जब -जब सावन आये सखी री

अन्नपूर्णा बाजपेयी ‘अंजू’
जब -जब सावन आये सखी री
जब- जब सावन आये सखी री
बचपन याद दिलाये सखी री ।
काले बादल घिर-घिर आये
मन मयूर ये नाचे गाये
अम्मा के पीछे छिप जाना
जब कड़क चंचला डरवाये
बाबुल लपक उठाये सखी री
जब-जब सावन आये सखी री ।
भैया बहना से दुलराना
ठुनक-ठुनक बातें मनवाना
तोड़कर मेंहदी की पत्तियाँ
अपनी झोली में भर लाना
जननी लाड़ लड़ाये सखी री
जब-जब सावन आये सखी री।
हाथों पर मेंहदी रचवाना
सखियों संग झूले झुलवाना
परब राखी का पावन आता
पूजा की थाली सजवाना
भैया रौब जमाये सखी री
जब -जब सावन आये सखी री ।
अब सावन बैरी बन आता
पीहर की यादें भर लाता
मां-बाबुल घर में ना दिखते
अंतस पीड़ा से भर जाता
नैना नीर बहाये सखी री ।
जब-जब सावन आये सखी री ।

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