पोस्ट ट्रूथ, असहिष्णुता, मीडिया और बच्चों पर संवाद

मीडिया राष्ट्रीय मीडिया कॉन्क्लेव की रिपोर्ट

संस्था विकास संवाद का ग्यारहवां वार्षिक आयोजन ओरछा में 18 से 20 अगस्त 2017 तक आयोजित हुआ। विषय रहा – ‘मीडिया, बच्चे और असहिष्णुता’। आयोजन के आधार पत्र में लिखा गया है – ‘‘आज कल मीडिया का जिक्र भी राग दरबारी के उस बहुउद्घ्रत प्रसंग की तरह हो गया है, जिसमें शिक्षा व्यवस्था की जगह अगर मीडिया को रख दें, तो उसे सड़क की कुटिया मानकर हर कोई लात जमाता चलता है। लोकतंत्र की झंडाबरदार राजनीतिक जमातों और नौकरशाही से लेकर कोई भी सड़क चलता इंसान किसी भी छोटी-मोटी बात पर मीडिया को भी गरियाता रहता है… मीडिया खुद के ‘बिक जाने,’ ‘तोड़-मरोड़कर पेश करने’ से लगाकर ‘सत्ता में सहयोगी’ तक की गालियों से नवाजा भी जाता है।’’

मीडिया संवाद के तीखे तेवर वाले इस आधार पत्र में इस बात की चिंता गंभीरता से व्यक्त की गई है कि मीडिया हाशिये पर बैठे किसानों, आदिवासियों, महिलाओं, दलितों, वंचितों जैसे तबके के बारे में गंभीरता से कवरेज नहीं करता। मीडिया की क्रूर बदहाली का शिकार बच्चे भी हो रहे है। तीन दिन के इस आयोजन में मीडिया संवाद में असहिष्णुता के संदर्भों खासकर सामाजिक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विषयों पर और असहिष्णुता की राजनीति पर खुलकर चर्चा हुई। बच्चों के संदर्भ में असहिष्णुता को लेकर मौजूदा स्थिति पर तो चर्चा की ही गई। मीडिया में बच्चों के बारे में पहचान का संकट और असहिष्णु समाज में बच्चों की स्थिति पर भी चिंतन-मनन हुआ।

वर्ष 2016 के सबसे चर्चित शब्द पोस्ट ट्रूथ को लेकर रचा जाता सत्य विषय पर भी चर्चा हुई, जिसमें मीडिया अर्थनीति अकादमी क्षेत्र और आभासी तथा वेब मीडिया में रचे जा रहे सत्य पर विचार विमर्श हुआ। असहिष्णुता के बरक्स संभावनाओं को भी टटोला गया। इसके अलावा मीडिया संवाद द्वारा संभावनाएं रचने की प्रक्रिया के अगले चरण पर भी चर्चा हुई और इस विषय का विस्तार करने की कोशिश भी की गई।

ओरछा के अमर महल होटल में आयोजित इस आयोजन की अनौपचारिक शुरूआत प्रतिभागियों के परिचय के साथ शुरू हुई। राकेश दीवान ने विषय और विकास संवाद के बारे में चर्चा की तथा ओरछा क्षेत्र के पूर्व विधायक ब्रजेन्द्र सिंह राठौर ने प्रतिभागियों का स्वागत किया। डॉ. रामप्रकाश भेंगुला ने ओरछा से परिचित कराया।

सिद्धार्थ वरदराजन : असहिष्णुता के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संदर्भ की चर्चा करते हुए पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा कि असहिष्णुता राजनीति का हिस्सा है। नेता यहां मीडिया का जमकर इस्तेमाल कर रहे है। उपराष्ट्रपति डॉ. हामिद अंसारी के कार्य मुक्त होते समय संसद में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो बयान दिया, वह इस असहिष्णुता का बड़ा उदाहरण है। मोदी ने उपराष्ट्रपति को जाते-जाते जिस तरह जलील किया, वह शर्मसार कर देने वाला था। इस देश में अगर कोई हिन्दू कहता है कि मुसलमान असुरक्षा की भावना से घिर गए है, मान लीजिए कि मैं यह बात कहूं, तो मुझे कोई देशद्रोही नहीं कहेगा, लेकिन अगर कोई मुस्लिम व्यक्ति यह कह दें कि मैं यहां असुरक्षित महसूस करता हूं, तो वह सीधा देशद्रोही हो जाता है।

