झाबुआ के उपचुनाव में फीका रहा शिवराज का प्रभाव   

कृष्णमोहन झा
हाल ही में संपन्न झाबुआ विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी एवं पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया की प्रचंड जीत ने भारतीय जनता पार्टी को स्तब्ध कर दिया है।भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी, परंतु उसकी सारी उम्मीदें धरी की धरी रह गई। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी ऐसा पूर्वानुमान लगाने में सफल नहीं हो पाए की कांग्रेसी प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया भाजपा प्रत्याशी भानु भुरिया को ऐसी करारी हार का सामना करने के लिए विवश कर देंगे। 
गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान चुनाव प्रचार के दौरान अपने भाषणों में यह तंज कसने से भी नहीं चूके थे कि कांतिलाल भूरिया को जनता पहले ही रिटायर कर चुकी है। इसके बावजूद में वे बार बार चुनाव मैदान में उतर जाते हैं। परंतु कांग्रेस प्रत्याशी कांतिलाल भूरिया ने भाजपा से यह सीट छीनकर यह साबित कर दिया है कि वे भले ही भाजपा प्रत्याशी भानु भूरिया से आयु में बड़े हो, परंतु चुनावी राजनीति से रिटायर होने की अभी उनकी कोई मंशा नहीं है औऱ न हीं कांग्रेस पार्टी ने उन्हें राजनीति से रिटायर करने का अभी कोई मन बनाया है। यह चुनाव जीतने के बाद कांतिलाल भूरिया का पार्टी के अंदर कद इतना ऊंचा हो गया है कि अब उन्हें प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से नवाजे जाने की मांग उठने लगी है। अब इस बात की संभावनाएं बलवती प्रतीत होने लगी है कि अगले कुछ दिनों के अंदर मुख्यमंत्री कमलनाथ  प्रदेश कांगे्रस अध्यक्ष का ताज उनके रखने को तैयार हो जाएंगे या फिर उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल करके किसी महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंप देंगे। झाबुआ की जीत में प्रदेश कांग्रेस की सरकार की ताकत में भले ही एक सीट का इजाफा किया हो ,परंतु 230 सदस्यीय सदन के अंदर वह जादुई आंकड़े 116 से महज एक सीट दूर रह गई है ।
सरकार के लिए यह सीट कितनी महत्वपूर्ण थी, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि झाबुआ में पार्टी के प्रचार अभियान की बागडोर मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्वयं अपने हाथों में कसकर थाम रखी थी। पार्टी के प्रचार की रणनीति उन्होंने ही तय की थी और इस बात का पूरा ध्यान रखा कि चुनाव प्रचार के दौरान पार्टी में किसी भी स्तर पर मतभेद दिखाई ना दे। गत विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार इस बार कांतिलाल भूरिया के पुत्र डॉ विक्रांत भूरिया को पार्टी के बागी उम्मीदवार जेवियर मेडा के कारण जो पराजय झेलनी पड़ी थी ,उसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए मुख्यमंत्री कमलनाथ ने जेवियर मेडा को मनाने में जो सफलता प्राप्त की, उसका कांतिलाल भूरिया की जीत सुनिश्चित करने में बहुत बड़ा योगदान रहा है। जेवियर मेडा तो इस उपचुनाव में भी पार्टी से बगावत करने के लिए तैयार बैठे थे ,परंतु मुख्यमंत्री कमलनाथ ने उन्हें पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में बैठने के लिए न केवल तैयार कर लिया, बल्कि उन्हें भूरिया के चुनाव प्रचार में सक्रिय भागीदारी के लिए मनाने में भी सफलता हासिल कर ली। इस तरह चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के उत्साह पर पानी फेरने में भी वे सफल हो गए। दरअसल भाजपा को जरा सी भी उम्मीद नहीं थी की कांग्रेस मेडा को मनाने में सफल हो पाएगी।   इसलिए वह मानकर चल रही थी कि झाबुआ सीट पर उसका कब्जा बरकरार रखने से कांग्रेश उसे रोक नहीं पाएगी ,परंतु चुनाव परिणामों ने भाजपा को  हक्का-बक्का कर दिया।
