नोटबन्दी का सकारात्मक परिणाम

मुनिशंकर पाण्डेय

नोटबन्दी से भारतीयों खर्च और निवेश की प्रवृत्ति में संरचनात्मक बदलाव आया है।

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8 नवम्बर, 2017 को जब नोटबन्दी का एक साल होने को है तो फिर ये प्रश्न जायज ही लगता है कि नोटबन्दी से क्या हासिल हुआ ? पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी का फैसला लागू किया था तब भारत में कुछ दिनों तक नगदी को लेकर अफरातफरी का माहौल था। लेकिन विश्व की तमाम वित्तीय संस्थाओं विश्वबैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), जेपी मार्गन, गोल्डमैनसैक इत्यादि ने ये माना था कि नोटबन्दी भारत सरकार का कालाधन और भ्रष्टाचार से लड़ाई में अब तक किसी भी देश की सरकार का बड़ा और सकारात्मक कदम है। इतना ही नहीं लगभग सभी अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत रहे कि भारत में काले धन की समानान्तर व्यवस्था पर ये सबसे गहरी चोट थी क्योकि विश्वबैंक की 2010 के रिपोर्ट के मुताबिक भारत की जीडीपी का 23.2 प्रतिशत समानान्तर अर्थव्यवस्था थी, जिसका अपना पूरा विकसित तन्त्र था। अमेरिका में ऐसे ही तन्त्र को समाप्त करने के लिए तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन ने 1969 में विमुद्रीकरण लागू किया था जो दीर्घकालिक रुप से अमेरिका के लिए लाभप्रद रहा। हालाकि ये देखा गया है कि अर्थशास्त्र कभी भी चाबुक के नोक पर नहीं चलते वर्ना सैनिक शासन वाले देशों का आर्थिक अतीत स्वर्णिम होता किन्तु ऐसा इतिहास नहीं है। वैश्विक दृष्टि से केवल अमेरिका (1969 ई.) और आस्ट्रेलिया (1996 ई.)  का विमुद्रीकरण ही सफल रहा है और घाना, नार्थ कोरिया, म्यांमार, नाइजीरिया एंव जिम्बाब्वे में विमुद्रीकरण असफल रहा है।

भारत के विमुद्रीकरण (नोटबन्दी) की बात करे तो नोटबन्दी के बाद तमाम आर्थिक आकडें ये दर्शाते है कि भारत की विकास दर में गिरावट आयी है ,जो एक से दो प्रतिशत की है।  भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में कमी आना भी स्वाभाविक था क्योकि नोटबन्दी ने समानान्तर अर्थव्यवस्था को नेस्तानाबूत किया था। किन्तु जैसा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के आधारभूत ढाँचे मजबूत है और आन्तरिक माँग के कारण जल्द ही साफ सुथरी अर्थव्यवस्था फिर से दिखने लगेगी। पिछले सप्ताह आये अगस्त के आईआईपी (आधारभूत उद्योगों) के आकडें पिछले नौ महीने के उच्चस्तर 4.3 प्रतिशत पहुच गये साथ ही खुदरा महंगाई 3.38 फीसदी पर बने रहना ये दर्शाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अपने रुप में फिर से लौट रही है, जो पहले से अधिक स्वच्छ और निवेशको को आकर्षित करने वाली है।

हाल ही में अर्थशास्त्र के नोबल से सम्मानित रिचर्ड थेलर ने नोटबन्दी की तारीफ की थी और एक वर्ष बाद हम भारतीयों विशेषकर युवाओं के आर्थिक व्यवहार को आकड़ो की नज़र से देखते है तो रिचर्ड थेलर की नज थ्योरी सफल होती दिख रही है। जैसे कि इस वित्त वर्ष में टैक्स रिटर्न दाखिल करने वालो की संख्या में 23 प्रतिशत का उछाल आया है जो अब तक के इतिहास में किसी भी वित्तीय वर्ष का सर्वाधिक है। हालाकि नज थ्योरी कहती है कि छोटे सुझावों और उसे मजबूत करने वाले सकारात्मक कदम उठाकर ग्राहक का व्यवहार प्रभावित किया जा सकता है। यही नज थ्योरी को भारत में हो रहे बडें आर्थिक बदलाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाय साथ ही कर अदा करने की प्रवृत्ति को सकारात्मक माना जाय तो विश्व में इस तरह का सामूहिक आर्थिक व्यवहार परिवर्तन का यह अनूठा उदाहरण है। इसी तरह नोटबन्दी के बाद भारत में सामूहिक रुप से सबसे कम समय में आनलाइन ट्रान्जेक्शन को अपनाना भी नोटबन्दी की सफलता पर एक मोहर है, जो डीजिटल लेन-देन वित्तीय वर्ष 2013-14 में 254.5 करोड़ था वह 2016-17 में लगभग तीन गुना बढ़ते हुए 865.9 करोड़ हो गया। एनपीसीआई का अनुमान है कि भारत में डीजिटल कारोबार 2020 ई. 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष औसतन की दर से विकास करेगा।  कैपजेमिनी और बीएनपी परिबा द्वारा संयुक्त रूप से तैयार कराई गई विश्व भुगतान रिपोर्ट 2017 के अनुसार डिजिटल भुगतान के मामले में भारत दुनिया के शीर्ष दस बाजारों में शामिल होने की क्षमता रखता है। यह नोटबन्दी के कारण आये एक बड़े बदलाव का सूचक है।

एक और परिवर्तन की बात करें तो नोटबन्दी से पहले भारतीय ज्यादातर बचत और निवेश नगदी या भौतिक स्थूल संसाधनो में जैसे कि सोना, जमीन, मकान इत्यादि में करते है जो कि अर्थव्यवस्था के दृष्टि से बेहतर नहीं होता। नोटबन्दी के बाद भारतीय विशेषकर युवा और प्रौढ़ लोगों के निवेश की प्रवृत्ति में बदलाव आया है जो लगातार प्रसार पारहे शेयर बाजार, म्यूचुल फण्ड, बाण्डमार्केट  के रुप में देखा जा सकता है। इनमें निवेश का बढ़ना ना केवल अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है अपितु ये बदलाव दीर्घकालीक रुप से बड़े पैमाने पर आर्थिक गतिविधियों के सृजन का कारक बनेगा।

हालाकि इससे कोई इनकार नहीं करता कि नोटबन्दी एक कड़वी गोली रही जिसे भारत की जनता ने सरकार के इकबाल को बढ़ाते हुए आसानी से इसलिए पचाया कि उनका भविष्य भ्रष्टाचार रहित हो। इसलिए अब यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि भ्रष्टाचार के हर रास्ते को हमेशा के लिए बन्द कर दिया जाय। शायद इसीलिए दूरदर्शी बाबा भीमराव अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक “प्राब्लम आफ इण्डियन रुपीज(1923 ई.)” में ये कहा था कि प्रत्येक दस वर्ष पर रुपये का विमुद्रीकरण किया जाना चाहिये।

प्रोग्राम डायरेक्टर, सेण्टर फार इकोनोमिक पालिसी रिसर्च, चंडीगढ़

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