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कोविड-19 महामारी से जुडी कुछ सकारात्मक जानकारी

कोविड-19 मरीजों के लिए सीएफटीआरआई ने बनाए उच्च प्रोटीन बिस्किट

उमाशंकर मिश्र

Twitter handle : @usm_1984

नई दिल्ली, 18 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): देश के विभिन्न अनुसंधान संस्थान कोविड-19 खिलाफ मुहिम में अपने तरीके से योगदान दे रहे हैं। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) की मैसूर स्थित प्रयोगशाला सेंट्रल फूड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएफटीआरआई) ने कोविड-19 के मरीजों को ध्यान में रखकर उच्च प्रोटीन युक्त बिस्किट बनाए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोटीन की प्रचुर मात्रा से युक्त ये पौष्टिक बिस्किट मरीजों को कोविड-19 से जल्दी उबरने में मदद कर सकते हैं। ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स), नई दिल्ली में उपचार करा रहे कोविड-19 के मरीजों लिए ये बिस्किट सीएफटीआरई की ओर से भेजे गए हैं। उच्च प्रोटीन युक्त 500 किलोग्राम बिस्किट और 500 किलोग्राम रस्क एम्स के आहार विज्ञान विभाग को उपलब्ध कराए गए हैं, ताकि इसे कोविड-19 से प्रभावित मरीजों के आहार में शामिल किया जा सके। सीएफटीआरआई की ओर से ये बिस्किट एम्स के अधिकारियों के आग्रह पर उपलब्ध कराए गए हैं।

इस बिस्किट को बनाने के लिए गेहूँ का आटा, मैदा, चीनी, हाइड्रोजेनेटेड फैट, सोया आटा, व्हे प्रोटीन (Whey Protein), सोया प्रोटीन, मिल्क सॉलिड्स, ग्लूकोज, नमक और फ्लेवर्स का उपयोग किया गया है। इस बिस्किट के 100 ग्राम के पैकेट से 400 किलो कैलोरी के ऊर्जा मिल सकती है। इसके पोषण मूल्य में कार्बोहाइड्रेट (63.2 ग्राम), प्रोटीन (14 ग्राम), वसा (17.1 ग्राम) और खनिज (1.2 ग्राम) शामिल है। कोविड-19 के मरीजों के लिए विशेष रूप से बनाए गए इस बिस्किट में प्रोटीन की मात्रा 14 प्रतिशत है, जो 8-9 प्रतिशत प्रोटीन वाले आम बिस्किट की तुलना में काफी अधिक है। सीएसआईआर-सीएफटीआरआई के निदेशक के.एस.एम.एस राघवराव ने बताया कि “ये पौष्टिक बिस्किट मरीजों को जल्द स्वस्थ होने के लिए आवश्यक प्रोटीन उपलब्ध करा सकते हैं।”

एम्स की मुख्य डाइटीशियन डॉ परमीत कौर कहती हैं- “यहाँ यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि प्रोटीन युक्त इस बिस्किट की रेसिपी सीएसआईआर-सीएफटीआरआई, मैसूर के वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई है। अस्पताल में अन्य लोगों के साथ इलाज करा रहे कोविड-19 रोगियों को बिस्किट उनके नियमित आहार के हिस्से के रूप में दिए जाएंगे।” सीएसआईआर-सीएफटीआरआई के फॉर्मूलेशन के आधार पर ये बिस्किट नोएडा की कंपनी सेवन पिलर्स हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा बनाए गए हैं। जबकि, जरूरतमंदों को यह बिस्किट पहुँचाने के लिए लॉजिस्टिक सहयोग इंडियन सोसायटी ऑफ एग्रीकल्चरल प्रोफेशनल्स, नई दिल्ली द्वारा प्रदान किया जा रहा है। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 की हर्बल दवा पर शोध कर रहे हैं भारतीय वैज्ञानिक

नई दिल्ली, 22 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कोविड-19 से निपटने के लिए वैज्ञानिक किसी भी तरीके को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। लखनऊ स्थित नेशनल बोटैनिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट (एनबीआरआई) में कोविड-19 की जाँच के लिए एक तरफ बायोसेफ्टी लेवल (बीएसएल)-2 लैब तैयार की जा रही है, तो दूसरी ओर संस्थान के वैज्ञानिक कोविड-19 की हर्बल दवाओं पर भी शोध कर रहे हैं। इसके लिए एनबीआरआई ने लखनऊ की किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) के साथ करार किया है।

