाधान और उत्तर खोजना होंगे I

शयन

  • सोने से पूर्व स्वाध्याय करें, चिन्तन, मनन करें, मित्रों के साथ सामाजिकता या सामूहिक हित के विषयों पर चर्चा करें, राजनीतिक बहस से बचें I
  • सोने से पूर्व स्वस्थ रहने की दृष्टि से हल्दी और एक चौथाई घी युक्त गर्म दूध का सेवन करें I
  • रात लगभग दस बजे सोने के स्वच्छ और ढीले वस्त्र पहनकर हाथ-पैर-मुंह धोकर और उन्हें साफ़ कपड़े से सूखाकर बिस्तर में लेट जाएं और तटस्थ भाव से सोचें कि दिनभर में क्या क्या किया, किस व्यक्ति से मिलकर अच्छा लगा, किसने आपकी सोच को सही दिशा दी, किसने कामचोरी या अन्य नकारात्मक बातें की, किसका सानिध्य सत्संगत-सा था I सिर पूर्व अथवा दक्षिण दिशा में हो, चादर और ओढने के वस्त्रों को अच्छे से झटकें I शयनकक्ष में शुद्ध वायु का प्रवाह अवश्य हो I खिड़की-उजालदान का प्रावधान होना चाहिए I सोने से पूर्व परमात्मा का आभार मानें कि आपका दिन अच्छा गया और अगला दिन और भी अच्छा बीतें, ऐसी प्रार्थना करें I
  • माह में एक बार एक चम्मच अरण्डी (केस्टर) के तेल को गर्म दूध में डालकर रात्रि को लें, जुलाब और पेट साफ़ करने की दृष्टि से यह उत्तम प्रयोग माना जाता है I
  • बीमार व्यक्ति यदि रात्रि में सोते समय स्वयं के पूर्णत: स्वस्थ होने के विचार को पूर्ण आस्था और विश्वास के साथ बार-बार दोहराए तो सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं I
  • किसी समस्या का समाधान नहीं मिल रहा है, तो रात को सोते समय उस समस्या का बार-बार स्मरण रात सोने से पहले करें, कुछ ही दिनों में समस्या का समाधान मिल सकेगा I
  • स्मरण शक्ति बढाने या हस्तलिपि (हैण्ड राइटिंग) सुधारने के इच्छुक, रात में सोते समय इस हेतु अपनी भाषा में विचार को बार-बार दोहराएं I
  • यह विचार दृढ़तापूर्वक प्रत्येक क्षण अपने मन-मस्तिष्क में धारण करें कि मैं परमात्मा का हूं और परमात्मा मेरे हैं I श्रीमद्भागवतगीता और श्रीरामचरितमानस में उल्लेखित एक बात मस्तिष्क में धारण कर लेना उचित होगा कि भगवान् को चारों तरह के भक्त अच्छे लगते हैं, धनार्थी यानी धन चाहने वाले, आर्त अर्थात् विभिन्न तरह के सांसारिक संकटों से मुक्ति चाहने वाले, जिज्ञासु (परमात्मा को तत्व से जानने की इच्छा से भजने वाले) तथा ज्ञानी (परमात्मा को प्राप्त कर चुके) भक्त प्रिय हैं I इस तथ्य के चलते परमपिता परमेश्वर को अपना हितैषी मानते हुए, बिना संकोच के जो भी मांगना चाहें, मांग लेना चाहिए I

विद्यार्थियों के हितार्थ कुछ विशेष सूत्र

इन्दौर के प्रसिद्ध इण्टरवेंशनल कार्डियोलाजिस्ट डॉ.भारत रावत ने विद्यार्थियों के लिए सफलता के कुछ सूत्र बताएं हैं, आप भी इनका लाभ उठाएं और अन्यों को भी लाभान्वित करें I

  • स्वयं भी स्वस्थ रहें और अपने माता-पिता परिजनों को भी अपने अद्यतन ज्ञान से स्वस्थ रहना सिखाएं I
  • फास्टफूड, जंकफूड से बचें I
  • नियमित व्यायाम करें I
  • वरिष्ठों और कक्षा में अपने सीनियर्स से सीखें, उनके अनुभवों का लाभ लें I
  • उनका सम्मान करें I
  • सजने संवरने से ज्यादा जरूरी है, लक्ष्य के प्रति समर्पण I
  • सतत पढ़ाई ही सफलता का एकमात्र मार्ग है I
  • अपने लक्ष्य को पाने में आने वाली अन्य सभी रुचियों को टाइम वेस्टर मानते हुए उनके चक्कर में ना पड़ें I
  • सोश्यल मीडिया सबसे बड़ा टाइम वेस्टर है, यह याद रखें I
  • अपने मस्तिष्क का दुरुपयोग ना करें I जैसे आप देख रहे हैं, वाट्सअप और पूछने पर बताते हैं कि पढ़ रहा हूं I लक्ष्य से बहकाने, और भटकाने वाले बहाने ना बनाएं I
  • एक सूत्रीय कार्यक्रम यानी लक्ष्य भेदन I
  • आई विल डू माय बेस्ट, भाड़ में जाए रेस्ट (फ़िल्में, सोश्यल मीडिया,अन्य समय खोने वाले साधन)I
  • धैर्य ही संतुष्टी और सफलता का राज है I
  • सुखी और खुश होने के वास्तविक खिलौनों को पहचानें, लक्ष्य प्राप्ति के तमाम प्रयास और साधन ही आपके खिलौनें हैं I
  • पढ़ाई को बोझ नहीं मानें बल्कि उसे आनन्ददायी मानें यानी इन्जाय करें I
  • डू गुड, फील गुड I
  • व्यसनों से सतर्कतापूर्वक बचें I
  • All are my friends. No girl friend, No boy friend.

स्वअनुभूत कुछ सूत्र

  • सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करें I
  • एक डेढ़ घंटे पढने के बाद पांच-सात मिनट विराम दें, आँखों पर शीतल जल डालें और आंखें बन्दकर बैठ जाएँ I
  • ध्यान भटकाने वाले साधनों से बचें I
  • अनावश्यक आलस्य से बचने के लिए भरपेट भोजन करने से बचें I
  • बारम्बार प्रयास करने से कठिन से कठिन पाठ भी समझ में आने लगता है I
  • जिस पाठ को आप अच्छी तरह से समझ चुके हैं, उसे अपने किसी साथी को पढ़ाएं I

            इस सामग्री का व्यक्तिहित, समाजहित और राष्ट्रीयहित में सदुपयोग करेंगे, ऐसा प्रबल विश्वास है I  कहा जाता है कि नि:संकोच और नि:स्वार्थ संवाद केवल किशोरों और तरुणों में ही शेष रह गया है I अतएव समाजहित में संकोच कदापि ना करें, संवाद करें, यह सोचकर अन्यों से संवाद करें कि उसके भीतर भी वे हीं  परमात्मा विराजमान है, जो आपके भीतर ऊर्जा का अनुपम स्रोत बनकर परमार्थ के लिए प्रेरित कर रहे हैं I

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