लोकप्रियता के लिए तुच्छ मानसिकता को देना होगी तिलांजिल

डा. रवीन्द्र अरजरिया

देश में चुनावी घमासान की तैयारियां जोरों पर हैं। राजनैतिक दलों से लेकर छुटभैया नेताओं तक ने अपनी रणनीति निर्धारित कर ली है। कहीं सत्ता सुख की आकांक्षा. तो कहीं चुनावी दंगल में स्वार्थ पूर्ति की जुगाड। लोकतंत्र के इस महाकुम्भ में लाभ कमाने के लिए तरह-तरह के हथकण्डे आजमाये जा रहे हैं। जातिगत समीकरणों की बाजीगरी, क्षेत्रवाद का बिगुल, लालच की मृगमारीचिका, सिद्धान्तों की दुहाई, अतीत का यशगान, प्रतिद्वंदी की आलोचना जैसे हथियारों पर धार रखी जा रही है। सामाजिक परिदृश्य को स्वार्थ की बहुरंगी आभा से आलोकित करने के प्रयास युद्धस्तर पर किये जा रहे हैं। राष्ट्रवाद का राग अलापने के नाम पर सभी दल अपनी-अपनी कूटनीतिक चालें चलने में लगे हुए हैं। विरोध करने के लिए पहचान मिली है, तो आलोचना करना ही धर्म बन गया है, भले ही वह आधारहीन हो। राहगीरों का ध्यानाकर्षित करने के लिए सडकों को बैनर, पोस्टर और होडिंग्स से पाट दिया गया है। गाडी आफिस की तरफ सडक माप रही थी और विचार अपनी गति से वर्तमान परिस्थितियों के आधार पर विश्लेषण करने में जुटे थे। तभी फोन की घंटी ने व्यवधान उत्पन्न किया। फोन पर हमारे मित्र नारायण काले जी ने खजुराहो में आयोजित होने वाले राजपूत जाति के विशाल सम्मेलन की जानकारी देते हुए आमंत्रित किया। सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पधारने वाले सांसद प्रहलाद पटेल ने भी मिलने की इच्छा प्रगट की। हमने सम्मेलन में भागीदारी करने के निवेदन को विनम्रतापूर्वक अस्वीकार करते हुए उनकी व्यक्तिगत इच्छा का सम्मान किया। आपसी मुलाकात के लिए स्थान निर्धारित हुआ नारायण काले जी का न्यू कालोनी स्थिति बंगला। निर्धारित समय पर हम पहुंच गये। मुलाकात लम्बे समय बाद हुई थी, सो अतीत की स्मृतियां ताजा होते ही संबंधों के माधुर्य ने हमें अपने आगोश में ले लिया। लोकसभा में पांच वार भागीदारी दर्ज करने वाले प्रहलाद पटेल को अटल जी की सरकार में कोयला राज्य मंत्री का दायित्व सौंपा गया था। उमा जी ने भी अपनी जनशक्ति पार्टी में उन्हें राष्ट्रीय महामंत्री मनोनीत किया था। जबलपुर विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष पद पर निर्वचित होने के बाद से सक्रिय राजनीति में कूदने वाले प्रहलाद जी, अतीत की गहराइयों में गोते पर गोते लगा रहे थे। कभी सामूहिक पारिवारिक भोज तो कभी राजनैतिक बहस में भागीदारी। मंच साझा करने के दौरान उल्लेखनीय संस्मरण तो कभी पद-यात्रा का रोमांच। सभी कुछ सजीव होने लगा। भूत को भगाना कर वर्तमान में निर्माण की आधार शिला रखते हुए हमने भविष्य को टटोलने की कोशिश की। खजुराहो के राजपूत महासम्मेलन को रेखांकित करते हुए हमने कहा कि यह जातिगत संगठन क्या भाजपा के किसी प्रकोष्ठ की उप शाखा है जिसमें आपकी भागीदारी, पार्टी के प्रवक्ता सह प्रचारक के रूप में हुई है। आत्मीयता से निकल कर व्यवसायिक परिधि पर पहुंचते ही