कुर्बानी दें, हत्या न करें!

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच ने बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी न देने की अपील की हैं!!!

ज्योति देहालीवाल के ब्लॉग सा साभार .

दोस्तो, आज मैं बहुत-बहुत खुश हूं…क्योंकि ख़बर हैं ही इतनी खुशी की! मैं ही क्यों ख़बर पढ़ कर हर देशवासी खुश होगा। आरएसएस के मुस्लिम विंग राष्ट्रीय मंच ने इस साल देश में बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी न देने की अपील की हैं! मुस्लिम मंच ने कहा हैं कि बकरीद पर जानवरों को जिबह किया जाना कुर्बानी नहीं बल्कि जानवरों का कत्ल हैं। ईद-उल-अजहा से पहले ही मुस्लिम संगठनों व नेताओं ने इस्लाम धर्म को मानने वालों से सड़कों पर कुर्बानी ना देने का आग्रह किया हैं। मुस्लिम मंच पदाधिकारियों ने कहा, पेड़-पौधे और जानवर अल्लाह ने बनाए हैं, उन पर रहम करना चाहिए। मंच ने जानवरों की कुर्बानी कि तुलना तीन तलाक से कर डाली।
इस ख़बर में सबसे ज्यादा ख़ुश होने वाली बात यह हैं कि बकरीद पर जानवरों की कुर्बानी न देने की अपील स्वयं मुस्लिम संगठनों ने की हैं! हाल ही में तीन तलाक पर पाबंदी का जो फ़ैसला आया वो न्यायालय की तरफ़ से आया था। मुस्लिम धर्मगुरुओं को वे मजबुरन मानना पड़ा। जब किसी भी धर्म के ठेकेदार स्वयं आगे बढ़कर उस धर्म की कुरीति को ख़त्म करने की अपील करेंगे तो धीरे-धीरे वह कुरीति ख़त्म होगी ही। कोई भी कुरीति कानून से जितनी जल्दी ख़त्म नहीं हो सकती उतनी जल्दी वो धर्म के ठेकेदारों के अपील पर ख़त्म हो सकती हैं। हिंदू धर्म में भी कई कुरीतियां हैं जिन्हें बंद करना समय की जरुरत हैं। लेकिन जो भी इस मामले में आवाज़ उठाता हैं उसे नास्तिक कहकर खारिज किया जाता हैं। सिर्फ़ हिंदुओं की कुरीतियां ही क्यों दिखती हैं ऐसा आक्षेप लगाया जाता हैं। जितनी चर्चा हिंदू धर्म के कुरीतियों की होती हैं उतनी चर्चा मुस्लिम धर्म के कुरीतियों की नहीं होती क्योंकि दरअसल हिंदू धर्म के लोगों में शिक्षा का प्रतिशत ज्यादा होने से ये लोग सही-गलत सोच सकते हैं! अभी हाल ही में मैं ने ऋषि पंचमी पर बहनों, ऋषि पंचमी का व्रत करने से पहले जरा सोचिए…” पोस्ट लिखी थी। फेसबुक के एक ग्रृप में उस पर एक टिप्पणी आई कि आपको हिंदु धर्म में ही कुरीतियां क्यों नजर आती हैं? यदि हिम्मत हैं तो बकरीद पर लिख कर दिखाओं!
इसलिए दी जाती हैं बकरीद के दिन बकरे की कुर्बानी:
इस्लाम के मुताबिक, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अपनी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने का हुक्म दिया था। हजरत इब्राहिम को लगा कि उन्हें सबसे प्यारा तो उनका बेटा हैं इसलिए उन्होंने अपने बेटे की ही बलि देने का फ़ैसला किया। हजरत इब्राहिम को लगा कि कुर्बानी देते समय उनकी भावनाएं आडे आ सकती हैं, इसलिए उन्होंने आंखों पर पट्टी बांध ली थी। लेकिन जब कुर्बानी देने के बाद उन्होंने अपनी आंखों पर से पट्टी हटाई तो देखा कि उनका बेटा उनके सामने जिंदा खड़ा हैं और बेटे की जगह दुम्बा (सउदी में पाया जाने वाला भेड़ जैसा जानवर) पड़ा हुआ था। तभी से इस मौके पर कुर्बानी देने की प्रथा हैं।
काश, इसी तरह एक-एक करके हर कुप्रथा के लिए संबंधित धर्म के ठेकेदार स्वयं आगे आए। जैसे, आपको जानकर हैरानी होगी कि आज भी गुजरात के रुपाल गांव में आसो सूद नोम के दिन ‘वरदायिनी माता’ के मंदिर में प्रतिवर्ष ‘पल्ली उत्सव’ मनाया जाता हैं। इस उत्सव के दौरान माता जी को चढ़ावे के रुप में प्रतिवर्ष लगभग 5 लाख किलों शुद्ध देशी घी चढ़ाया जाता हैं जिसके फलस्वरुप गांव की गलियों में देशी घी की नदियां बहने लगती हैं। काश, वरदायिनी माता मंदिर के पुजारी भी मुस्लिम धर्म के धर्मगुरुओं की तरह साहसिक अपील करें…!!!
वास्तव में कुरीति, कुरीति होती हैं…चाहे धर्म कोई भी हो! अभी मुस्लिम मंच ने जानवरों की कुर्बानी न देने की सिर्फ़ अपील की हैं इसका असर कितना होगा यह समय बताएगा। कोई भी अच्छा कार्य सफल होने के लिए सबसे ज़रुरी कार्य हैं…उस कार्य को करने की शुरवात हो…! और यहीं शुरवात मुस्लिम संगठनों ने कर दी हैं। इसलिए मुझे पूरा विश्वास हैं कि धीरे-धीरे ही सही एक-न-एक दिन जानवरों का कत्ल करने की कुरीति ज़रूर ख़त्म होगी।

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