भाषा नीति: ढुलमुल छोड़ मजबूती से आगे बढ़ने की बेला

विनोद बब्बर  

भाषा जीव के मानव बनने की दिशा में प्रथम कदम कहा जा सकता है। आरंभ में संकेतों की भाषा रही होगी जो कालांतर में शब्द संवाद में परिवर्तित हुई। हर परिस्थिति परिवेश एक दूसरे से अपरिचित और भिन्न था इसलिए हर मानव समूह ने अपने ढ़ंग से कुछ शब्द संकेत बनाये। एक दूसरे से कुछ मील से हजारो मील तक की दूरी में रह रहे समूहों द्वारा विकसित किये गये इन संकेतों और शब्दों में एकरूपता का प्रश्न ही पैदा नहीं होता। अतः हर कबीले की अपनी बोली-भाषा बन गई। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि समय के साथ लगभग सभी भाषाओं बोलियों में परिवर्तन, परिष्कार भी जारी रहा क्योंकि हर द्वीप, महाद्वीप में केवल प्रकृति आपदाओं और परिवर्तनों से ही नहीं बल्कि मानव निर्मित परिस्थितियो और आविष्कारों को व्यक्त करने के लिए भी नये शब्द अथवा संकेत चाहिए थे। यह प्रक्रिया सतत जारी है लेकिन आज हमारा परस्पर सम्पर्क और संवाद बढ़ा है इसलिए एक दूसरे की भाषा का प्रभाव होना स्वाभाविक है। हर क्षेत्र, समुदाय का अपनी बोली-भाषा से अनुराग होना शुभ संकेत है। यह भाव उस क्षेत्र की विशिष्ट संस्कृति के जीवान्त रहने की गारंटी है।

भाषा को संस्कृति की संवेदन तंत्रिका भी कहा जा सकता है। क्योंकि उससे जुड़ा हर शब्द एक लंबा इतिहास अपने साथ लेकर चलता है। विभिन्न अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले शब्द, संवाद, गीत उस भाषा और उसे मानने वाले समुदाय समाज की संस्कृति के परिचायक है। यदि सांस्कृतिक भिन्नता होगी तो भाषा और उसके शब्दों और उसे अभिव्यक्त करने के ढ़ंग में भिन्नता होना अवश्यंभावी है। इसलिए हर बोली अथवा भाषा महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक विशिष्ट संस्कृति की वाहिका है। उसका संरक्षण होना ही चाहिए।

यह हमारा सौभाग्य है कि भारत अपने आप में एक अनूठा देश है जहां लगभग हर मौसम है। बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियां है तो तपते रेगिस्तान भी है। तीन तरफ महासागर है। पठार है। नदियों का जाल है। घने जंगल है। विशाल मैदान है। अर्थात् विभिन्न परिस्थितियां है। हर दो कोस पर पानी का स्वाद बदल जाता है तो बोली भाषा के उच्चारण में भी परिवर्तन देखने को मिलता है। इसीलिए यहां 1652 भाषाएं और बोलियां हैं। हालांकि 22 संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है लेकिन 100 से अधिक सक्रिय भाषाएं हैं तथा 50 से अधिक भाषाओं में निरंतर साहित्य सृजन हो रहा है।

आधुनिकता के दौर में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के लिए सम्पर्क, संवाद बढ़ा है अतः एक दूसरे की भाषा को जानने सीखने की आवश्यकता भी बढ़ी है। यह भी सत्य है कि प्रत्येक भारतीय के लिए यहां की सभी 1652 बोलियों भाषाओं को सीखना संभव नहीं है इसलिए एक सम्पर्क भाषा का होना आवश्यक है। हिंदी संघ की राजभाषा के साथ-साथ देश की संपर्क भाषा है। अनेक अवरोधों के बावजूद हिंदी अपनी सरलता, ग्रहणशीलता और जन जुड़ाव के बल पर पूरे देश में संपर्क भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी है।  यह स्मरणीय है कि संविधान निर्माण के समय हिंदी को राजभाषा घोषित करते हुए प्रथम 15 वर्ष के लिए हिंदी के साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग करने की छूट दी गई थी। इस कालावधि को बढ़ा कर हिंदी को हिंदुस्तान में ही दासी और विदेशी अंग्रेज़ी को रानी बनाया गया।