इस समझौते के तहत एनबीआरआई में कोरोना वायरस की जाँच के साथ-साथ वायरस संक्रमण रोकने के लिए हर्बल यौगिकों का परीक्षण किया जाएगा। औषधीय पादप विविधता के अध्ययन से प्राप्त हर्बल यौगिक एनबीआरआई के पास पहले से मौजूद हैं। वैज्ञानिक जैव-रसायनिक, जैविक और अजैविक परीक्षणों के माध्यम से हर्बल यौगिकों की वैधता की जाँच करेंगे। सभी आवश्यक पूर्व-चिकित्सीय अध्ययनों के बाद, केजीएमयू द्वारा चिकित्सीय परीक्षण किए जाएंगे। इस तरह, दोनों संस्थान मिलकर पादप आधारित हेल्थकेयर उत्पाद और दवाएं विकसित करने की योजना पर काम कर रहे हैं। एनबीआरआई द्वारा पहले भी मधुमेह जैसी बीमारियों के लिए हर्बल औषधि (बीजीआर-34) विकसित की जा चुकी है, जो काफी सफल हुई है।

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) से संबद्ध एनबीआरआई को मुख्य रूप से वनस्पति आधारित अनुसंधान के लिए जाना जाता है। हर्बल यौगिकों के परीक्षण के अलावा, कोविड-19 की जाँच में तेजी लाने के लिए एनबीआरआई में अब बायोसेफ्टी लेवल (बीएसएल)-2 स्तरीय लैब तैयार की जा रही है। एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने बताया कि कोविड-19 की जाँच के लिए नमूने एवं किट रिएजेंट केजीएमयू द्वारा उपलब्ध कराए जाएंगे। रिएजेंट उन तत्वों के सेट को कहते हैं, जिसका उपयोग परीक्षण में किया जाता है। एनबीआरआई के निदेशक डॉ एस.के. बारिक ने बताया कि “बीएसएल-2 लैब की आवश्यकता कोविड-19 के नमूनों के परीक्षण में पड़ती है। कोविड-19 के परीक्षण के लिए सीएसआईआर मुख्यालय से संस्थान को मंजूरी मिल चुकी है। कोविड-19 के परीक्षण के लिए संस्थान ने निजी सुरक्षा उपकरण की खरीद के लिए ऑर्डर दे दिए हैं और लैब को तैयार किया जा रहा है। अगले चार से पाँच सप्ताह में यह लैब बनकर तैयार हो जाएगी।”

बायोसेफ्टी (बीएसएल) का संबंध रोगजनक सूक्ष्मजीवों से संरक्षण के स्तर से है, जिसे जैविक प्रयोगशालाओं में प्रायः सुरक्षा के लिहाज से अपनाया जाता है। इसके अंतर्गत प्रयोगशालाओं को जैविक सुरक्षा से संबंधित सुविधाओं के आधार पर बीएसएल-1 से बीएसएल-4 तक चार स्तरों में वर्गीकृत किया गया है। कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए संदिग्ध लोगों का परीक्षण करके संक्रमित मरीजों की पहचान और फिर उन्हें क्वारांटाइन करना अभी तक सबसे कारगर उपाय माना जा रहा है। लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में परीक्षण को बढ़ावा मिलेगा तो कोविड-19 को रोकने में मदद मिल सकती है।

एनबीआरआई में कोविड-19 के परीक्षण के लिए उपकरण तो मौजूद हैं, पर इस संस्थान की विशेषज्ञता पौधों पर कार्य करने की रही है। इसलिए, संस्थान कोविड-19 के परीक्षण के लिए अपने वैज्ञानिकों को प्रशिक्षित करने के लिए केजीएमयू की मदद ले रहा है। कोविड-19 के परीक्षण के लिए आरएनए एक्सट्रैक्शन की जरूरत पड़ती है। दोनों संस्थानों के बीच हुए करार के बाद इसकी जानकारी एनबीआरआई के वैज्ञानिकों को केजीएमयू से मिल सकती है।

