दबाव आने दीजिए..पर चलते रहिए !

रितु शर्मा

गर्मी ने अपने तीखे तेवर दिखाना शुरु कर दिए हैं. एक अलसाया पौधा सुबह की किरण से जाग चुका है.फिर साँझ ढलते- ढलते दिन भर धूप- ताप सहकर चुपचाप फिर सो जाता है अपनी झुलसी हुई पत्तियों को गिराकर, सुबह के इंतज़ार में, उस पौधे की तकलीफों को सुनने वाला भी कोई नहीं होता पास.. बस जीने का उत्साह झरता रहता है निरंतर. क्योंकि इस उत्साह का आरम्भ बहुत पहले ही हो चुका था, धरती के गर्भ में ..जब वह बीज था, सोया हुआ बंद खोल में, बूंदो के स्पर्श ने उसे जगा दिया ये कहकर की अब भोर होने को है. वह पूरी शक्ति के साथ तैयार हो गया अपने खोल से बाहर आने के लिये और धरती को तोड़कर, चट्टानों से टकराता हुआ आखिर वृक्ष बनने को फूट पड़ा. बिना इस चिंता के कि सतह के संघर्षों का कैसे सामना करेगा? कौन पोषण करेगा? कोई माली देखभाल को मिलेगा या नहीं ? पर ये क्या?! ये तो उस बीज की जिज्ञासा है ही नहीं ! ये तो मानव मन के प्रश्न हैं !

वह तो बस चल रहा है सहज, स्वाभाविक… यह चलना हमारी दॄष्टि में संघर्ष है.. क्योंकि हम विचारशील हैं और अपने- अपने दृष्टिकोण से चीजों का आँकलन करते हैं. लेकिन अपने आसपास  कितने ऐसे जीवंत उदाहरण दिखाई दे जाते हैं जहाँ कठिनाई है पर चलना नहीं रुकता. धरती पर चल रहे एक छोटे से कीड़े को भी जहाँ हवा की कई परतें दबा रही हैं, वहीं धरती का गुरुत्व भी बराबर खींचें जा रहा है. उस नाज़ुक तितली के पंख फिर भी उड़ना नहीं छोड़ते. मूक जानवर प्रसव वेदना को नितांत अकेले ही सहन करते हुए प्रकृति के नियम का पालन करते हुए सृजन में अपनी भगीदारी निभाते हैं. वेदना और पीड़ा तो सभी के लिये समान होती है, हां पर हमें तो अभिव्यक्त करना और बाँटना आता है पर वे किससे कहें?

                         हमारी समस्याये कितनी जटिल बन गयी हैं. या बना ली हैं ?! शिशु के मुख में पहली बार दाँत का उगना किसी भारी उपद्रव से कम नहीं होता, पर यह स्वाभाविक है कि नये को आने के लिये पुराने में से ही जगह करनी होगी. तब हम ये तो नही चाहेंगे न कि दाँत उगे ही न क्योंकि संतान  के मोह कई कारण पीड़ा होती है. और शिशु भी सहजता से अपने बदलाव को स्वीकार करते हुए समायोजन कर लेता है. ये हमारे दृष्टिकोण की वजह से है. न जाने कितने गुना दबावों में हम जिये चले जा रहें हैं. अगर हम जीवन के बदलावों के लिये स्वीकार्यता के साथ खड़े हैं तो हमारी सहज स्वभाविक प्रकृति हमारा रास्ता बताने को तैयार है. पर शर्त एक ही है, कि कुम्हार के हाथों में अपने आपको पूरी तरह मिटाना होगा, तो वह मिट्‍टी को कूटेगा भी और हाथ लगाकर आकार भी देगा. इसलिये जीवन में आने वाले दबाव ज़रूरी हैं, दबावों से ही हम संभलना सीखते हैं और संतुलन के साथ चलना भी. बस इन दबावों और तनाव भरी परिस्थितियों में रुककर मंथन कर अपनी खूबियों को जान लेना है. क्योंकि इस विराट सृष्टि के हम लघुत्तम जीव हैं, और सौभाग्यवश “जानने” के अधिकारी भी. पर यह “जानना”, “जागने” पर फिर वैसा “जीने” पर निर्भर है. इसलिये कठिनाई में चलना मत बंद कीजिये, बस चलते रहिये…

लेखिका बीईंग माईंडफुल” की एडिटर हैं .

8 comments

  1. पद्मेश गौतम

    चरैवेति चरैवेति

  2. Shashank dwivedi

    Bahut accha likha hua h

  3. Dr. Shyam Sunder Singh

    रितु शर्मा जी,
    सादर नमस्कार,
    मैंने आपका लेख पढ़ा तदोपरांत मैंने महसूस किया और चिंतन भी किया कि प्रकृति के शाश्वत सुख को भोगने का अधिकार स्वयं प्रकृति ने सभी जड़-चेतन को प्रदान किया है। प्रकृति की यह कृपा संभवता मनुष्यों को सहज रूप में बिना किसी शर्तों के सहज रुप में प्राप्त है। शायद यही कारण है कि स्वभावगत मनुष्य प्रकृति द्वारा प्रदान अनमोल धरोहर की कीमत नहीं समझता, परिणाम स्वरुप हर प्रकार से संपन्न होने के पश्चात भी उसे अनेक रूपों में प्राप्त प्रकृति के उपहारों का मूल्य नहीं पता है। इसी कारण उसे सर्वाधिक दुख का ज्ञान, अभाव का ज्ञान है। इसी को मनुष्य भूलवश अपनी बुद्धिमता, विवेकशीलता मान बैठा है। परिणाम स्वरुप मनुष्य प्रकृति के नियमों को ना मानते हुए, उसे अपनी सुविधा मानकर सुख की कामना करता हुआ सुख को खोजता, स्वयं का नाश कर रहा है और सुख प्रदान करने वाली प्रकृति को प्रत्येक क्षण अपने बुद्धि-विवेक के अनुसार विश्लेषित कर दुखी रहता है और अपने को अभाव से ग्रसित पाता है। जबकि देखा जाए तो उसे हर प्रकार के सुख का भंडार प्रकृति ने अपने बनाए इस खूबसूरत रचना से मनुष्य को निरंतर परिपूर्ण कर रहा है। विचारों को विराम देते हुए, मैं यहीं कहना चाहूंगा कि आपका लेख अति उत्तम है। आपने बहुत ही सरल शब्दों में मनुष्य और प्रकृति के बीच के संबंधों को सरल भाषा का प्रयोग करते हुए बताने का अथक प्रयास किया है। आप के अथक प्रयास को सराहना करता हूं और आपका हृदय से धन्यवाद करता हूं कि समय-समय पर आप के बौद्धिक लेख पढ़ने का शुभ अवसर मिलता रहेगा।
    धन्यवाद !

    • ठीक कहा है आपने। आपका हार्दिक धन्यवाद श्यामसुंदर जी।

  4. प्रभाकर पाण्डेय

    उम्दा अभिव्यक्ति।

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