कामकाजी महिलाओं की समस्याएं समाधान और विकल्प

अन्नपूर्णा वाजपेयी
बदलते वक्त ने महिलाओं को आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है और उनकी हैसियत एवं सम्मान में वृद्धि हुई है. इसके बावजूद अगर कुछ नहीं बदला तो वह है महिलाओं की घरेलू जि़म्मेदारी. खाना बनाना और बच्चों की देखभाल अभी भी महिलाओं का ही काम माना जाता है. यानी अब महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है. घरेलू महिलाओं की तुलना में कामकाजी महिलाओं पर काम का बोझ ज्यादा है. इन महिलाओं को अपने कार्यक्षेत्र और घर, दोनों को संभालने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है. घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बिठाने में हुई दिक्कत के बाद नौकरी छोड़ने वाली कल्पना कहती हैं, “8 घंटे ऑफिस में, 3 घंटे ट्रेन-ऑटो में धक्के खाने के बाद या कुछ महिलाएं तो निजी वाहन भी चलाती है उसकी टेंशन अलग होती है फिर इसके बाद घर के कामकाज के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल होता है।
रोजगार के हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों का वर्चस्व तोड़ रही हैं. खासकर व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त महिलाओं के काम का दायरा बहुत बढ़ा है. लेकिन कामयाबी के बावजूद परिवार से जो सहयोग उन्हें मिलना चाहिए, वह नहीं मिल रहा है.
आज के दौर में महिलाएं शिक्षा, पत्रकारिता, कानून, चिकित्सा या इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाएं दे रही हैं. पुलिस और सेना में भी वे जिम्मेदारी निभा रही रही है.  पर ज्यादातर महिलाओं को पेशेवर जिम्मेदारियों के साथ ही घर की जि़म्मेदारी भी उठानी पड़ती है. जिसका उनके स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ता है।
घर और ऑफिस के बीच सामंजस्य बिठाने में होने वाली दिक्कतों के मध्य अक्सर महिलाओं को उनसे नौकरी छोड़ने की अपेक्षा रखी जाती है। जो कहीं न कहीं उन्हें गहरे अवसाद में धकेलता है । सर्वे के मुताबिक 40 प्रतिशत महिलाएं अपने बच्चों को पालने के लिए यह फैसला लेती हैं. प्रोफेसर अर्चना सिंह कहती हैं कि कामकाजी महिलाओं की स्थिति ‘दो नावों में सवार’ व्यक्ति के समान होती है क्योंकि एक ओर उसे ‘ऑक्यूपेशनल स्ट्रेस’ या कामकाज का तनाव झेलना पड़ता है तो दूसरी ओर उसे घरेलू मोर्चे पर भी परिवार को खुश रखने की जिम्मेदारी का निभानी पड़ती है।
स्वास्थ विशेषज्ञों के अनुसार ऑफिस और घर संभालने की दोहरी जिम्मेदारी के कारण तनाव बढ़ता है और बीमारियां पैदा होती हैं।
डॉ. रमा कहती हैं कि अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के चक्कर में महिलाएं अक्सर अपनी सेहत को नजरअंदाज करती है. एसोचैम के सर्वे के अनुसार 78 फीसदी कामकाजी महिलाओं को कोई ना कोई लाइफस्टाइल डिसॉर्डर है। 42 फीसदी को पीठदर्द, मोटापा, अवसाद, मधुमेह, उच्च रक्तचाप की शिकायत है। इसी सर्वे के अनुसार कामकाजी महिलाओं में दिल की बीमारी का जोखिम भी तेजी से बढ़ रहा है. 60 प्रतिशत महिलाओं को 35 साल की उम्र तक दिल की बीमारी होने का खतरा है। 32 से 58 वर्ष उम्र की महिलाओं के बीच हुए इस सर्वे के अनुसार 83 प्रतिशत महिलाएं किसी तरह का व्यायाम नहीं करती और 57 फीसदी महिलाएं खाने में फल-सब्जी का कम उपयोग करती हैं। जिससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है ।
समाधान
आज के युग मे ये तो तय है कि महिलाएं काम करेंगी ही। किन्तु बिना स्ट्रेस के रहने के लिए कुछ उपाय किये जाने चाहिए जिनसे वे सफलता पूर्वक और दुगनी शक्ति से काम करेगी ।
 1- अपनी पर्सनल व प्रोफेशनल लाइफ को एक-दूसरे में अतिव्यापित न होने दें।
2-यह सच है कि एक ही समय में एक व्यक्ति दो जगह नहीं रह सकता है। मैं तो यह मानती हूँ कि महिला सब कुछ कर सकती है बशर्ते वो टाइम मैनेजमेंट को अपनाए।  टाइम मैनेजमेंट’ स‍ीखकर आप हर कार्य में सफल हो सकते हैं।
3-दृढ़ इच्छाशक्ति, समय प्रबंधन व लगन से हर असंभव कार्य संभव हो जाता है।
4- – अपने पति व परिवार का विश्वास जीतकर महिला जीवन की हर जंग में सफल हो सकती है। इसे भी आजमायें ।
5- समयाभाव में हर छोटे बड़े काम खुद ही करने या टेंशन लेने की बजाय घर के अन्य लोगों से मदद लें। यदि आप मेड भी लगाती हैं तो उसके नखरे भी उठाने होंगे । उसको भी समय प्रबंधन सिखा दीजिये ताकि आप दोनों को आसानी रहे ।
6- शान्त रहें , हर काम समय से होता चलेगा । बस उन कामों को लिस्ट का रूप दें और प्राथमिकता  के आधार पर सभी कार्य करें ।
नौकरी , व्यवसाय या कुछ भी करना यदि आपने चुना है तो याद रखिये चुनौतियाँ तो आएँगी ही । उसका सामना भी आपको ही करना होगा । इसका कोई विकल्प नही है। सिवाय इसके कि आप हार कर काम छोड़ दें ।

One comment

  1. अन्नपूर्णा बाजपेयी

    धन्यवाद !

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