नदी – एक व्यथा

श्वेता रानी

सुबह से ही गली में काफी चहल-पहल हो रही है l नगरपालिका अतिक्रमण हटाने के काम पर लगी हैए तो कहीं मैं भी उसे अतिक्रमण ना
दिखूं l मैं कुछ बोल नहीं सकती और मेरी दुर्दशा की वजह से लोग मुझे पहचान नहीं पाते हैं l पिछले शाम की बात हैए कुछ नवांकुर मेरी देहरी (किनारे) से होकर गुजर रहे थे, सभी अपने नाक पर कपड़ा रखे, मुंह सिकोड़ कर जल्दी से निकल गए l मैंने खुद को कई बार सूंघा  भी एक्या मुझसे इतनी अत्याधिक बदबू आ रही है कि लोग मेरे पास आने से भी कतरा रहे हैं l ये महज कल की बात नहीं है, ऐसे दृश्यों का सामना तो मैं रोज ही करती हूँ l अभी कुछ दिन पहले की ही बात है, किसी अच्छे घराने से कुछ बच्चे आये थे l नवांकुरों को देखकर मैं बहुत खुश हुई l मेरा रोम-रोम आह्लादित हो गया l लेकिन मेरी सारी ख़ुशी उस वक़्त ही फुस्स हो गयी, जब मैं उनके वार्तालाप को थोड़े ध्यान से सुनी l उन बच्चों में से एक ने कहा, ”दिस पोंड इज सो डर्टी ” ,  दूसरे बच्चे ने ये कहकर पहले को चुप करवा दिया किए ‘ये तालाब नहीं हैं l आई थिंक इट इज सम काइंड ऑफ़ ड्रेनेजश् और मैं उनको अपना परिचय दे पाती, अपने बारे में कुछ बता पाती, इससे पहले ही तीसरा बच्चा बोल उठाए ‘ओ प्लीज़ ए व्हाट एवर इट इज,आय नेवर सॉ सच अ वर्स्ट डर्टी वाटर बॉडी इन माय लाइफ, लेट्स गो फ्रॉम हियर ,  और फिर वो बच्चे किसी विद्यालय के वाहन से वापिस कहीं चले गये , उनके जाने के उपरांत मैं कई बार खुद को अपने ही जल प्रतिविम्ब में अपने रूप को निहारने की विफल कोशिश की ,  मेरे जलीय सतह पर इतनी गंदगी थी कि मैं खुद को भी नहीं देख पा रही थी, और मैं घंटों यही सोचती रही कि, ‘क्या मैं इतनी गन्दी हो गयी हूँ कि नवांकुर मुझे पहचान नहीं पा रहे, साथ में मैं यह भी सोचने पर विवश थी कि मुझे इस गर्त तक पहुँचाने में योगदान किसका रहा है l  किन्तु फिर मैंने खुद को ये सोच कर सांत्वना दी कि हो सकता है बच्चों के पाठ्यक्रम में अभी नदी वाला पाठ आया ही नहीं होगा, नहीं तो वो मुझे अवश्य ही पहचान लेते l मेरी धाराएं शांत हो गयी l तभी मेरी गोद में उछल कूद करती एक मछली ने अनायास ही मुझे ध्यानाकर्षित कर लिया l  वो छोटी-सी मछली बहुत खुश थी और उस नन्हे से जीव को खुश देखकर मेरे चेहरे पर संतोषप्रद रेखाएं थी कि चलो मेरे पास आकर कोई तो खुश है l
मेरे देहरी पर पड़े अखबार के टुकड़ों से पता चला कि मानव जाति पर जल संकट गहराया हुआ है स प्रधानमंत्री ने लोगों से जल संरक्षण का आह्वान किया है स साथ ही हर शहर के आला.अफसरों को इस मुहीम के लिए खासकर प्रशिक्षित भी किया गया है स ताकि वो लोगों को जागरूक कर सके स उस अखबार में सबसे ध्यानाकर्षित बात यह थी किएइस मुहीम के तहत देश की कई नदियों की सफाई भी होनी है स मैं मन ही मन खुश हुई कि चलो देर से ही सहीएमैं वापिस अपने अस्तित्व को पा लुंगी स और तभी मेरी नजर अख़बार की तारीख पर गयी और मेरे सतह पर गंदगी और मन का अँधेरा और भी घना हो गया स वो करीबन एक साल पुरानी खबर थी एमैंने भी रूष्ट होकर अख़बार को खुद से दूर फेंक दिया स और अपनी ही गहराई में अपने टूटे.बिखरे भावनाओं को समेटने की कोशिश करने लगी l