डॉ बारिक ने बताया कि “संस्थान में कई ऐसे हर्बल यौगिक मौजूद हैं, जिनका उपयोग कोविड-19 के साथ-साथ मोटापे, गठिया और कैंसर जैसे रोगों के उपचार की दवाओं के विकास से जुड़े शोधों में किया जा सकता है। केजीएमयू के साथ मिलकर एनबीआरआई इन यौगिकों का क्लीनिकल ट्रायल करेगा। उम्मीद है कि दोनों संस्थानों के सहयोग से हर्बल दवाओं के विकास में मदद मिल सकती है। इस समझौते के बाद दोनों संस्थानों के शोधार्थियों को केजीएमयू और एनबीआरआई में मौजूद अनुसंधान सुविधाओं का भी लाभ मिल सकेगा।” (इंडिया साइंस वायर)

वैज्ञानिकों ने मिस्ट सैनिटाइजर टनल को बताया सुरक्षित

नई दिल्ली, 23 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए अग्रिम पंक्ति में तैनात स्वास्थ्यकर्मियों, डॉक्टरों, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों को संक्रमण से बचाने के लिए कुछ स्थानों पर मिस्ट सैनिटाइजर टनल का उपयोग हो रहा है। लेकिन, इस टनल में छिड़काव के लिए उपयोग होने वाले रसायन सोडियम हाइपोक्लोराइट के दुष्प्रभावों का हवाला देते हुए कई एजेंसियों ने इसके खिलाफ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। हालाँकि, अब वैज्ञानिक परीक्षण के बाद मिस्ट सैनिटाइजर टनल के उपयोग को सुरक्षित बताया जा रहा है। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) की पुणे स्थित प्रयोगशाला नेशनल केमिकल लैबोरेटरी (एनसीएल) के एक ताजा अध्ययन के बाद इस संस्थान के वैज्ञानिकों ने यह बात कही है।

संक्रमण हटाने के लिए मिस्ट सैनिटाइजर टनल में कोहरे की फुहार जैसी सूक्ष्म बूंदों के रूप में रसायनों की एक निश्चित मात्रा का छिड़काव किया जाता है। इस टनल के भीतर से होकर गुजरने पर सोडियम हाइपोक्लोराइट की निर्धारित मात्रा का उपयोग संक्रमण हटाने के लिए किया जाता है। सीएसआईआर-एनसीएल के वैज्ञानिकों ने सोडियम हाइपोक्लोराइट की विभिन्न सांद्रताओं का मूल्यांकन करने पर मिस्ट सैनिटाइजर टनल में इसके उपयोग को सुरक्षित पाया है। सोडियम हाइपोक्लोराइट के प्रभाव, जिसे हाइपो या ब्लीच के रूप में भी जाना जाता है, का 0.02 से 0.5 प्रतिशत वजन की सांद्रता के साथ मिस्ट सैनिटाइजर टनल इकाई के भीतर से होकर गुजरने वाले कर्मियों पर अध्ययन किया गया है। इसके अलावा, मिस्ट सैनिटाइजर के टनल के संपर्क में आने से पहले और बाद में सूक्ष्मजीवों के खिलाफ जीवाणुरोधी गतिविधि का आकलन किया गया है। इस अध्ययन से पता चला है कि 0.02 से 0.05 प्रतिसत वजन की सांद्रता त्वचा पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना रोगाणुओं को नष्ट कर सकती है। इसी आधार पर, वैज्ञानिक मिस्ट सैनिटाइजर में 0.02 से 0.05 प्रतिशत वजन की सांद्रता में हाइपोक्लोराइट का उपयोग करने की सलाह दे रहे हैं।

संक्रमण के संपर्क की अलग-अलग प्रकृति के अनुसार वैज्ञानिकों ने हाइपोक्लोराइट की विभिन्न सांद्रताओं की सिफारिश की है। हाइपोक्लोराइट की 0.5 प्रतिशत सांद्रता के मिश्रण के छिड़काव की सिफारिश उन लोगों पर करने के लिए की गई है, जो अधिक आबादी के बीच रहकर कोविड-19 के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसी तरह, 0.2 प्रतिशत मात्रा का उपयोग सामान्य कार्यालयों या फैक्टरी में किया जा सकता है। हालांकि, घर जैसे पूरी तरह पृथक रहने वाले स्थानों पर इस सैनिटाइजर के उपयोग की आवश्यकता नहीं है। सोडियम हाइपोक्लोराइट के दुष्प्रभाव न होने के बावजूद सीएसआईआर-एनसीएल के वैज्ञानिकों ने कहा है कि टनल से गुजरने के दौरान सुरक्षा की दृष्टि से फेस शील्ड या सेफ्टी गॉगल्स का उपयोग किया जा सकता है। टनल से गुजरकर सैनिटाइज करने की प्रक्रिया हैंड-सैनिटाइजर या साबुन से हाथ धोने के बाद पूरी होती है।