झाबुआ के चुनाव परिणाम की घोषणा के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने विपक्षी भारतीय जनता पार्टी पर निशाना साधने में तनिक भी देर नहीं की। उन्होंने भाजपा को चुनौती दी कि वह 10 महीने से सरकार गिराने की बात कर रही थी। इसलिए अब आए और उनकी सरकार गिराकर दिखाए ।  निश्चित रूप से मुख्यमंत्री कमलनाथ के आत्मविश्वास को झाबुआ की जीत ने दोगुना कर दिया है और उनके इस आत्मविश्वास को डिगाने की कोशिशों में जुटी भारतीय जनता पार्टी अब कारणों को तलाशने में जुट गई है जो झाबुआ सीट उसके हाथ से निकलने के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ झाबुआ की जीत को अपनी सरकार के कामकाज पर मुहर बता रहे हैं और भाजपा मानती है कि वह वर्तमान सरकार की असफलताओं को जनता तक पहुंचाने में सफल नहीं हो पाई।
पार्टी की शर्मनाक हार के लिए भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह का यह बयान हास्यास्पद प्रतीत होता है कि अगर चुनाव मैदान में कांग्रेस का बागी उम्मीदवार भी होता तो भाजपा को झाबुआ में हार का सामना नहीं करना पड़ता। आश्चर्य की बात है कि राकेश सिंह को प्रदेश की पूर्ववर्ती भाजपा सरकार का कामकाज इतना प्रशंसनीय प्रतीत क्यों नहीं हुआ कि उसके आधार पर पार्टी झाबुआ सीट जीतने में सफल हो जाती। उन्हें अपनी पार्टी की हार के लिए कांग्रेस के बागी उम्मीदवार की गैरमौजूदगी सही प्रतीत हो रही है तो फिर उन्हें खुद ही इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि क्या उनके नेतृत्व में प्रदेश में भाजपा का संगठन इतना कमजोर हो गया है कि वह अब कांग्रेस की एकजुटता का सामना करने की स्थिति में नहीं है। भाजपा ने चुनाव प्रचार के दौरान ही इस हकीकत को जानने की जरूरत क्यों नहीं महसूस की कि कांग्रेस पार्टी की एकजुटता से उसके हाथ से यह सीट जा सकती है। यह दिलचस्पी का विषय है कि झाबुआ में भारतीय जनता पार्टी की शर्मनाक हार के लिए पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह को कांग्रेस की एकजुटता बड़ा कारण प्रतीत होती है, लेकिन भाजपा के सीधी से विधायक केदारनाथ शुक्ल झाबुआ में पार्टी की हार के लिए राकेश सिंह को जिम्मेदार मानते हैं। झाबुआ के परिणाम घोषित होने के बाद उन्होंने प्रदेश के नेतृत्व में परिवर्तन की मांग तक कर दी। उसके बाद केदारनाथ शुक्ला के बयान को अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें पार्टी ने शो का नोटिस जारी कर दिया। पार्टी के प्रदेश महामंत्री का कहना है कि झाबुआ की हार पार्टी की सामूहिक जिम्मेदारी है। खैर केदारनाथ शुक्ला को नोटिस दिया जाना तो स्वभाविक, लेकिन भाजपा यह कहने का साहस नहीं दिखा पा रही है कि झाबुआ में उसकी हार इसलिए हुई है कि वह कोई प्रभावी रणनीति तय करने में असफल रही है।
चुनाव प्रचार के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री चौहान एवं पार्टी के वर्तमान अध्यक्ष राकेश सिंह के बीच तालमेल न होने की खबरें आती रही है ,जो झाबुआ में पार्टी की पराजय में बड़ी भूमिका रही। गौरतलब है कि  झाबुआ परंपरागत रूप से कांग्रेस की ही सीट रही है। भाजपा को अब तक मात्र तीन बार जीत का स्वाद चखने को मिला है, परंतु लगातार दो विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस सीट पर जीत हासिल करके यह धारणा बना ली थी कि इस बार भी कांग्रेस उससे झाबुआ सीट छीनने में सफल नहीं हो पाएगी ,परंतु कांग्रेस ने अपने बागी उम्मीदवार को भूरिया के पक्ष में राजी करके भाजपा की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब सवाल यह है कि झाबुआ  सीट हारने के बाद भी क्या भाजपा यह दावा करने की स्थिति में रह पाएगी कि वह जब चाहे कमलनाथ सरकार को गिरा सकती है। बस उसे दिल्ली से अनुमति मिलने का इंतजार है। मुख्यमंत्री कमलनाथ तो उसे चुनौती दे चुके हैं कि अब आई और गिराए सरकार। अब यह दिलचस्पी का विषय है कि भाजपा मुख्यमंत्री की इस चुनौती को किस रूप में लेती है। फिलहाल तो उसे अभी झाबुआ में मिली करारी हार से उभरना है।

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