सूर्यास्त हो चला था l  नभचर भी अपने-अपने बसेरे की ओर प्रस्थान कर चुके थे l रोज की तरह मुनिया गौरैया, रोज़ी मछली से दुआ सलाम के लिए आज भी मेरे जलीय सतह की ओर निहारे जा रही थी l किन्तु कचड़े की परत इतनी ज्यादा है कि रोज़ी मछली, मुनिया गौरैया को ना देख पाती है और ना हीं मुनिया रोज़ी से मिल पाती है l मै दूर बैठकर हर दिन इन दोनों के मन को महसूस करती हूँ और मन-मसोस कर रह जाती हूँ कि मै जो अपना मार्ग स्वयं बनाती थी वो आज निरीह बैठी है l इस समाज ने मुझे मेरे ही समाज से विरक्त कर दिया है l पूर्णमासी की रात है l तारों की पूरी बारात आयी हैं l आसमान में चाँद तारे नाच गा रहे हैं l  हमारी हालात पर हंस भी रहे होंगे l वो भी क्या दिन थे जब  मैं अपने स्वच्छ जल के साथ निर्विघ्न घूमती थी l  कई बार तो हमने पवनदेव को भी शीतलता प्रदान की है l सूर्यास्त के उपरांत मेरी सतह पर जब तारों की जगमगाती रौशनी पड़ती किसी मदमस्त जुगनू से कम नहीं लगती थी मैं l मैं और गगन घंटों एक दूसरे को निहारा करते थे l एक आज का वक़्त है! मेरी हालत ऐसी है कि वो तारे अब मुझे पहचानते तक नहीं हैं l पहचाने भी तो कैसे ? पहचान भी तो धूमिल हो चुकी है l अब तो दवाई कारखाने के दूषित जल की नलिका भी मुझसे होकर ही गुजरती है l नलिका ने बताया कि जिस अस्पताल से वो आयी है उसके बगल वाले आलिशान होटल की छत पर उसने तारों को मंडराते हुए देखा है l मैंने उससे कहा भी कि उसे कोई ग़लतफ़हमी हुई होगी और साथ में अफवाह ना उड़ाने की नसीहत दे डाली l तभी अचानक एक तेज़ वेग आया और कचड़ों का अम्बार फिर से मेरे ऊपर लद गया l किन्तु आज मुझे बदबू नहीं आ रही और ना ही गुस्सा l बस नलिका की बातों से दिल में एक टीस-सी उठी है कि गगन तो मेरे अलावा किसी और के बारें में सोंच ही नहीं सकता l तो वो उस आलिशान होटल के ऊपर तारों के साथ क्यूँ गया होगा स कारखाने के कचडों को बहा कर करीबन साढ़े पाँच किलोमीटर ले आयी हूँ मैं,  किन्तु चेहरे पर एक शिकन तक नहीं हैं l बस दिल में उहापोह थी कि नलिका ने जो भी कहा क्या वो सही है l और अगर सही है तो मैं देखना चाहूँगी कि आखिर कौन है वो जिसमें मेरा स्थान लेने का सामर्थ्य है, और मैं पूरी रात कचडों को किनारा लगाती रही l
सूर्योदय हो गया l  दिन चढ़ आया था l मैं फिर से थम सी गयी l प्रदूषित होने का दुःख कम था जो प्रिय विरह का का गम और मिल गया l मैं बेसब्री से नलिका के आने की प्रतीक्षा करने लगी l शाम हो चली थीl  नलिका ढेर सारा कचड़ा गंदगी लेकर आयी l किन्तु मैं उसे देख मुह नहीं बनायी l मैंने पूछा, ‘और कैसी हो -‘ वो भी अजीब तरीके से मुझे देखी और बोली, ‘मुझे क्या होगा , जैसी कल थी, वैसी ही आज हूँ l लेकिन तुम्हें क्या हो गया? आज मुझसे इतने प्यार से बात कर रही हो, मुझसे बदबू नही आ रही क्या -”मैं उसके पास गयी और बड़े प्यार से बोली , ‘बता ना , तूने गगन और तारों को कब देखा, उस आलिशान होटल के ऊपर l ”
नलिका बोली,  ‘अच्छा, तो ये बात है ! सुन बहन, सुना है ! उस होटल में बहुत सुन्दर तालाब है l लोग उसे स्विमिंग पूल भी कहते है l  गगन उसी को देखता होगा l सुना है, उस तालाब में हर चीज़ की प्रतिबिम्ब बिलकुल साफ़ दिखती है,  इतनी स्वच्छ है वो स जाने दो बहन,अपनी दुनिया बिलकुल अलग है l ” इतना कहकर वो जिस वेग से आयी थी उसी वेग से दूसरे किनारे चली गयी l”