मुंबई स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नोलॉजी (आईसीटी) के शोधकर्ताओं ने इस तरह के रसायनों के छिड़काव के लिए खास नोज़ल डिजाइन किए हैं, जिन्हें आवश्यकता के अनुसार उपयोग किया जा सकता है। सैनिटाइजर टनल में एक व्यक्ति को संक्रमण मुक्त करने में औसतन आठ सेंकेंड का समय लगता है। अगर 0.5 प्रतिशत सॉल्यूशन का मिस्ट सैनिटाइजर में आठ सेंकेंड तक छिड़काव किया जाए तो सिर्फ 0.00133 मिलीग्राम हाइपोक्लोराइट के संपर्क में आने की संभावना होती है। नोजेल से पूरी टनल में समान रूप से सूक्ष्म बूंदों के छिड़काव का समान वितरण भी नुकसान से बचाने में मददगार होता है। द्रव कण बनाने के लिए फिल्टर की हुई हवा का उपयोग टनल में घुटन की आशंका से बचा जा सकता है।

मिस्ट सैनिटाइजर के उपयोग से जुड़ी नकारात्मक खबरों पर प्रतक्रिया देते हुए सीएसआईआर-एनसीएल के निदेशक प्रोफेसर अश्विनी कुमार नांगिया और आईसीटी, मुंबई के वाइस चांसलर प्रोफेसर ए.बी. पंडित ने अपने संयुक्त वक्तव्य में कहा है कि “हर चीज की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है और रसायनों के उपयोग पर यह बात सबसे अधिक लागू होती है। कई स्थानों पर मिस्ट सैनिटाइजर में निर्धारित मात्रा से 100 गुना अधिक तक सोडियम हाइपोक्लोराइट का उपयोग किया गया, जिससे नुकसान स्वाभाविक है।”

यदि किसी को सोडियम हाइपोक्लोराइट से एलर्जी है, तो उसके लिए भी आईसीटी, मुंबई ने एक विकल्प सुझाया है। ऐसे लोगों को संक्रमण रहित करने के लिए  बेंजैलकोनियम क्लोराइड (बीकेसी) आधारित सॉल्यूशन का छिड़काव किया जा सकता है। द जर्नल ऑफ हॉस्पिटल इन्फेक्शन में प्रकाशित एक ताजा अध्ययन में बीकेसी की 0.003 से 0.005 प्रतिशत मात्रा को कोरोना वायरस के खिलाफ प्रभावी पाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सही पद्धति की जानकारी हो और उस पर उपयुक्त ढंग से अमल किया जाए तो बिना किसी नुकसान के रोगजनक सूक्ष्मजीवों से बचा जा सकता है।

हैदराबाद विश्वविद्यालय के वालंटियर्स को प्रशिक्षित कर रहा है सीसीएमबी

नई दिल्ली, 23 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) और इसकी घटक प्रयोगशालाएं कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में अधिकतम समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध दिख रही हैं। कोविड-19 के खिलाफ सेंटर फॉर सेलुलर ऐंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी (सीसीएमबी) की मुहिम में अब एक और आयाम जुड़ गया है। कोविड-19 के परीक्षण के लिए सीसीएमबी अब हैदराबाद विश्वविद्यालय के साथ मिलकर काम कर रहा है। दोनों संस्थानों की इस साझा पहल के तहत सीसीएमबी हैदराबाद विश्वविद्यालय के वालंटियर्स को कोविड-19 के परीक्षण के लिए प्रशिक्षण दे रहा है।

हैदराबाद स्थित सीसीएमबी कोविड-19 के विभिन्न आयामों पर काम कर रही है। इन आयामों में कोविड के परीक्षण के अलावा दवाओं की रिपर्पजिंग, वायरस कल्चर, वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग और वैक्सीन का विकास शामिल हैं। सीसीएमबी देश के उन चुनिंदा संस्थानों में से है, जिन्हें कोविड-19 के परीक्षण की जिम्मेदारी मिली है।

