1 अक्टूबर को साँची में पोषण अभियान पर केन्द्रित अंत:पांथिक संवाद

विभिन्न पंथों के प्रधान व प्रतिनिधि शरीक होंगे

भोपाल l स्पंदन संस्थान एक दिवसीय  “अंत: पांथिक संवाद” का आयोजन कर रहा है l 1 अक्टूबर को साँची में आयोजित यह संवाद पोषण अभियान पर केन्द्रित होगा l उल्लेखनीय है कि कुपोषण मध्यप्रदेश सहित देश के अधिकाँश राज्यों में एक बड़ी चुनौती बन चुकी है l यह चुनौती समाज और सरकार दोनों के लिए है l सरकार का पोषण अभियान कुपोषण के खिलाफ एक बड़ी जंग है l इस जंग में विभिन्न सामाजिक संगठन भी सरकार को सहयोग देने के लिए आगे आये हैं l

पिछले 3 वर्षों से स्पंदन संस्थान यूनिसेफ के सहयोग से विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर पंथ-प्रतिनिधियों व पंथ प्रधानों के साथ संवाद का आयोजन करता रहा है l वर्ष 2016 में “स्वच्छता” और वर्ष 2017 में “नवजात शिशुओं की देखभाल” विषय पर अंत: पांथिक संवाद का आयोजन हुआ था l इस वर्ष भारत सरकार और राज्य शासन ने “सही पोषण, देश रोशन” का नारा दिया है l इस विषय पर विभिन्न मत-पंथों, सम्प्रदायों के वरिष्ठ महानुभावों का मार्गदर्शन और महत्वपूर्ण सन्देश समाज और समुदाय को मिले इसलिए  यह प्रयास किया जा रहा है l इस वर्ष इस आयोजन में संस्कृत विद्यामंडलम छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष स्वामी परमात्मानंद गिरी, स्वामी हनुतश्री ‘मन्नत बाबा’, भोपाल शहर काजी सैय्यद मुश्ताक़ अली नदवी, पं. रमेश शर्मा, भंते शाक्यपुत्र सागर थेरा, श्री चैतन्य सारस्वत संस्थान बेंगुलुरु के स्वामी भक्ति निष्काम संत और स्वामी विज्ञान मुनि, चित्रकूट के स्वामी बलवीर दास, भोपाल बिशप हाउस से सम्बंधित फादर साजी, ब्रह्माकुमारी प्रजापिता ईश्वरीय विश्वविद्यालय से बी.के. रीना, गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी से ज्ञानी दिलीप सिंह,यूनिसेफ के मध्यप्रदेश प्रमुख माइकल जुमा,  मध्यप्रदेश शासन के प्रमुख सचिव (महिला एवं बाल विकास) जे. एन. कंसोटिया, गुना के शहर काजी नूर उल्लाह यूसुफ़ जई , गोहद के शहर काजी हाफिज हसमत अली, ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड मध्यप्रदेश की महिला विंग अध्यक्ष नाजिया खान, गायत्री परिवार के के एन शर्मा, आर्य समाज के आचार्य भद्रपाल सिंह पुरोहित, पंडित संजय मेहता, मध्यप्रदेश अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य डा. अमरजीत सिंह भल्ला, पत्रकार गिरीश उपाध्याय, दीपक तिवारी, यूनिसेफ के संचार विशेषज्ञ अनिल गुलाटी, स्पंदन के एस.जी. हसन, संयम जैन, म.प्र. बाल आयोग की पूर्व सदस्य डा. आर. एच. लता, जमायते इस्लामीके प्रवक्ता डा. अजहर बेग, म.प्र. हज कमिटी के सदस्य सरफराज हसन तथा वर्त्तमान सदस्य बृजेश चौहान, साहित्यकार सोनाली मिश्र, लाइफ कोच अभिलाषा द्विवेदी तथा पत्रकार कात्यायनी चतुर्वेदी शामिल होंगी l