सच ही तो कह रही थी वो कि हमारी दुनिया अलग है l बल्कि इन मनुष्यों की वजह से हम हमारी दुनिया से अलग हो गये हैं l मैं मेरे ही अन्दर दम तोड़ रही हूँ l मैं सोच रही, मैं दूषित हूँ क्या महज इसीलिए गगन मुझे नहीं देखता l बहुत सोचने के बाद, मैंने समस्या और समाधान को कहीं न कहीं मेरे अस्तित्व से ही जुड़ा पाया l मैं मेरे स्वर्णिम दिनों को याद करने लगी l कितनी स्वच्छ और कितनी खुश हुआ करती थी मैं l उदगम स्थल से होते हुए हर प्रदेश को मैंने अपने जल से में सींचा है l  इसमें मेरी बड़ी बहन प्रकृति ने मेरा खूब साथ दिया है l मैंने जीवन और प्रकृति के हर रंग को बेहद ही करीब से महसूस किया है l मैं भी कहीं न कहीं प्रकृति के इन्द्रधनुष का हिस्सा हुआ करती थी l और आज अखबार के ख़बरों का हिस्सा हूँ l मनुष्य तो अपने दुख दर्द को व्यक्त करने का, बाटने का साधन ढूंढ लेते है l मैं किस से अपनी व्यथा कहूँ !  प्रकृति ही एक थी जिससे अपनी व्यथा कह सकती थी, किन्तु ब्रह्मांड की सबसे बड़ी कल्पना, मनुष्यों ने तो प्रकृति को भी समाप्त कर दियाl  मैं यहाँ मैली हूँ और वो कहीं मूर्छित पड़ी होगी स यही सच है l

उदगम स्थल से जब मैं मानव कल्याण जैसे पुण्य कार्य के लिए निकली थी, उस वक़्त हमें कहा गया कि मेरे भीतर अथाह सहनशक्ति है ,  किन्तु मानवों की ये बेरुखी,  ये अत्याचार अब सहन नहीं होता l ये कैसा हिसाब है कि कोई आपको जीवन दे रहा है और बदले में जीवनदाता के अस्तित्व पर ही हमला हो रहा है l मनुष्य ये समझने की भूल बिलकुल भी न करें कि मैं असहाय हो गयी हूँ l एक तरफ जहाँ मैं जीवन रक्षक हूँ, वही जीवन भक्षक की भूमिका भी बखूबी निभा चुकी हूँ स अतः मनुष्य मुझे रौद्र रूप लेने पर मजबूर न करे l इतिहास गवाह है,  पूत कपूत हुए किन्तु माता कभी कुमाता नहीं बनी l  कहीं ऐसा ना हो कि माता को कुमाता बनना पड़े स जो लोग मुझे पढ़ रहे होंगे वो ये सोंच रहे होंगे कि मैं हूँ कौन, जो इतनी सारी बातें बताये जा रही हूँ l कोई पागल तो नहीं हूँ l या विक्षिप्त कोई महिला तो नहीं !  बिलकुल नहीं ! मैं कोई पागल या विक्षिप्त महिला नहीं हूँ l

मैं नदी हूँ l मैं गंगोत्री से निकली गंगा हूँ, अमरकंटक से निकली नर्मदा हूँ, अनंतनाग की झेलम और महाबलेश्वर की कृष्णा हूँ l वास्तव में मैं वो हर नदी हूँ जिसके अस्तित्व और भावनाओं को मनुष्यों ने अपने स्वार्थ के लिए बड़े मजे से कुचला है स मनुष्यों के घर अगर कोई लड़की पैदा होती है तो उसे मेरी धाराओं में प्रवाहित कर दिया जाता है l और अगर इस दुनिया से विदा लेता है तो उसकी अस्थियों को भी मुझमें ही प्रवाहित किया जाता है l मानव संस्कृति का आधार मेरे ही इन दोनों किनारों पर फला-फूला और मैं इनके जीवन का आधार बनी l आज मनुष्य हमारे ही विनाश पर उतर आये हैं l  पर शायद वो मुर्ख ये भूल गये हैं कि वो हमें आधारविहीन करके खुद के अस्तित्व को तबाह कर रहें हैं l हम नदियों के भीतर जो तूफ़ान पल रहा है, अब वक़्त आ गया है मानव अपनी आँखों से अपनी की तबाही देखे स जल संकट तो इसका एक नमूना है l

लेखिका मीडिया शोधार्थी हैं. swetarani815@gmail.com

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