हैदराबाद और आसपास के इलाकों में कोविड-19 के परीक्षण के दायरे को बढ़ाने के लिए हाल में हैदराबाद विश्वविद्यालय को भी परीक्षण केंद्र के रूप में चुना गया है। विश्वविद्यालय के वालंटियर्स को सीसीएमबी के विशेषज्ञ परीक्षण के बारे में जानकारी दे रहे हैं। तकनीकी स्टाफ को आईसीएमआर से मान्यता प्राप्त आरटी-पीसीआर परीक्षण के लिए सीसीएमबी द्वारा प्रशिक्षित किया जा रहा है।

सीसीएमबी के अलावा राज्य में कोविड-19 के परीक्षण केंद्रों में उस्मानिया मेडिकल कॉलेज, गांधी अस्पताल, गवर्न्मेंट एमजीएम अस्पताल वारंगल, फीवर अस्पताल, इंस्टीट्यूट ऑफ प्रिवेंटिव मेडिसन और निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज शामिल हैं।

इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा सीसीएमबी को कोविड-19 के परीक्षण के लिए काफी पहले ही चुना जा चुका है। तेलंगाना के 33 जिलों के सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों से प्राप्त नमूनों का परीक्षण इस संस्थान में किया जा रहा है। कोविड-19 के परीक्षण में प्रशिक्षण देने के लिए विशेष रूप से वीडियो मैन्यूअल बनाया गया है, जिसमें चरणबद्ध तरीके से नमूनों से आरएनए को अलग करने और आरटी-पीसीआर के बारे में जानकारी दी गई है। कोविड-19 के परीक्षण के लिए नियामक मंजूरी प्राप्त डॉक्टरों, अस्पतालों और क्लीनिकों के लिए यह मैन्यूअल निशुल्क उपलब्ध है। जिन संस्थानों को परीक्षण के लिए मंजूरी मिल चुकी है, वे इन संसाधनों को प्राप्त करने के लिए सीसीएमबी के निदेशक को सीधे ईमेल कर सकते हैं। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 परीक्षण तेज करने के लिए सीएसआईआर-आईएचबीटी ने की पहल

नई दिल्ली, 15 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए बड़े पैमाने पर इसके परीक्षण के प्रयासों को तेज करना जरूरी हो गया है। हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में स्थित हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) ने संकट के इस समय में महत्वपूर्ण पहल करते हुए गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज, टांडा में कोविड-19 की परीक्षण क्षमता को मजबूत करने के लिए “क्वालिटेटिव रियल टाइम पॉलिमरेज चेन रिएक्शन (qRT-PCR)” सुविधा उपलब्ध करायी है। आईएचबीटी की इस पहल के बाद स्थानीय स्तर पर कोविड-19 के परीक्षण को बढ़ावा मिल सकता है।

हिमालय जैवसंपदा प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएचबीटी) वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की 38 प्रयोगशालाओं में शामिल एक प्रमुख प्रयोगशाला है। सीएसआईआर-आईएचबीटी के निदेशक डॉ संजय कुमार ने कहा है कि “qRT-PCR अत्यधिक संवेदनशील उपकरण है, जो लक्षित नमूनों में वायरल आरएनए की निम्नतम मात्रा का भी पता लगा सकता है। टांडा मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ भानु अवस्थी ने कहा है कि “यह सुविधा उनके संस्थान में कोविड-19 परीक्षण क्षमता बढ़ाने में सबसे महत्वपूर्ण हो सकती है।” इन दोनों संस्थानों ने संयुक्त अनुसंधान के क्षेत्र में समझौते किए हैं और अब इस वायरस के अनुक्रमण का कार्य करने के लिए भी मिलकर काम कर रहे हैं।

