प्रभु राम सबके है

 – डाॅ. शशि तिवारी

मूलतः हम सब धर्म भीरु ही होते है फर्क इतना है कुछ मानते है कुछ नही मानते। लेकिन दिखाते है, लेकिन होते है, उनकी न में भी गहराई मैं हाँ ही होती है भक्त भक्ति के माध्यम से ही अध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त करता है। मनोविज्ञान जिसे दृढ़ इच्छा शक्ति अर्थात् विल पावर का नाम देता है। कुछ चीजें दिखती नहीं है पर होती है। ये अलग बात है, वह हमारी रेंज में नही आ पाती, लेकिन उसका प्रभाव जरुर प्रत्यक्ष रुप से घटित होता है फिर बात चाहे आर्शीवाद की हो, दुआओं की हो या श्राप की हो।

हमारी भारतीय संस्कृति हमेशा बड़ों का आर्शीवाद लेने की एवं सम्मान देने की बात करती है। 1980 मे जन्मी भाजपा पार्टी ने जब से प्रभु राम का सहारा लिया तब से आर्शीवाद स्वरुप दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति की है। 2 सीटों से 282 तक के शिखर पर पहुंची, 21 राज्योें में अपनी जीत का परचम भी लहराया। लेकिन, विगत दो वर्षो से उसका ग्राफ अब रुक अवनति की और जा रहा है। हाल ही में पाँच राज्यों के चुनाव में मिली हार ने अब सोचने को मजबूर कर दिया है वैसे भी देखे हमें सफलता मिलती है तो मैं” अर्थात अहंकार का उदय होता है। यह इतनी चालाकी से फलता-फूलता है कि एहसास भी नहीं होने देना बल्कि एक ही भाव जाग्रत रहता है मेरी मेहनत से हुआ वह यहीं अहंकार विनाश के मार्ग की और ले जाता है। अब जब तीन बड़े हिन्दी बेल्ट के राज्य मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ से हाथ धोना पड़ा तो माथे पर चिंता की लकीर उठना भी स्वभाविक है। ऐसे में ही तरह-तरह के भाव भी आते है मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारो, मजारे भी याद आती है। शायद कहीं से तो कोई बात बन जाए। पार्टी में घटने वाली ये अशुभ घटनाएँ कही भगवान प्रभु राम का श्राप तो नहीं। श्राप से इन्सान तो इन्सान भगवान स्वंय भी नही बच पाए फिर चाहे राजा दशरथ हो, अश्वस्थामा की हो, अहिल्या की हो, भगवान विष्णु की हो या भगवान श्री कृष्ण हो।

कभी ऐसा भी लगता है कहीं भाजपा के आधार स्तम्भ लालकृष्ण आड़वानी, मुरलीमनोंहर जोशी तथा अन्य जिन्हें कई दफा सार्वजनिक मंच पर साहेब की उपेक्षा का शिकार होना पड़ा, उनके अंदर की ये पीड़ा कही श्राप तो नहीं? हाँलाकि भाजपा ने बुजुर्गों का मार्गदर्शकों मण्डल तो बनाया लेकिन उन्हें कितना मान-सम्मान मिला ये तो उन्हीं का दिल जानता है।

कहीं भाजपा का गिरता ग्राफ सत्यनारायण की कथा के पात्र लीलावती, कलावती द्वारा भगवान को ढेर सारे आश्वासन दे पूरा न करने पर मिलने वाला दण्ड़ घटने वाली अशुभ घटनाओं का ही परिणाम तो नहीं? अब 28 वर्ष पश्चात् भी प्रभु राम के मंदिर बनाने पार्टी के संकल्प को पूरा न करने का प्रकोप तो नहीं? हद तो तब और भी हो जाती है जब प्रभु का काज न कर राम प्रभु के परम भक्त हनुमान को ही जातियों में बाँधना शुरु कर दिया जो हनुमान रावण की राज सत्ता में आग लगा सकते है तो फिर बाकी की क्या विसात?

निःसन्देह चिरंजीवीयों में रामभक्त हनुमान भी एक है! जब हिन्दु- मुस्लिम सभी राजी तो फिर अड़चन कहाँ, निःसन्देह न्यायालय, भी जन के लिए हीं है अन्याय के विरुद्व न्याय के लिए ही है। हैरत तो तब होती है जब हम राम को ही भुला देते है? अब शिव सेना ने भी भगवान की शरण ली है सन् 1992 में शिव सेना की एक अहम भूमिका रही अब उद्वव ठाकरे भी प्रभुराम से आर्शीवाद की कृपा चाह रहे है। शायद शिव सेना पार्टी भी भाजपा की तरह फलफूल जाएं भाजपा अब रामलला को भूल विकास की राह पर चल पड़ी है। लेकिन अब शायद उसको भी यह अहसास हो रहा है कि कही  राम लला नाराज तो नहीं? रामलला को 28 साल में छत तो दे नहीं पाए? अब उलट प्रभुराम की एक उंची प्रतिमा की बात करने में जुट गए। तुलसी बाबा कह गए हैं  जाको प्रभु दाऊन देई उसकी मति पहले हर लेई प्रभु राम की इतनी बड़ी प्रतिमा बिना छत के धूप ठंड़ में यू हीं खड़ी रहेगी? भोग कैसे लगेगा श्यन कैसे होगा? क्या हम पूजा अर्चना का पालन कर सकेंगे ।

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि प्रभु राम सबके है, प्रत्येक जीव के है, भगवान राम और रामभक्त हनुमान को जाति मे न बांधे। जाति अज्ञानी की होती, ज्ञानी की नहीं।

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