संचार, शिक्षा और जागरूकता में आप महानुभावों की महती भूमिका है l आपके सन्देश न सिर्फ समाज को शिक्षित करते हैं बल्कि उन्हें संवेदनशील भी बनाते हैं l आपके संदेशों से समाज का दृष्टिकोण और व्यवहार परिवर्तन भी होता हैl आप मजहबी और धार्मिक संदेशों के साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, नवजात देखभाल, बाल अधिकार और पोषण जैसे मुद्दों को भी गंभीरता से संप्रेषित करते रहे हैं l  आपकी बातें और आपका विचार समुदाय के साथ-साथ सम्पूर्ण समाज में सुनी और मानी जाती है l
प्रस्तावना
छह वर्ष से कम आयु के बच्चों और महिलाओं के बीच कुपोषण को कम करने के लिये सरकार ने कई योजनाएँ  लागू की हैं। इन योजनाओं के बावज़ूद देश में कुपोषण तथा संबंधित समस्याओं का स्तर अंतरर्राष्ट्रीय मानकों की तुलना में काफी अधिक है। निर्धारित लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिये योजनाओं में एक-दूसरे के साथ
ताल-मेल देखने को कम मिलता है । राष्ट्रीय पोषण मिशन (एनएनएम) सुदृढ़ व्यवस्था स्थापित करके वांछित तालमेल कायम करेगा, ताकि इस समस्या को कुछ कम किया जा सके।
भारतसरकार ने तीन वर्ष के लिये 9046.17 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान करतेहुए वित्तीय वर्ष 2017-18 से शुरू होने वाले राष्ट्रीय पोषण मिशन (National Nutrition Mission-NNM) की शुरुआत की
है। भारतने राष्ट्रीय पोषण अभियान के लिए विश्व बैंक के साथ 200 मिलियन डॉलर के ऋणपत्र पर हस्ताक्षर किए। यह धनराशि 0-6 आयु वर्ग के बच्चों में बौनेपन कोकम करने हेतु भारत सरकार के लक्ष्य (2022 तक 38.4 प्रतिशत को कम करके 25 प्रतिशत) को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करेगी।ध्यातव्य है कि प्रधानमंत्री ने 8 मार्च, 2018 को झूंझुनू, राजस्थान से पोषण अभियान को लॉन्च किया था।
 रणनीति एवं लक्ष्य
  • एनएनएमएक शीर्षस्थ निकाय के रूप में मंत्रालयों के पोषण संबंधी हस्तक्षेपों कीनिगरानी, पर्यवेक्षण, लक्ष्य निर्धारित करने तथा मार्गदर्शन का काम करेगा।
  • राष्ट्रीयपोषण मिशन का लक्ष्य ठिगनापन, अल्पपोषण, रक्ताल्पता (छोटे बच्चों, महिलाओंएवं किशोरियों में) को कम करना तथा प्रतिवर्ष अल्पवज़नी बच्चों में क्रमश: 2%, 2%, 3% तथा 2% की कमी लाना है।
क्या-क्या शामिल है?
  • कुपोषण का समाधान करने हेतु विभिन्न योजनाओं के योगदान का प्रतिचित्रण।
  • अत्यधिक मज़बूत अभिसरण तंत्र (Convergence Mechanism) प्रारंभ करना।
  • सूचना प्रौद्योगिकी आधारित वास्तविक समय (Real Time) निगरानी प्रणाली।
  • लक्ष्यों को प्राप्त करने वाले राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को प्रोत्साहित करना।
  • आईटी आधारित उपकरणों के प्रयोग के लिये आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों को प्रोत्साहित करना।
  • आंगनवाड़ी कार्यकर्त्रियों द्वारा रजिस्टरों के प्रयोग को समाप्त करना।
  • आंगनवाड़ी केंद्रों पर बच्चों का कद मापन प्रारंभ करना।
  • सामाजिक लेखा (Social Audit) परीक्षा।
उपरोक्तके अलावा लोगों को जन आंदोलन के ज़रिये पोषण पर विभिन्न गतिविधियों आदि केमाध्यम से शामिल करना, पोषण संसाधन केंद्रों की स्थापना करना इत्यादि शामिलहै।
क्या होगा प्रभाव?
