पत्रकारिता में भारतीय मूल्यों की तलाश जरूर करें!

डा. अनिल सौमित्र

पत्रकारिता जनसंचार का एक प्रमुख अंग है l बृहत् हिन्दी कोश के अनुसार पत्रकार के काम या पेशा, समाचार-पत्रों के संपादन, समाचार संकलन व विवेचन करने वाली विद्या को पत्रकारिता कहा गया है l भारत में यह विधा आयातीत है l  पत्रकारिता को जर्नलिज्म का भारतीय रूपांतरण माना जाता है l  पत्रकारिता के समानार्थी पद या शब्द के तौर पर – अख़बार नवीसी, जर्नलिज्म, संपादक कर्म, संपादन आदि का उल्लेख होता है l पत्रकारिता में मिशन बनाम प्रोफेशन, आदर्श बनाम व्यवसाय, वस्तुनिष्ठता बनाम विषय या विचारनिष्ठता की बहस होती रही है l पत्रकारिता की प्रवृत्तियों, सरोकारों, निष्ठाओं, प्रतिबद्धताओं की चर्चाएँ भी होती रही हैं l भारत में पत्रकारिता को आजादी के आन्दोलन, स्वराज्य प्राप्ति के बाद और वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करने की आवश्यकता है l  इस आलेख में भारतीय पत्रकारिता को विचार और बाजार यात्रा के विशेष सन्दर्भ में देखने का प्रयास किया गया है l

वर्त्तमान पत्रकारिता आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव में है l आर्थिक उदारीकरण का सीधा मतलब है बाजार या बाजारवाद का विकास l यह बाजारवाद गत तीन-चार दशकों से भारत में तेज गति से फैला है l ग्लोबलाइजेशन जिसे हिंदी में वैश्वीकरण कहा गया है, प्रौद्योगिकी, पूंजी और प्रचार के बल सम्पूर्ण समाज को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले चुका है l इंद्र विद्यावाचस्पति के अनुसार, ‘जो पत्रकार विचारों की स्वाधीनता से प्रेम रखता है, उसे पूंजीपति, के सत्संग से बचना ही चाहिए l  पूंजीपतियों का पत्र-संचालन कोरा व्यवसाय है, उसमें आदर्शवाद की गुंजाइश नहीं l’  वर्त्तमान समय में सम्पूर्ण मीडिया व्यवसायियों और पूंजीपतियों के नियंत्रण में है l

पत्रकारिता की सरसरी पड़ताल करते हुए भी यह साफ़ और स्पष्ट दिख जाता है कि अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं  में संपादकों की औकात कम कर प्रबंध संपादक को ताकतवर बना दिया गया है l अखबारों में समाचार से ज्यादा विज्ञापन को महत्व दिया जाने लगा है l  अखबार उत्पाद हो गए हैं और पाठक ग्राहक बन गए हैं l  सामाजिक सरोकारों का स्थान व्यावसायिक हितों ने ले लिया है l  यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं है कि पत्रकारिता की दिशा बाजारोन्मुखी हो गई है l

कुछ दशकों पहले जो काम योरोप-अमेरिका के अखबारों में होता था, बहुत कुछ वैसा ही आज भारत के पत्रकारिता में धड़ल्ले से होता हुआ देखा जा सकता है l विज्ञापनों के द्वारा उपभोक्ताओं को, पाठकों को भ्रमित किये जाने का खेल बड़े पैमाने पर चल रहा है l समाचार में संवाददाता और संपादकों के विचारों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है, किन्तु सम्पादकीय आलेखों में विचारों की कमी होती जा रही है l  इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि वर्त्तमान भारतीय समाज को शिक्षित और जागरुक करने का सबसे बड़ा माध्यम पत्रकारिता ही है l  किन्तु सैक तरफ जहां पत्रकारों की तादाद बहुत तेजी से बढ़ती जा रही है, वहीं इन पत्रकारों में बौद्धिक और वैचारिक योग्यता-क्षमता में निरंतर कमी आती जा रही है l  इन पत्रकारों की प्रतिबद्धता व निष्ठा समाज से कहीं बहुत ज्यादा नियोक्ताओं (मालिकों) के प्रति होती है l  दुर्भाग्यवश अधिकाँश मालिकों की प्रतिबद्धता  पूंजी, व्यावसायिक लाभ और बाजार के लिए हो गई है l