सिद्धार्थ वरदराजन ने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए नरेन्द्र मोदी के एक इंटरव्यू को याद दिलाया। श्री मोदी से सवाल किया गया था कि क्या आप हिन्दू राष्ट्रवादी है? श्री मोदी का जवाब था हां, मैं हिन्दू हूूं और राष्ट्रवादी भी। अगर यहीं बात कोई मुस्लिम कहे कि मैं मुस्लिम हूं और राष्ट्रवादी हूं, तो क्या होगा? भारत के संस्कृति मंत्री हैं महेश चन्द्र शर्मा। उन्होंने एक बयान दिया था कि डॉ. एपीजे कलाम मुसलमान होते हुए भी राष्ट्रवादी थे। ऐसे बयान का क्या अर्थ निकाला जाए। इस मुद्दे पर मीडिया की भूमिका की आलोचना करते हुए श्री वरदराजन ने कहा कि देश में जहर फैलाने में मीडिया का उपयोग किया जा रहा है। असहिष्णुता पर मीडिया का रोल गलत है। मीडिया मुनाफे के लिए यह सब कर रहा है।

सिद्धार्थ वरदराजन ने लव जेहाद और गौहत्या के मुद्दों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि हरियाणा में तो 1961 से ही गौहत्या पर रोक है। फिर गौहत्या का हो-हल्ला क्यों हो रहा है? पुराने कानून को ही नए रूप में पेश किया जा रहा है। यह सबकुछ वैसा ही है, जैसा 1920 से 1930 के दौरान जर्मन मीडिया में होता था। जब उनके पास कोई खबर नहीं होती थी, तब वे कहते थे कि jews is news (यहूदी खबर हैं)। अब यहीं बात गौहत्या और असहिष्णुता को लेकर भी की जा रही है। गोरखपुर के अस्पताल में जब बच्चों की ऑक्सीजन की कमी कारण मौत हो रही थी, तब हमारा मीडिया वंदे मातरम की बात कर रहा था। यह मीडिया सेंसिबल मुसलमानों को कभी भी आगे नहीं लाता।

असहिष्णुता के मायने समझाते हुए सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा कि जब हम असहिष्णुता की बात करते है, तब इसका मतलब यह नहीं कि आम आदमी आक्रामक हो गया है। असहिष्णुता बढ़ने की बात करने का मतलब यह है कि सरकार उन लोगों के खिलाफ सख्ती नहीं बरतती, जो हिंसा को बढ़ावा देते है। देश में विविधता को नष्ट करने की कोशिश की जा रही है। हम क्या खाएं, क्या पहनेंं, कब छुट्टी मनाएं यह सब सरकार तय करना चाहती है। इमरजेंसी के दिनों में भी ऐसा ही सबकुछ होता था पर तब इमरजेंसी एलानिया थी, घोषित थी। आज जो हालात है वे इमरजेंसी के हालात तो है, लेकिन घोषित इमरजेंसी नहीं है।

अरूण त्रिपाठी : जाने-माने पत्रकार अरूण त्रिपाठी ने कार्यक्रम का संचालन करते हुए कहा कि जो सरकार मिनिमम गवर्नेंस की बात कर रही थी, वह मेक्सिमम गवर्नेंस करना चाहती है। प्रधानमंत्री श्री मोदी ने शुरू में कहा था कि यह सरकार हर जगह हस्तक्षेप करना नहीं चाहेगी, लेकिन हो इसका उल्टा रहा है।

