मोदी : जिसने अपने लिए कुछ नहीं किया, उसके लिए कुछ करने का वक्त

एक सामान्य किन्तु समझदार गृहिणी रंजना सिंह की अपील
गहन असमंजस से भरा वह समय जब यह निश्चित नहीं था कि दलाध्यक्ष बाहर आकर उद्घोषणा कर पाएँगे कि नहीं कि उक्त दल का प्रधानमंत्री उम्मीदवार वह व्यक्ति होगा जिसे पिछले 2 दशकों से मीडिया बुद्धिजीवियों और विपक्षियों ने राक्षस हत्यारा और हिटलर साबित कर रखा था(चाहे प्रदेश का प्रधान रहते उसने जो कीर्तिमान बना रखे थे, उसके आसपास पहुँचने की भी औकात पिछले कई दशकों में किसी प्रदेश प्रधान में नहीं हुई थी) विपक्ष ही क्यों,उसके अपने ही दल के साथी उसके घोर विरोध में खड़ी थी। और तब विद्रोही तेवर लिए, उतरे तमतमाए चेहरे और सूखे गले के साथ अकेले बाहर आये राजनाथ जी ने मीडिया के सामने आकर मोदीजी का हाथ उठाते अतिसीमित वाक्यों में उद्घोषणा की कि यह व्यक्ति भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होगा।
समय को भाँप पाने वाले कुछेक लोगों को छोड़ मोदीजी को प्रधानमंत्री रूप में देखने की इच्छा रखने वाले लोगों को भी उस दौर में यह विश्वास न था कि इस सेकुलड़ी देश में कम्युनल का ठप्पा लगा यह व्यक्ति सचमुच कोई जादू दिखा सकता है।135-40 से लेकर बहुत उदार लोग 190 सीट फतह तक का अन्देशा जताते थे। मैं जब भी अपने मन से पूछती तो वह मुझे ऐसी संख्या देती कि प्रकट में उसे कहने में भी मुझे हिचकिचाहट होती। लेकिन जब परिणाम आया,तो सबसे पहले मैनें अपने मस्तिष्क को दुत्कारा कि वह कितना कमजोर है जो मन की बात नहीं मान पाता।
खैर, यह इतना सबकुछ इसलिए कह गयी कि, चाहकर भी मैं उस दिन और उसके आसपास के परिघटनाओं को विस्मृत नहीं कर पाती और भारत का भला चाहने वाले उन सभी भारतीयों से मेरा विनम्र निवेदन है कि वे भी वह दिन न भूलें। वह व्यक्ति भी और उसके समर्थक भी, सदा ही स्थापित मालिकों (बुद्धिजीवी,लोकतंत्र के राजपरिवारों,वामी मीडिया तथा भारतद्रोहियों) द्वारा दुत्कारे जाते रहे हैं और आगे भी रहेंगे,,परन्तु मित्रों यह स्मरण रहे कि यही धिक्कार वह कीचड़ है जिसमें कमल खिलते हैं।यह कीचड़ न रहे तो कमल खिलेगा कैसे?
अगले कुछ दिन हतोत्साहित करने वाले एग्जिट पोलों की रेलमपेल रहेगी।लेकिन यह सदा ध्यान में रखें कि 2014 में तो मात्र सम्भावना थी कि यह व्यक्ति भारत की लुटी पिटी टूटी रीढ़ को स्वस्थ करने की दिशा में कुछ सफल होगा, परन्तु अब तो सामने प्रमाण है।स्वतंत्रता संग्राम काल के कुछ लोग जो अभी जीवित हैं,उनसे पूछकर देखिये,1947 के बाद कभी किसी काल में उन्होंने वह गर्वानुभूति पायी जो एक भारतीय होने के नाते भारत सहित दुनियाँ के किसी भी भाग में रहते वे आज अनुभूत कर पाते हैं?
बंधुओं, देश रहेगा,उसका चरित्र और स्वाभिमान रहेगा तो विकास प्रगति सब स्वतः हो जाएगी,अन्यथा एक रीढ़विहीन देश का अस्तित्व मिटते समय ही कितना लगता है। आज हमारा परम् कर्तब्य बनता है कि अपने आसपास के बुद्धिजीवियों (लोअर मिडिल क्लास तो स्वतः ही वोट डाल आता है) को वोट देने को प्रोत्साहित करें, यथासंभव उनके शंकाओं का समाधान करते पिछले वर्षों में हुए कामों/विकास की जानकारी दें और कुछ भी हो जाये स्वयं सपरिवार वोट अवश्य दें।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)