क्या यह एक दुर्संयोग नहीं है कि अखबारों प्रसार संख्या बढ़ने के साथ ही समाज में हिंसा, अनाचार, अनैतिकता, विषमता, विद्वेष, उग्रता, असंतोष, वैमनस्य आदि की वृद्धि भी हो रही है ! समाज में नकारात्मकता का वातावरण विकसित करने में पत्रकारिता की भूमिका उल्लेखनीय है l  नो निगेटिव के नाम पर अधिकाधिक निगेटिविटी परोसी जा रही है l  अखबारों का प्रसार बढाने के लिए नित्य नए हथकंडे अपनाये जा रहे हैं l  प्रसार बढाने के मुद्दों और विषय-वस्तु की जगह  उपहार योजना का तरीका अपनाया जा रहा है l  परिणाम यह हो रहा है कि ज्यादा और सकारात्मक पठनीय सामग्री देने के बावजूद कई अखबार कमजोर आर्थिक स्थिति व प्रबंधकीय कमियों के कारण हाशिये पर हैं l  उन अखबारों का प्रसार आधिपत्य तेजी से बढ़ता जा रहा है जो असामाजिक, अमानवीय और नकारात्मक जानकारियों को कुशल प्रसार रणनीति के साथ परोसते हैं l

एक समय में अखबार भारत की आजादी के उपकरण बने l वे सामाजिक कुरीतियों-रुढियों और दोषों के निर्मूलन का माध्यम बने l  आजादी आन्दोलन के अधिकाँश सेनानियों ने पत्रकारिता को देशभक्ति और संघर्ष का माध्यम बनाया l  बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गांधी, गणेश शंकर विद्यार्थी से लेकर माधवराव सप्रे जैसे अनेक महापुरुषों ने अंग्रेजों से संघर्ष करने के लिए अखबार को, पत्रकारिता को हथियार बनाया l देश की आजादी के कई वर्षों बाद तक भी पत्रकारिता देशभक्ति, सेवा भावना, लोकतांत्रिक मूल्यों, शिक्षा और जन-जागरण का माध्यम बना रहा l इन्हीं कारणों से पत्रकारिता को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का दर्जा मिला l  लेकिन बाद के समय में टेक्नालोजी और आर्थिक उदारीकरण के प्रभाव ने पत्रकारिता चाल, चरित्र और चेहरा बदल दिया l  अत्याधुनिक मुद्रण तकनीक ने अखबारों का कलेवर तो आकर्षक बना दिया और साथ ही छपाई को भी अत्यधिक तीव्र बना दिया l लेकिन पत्रकारिता की आत्मा विचार और बौद्धिकता कुंद हो गई l  आज तो पत्रकारिता भौतिक विकास के मामले में अपने चरम पर है, किन्तु वैचारिकता, बौद्धिकता, विषय-वस्तु  के लिहाज से निम्न स्तर पर l