वे गम्भीर हो गये। राजनैतिक दलों के अघोषित जातिगत प्रकोष्ठों पर बेवाक टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि राजनीति और जंग में सब जायज है, की कहावत पर कूटनीतिक चालें विकृत होने लगीं हैं। जाति में प्रभावशाली बनाने से लेकर उसे भुनाने तक के हथकण्डे सिखाये जा रहे हैं। मानसिक अपहरण से लेकर आर्थिक शोषण तक के गुरों का अविष्कार करने में दिग्गजों का मंथन, नित नये गुल खिला रहा है। इलैक्शन मैनेजमैन्ट जैसी तकनीक को आवश्यक माना जाने लगा है। यह सब सत्ता हथियाने से लेकर व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति तक ही चक्रीय परिधि में सीमित होकर रह गये हैं। दलगत और व्यक्तिगत स्वार्थों के समुच्चय को केन्द्र में रखते हुए हमने उनसे इस तरह के आयोजनों के परिणामों को विश्लेषित करने के लिए कहा। गम्भीरता की चादर कुछ और गहरा गई। माथे पर सिलवटें उभर आयीं। शब्दों का भारीपन उनके चिन्तन का आभाष करने लगा। जातिगत संगठनों की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि हर जाति के अनेक संगठन सामने आ रहे हैं। भाजपा, कांग्रेस, सपा, बसपा, कम्युनिष्ट सहित सभी राजनैतिक दलों ने विभिन्न जातियों के नेतृत्व क्षमता वाले लोगों को पूरी तरह प्रशिक्षित करके मैदान में उतारा ही नहीं है बल्कि समानान्तर जातिगत संगठन पैदा कर दिये हैं ताकि जातिगत हितों की दुहाई पर वोट बैंक में इजाफा किया जा सके। भाजपा के इस कद्दावर नेता द्वारा अपनी पार्टी को भी इस अवसरवादी चाल में शामिल करने पर हमें आश्चर्य हुआ। अनुशासन की तलवार से लहुलुहान होने का खतरा उनके सिर पर मडराता हुआ दिखा। इस संदर्भ में प्रश्न करने पर उन्होंने बेफिक्री के साथ कहा कि हम तो सत्य के सेवक है, शाश्वत के अनुयायी हैं और हैं देश के अडिग सिपाही। अपने सिद्धान्तों पर हम अडिग हैं। पार्टी की नीतियों और रीतियों ने हमें प्रभावित किया है। कहीं न कहीं हम एक से चिन्तन को धरातल देने में जुटे हैं। परन्तु व्यक्तिगत सोच पर अग्राह्य कदापि स्वीकार नहीं करता। लोकप्रियता के लिए तुच्छ मानसिकता को देना होगी तिलांजिल, समझना होगा सामाजिक हितों का व्याकरण और अनुकरण करने के लिए करना होगी आदर्श की स्थापना, तभी सफलता का परचम गगनचुम्बी हो सकेगा। चर्चा चल ही रही थी कि बंगले के नौकरों ने नारायण काले जी के पूर्व निर्देशनानुसार भोज्य पदार्थों के साथ पौष्टिक पेय के पात्र सेन्टर टेबिल पर सजाना शुरू कर दिये। पुरानी यादों से शुरू हुए मुलाकात के सफर ने राजनैतिक परिदृश्य के आन्तरिक स्वरूप का जो खाका खींचा. उसने  अनेक गम्भीर प्रश्नों को जन्म दे दिया, जिनका उत्तर पार्टी के नीति निर्धारकों के मनःस्थल को टटोले बिना सम्भव नहीं होगा। तभी काले जी ने सेन्टर टेबिल पर चलने का आग्रह किया। हमने अपनी चर्चा को विराम देते हुए आग्रह का पूर्ण सम्मान किया। फिलहाल इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Enable Google Transliteration.(To type in English, press Ctrl+g)