रियल टाइम पीसीआर मशीन परीक्षण के लिए सबसे पहले रोगी से नाक या मौखिक स्वैब (Swab) नमूने एकत्र किए जाते हैं और उसमें मौजूद आरएनए को मानक तरीकों द्वारा अलग किया जाता है। यदि नमूने में वायरस मौजूद है तो उसका आरएनए भी इस चरण में अलग कर लिया जाता है। आरएनए नमूने क्यूआरटी-पीसीआर मशीन पर लोड किए जाते हैं, जहां आरएनए पहले सीडीएनए में परिवर्तित हो जाते हैं और उसके बाद थर्मल साइकलिंग के माध्यम से वायरल सीडीएनए का प्रवर्धन (Amplification) होता है। प्रवर्धन प्रक्रिया को वायरल जीनोमिक अनुक्रम के लिए विशेष रूप से बाध्यकारी प्राइमर्स (Binding Primers) की आवश्यकता होती है। उपयुक्त धनात्मक एवं ऋणात्मक नियंत्रणों का उपयोग करते हुए qRT-PCR मशीन क्लिनिकल नमूनों में कोविड-19 वायरस का पता लगाती है।

परीक्षण की यह पद्धति विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) व भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) से मान्यता प्राप्त है। (इंडिया साइंस वायर)

सीएसआईआर की एक और प्रयोगशाला में कोरोना वायरस की जीनोम सीक्वेंसिंग

नई दिल्ली, 16 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): कोशकीय एवं आणविक जीवविज्ञान केंद्र (सीसीएमबी) और जीनोमिक एवं समेकित जीवविज्ञान संस्थान (आईजीआईबी) के बाद वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की एक और प्रयोगशाला में नये कोरोना वायरस के संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण (Genome Sequencing) का कार्य शुरू किया जा रहा है। चंडीगढ़ स्थित सीएसआईआर-सूक्ष्मजीव प्रौद्योगिकी संस्थान (इम्टेक) ने भी कोविड-19 की चुनौती से निपटने के लिए महत्वपूर्ण पहल करते नये कोरोना वायरस का संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण शुरू कर दिया है।

इम्टेक के निदेशक डॉ संजीव खोसला ने कहा है कि “इस अनुक्रमण से प्राप्त जीनोमिक संसाधन कोविड-19 के लिए जरूरी निदान और दवाओं के लक्ष्यों की पहचान करने में कारगर हो सकते हैं। जीनोम अनुक्रमण के नमूनों को अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त संग्रह में जमा किया जाएगा।” दूसरे सूक्ष्मजीवों की तुलना में वायरस के रूपांतरित होने की दर अधिक होती है, और उनकी आनुवंशिक सामग्री तेजी से बदलती रहती है, क्योंकि वायरस संख्या तेजी से बढ़ती रहती है। संपूर्ण जीनोम अनुक्रम की जानकारी होने से शोधकर्ता वायरस की उत्पत्ति, भारत में मौजूद उसके रूपों और हमारे देश में इसके फैलने बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।

संपूर्ण जीनोम अनुक्रमण किसी जीव के जीनोम के पूर्ण डीएनए अनुक्रम को निर्धारित करने के लिए उपयोग की जाने वाली विधि है। सीएसआईआर-इम्टेक को सूक्ष्मजीव और जीनोमिक अनुसंधान में विशेषज्ञता के लिए जाना जाता है। यह संस्थान नैदानिक नमूनों से पृथक किए गए SARS-Cov-2 आरएनए जीनोम का अनुक्रमण करेगा। वर्ष 1984 में स्थापित सीएसआईआर-इम्टेक सूक्ष्मजीव विज्ञान में एक प्रमुख राष्ट्रीय स्तरीय उत्कृष्टता केंद्र है।

डॉ खोसला ने कहा, “हमने नमूनों का नैदानिक परीक्षण शुरू कर दिया है, और अब वायरल उपभेदों को अनुक्रमित करने के लिए इस मिशन को शुरू करते हुए हम इस वायरस की प्रकृति को समझने के लिए बेहतर रूप से सुसज्जित होंगे, जिसके कारण कोविड-19 वैश्विक महामारी फैल रही है।” यह संस्थान भारत में SARS-Cov-2 के उपभेदों में रासायनिक बदलावों का अध्ययन करने के लिए वास्तविक समय में पोर्टेबल और प्रत्यक्ष जीनोम अनुक्रमण में अपने अनुभव का उपयोग करेगा। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 से लड़ने के लिए सीएसआईआर लैब के शोधार्थियों ने बढ़ाया हाथ