  • यहकार्यक्रम लक्ष्यों के माध्यम से ठिगनेपन, अल्प पोषाहार, रक्त की कमी तथाजन्म के समय बच्चे के वज़न कम होने के स्तर में कमी के उपाय करेगा।
  • इससेबेहतर निगरानी समय पर कार्यवाही के लिये सावधानी जारी करने में तालमेलबिठाने तथा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये मंत्रालय औरराज्यों/केंद्रशासित क्षेत्रों को कार्य करने, मार्गदर्शन एवं निगरानी करनेके लिये प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • इसकार्यक्रम से 10 करोड़ से ज्यादा लोगों को लाभ पहुँचेगा। सभी राज्यों औरज़िलों को चरणबद्ध रूप से अर्थात्त 2017-18 में 315 ज़िले, वर्ष 2018-19 में 235 ज़िले तथा 2019-20 में शेष ज़िलों को शामिल किया जाएगा।
वित्तीय परिव्यय 
इसकासरकारी बजटीय समर्थन केंद्र तथा राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों के बीच 60:40%, पूर्वोत्तर क्षेत्रों तथा हिमालयी राज्यों के लिये 90:10% तथाकेंद्रशासित प्रदेशों के लिये 100% सरकारी बजटीय समर्थन होगा। तीन वर्ष कीअवधि के लिये भारत सरकार का कुल अंश 2849.54 करोड़ रुपए होगा।
 कुपोषण मुक्त भारत 2022
 ‘अल्प-पोषणसे निपटने के लिये मिशन मोड’ के तहत महिला व बाल विकास मंत्रालय ने कुपोषणसमाप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसके लिये पूरक पोषण कीगुणवत्ता में सुधार करने तथा वितरण व्यवस्था को कार्यकुशल बनाया जा रहा है।महिलाओं को 1000 कैलोरी तथा बच्चों को 600 कैलोरी उपलब्ध कराने पर कामकिया जा रहा है। अब इस मुड़े पर ध्यान दिया जाएगा कि केवल भोजन उपलब्ध करानेके बजाय ‘पोषकता से युक्त भोजन’ के ज़रिये पोषक आहार उपलब्ध कराया जाए। इसलक्ष्य को पूरा करने के लिये भोजन की पोषकता, स्तनपान के माध्यम से स्थायीसमाधान, आहार विविधीकरण, मिशन इंद्रधनुष के माध्यम से मातृ एवं शिशुस्वास्थ्य में सुधार, निगरानी को उच्चस्तरीय बनाना आदि उपायों पर ज़ोर दियाजाएगा।
 राष्ट्रीय पोषण रणनीति 
  • कुछसमय पूर्व नीति आयोग द्वारा देश में कुपोषण पर नए सिरे से ध्यान देने केलिये राष्ट्रीय पोषण रणनीति (National Nutrition Strategy) शुरू की गई।
  • यह रणनीति भारत के भविष्य के लिये है क्योंकि कुपोषण से मुक्ति पाए बिना आर्थिक विकास का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता है।
  • एकव्यापक सलाहकारी प्रक्रिया के माध्यम से पोषण के लक्ष्य को प्राप्त करनेके लिये इस रणनीति के तहत एक प्रभावी रूपरेखा तैयार की गई है।
  • कुपोषणमुक्त भारत की परिकल्पना पर आधारित इस रणनीति में कुपोषण से निपटने केउपाय करने के साथ ही बच्चों, किशोरियों और महिलाओं पर विशेष ध्यान देने कीबात कही गई है।
  • इसमेंविभिन्न तरह के कुपोषण में कमी लाने के लक्ष्य भी तय किये गये हैं औररक्ताल्पता पीड़ित महिलाओं की संख्या में भी तेज़ी से कमी लाने का लक्ष्य तयकिया गया है।
  • इसरणनीति के अंतर्गत ऐसी संरचना की परिकल्पना की गई है, जिसमें पोषण के चारसबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्वों (स्वास्थ्य सेवाएँ, भोजन, पेयजल और सफाई तथा आयएवं आजीविका) को शामिल किया गया है। ये सभी तत्त्व भारत में अल्प-पोषण कीगिरती दर को तीव्रता प्रदान करने में सहायता करते हैं|