विनोद शर्मा : पाकिस्तान में बिताए अपने पत्रकारीय कार्यकाल का हवाला देते हुए श्री विनोद शर्मा ने कहा कि असहिष्णुता का अर्थ वे बहुत अच्छी तरह महसूस करते हैं। दिसंबर 1992 में जब भारत में हालात संगीन थे, तब उन्हें लगता था कि पाकिस्तान में वे सुरक्षित नहीं रह पाएंगे।

19 अगस्त के पहले सत्र का विषय था, असहिष्णुता और बच्चे। बच्चों की मौजूदा स्थिति के बारे में नीतियों और तथ्यों पर इस सत्र में चर्चा की गई। मीडिया और असहिष्णु समाज में बच्चों की स्थिति पर भी विमर्श हुआ। संचालन दयाशंकर मिश्र ने किया।

राकेश दीवान : विषय प्रवर्तन के साथ राकेश दीवान ने इस बात पर चिंता जाहिर की कि हमारे समाज में बच्चों के लिए बहुत जगह नहीं बची है। संवेदनशीलता की कमी बेहद चिंता का मुद्दा है।

पीयूष बबेले : मीडिया में बच्चों की स्थिति और पहचान के संकट पर चर्चा करते हुए पीयूष बबेले ने अपनी पत्रकारिता के मार्मिक प्रसंग सुनाए, जिनमें बच्चे केन्द्र में थे। उन्होंने अपने घर के बच्चों से बात शुरू की और देशभर के बच्चों के संदर्भ से जोड़ा। श्री बबेले ने कहा कि हम बच्चों को व्यक्तित्वहीन मानते है। हमें यह सोचना होगा कि बच्चे भी हमारी ही तरह अपना निजी अस्तित्व रखते है।

चिन्मय मिश्र : बच्चों को समझने की कोशिश क्यों जरूरी है, यह चर्चा करते हुए चिन्मय जी ने सरकार, समाज और बाजार में बच्चों की स्थिति पर चर्चा की। बाल विवाह की चिंता करते हुए श्री मिश्र ने कहा कि भारत सरकार की नीति दोषपूर्ण है। भारत सरकार बच्चों में भी धर्म के आधार पर भेदभाव करती है। सुप्रीम कोर्ट में केन्द्र सरकार ने एक शपथ पत्र दिया और उसमें कहा है कि अगर मुस्लिम लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र में हो, तो केन्द्र सरकार को उसमें कोई आपत्ति नहीं है। हिन्दू लड़कियों की शादी 18 साल से कम की उम्र में नहीं हो सकती, तो मुस्लिम लड़कियों की शादी 15 साल की उम्र में क्यों हो सकती है। 15 साल की हिन्दू लड़की बच्ची है और 15 साल की मुस्लिम लड़की जवान? यह क्या दर्शाता है? हम बच्चों का उपयोग राजनीति के लिए कर रहे है, यह शर्मनाक है। श्री चिन्मय मिश्र ने एक उद्धरण देते हुए कहा कि महिलाएं विश्व का आखिरी उपनिवेश है।

दूसरे दिन के दूसरे सत्र में पोस्ट ट्रूथ को लेकर चर्चा हुई। किस तरह मीडिया, आर्थिक क्षेत्र, शैक्षणिक क्षेत्र, आभासी और वेबमीडिया में अपने-अपने सत्य घड़े जा रहे हैं। ये उन बातों को सच साबित करना चाहते है, जो सच्ची नहीं है। यह सभी जानते है कि सच केवल सच होता है। वह न तो अद्र्ध सत्य होता है न पूर्ण सत्य होता है। सत्य को रचा नहीं जा सकता, लेकिन आज के दौर में सत्य को रचा जा रहा है।