नई दिल्ली, 17 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की जोरहाट स्थित प्रयोगशाला उत्तर-पूर्व विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी संस्थान (एनईआईएसटी) के शोधार्थी छात्रों ने भी अब कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई को मजबूती देने के लिए अपना हाथ बढ़ाया है।

एनईआईएसटी के निदेशक डॉ जी. नरहरि शास्त्री के आह्वान पर संस्थान में अध्ययन कर रहे शोधार्थियों ने भी कोविड-19 के संकट में जरूरतमंदों की मदद के लिए पीएम-केयर फंड में आर्थिक सहयोग राशि जमा करायी है। इस पहल के अंतर्गत संस्थान के 58 शोधार्थियों ने 54,201 रुपये पीएम-केयर फंड में जमा कराए हैं।

यह सहयोग राशि पीएम-केयर के कोविड-19 दान से संबंधित खाते में सीएसआईआर के सीनियर रिसर्च फेलो (एसआरएफ) प्रचुरज्य दत्ता के खाते से 15 अप्रैल को जमा करायी गई है। डॉ शास्त्री के नेतृत्व में सीएसआईआर-एनईआईएसटी कोविड-19 से निपटने के लिए हैंड-सैनिटाइजर, लिक्विड हैंडवॉश और संक्रमण दूर करने वाले लिक्विड जैसी निजी सुरक्षा से संबंधित सामग्री का उत्पादन कर रहा है।

यह सामग्री पिछले करीब एक महीने से पुलिस स्टेशन, प्रशासन, पोस्ट ऑफिस, बैंक, ऑयल ऐंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन लिमिटेड (ओएनजीसी), ब्रह्मपुत्र क्रैकर्स ऐंड पॉलिमर्स लिमिटेड (बीसीपीएल), जिला सत्र न्यायालय, भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), एयरफोर्स स्टेशन और स्थानीय समुदाय के बीच वितरित की जा रही है। कोविड-19 की महामारी के देखते हुए संस्थान फेस-मास्क जैसे सुरक्षात्मक उपकरणों का उत्पादन भी कर रहा है। मास्क बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर लोकप्रिय गमछा और अन्य उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया जा रहा है।

सीएसआईआर-एनईआईएसटी को उसके बहुआयामी अनुसंधान और विकास कार्य के लिए जाना जाता है। देश की वैज्ञानिक शोध संबंधी जरूरतों को पूरा करने और विशेष रूप से सुदूर उत्तर-पूर्व के राज्यों को ध्यान में रखकर किए जाने वाले सीएसआईआर-एनईआईएसटी के कार्य बेहद महत्वपूर्ण हैं। (इंडिया साइंस वायर)

कोविड-19 के खिलाफ सेप्सिस की दवा का परीक्षण करेंगे भारतीय वैज्ञानिक

नई दिल्ली, 21 अप्रैल (इंडिया साइंस वायर): भारतीय वैज्ञानिक अब कोविड-19 से गंभीर रूप से ग्रस्त रोगियों पर सेप्सिस के उपचार के लिए उपयोग होने वाली दवा का परीक्षण करने जा रहे हैं। ग्राम नेगेटिव बैक्टीरिया जनित सेप्सिस की दवा का उपयोग इस परीक्षण में किया जाएगा। सेप्सीवैक नामक इस दवा को काउंसिल ऑफ साइंटिफिक ऐंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआईआर) के सहयोग से दवा कंपनी कैडिला फार्मास्यूटिकल्स ने विकसित किया है।

सीएसआईआर के महानिदेशक डॉ शेखर सी. मांडे ने कहा है कि “ग्राम नेगेटिव सेप्सिस के कारण होने वाली मौतों की रोकथाम के लिए कैडिला फार्मास्यूटिकल्स ने इस दवा पर व्यापक क्लिनिकल ट्रायल किए हैं। इस दवा के उपयोग से सेप्सिस के गंभीर रोगियों की मौतों में 50 प्रतिशत से अधिक कमी देखी गई है। हमें उम्मीद है कि कोविड-19 के खिलाफ किए जाने वाले इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल से भी मौतों को रोकने में मदद मिल सकती है।”