  • नीतिआयोग ने देश-विदेश के विशेषज्ञों और संस्थानों के साथ विचार-विमर्श कर यहरणनीति बनाई है और इसको हासिल करने का रोडमैप भी सुझाया है।
  • एनएनएमएक शीर्षस्थ निकाय के रूप में मंत्रालयों के पोषण संबंधी हस्तक्षेपों कीनिगरानी, पर्यवेक्षण, लक्ष्य निर्धारित करने तथा मार्गदर्शन का काम करेगा।
  • राष्ट्रीयपोषण मिशन का लक्ष्य ठिगनापन, अल्पपोषण, रक्ताल्पता (छोटे बच्चों, महिलाओंएवं किशोरियों में) को कम करना तथा प्रतिवर्ष अल्पवज़नी बच्चों में क्रमश: 2%, 2%, 3% तथा 2% की कमी लाना है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4
इससर्वेक्षण में देश की स्वास्थ्य स्थिति के विषय में जानकारी प्रदान की गईहै। इसके अनुसार, महिलाओं और बच्चों के समग्र पोषण स्तर में गिरावट आई है।हालाँकि, समान विकास दर वाले अन्य देशों की तुलना में भारत में इस दर मेंअपेक्षाकृत कम गिरावट आई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 मेंकुपोषण सहित विभिन्न मामलों में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन सुधार की रफ्तारबहुत धीमी है। इस समस्या का समाधान करने तथा पोषण को राष्ट्रीय विकासएजेंडे के केंद्र में लाने के लिये ही नीति आयोग ने  उपरोक्त राष्ट्रीयपोषण नीति तैयार की है।
पोषण अभियान के मुख्य बिंदु
  • पोषणअभियान का मुख्य तत्त्व विश्व बैंक द्वारा सहायता वाली एकीकृत बाल विकाससेवा (आईसीडीएस) को मज़बूत करना तथा बेहतर पोषण परियोजना को देश के सभीजिलों में लागू करना है।
  • यह अभियान सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के 315 ज़िलों में चलाया जाएगा।
  • आईसीडीएस योजना के तहत स्तनपान कराने वाली महिला तथा 3 वर्ष तक के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण पोषण प्रदान किया जाता है।
  • इसपरियोजना में पोषण आधारित सभी योजनाओं को शामिल कर दिया जाएगा तथाप्रदर्शन के आधार पर राज्यों, समुदायों, स्वास्थ्य कर्मियों आदि कोप्रोत्साहन प्रदान किया जाएगा।
केंद्र सरकार अपने ‘ पोषण अभियान ’ के दूसरे चरण में 235 जिलों को शामिलकरेगी। इस अभियान का मकसद बच्चों में वृद्धि थमने की समस्या रोकना, कुपोषणपर लगाम लगाना और महिलाओं, किशोरियों एवं बच्चों में खून की कमी दूर करनाहै। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार की अध्यक्षता में पोषण अभियान के तहतभारत की पोषण चुनौतियों पर भारतीय परिषद की पहली बैठक में यह फैसला कियागया। एक बयान के मुताबिक, इस अभियान के पहले चरण में 315 जिलों को पहले हीशामिल किया जा चुका है और दूसरे चरण में 235 जिले शामिल किए जाएंगे।