अरविन्द मोहन : रचा जाता सत्य पर मीडिया की भूमिका को रेखांकित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अरविन्द मोहन ने कहा कि मीडिया पोस्ट ट्रूथ राजनीति का हिस्सा है। वह लड़ाई लड़ने में लगा है और पीछे बैठे लोग उसका फायदा उठा रहे है। गांधीजी के दौर में कोई पोस्ट ट्रूथ नहीं होता था। चंपारण के दौरान गांधीजी ने अपने तरीके से देश को कम्युनिकेट किया और ब्रिटिश साम्राज्य को नष्ट कर दिया।

श्री मोहन ने फिर से सत्यमेव जयते का उद्घोष किया। झूठी खबरों के बारे में उन्होंने कहा कि यह बड़े ही ताकतवर ढंग से हो रहा है, जो सभी को प्रभावित कर रहा है। भारत में मोदी और अमेरिका में ट्रम्प ने चुनावी सर्वे को पूरी तरह गलत साबित किया। अब पोस्ट ट्रूथ के युग में यह माना जा रहा है कि सच कुछ भी नहीं है और सच को किनारे किया जा सकता है, लेकिन यह सही नहीं है।

पोस्ट ट्रूथ के बारे में सरल शब्दों में अरविन्द जी ने कहा कि यह हवा बनाना, हवा बिगाड़ना जैसे मुहावरों का ही रूप है। इसे वह मॉडर्न मीडिया इस्तेमाल कर रहा है। जो 24 घंटे का होना का दावा करते हुए भी 24 घंटे का मीडिया नहीं है। जो टीवी मीडिया पहले महाबली माना जाता था, आज पोस्ट ट्रूथ के दौर में एक उपकरण बनकर रह गया है। उसे लगता है कि खबरों की तरह चुनाव को भी मैनेज किया जा सकता है। एक पुराना अनुभव सुनाते हुए उन्होंने कहा कि वे पूर्व राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा से मिलने गए। उन दिनों श्री शर्मा के खराब स्वास्थ्य को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं थी। कहीं-कहीं तो यह भी चर्चा थी कि श्री शर्मा नहीं रहे। जब उनकी मुलाकात श्री शर्मा से हुई, तब उन्होंने खुद इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि पता नहीं कौन है, जो उनकी मौत की खबरें फैला रहा है।

समाचारों में अमेरिका के केन्द्रीयकरण और गूगल की अर्थव्यवस्था तथा राजनीति पर भी श्री अरविन्द मोहन ने चर्चा की। उन्होंने साफ-साफ कहा कि कोर्ट कचहरी और मीडिया में फर्फ है। संपादक और रिपोर्टर कोई जज या वकील नहीं है। उन्होंने टेक्नॉलॉजी के क्षेत्र में अंग्रेजी की सुप्रीमेसी की चर्चा की और कुछ ही घरानों के विश्व मीडिया पर कब्जे का जिक्र किया। नकली निष्पक्षता और नकली पक्षधरता से काम नहीं चलने वाला। गला कटाने के बाद कोई क्रांति नहीं हो सकती।

अरुण त्रिपाठी : अर्थ नीति के क्षेत्र में रचे जाते सत्य के बारे में श्री त्रिपाठी ने कहा कि हमारे देश के नीति निर्माताओं की नीतियों में लोचा है। सरकारें व्यापार कर रही है। पिंक डेली की खबरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। भ्रष्टाचार के बहाने खुलेपन की अच्छाई बताई जा रही है। हमने देश में बनियो को छुट्टा छोड़ दिया है। मोदी जी हार्वर्ड बनाम हार्ड वर्क की बात करते थे, लेकिन उन्होंने अर्थव्यवस्था को किस दिशा में हांक दिया है। इकोनॉमिक्स के लिए राज्य जनता पर जुल्म कर रहा है। पुराना विषय है कि अर्थव्यवस्था का संचालन नेता करें या अर्थ विशेषज्ञ? अब हमने अर्थव्यवस्था को नेताओं के हवाले कर दिया है। अब व्यक्ति की सनक से काम चल रहा है, जैसे नोटबंदी। पुरानी बड़ी संस्थाओं को नष्ट किया जा रहा है। इन संस्थाओं की संवैधानिक महत्ता थी। अब राज्य की शक्ति व्यक्तियों को सौंपी जा रही है और वे व्यक्ति अपनी सनक के हिसाब से कार्य करते है।

