महिलाओं के अनुकूल कृषि मशीनीकरण की नई पहल

शुभ्रता मिश्रा

देश के कुल कृषि श्रमिकों की आबादी में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं हैं। लेकिन, खेतीबाड़ी में उपयोग होने वाले ज्यादातर औजार, उपकरण और मशीनें पुरुषों के लिए ही बनाए जाते हैं। अधिकतर उपकरण महिलाओं की कार्यक्षमता के अनुकूल नहीं होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा महिलाओं के अनुकूल उपकरण और औजार बनाए जाने की पहल से यह स्थिति बदल सकती है। विकास दर और बदलते सामाजिक-आर्थिक परिवेश जैसे कारकों को ध्यान में रखकर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि वर्ष 2020 तक कृषि में महिला श्रमिकों की भागीदारी बढ़कर 45 प्रतिशत हो सकती है, क्योंकि ज्यादातर पुरुष खेती के कामों को छोड़कर शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। ऐसे में भविष्य में महिलाएं ही कृषि में प्रमुख भूमिका निभाएंगी।

शोध पत्रिका करंट साइंस में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन में महिला श्रमिकों की कार्यक्षमता के आधार पर तैयार किए गए आधुनिक कृषि औजारों और उपकरणों के बारे में विस्तार से जानकारी भी दी गई है, जिनका उपयोग महिलाएं सरलता और सहजता से कर सकती हैं। इस अध्ययन में महिलाओं के लिए बनाए जाने वाले इन कृषि उपकरणों का डिजाइन तैयार करने के लिए शरीर के 79 आयामों की पहचान की गई है। काम करते समय शरीर की विभिन्न प्रमुख मुद्राओं, जैसे- खड़े होकर, बैठकर, झुककर आदि को दृष्टिगत रखते हुए कुल सोलह शक्ति मानकों का उपयोग कृषि मशीनरी डिजाइन करने में किया गया है। इनमें विशेष रूप से ध्यान रखा गया है कि उपकरण के उपयोग में उसे धक्का देना है या खींचना है और शरीर की मुद्रा विशेष में उपकरण के प्रयोग के समय हाथ की पकड़ और पैर की ताकत कितनी लग सकती है। इसके अलावा महिला श्रमिकों की ऊंचाई और वजन, कार्य करते समय अधिकतम ऑक्सीजन खपत दर, हृदय गति की दर, मांसपेशीय स्थैतिक क्षमता, हाथ की चौड़ाई, उंगलियों के व्यास, बैठकर काम करने की ऊंचाई और कमर की चौड़ाई जैसे आयामों को भी ध्यान में रखा गया है।

इन आयामों और महिलाओं की शारिरिक क्षमता के आधार पर पुराने प्रचलित कृषि उपकरणों को संशोधित करके कई नए उपकरण बनाए गए हैं। इनमें बीज उपचार ड्रम, हस्त रिजर, उर्वरक ब्राडकास्टर, हस्त चालित बीज ड्रिल, नवीन डिबलर, रोटरी डिबलर, तीन पंक्तियों वाला चावल ट्रांसप्लांटर, चार पंक्तियों वाला धान ड्रम सीडर, व्हील हो, कोनो-वीडर, संशोधित हंसिया, मूंगफली स्ट्रिपर, पैरों द्वारा संचालित धान थ्रैशर, धान विनोवर, ट्यूबलर मक्का शेलर, रोटरी मक्का शेलर, टांगने वाला ग्रेन क्लीनर, बैठकर प्रयोग करने वाला मूंगफली डिकोरटिकेटर, फल हार्वेस्टर, कपास स्टॉक पुलर और नारियल डीहस्कर प्रमुख हैं।

शोधकर्ताओं के अनुसार, भारतीय महिला कृषि श्रमिकों की औसत ऊंचाई आमतौर पर 151.5 सेंटीमीटर और औसत वजन 46.3 किलोग्राम होता है। खेती के कामों में भार उठाने संबंधी काम बहुत होते हैं। वर्ष 2004 में अर्गोनॉमिक्स जर्नल में छपे एक शोध में आईआईटी-मुम्बई के वैज्ञानिकों के एक अनुसंधान के अनुसार भारतीय वयस्क महिला श्रमिकों को 15 किलोग्राम (अपने भार का लगभग 40 प्रतिशत) से अधिक भार नहीं उठाना चाहिए।

केन्द्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल से जुड़े प्रमुख अध्ययनकर्ता डॉ सी.आर. मेहता ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “पिछले कुछ वर्षों में महिला कृषि श्रमिकों की उच्च भागीदारी और कृषि प्रौद्योगिकियों के बदलते परिदृश्य में महिलाओं के अनुकूल औजारों, उपकरणों के साथ-साथ कार्यस्थलों के विकास पर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है। अब ऐसे उपकरण तैयार किए गए हैं, जिससे महिलाएं भी आधुनिक कृषि तकनीक का लाभ उठा सकें।”

डॉ मेहता के अनुसार, इन उपकरणों के उचित और सुरक्षित संचालन हेतु महिला श्रमिकों को जागरूक और प्रशिक्षित करना, निर्माताओं तथा उद्यमियों को इन कृषि औजार बनाने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें उपयोगकर्ताओं द्वारा खरीद के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध कराया जाना जरूरी है। उपकरण खरीदने के लिए बैंकों तथा अन्य संगठनों से ऋण प्राप्त करने के लिए महिलाओं की सहायता भी आवश्यक है।

केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान, भोपाल के ही एक अन्य वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉ. गीते के अनुसार श्रम उत्पादकता बढ़ाने और महिला श्रमिकों के कठोर परिश्रम को कम करने के लिए बेहतर प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकार के विभाग, अनुसंधान और विकास संस्थान तथा गैर सरकारी संगठनों को आगे आना चाहिए। उन्हें कृषि महिलाओं को प्रौद्योगिकियों के प्रभावी हस्तांतरण के लिए महिला कर्मचारियों की भर्ती भी करनी चाहिए। राज्य कृषि विभागों को इस गतिविधि में मुख्य भूमिका निभानी होगी, क्योंकि उनके पास ग्रामीण स्तर पर कार्यकर्ता होते हैं।

इस संबंध में मध्यप्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर में कार्यरत ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी उदय अग्निहोत्री ने इंडिया साइंस वायर को बताया कि “इस तरह के उपकरणों का प्रचलन तेजी से गांवों में बढ़ रहा है। हालांकि, पहले से पुराने औजारों का इस्तेमाल कर रही महिलाओं को आधुनिक उपकरणों से काम करने में शुरू में हिचकिचाहट होती है, पर धीरे-धीरे प्रशिक्षण के माध्यम से उन्हें इन औजारों का उपयोग आसान लगने लगता है।”

मध्यप्रदेश के सतना जिले के किसान लक्ष्मीनारायण मिश्र के अनुसार, परिवार में खेतों के बंटवारे के कारण जोतों का आकार छोटा हो रहा है। इस कारण व्यावहारिक और आर्थिक दृष्टिकोण से बड़े कृषि उपकरणों और मशीनरी का उपयोग लाभदायक साबित नहीं हो पाता। पुरुषों के अन्य व्यवसायों में संलग्न होने से भी गांवों में ज्यादातर महिलाएं ही खेती के काम करती हैं। महिला कृषकों के अनुकूल छोटे-छोटे कृषि उपकरण तैयार होना एक अच्छा कदम है, इससे उनको काम करने में आसानी होगी, उनकी भागीदारी बढ़ेगी और उनकी कार्यक्षमताओं का पूरा उपयोग हो सकेगा। (इंडिया साइंस वायर)

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