सर्वाधिक तेज गति से प्रसार बढाने, नंबर वन बनने के लिए कई अखबारों ने श्रेष्टता को ताक पर रख दिया है l अधिकाधिक प्रसार के लिए जनहित और नैतिक सिद्धांतों की बलि दे दी गई है l पत्रकारिता के प्रमुख स्तम्भ गणेश शंकर विद्यार्थी  ने बहुत जोर देकर बार-बार कहा कि पत्रकार की समाज के प्रति बड़ी जिम्मेदारी है l  वह जो लिखे, प्रमाण और परिणाम का विचार रखकर लिखे और अपनी गति-मति में सदैव शुद्ध और विवेकशील रहे l पैसा कमाना उसका ध्येय नहीं, लोकसेवा उसका उसका ध्येय है l  लेकिन विद्यार्थी जी के कहे का बार-बार उल्लंघन हो रहा है l पत्रकारिता के प्रेरणा पुरुष बाबूराव विष्णु पराड़कर ने कहा कि – ‘अश्लील समाचारों को महत्त्व देकर तथा दुराचरण मूलक अपराधों का चित्ताकर्षक वर्णन कर हम परमात्मा की दृष्टि में अपराधियों से भी बड़े अपराधी ठहर रहे हैं l अपराधी एकाध अपराध कर दंड पाता है और हम सारे समाज की रूचि बिगाड़कर आदर पाना चाहते हैं l’ आज की पत्रकारिता मनीषी पत्रकारों की सारी आशंकाओं, संदेहों और चेतावनियों को सच सिद्ध करने के लिए प्रयासरत है l

भारतीय दृष्टि से विचार करें तो स्पष्टत: पत्रकारिता का पतन दृष्टिगोचर हो रहा है l पतन की यह प्रवृत्ति  सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में है l अव वक्त आ गया है कि पतनशील पत्रकरिता की प्रवृत्तियों का गहन चिंतन किया जाए l  यह चिंतन पत्रकारों से अधिक बौद्धिकों, राजनीतिकों, साहित्यकारों, संस्कृतिधर्मियों से अधिक है l दरअसल चिन्तक, विचारक और महापुरुष समय रहते अपनी चिंताएं व्यक्त करते रहे हैं l लेकिन हम हैं कि उनकी परवाह नहीं करते और पतन की ओर निरंतर अग्रसर रहते हैं l  लगभग 100 साल पहले महात्मा गांधी ने ‘यंग इंडिया’ में लिखा था कि पत्रकारिता में जिस तरह सतहीपन पक्षपात, यथार्थता और बेईमानी घुस आयी है वह ईमानदार लोगों को गलत रास्ते पर ले जाती है l गांधी जी की 1920 में कही बात आज सच हो गई  लगती है l

अब कोई नहीं पूछता कि पत्रकारिता में आदर्श कौन है ? पत्रकारिता का मिशन क्या है ?  इसका स्पष्टीकरण देते हुए बहुत मिल जायेंगे कि पत्रकारिता को उद्योग का दर्जा मिल गया है, पत्रकारिता व्यवसाय-व्यापार  हो गई है l  पत्रकारिता के लिए यह भी स्वीकार्य हो गया है कि वह बाजार के समक्ष समर्पित हो गई है l  पत्रकारिता समाज का नहीं, बाजार का हिस्सा हो गई है l

आज परिस्थिति की मांग है कि पत्रकारिता का पुनरावलोकन किया जाए l पत्रकारिता धर्म का स्मरण किया जाए l पत्रकारिता के पुरखों की बात आज ज्यादा प्रासंगिक है l  पत्रकारिता को भारतीय मूल्यों के प्रति अनुगत करने की जिम्मेदारी सबसे पहले और सबसे अधिक पत्रकारों की ही है l अपनी जातीय, साम्प्रदायिक, राजनीतिक, वैचारिक और व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों के बावजूद पत्रकारिता धर्म का अनुशीलन सबसे बड़ी जिम्मेदारी है l वक्त और परिस्थितियों का तकाजा है कि पत्रकारिता के अंतर्गत समाचारों को वस्तुनिष्ट, सम्पादकीय व आलेख-फीचर को वैचारिक-बौद्धिक तथा सकारात्मक बनाया जाए l  पत्रकारिता को भारतीय, लोकतांत्रिक, मूल्यानुगत, सकारात्मक और मानवीय बनाने के अपने कर्तव्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते l  पत्रकारिता की प्रवृत्ति रचनात्मक, सकारात्मक,  एकात्म और लोक-कल्याणकारी होनी चाहिए l

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)