देश की अर्थव्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए श्री त्रिपाठी ने कहा कि आरबीआई, सीएजी जैसी संस्थाओं का महत्व कम किया जा रहा है। तीन साल होने के बाद भी लोकपाल बिल की कोई आहाट नहीं है। बैंकों में जमा धन की स्थिति खराब है। एनपीए बढ़ रहा है और निजी निवेश नहीं आ रहे है। जो आर्थिक फैसले तटस्थ होकर करने चाहिए थे, वे राजनैतिक हितों को देखते हुए निजी लाभ के लिए किए जा रहे है। नेताओं को करिश्माई नेता दिखाने के चक्कर में अर्थव्यवस्था की हालात बिगाड़ी जा रही है। तीन साल में अर्थव्यवस्था पवित्र नहीं हुई है, बल्कि गंगा नहलाने के चक्कर में किटाणुओं और गंदगी से बीमारी बढ़ गई है। किसानों को अर्थव्यवस्था में भटकाया जा रहा है और कार्पोरेट गवर्नेंस की कोई निगरानी नहीं है। कृषि और मेन्युफेक्चरिंग सेक्टर की बुरी हालात है। आर्थिक मार से परेशान लोग जुबान नहीं खोल रहे है। अर्थ नीति पर सम्मोहन का पर्दा पड़ा हुआ है। आर्थिक राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की चर्चा हो रही है। वैश्वीकरण का सिराजा बिखर गया है और उसे राष्ट्रवाद की चाश्नी में छिपाया जा रहा है।

प्रकाश हिन्दुस्तानी : इंटरनेट और आभासी दुनिया में सक्रिय पत्रकार और ब्लॉगर प्रकाश हिन्दुस्तानी ने अपने शोध के हिस्से की उन वेबसाइट्स और पोर्टल्स की सूची बताई और कहा कि ऐसा लगता है कि इन्हें बनाया ही दुष्प्रचार के लिए गया है। पोस्ट ट्रूथ का सबसे बड़ा वाहक इंटरनेट और सोशल मीडिया ही है। कार्पोरेट शैली में यह कार्य हो रहा है और उसके पीछे अरबों रुपए की व्यवस्था काम कर रही है। कन्हैया कुमार, आजम खान, अमित शाह आदि के उदाहरण देते हुए प्रकाश हिन्दुस्तानी ने कहा कि नेताओं ने इंटरनेट और सोशल मीडिया को पोस्ट ट्रूथ के मास मीडियम का रूप दे दिया है।

आनंद प्रधान : अकादमिक क्षेत्र में रचे जाते सत्य की चर्चा करते हुए आईआईएमसी के डॉ. आनंद प्रधान ने कहा कि पोस्ट ट्रूथ संगठित रूप से चलाया जा रहा प्रोपेगंडा हैलॉबी करने वालों ने अब अपना तरीका बदल दिया है। वे इसे बड़े ही संगठित तरीके से आगे बढ़ा रहे है। जो लोग शैक्षणिक क्षेत्र में होते है, वे म्युजिकल चेयर पर गेम खेलते लगते है। कभी वे शिक्षाविद होते है, तो कभी अर्थशास्त्री। कभी किसी मंत्रालय में सलाहकार, तो कभी नेता। आज देश में जो भ्रष्टाचार हो रहा है, वह लोगों की निगाह में सीधा आता है, लेकिन नीतियों में जो भ्रष्टाचार हो रहा है। वह आसानी से स्वीकार्य है, क्योंकि उसे समझने में लोग असमर्थ होते है। थिंग टैंक एक तरह का गिरोह होता है, जो कुछ लोगों के हितों के लिए कार्य करता है। जीएम सीड्स का उदाहरण देकर उन्होंने लॉबिंग को समझाया। यह भी कहा कि जीडीपी की जो ग्रोथ दिखाई जा रही है, वह फर्जी है। पॉलिटिशियन और मीडिया को पार्टनर इन क्राइम कहा जा सकता है।

