सामाजिक भय से रुकेगी दुष्कर्म की घटना!

कृष्णमोहन झा

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने राज्य में बेटी बचाओ अभियान शुरू कर समूचे प्रदेश की बेटियों को यह भरोसा दिलाया था कि उनके शासन में बेटियों के सम्मान,सुरक्षा एवं उन्हें समानता का अधिकार प्रदान करने में कोई कसर बाकी नही रखी जाएगी। उन्होंने बेटियों को यह भरोसा भी दिलाया था कि प्रदेश में ऐसा सुरक्षित महौल बनाया जाएगा, जिसमे बेटियां आधी रात को भी सुरक्षित घूम सकेगी।वे भिंड के रावतपुरा में आयोजित कुंभ में शिवराज बेटियों पर बुरी नजर रखने वालों को चेतावनी तक दे चुके है।

कुछ माह पूर्व ही मप्र विधानसभा में एक विधेयक पास किया गया था, जिसके अंतर्गत 12 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के साथ दुष्कर्म के अपराधी को फांसी की सजा का प्रावधान रखा गया है। मुख्यमंत्री ने एक अवसर पर यह भी कहा कि समाज मे दुष्कर्म की घटनाओं को रोकने के लिए नैतिक अभियान चलाने की सख्त आवश्यकता है। इसमें कोई संदेह नही है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान एक संवेदनशील व्यक्ति है। उन्हें इस बात की भी पीड़ा होती है कि देश के सबसे ज्यादा दुष्कर्म के मामले मप्र में ही दर्ज हो रहे है। इसलिए उनकी ही पहल से फांसी देने का प्रावधान बनाया गया है, लेकिन इससे भी मप्र में दुष्कर्म की घटनाएं रोके नही रुक रही है। समाचार पत्र प्रतिदिन इस तरह की घटनाओं से भरे रहते है।

मंदसौर में हुई घटना के बाद सामने आया राजनीतिज्ञों का आचरण भी सवाल खड़े करता है। किसी जनप्रतिनिधि द्वारा दुष्कर्म पीड़ित बेटी के परिजनों से यह कहना कि इन्हें धन्यवाद दीजिए कि इन्होंने आपकी बेटी की कुशलक्षेम पूछने के लिए अस्पताल आने का कष्ट उठाया है। ऐसे जनप्रतिनिधि पीड़ित बच्ची के अभागे परिजनों से धन्यवाद पाने की इच्छा में ये भी भूल जाते है कि इससे उन्हें कितनी पीड़ा होगी। सर्वाधिक खेद की बात तो यह है कि आखिर इन निर्वाचित प्रतिनिधियों को यह अहसास क्यों नही होता कि पीड़ित को सांत्वना देकर उन्हें सर्वोत्तम इलाज मुहैया कराना उनका ही दायित्व है , वही मानवता का भी यही तकाजा है। यही नही मुख्यमंत्री द्वारा यदि पीड़ित के अभिवाहकों को आर्थिक सहायता व पीड़ित को सर्वोत्तम इलाज का भरोसा दिया गया है तो इसके लिए भी धन्यवाद की अपेक्षा नही की जानी चाहिए। यह तो सरकार का कर्तव्य है न कि कोई उपकार, बल्कि अपनी जिम्मेदारी में असफल होने के कारण सरकार को तो अपराधबोध होना चाहिए।

मंदसौर की घटना को महज एक दुर्घटना कहकर उसकी गंभीरता से इंकार नही किया जा सकता है।इसमें स्कूल प्रबंधन भी पूरी तरह जिम्मेदार है,जिसने एक अनजान व्यक्ति के साथ उस बालिका को जाने दिया। पुलिस की लापरवाही तो इतनी आम हो चुकी है कि उस जितनी चर्चा की जाए वह कम है। क्या पुलिस की ऐसे आपराधिक प्रवत्ति के लोगो पर सतत निगरानी नही करनी चाहिए ताकि कोई चूक न हो। कई बार रसूखदार व्यक्तियों पर भी हाथ नही डालने पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहते है। बलात्कार की घटना जघन्य अपराध की श्रेणी में आने वाला अपराध है ,किन्तु उन नेताओं के बारे में क्या कहा जाए जिन्हें यह कहने में तनिक भी संकोच नही होता है कि इतने बड़े देश मे ऐसी घटनाओं को गंभीरता से नही लिया जाना चाहिए।

मंदसौर की घटना ने प्रदेश ही नही सारे देश को झकझोरकर रख दिया है। ऐसी घटनाओं की गंभीरता को केवल यह कहकर कम नही किया जा सकता है कि इसमे क़ानून अपना काम करेगा। इस घटना के बाद मंदसौर एवं आसपास के इलाकों में जो जनाक्रोश दिखाई दिया है वह स्वभाविक ही था। यह उस नैतिक अभियान का ही हिस्सा है,जिसके जरिए ऐसी घटनाओं पर रोकथाम के लिए मुख्यमंत्री आशान्वित दिखाई देते है। मुख्यमंत्री जिस अभियान की बात कर रहे ,वह तब ही सफल होगा जब इसे लेकर निर्वाचित प्रतिनिधि भी संवेदनशील होंगे। यह अभियान न तो किसी धन्यवाद की अपेक्षा से प्रारंभ होना चाहिए न कि अल्पावधि के अंदर इस पर विराम लगना चाहिए।यह अभियान सतत चलना चाहिए, जिसके प्रभावों की निरंतर मॉनिटरिंग भी होनी चाहिए।

मुख्यमंत्री को यह पीड़ा अवश्य हो रही होगी कि 12 वर्ष से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के आरोपी को फांसी की सजा का प्रावधान होने के बाद भी प्रदेश में दुष्कर्म की घटनाएं थम नही रही है। इस प्रावधान के बाद भी अपराधियों में कोई भय पैदा नही हो रहा है। इन घटनाओं से द्रवित होकर वे अपराधियों को जल्द से जल्द सजा दिलाने की बात भी कई मंचों से कह चुके है। हाल ही में जब उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा जबलपुर आए थे ,तब मुख्यमंत्री ने उनके सामने यह मांग रखी थी कि उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय में भी फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट का गठन किया जाना चाहिए, ताकि जल्द न्याय हो सके यह एक अच्छा सुझाव है। इससे पीड़ितों को जहां जल्द न्याय मिल सकेगा , वही इससे उसके व परिजनों के घावों पर कुछ हद तक मरहम अवश्य लगेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

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