बच्चों के जीवन में नित्य नई चुनौतियां आमद दे रही हैं l हालांकि यह भी सच है कि ये समस्याएं और चुनौतियां देश, काल और परिस्थिति जन्य हैं । अर्थात प्रत्येक समाज के बच्चों की कुछ समस्याएं सर्वथा भिन्न हैं ।लेकिन कई समस्याएं समान हैं, मसलन – समुचित देख-भाल न होना, गर्भावस्था से ही लैंगिक भेद-भाव, अभिभावकों की अनुचित अपेक्षाएं, परिवार और समाज की एकांगी भूमिका, बस्ते का बोझ, शिक्षण प्रक्रिया की नीरसता, असमान शिक्षण व्यवस्था, संतुलित स्वास्थ्य की व्यवस्था न होना, कुपोषण, तकनीक आधारित जीवन-शैली का विकास, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, पांथिक  और लैंगिक विषमताएं  आदि कुछ ऐसी बातें हैं जो बच्चों के जीवन को दुरूह बना रही हैं l प्रत्येक व्यक्ति और समाज अपनी अपेक्षाओं और समाज के आधार पर अपनी संतान को विकसित होते देखना चाहता है l इसके कारण अधिकांशत: बच्चों के भीतर छुपे गुणों की अनदेखी हो जाती है l बच्चे भावनात्मक, सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा से ग्रस्त हैं l
अधिकांश अभिभावक गुणवत्तापूर्ण समय की कमी के कारण बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पा रहे हैं । आर्थिक रूप से कामजोर वर्ग के बच्चे कई अन्य समस्याओं – नशा, भूख, कुपोषण, अशिक्षा, बीमारी, शोषण, बालश्रम तथा अनुचित धंधे आदि से ग्रस्त हैं । किसी भी समाज और देश का भविष्य बच्चे ही होते हैं l स्वस्थ, शिक्षित और सक्रिय बच्चे ही स्वस्थ समाज और विकसित देश के भविष्य हो सकते हैं ।
इसीलिये बच्चों के सुखद वर्तमान और गौरवशाली भविष्य के लिए समाज के विभिन्न वर्गों को संवेदनशील, जागरुक, शिक्षित, सतर्क, सावधान और सक्रिय होना आवश्यक है ।बच्चों का जीवन सुखद तभी हो सकता है, जब उनके अभिभावक सजग व जागरुक हों ।यह आवश्यक है कि समाज बच्चों के अधिकारों के प्रति न सिर्फ शिक्षित हो बल्कि संवेदनशील भी हो । लोक-कल्याणकारी राज्य में सरकारों की भूमिका होती है, लेकिन यह सीमित होती है । किसी भी समाज का सर्वांगीण विकास तभी संभव है जब सरकार पर उसकी निर्भरता कम-से-कम हो l स्वस्थ समाज के लिए समाज की सक्रियता अधिक और सरकार पर निर्भरता कम होनी जरूरी है l बच्चों का स्वास्थ, पोषण, शिक्षा, विकास व उन्नति के अवसर सरकार से अधिक समाज पर निर्भर होता है l इसीलिये समाज के विभिन्न वर्गों – अभिभावक, शिक्षक, चिकित्सक आदि के साथ प्रशासन, मीडिया के क्षेत्र में कार्यरत व्यक्तियों को भी बच्चों के प्रति जागरुक, संवेदनशील और शिक्षित होना आवश्यक है ।
केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही यूनीसेफ, जवाहर बाल भवन, बाल संरक्षण आयोग आदि विभिन्न राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियां भी बच्चों के हितों को लेकर अनेक प्रयास करती हैं l इसी सन्दर्भ में बाल दिवस का आयोजन भी किया जाता है l तमाम प्रयासों के बावजूद मध्यप्रदेश में शिशु मृत्यु की स्थिति चिंताजनक है l बच्चों में कुपोषण एक बड़ी समस्या है l दबावरहित और बोझमुक्त शिक्षा बच्चों के लिए अभी बहु-प्रतीक्षित है l बच्चों का स्वास्थ्य और सम्पूर्ण टीकाकरण आज भी एक बड़ी चुनौती है l संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर सहित यूनिसेफ द्वारा सुझाए गए बाल-अधिकारों को जानना-समझना और तदनुसार व्यवहार करने के लिए समाज को तैयार करना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है ।