दूसरे दिन की चर्चा का अंतिम सत्र मीडिया में असहिष्णुता के बरक्स संभावनाओं पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने अपने-अपने अनुभव सुनाएं। बढ़ती असहिष्णुता को लेकर आशा की किरण जगाने की कोशिश भी की।

सुभ्रांशु : रेडियो के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग कर रहे पत्रकार सुभ्रांशु ने वामपंथियों की असहिष्णुता की बात भी की और नए मीडिया के रूप में रेडियो की लोकप्रियता का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में बोला और सुना जाने वाला माध्यम ज्यादा लोकप्रिय होगा। साथ ही उन्होंने मोबाइल और रेडियो के समाचार संप्रेषण के क्षेत्र में उपयोग पर भी चर्चा की।

प्रकाश पुरोहित : वर्तमान राजनैतिक हालात पर चर्चा करते हुए प्रकाश पुरोहित ने अपने पत्रकारीय जीवन के दिलचस्प किस्से सुनाए। यह भी कहा कि तानाशाह खबर पर जिंदा रहता है और विचार पर मर जाता है।

सुमित अवस्थी : टीवी पत्रकार सुमित अवस्थी ने अपने दो दशकों के अनुभवों का निचोड़ रखा। उन्होंने कहा कि जो भी सरकार आती है, उसका पहला काम होता है, मीडिया को दबाना और फिर यह आरोप लगाना कि यह मीडिया तो बिकाऊ है। उन्होंने कहा कि मीडिया प्रोफेशन है और मैं इस प्रोफेशन में तनख्वाह के लिए हूं। मुझे बच्चों की फीस, मकान की ईएमआई और गाड़ी में पेट्रोल के लिए खर्च की जरूरत है। अब पत्रकारिता बदल रही है। मिशन से प्रोफेशन हो रही है।

गिरीश उपाध्याय : पत्रकार और मीडिया शिक्षण के क्षेत्र में काम कर चुके गिरीश उपाध्याय ने कहा कि आज की पीढ़ी पोस्ट ट्रूथ से उतनी परिचित नहीं है, जितनी पोस्ट पेड और प्री पेड से है। उन्होंने कहा कि असहिष्णुता का जवाब असहिष्णुता कतई नहीं है। असहिष्णुता का अर्थ किसी को खारिज करना भी नहीं है। असहिष्णुता दया, प्रेम, स्नेह, ममता आदि का हथियार नहीं है। विचार का जवाब विचार ही हो सकता है। नफरत और घृणा के बरक्स अभी भी संभावनाएं है। अपनी बात को उन्होंने इस शेर से रेखांकित किया –

‘सच घटे या बढ़े, तो सच ना रहे,

झूठ की कोई इंतेहा नहीं होती।’

आयोजन के अंतिम दिन मीडिया संवाद की प्रक्रिया के अगले चरण पर अरूण त्रिपाठी, अरविन्द मोहन और आनंद प्रधान ने चर्चाएं की। ग्यारहवें मीडिया संवाद पर विस्तार से समीक्षा और प्रतिक्रियाओं के दौर में कश्मीर सिंह उप्पल, भूपेन्द्र सिंह और सूर्यकांत पाठक सहित कई लोगों ने विचार रखें। एम. अख्लाख, संदीप नाईक, सूर्यकांत पाठक और उनके साथी मित्रों ने सांस्कृतिक संध्या में हुनर दिखाया। सचिन कुमार जैन और उनकी टीम के  लोग पर्दे के पीछे ही रहे।

वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रकाश हिन्दुस्तानी के ब्लॉग http://www.prakashhindustani.com/ से साभार

 

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