 समन्वय के लिए त्रिभाषा सूत्र सामने आया। यह सूत्र उत्तर और दक्षिण के मध्य सेतु बन सकता था लेकिन दुर्भाग्य से इसे भी राजनीति का शिकार बनाया जा रहा है। पिछले दिनों पिछले दिनों नई शिक्षा नीति का प्रारूप जारी होते ही कुछ लोग हिंदी थोपे जाने का हल्ला मचाने लगे। हालांकि तमिलनाडु के अतिरिक्त देश के किसी अन्य राज्य में इसका विरोध नहीं हुआ। चुनाव निकट होने के कारण तमिलनाडु के एक नेता की घुड़की भी भाषा के नाम पर र्ध्रुवीकरण की चाल है। उस पर सरकार  का इसपर ढुलमुल रवैया अपनाना देश के प्रत्येक भाषाप्रेमी को नाखुशगवार गुजरा। जबकि यह सर्वविदित है कि तमिलनाडु सहित पूरे दक्षिण भारत के लोग आज खुशी से कमोवेश हिंदी समझ-बोल लेते हैं। जहां तक हिंदी की बात है हिंदी स्वयं में अनेक बोलियों का सम्मुचय है। अतः सभी को हिंदी अपनी लगती है।  यह निर्विवाद सत्य है कि पूरे देश मे शासन की आधारशिला कहे जाने वाले नौकरशाह आई ए एस की परीक्षा पास करने के बाद हिंदीभाषी क्षेत्रों में नौकरी करते हैं।

दक्षिण में हिंदी के प्रसार स्वतंत्रता पूर्व से ही है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने उल्लेखनीय कार्य किया है। इधर नये दौर में नौकरियों के लिए उत्तर-दक्षिण का भेद नहीं रहा। दक्षिण के युवक बढ़ी संख्या में देशभर में अपनी प्रतिभा की छटा बिखेर रहे हैं तो इसीलिए कि उन्होंने अपनी मातृभाषा के साथ- साथ स्वयं को हिंदी से भी जोड़ा।  तमिलनाडु के विद्वान गर्व से इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि वहां हिंदी प्रशिक्षण केन्द्रो की मांग बहुत तेजी से बढ़ रही है। राजनीति माने या न माने सामान्य जन के लिए हिंदी पहले से ही राष्ट्रभाषा है। यदि केन्द्र जीएसटी और नोटबंदी की तरह मजबूती से कदम बढ़ाये  दक्षिण का सामान्यजन विरोध करने वालों को नकारने का साहस कर सकता है।

यह सर्वविदित है कि दक्षिण की सभी भाषाएं संस्कृत के बहुत निकट है। त्रिभाषा सूत्र में ‘हिंदी अथवा संस्कृत’ के विकल्प को भी आजमाया जा सकता है। इससे सभी विवाद स्वतः समाप्त हो सकते है। इसके अतिरिक्त सभी विदेशी भाषाओं को एक श्रेणी में रखते हुए स्नातक स्तर तक उनमें से केवल एक भाषा लेने की छूट होनी चाहिए। उत्तर भारत में दक्षिण की एक भाषा सीखने का नियम बनाना भाषायी सौहार्द को बल प्रदान करेगा। यदि कोई अतिरिक्त देशी-विदेशी भाषाएं सीखना चाहता है तो वह स्वयं इसकी व्यवस्था कर सकता है।

शिक्षा जीव को मानव बनाने की प्रक्रिया है जो भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करती है। शिक्षा के माध्यम से हम व्यवहारिक ज्ञान, आधुनिकतम तकनीकी दक्षता, भाषा, साहित्य, इतिहास सहित हर आवश्यक विषय की जानकारी प्राप्त करते हैं। इस तरह भाषा, शिक्षा और संस्कृति का संबंध गर्भनाल का है। कोई भी बालक सर्वप्रथम अपने परिवार और परिवेश की भाषा सीखता है। अभी उसका मस्तिष्क इतना विकसित नहीं होता कि वह एक साथ अनेक भाषायें सीख सके। इसीलिए विश्व के विशेषज्ञों का मत है कि प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही दी जानी चाहिए क्योंकि वह उसी माध्यम से सिखाये हुए को सहजता, सरलता से सीखता और याद रखता है।  एक अनजान भाषा अवोध बालक की प्रतिभा को कुंठित करती है। जनसंख्या के आंकड़े प्रमाण है कि अंग्रेजी किसी भी प्रांत अथवा समुदाय की मातृभाषा नहीं है। इस सत्य को जानने के बावजूद हम मातृभाषा अथवा मातृभूमि की भाषा की बजाय विदेशी अंग्रेजी माध्यम को प्राथमिकता दे रहे हैं। अनेक अध्ययनों ने प्रमाणित किया है कि दस कक्षा पास ऐसे अधिकांश बालक अपनी मातृभाषा पढ़ अथवा लिख नहीं पाते हैं। गिनती नहीं समझते है। आधा तीतर, आधा बटेर बने इन बालकों की इस दशा का मुख्य जिम्मेवार शिक्षा का माध्यम है। अतः सरकार को हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं को सशक्त बनाने के लिए ढुलमुल रवैया छोड़ मजबूती से आगे बढ़ना चाहिए।

विनोद बब्बर

संपर्क-   9868211911, 1vinodbabbar@gmail.com

ए-2/9ए, राष्ट्र-किंकर हस्तसाल  रोड, उत्तम नगर नई दिल्ली-110059

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