बच्चों से सम्बंधित समस्याओं, चुनौतियों, अधिकारों, सामाजिक कर्तव्यों, जवाबदेही और जिम्मेदारियों तथा विभिन्न स्तरों किये जा रहे प्रयासों के प्रति जागरूकता के लिए समाज के प्रतिष्ठित, स्थापित, विशेषज्ञ व्यक्तियों द्वारा संप्रेषित सन्देशों का अपना अलग महत्त्व होता है l ये सन्देश उद्देश्य और लक्ष्य प्रेरित होते
हैं l इन सन्देश से प्रभाव पैदा होता है l यह देखा गया है कि विभिन्न सम्प्रदायों के प्रमुख, पंथ-प्रधान, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के प्रतिनिधि, कलाकार-साहित्यकार, विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के प्रवक्ता  आदि जब सामाजिक महत्त्व के मुद्दों पर उनकी बातें न सिर्फ गंभीरता से सुनी जाती हैं, बल्कि मानी भी जाती है l इसी को ध्यान में रखते हुए निरंतर यह प्रयास किया जा रहा है कि सामाजिक महत्त्व के मुद्दे धार्मिक-आध्यात्मिक, मजहबी और पांथिक व्याख्यानों-चर्चाओं के विषय भी बनें l
ईद, ईस्टर और दीपावली आदि अवसरों स्वच्छता के सम्बन्ध में पंथ-प्रधानों की अपील काफी महत्वपूर्ण और असरकारी रही है l इसी महत्त्व और असर के मद्देनज़र पंथ-प्रधानों का समूह विकसित कर इनके बीच निरंतर संवाद का प्रयास किये जाने का प्रयास है ।आप भिन्न-भिन्न मत-पंथों के महानुभाव न सिर्फ अपने समुदाय में बल्कि सम्पूर्ण समाज में महत्वपूर्व प्रभाव रखते हैं । आपकी बातें गंभीरतापूर्वक सुनी और मानी जाती हैं ।आप महानुभावों में समाज को सजग, चैतन्यशील और सक्रिय करने की क्षमता है l  आपके संदेशों में समाज की समस्याओं का समाधान होता है l  आप व्यक्ति और समाज के व्यवहार परिवर्तन में समर्थ हैं l   आप व्यक्ति, समाज, सरकार और राष्ट्र की निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं l  आप सब महानुभाव समाज से अशिक्षा, कुपोषण, अज्ञानता, अस्वच्छता, अपराध, सामाजिक कुरीतियों आदि को दूर कर सकते हैं l   सभी पंथों के प्रबुद्ध महानुभाव मिलकर समाज को बेहतरी दे सकते हैं l  आपके प्रयासों और मार्गदर्शन से समाज में नैतिक मूल्यों की स्थापना होगी l  आप संत-महात्मा किसी के दबाव में नहीं होते हैंl  इसलिए आप समाज के हित में निष्पक्ष और सामूहिक आह्वान कर सकते हैं l   समाज में आध्यात्मिकता के साथ-साथ शुचिता और सात्विकता भी आवश्यक है l यह आपके ही सकारात्मक हस्तक्षेप से संभव है l  बच्चों, महिलाओं, किशोरों के मुद्दे पर समाज अपेक्षा भरी निगाहों से आपकी ओर देख रहा है l   जब कभी व्यवस्थायें समस्याओं के समाधान और चुनौतियों का सामना करने में कमतर सिद्ध हुई हैं, तब आपकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक शक्ति ने ही समाज को समाधान दिया है l
अस्वच्छता, गरीबी, अशिक्षा आदि की ही तरह कुपोषण भी एक बड़ी चुनौती है l  सरकार के प्रयास पर्याप्त सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं l  इस मुद्दे पर आपके हस्तक्षेप की महती आवश्यकता है l  इसी सिलसिले में चर्चा और प्रभावी सन्देश के लिए यह अंत: पांथिक संवाद आयोजित है l  आपकी उपस्थिति हमारे प्रयासों को संबल और मार्गदर्शन देने वाली सिद्ध होगी l

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