कोविड-19 से पीड़ित मरीजों और ग्राम नेगेटिव सेप्सिस की मिलती-जुलती चिकित्सीय विशेषताओं को देखते हुए सीएसआईआर ने इस दवा के क्लीनिकल ट्रायल की पहल की है। इस पहल का उद्देश्य कोविड-19 से गंभीर रूप से बीमार मरीजों में एमडब्ल्यू की क्षमता का मूल्यांकन करना है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्राम नेगेटिव सेप्सिस और कोविड-19 से गंभीर रूप से ग्रस्त रोगियों में परिवर्तित प्रतिरोधी प्रतिक्रिया उभरने लगती है, जिससे मरीजों के साइटोकीन (Cytokine) प्रोफाइल में व्यापक बदलाव देखने को मिलता है। इस दवा का उपयोग साइटोकीन में होने वाले बदलाव को बाधित करके मरीजों को जल्दी स्वस्थ होने में मदद कर सकता है। ग्राम नेगेटिव सेप्सिस से गंभीर रूप से ग्रस्त मरीजों के अंगों के काम न करने की स्थिति में भी यह दवा असरदार पायी गई है।

सेप्सिस की इस दवा में ऊष्मा से उपचारित (Heat Killed) निष्क्रिय माइकोबैक्टीरियम डब्ल्यू (एमडब्ल्यू) का उपयोग किया जाता है, जिसका मरीजों पर कोई दुष्प्रभाव नहीं देखा गया है। कोविड-19 के रोगियों के उपचार के लिए इस दवा को किसी अन्य उपचार के साथ समानांतर रूप से उपयोग किया जा सकता है। ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई) से यह क्लीनिकल ट्रायल शुरू करने की मंजूरी मिल गई है और जल्दी ही कुछ चुनिंदा अस्पतालों में यह ट्रायल शुरू हो सकता है।

सीएसआईआर अपने न्यू मिलेनियम इंडियन टेक्नोलॉजी लीडरशिप इनिशिएटिव (एनएमआईटीएलआई) कार्यक्रम के तहत ग्राम नेगेटिव सेप्सिस से होने वाली मौतों को रोकने के लिए कैडिला फार्मास्यूटिकल्स को इसकी दवा विकसित करने के लिए वर्ष 2007 से सहयोग कर रहा है। इस दवा के विकास से संबंधित अध्ययन की निगरानी सीएसआईआर की एक निगरानी समिति द्वारा की जा रही थी। अब इस दवा के विपणन की अनुमति मिल गई है, जो सेप्सीवैक नाम से बाजार में उपलब्ध होगी। भारत के लिए इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि बेहतर प्रयासों के बावजूद, वैश्विक स्तर पर ग्राम-नेगेटिव सेप्सिस के कारण होने वाली मौतों को कम करने के लिए किसी अन्य दवा को मंजूरी नहीं मिली है। (इंडिया साइंस वायर)

भयभीत न हों भयावहता को समझें

डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी

देश में कोरोना के मामलों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। देश में कोरोना के कुल मामलों की तादाद 18 हजार से ज्यादा पहुंच गई है। इनमें एक्टिव केस की संख्या 10 हजार के पार है । इसके साथ ही देश में कोरोना से अब तक 591 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 3678 लोग ठीक भी हो चुके हैं। (आलेख लिखे जाने तक के आंकड़े)

लॉकडाउन के 21 दिन समाप्त होने का पूरे देश को इंतजार था। लेकिन फिर अचानक कोरोना संक्रमित पता नहीं कहाँ से निकलने लगे । जैसे घरों में दुबके बैठे हुये है जब लॉक डाउन खुलने की सीमा समाप्त होने को होती है तभी फिर से निकल पड़ते हैं। जाने क्यों एक बार में ही सब सामने क्यों नहीं आते ? क्यों घबरा रहे हैं? कारण कुछ भी हो कहीं न कहीं लॉक डाउन मध्यम वर्ग में खासकर उनको जो प्राइवेट संस्थानों में नौकरी करते है, और मजदूर वर्ग को अधिक प्रभावित कर रहा है ।

डॉ विश्वरूप राय चौधरी का एक विडियो इन दिनों काफी वायरल हो रहा है वो मोहम्म्द अहमद काज़्मी के साथ चर्चा करते हुये दिख रहे है – “कहते है कि ये जो दौर है इसमें व्यक्ति बीमारी से नहीं मर रहा जितना कि डर से मर रहा है । यदि ये टेस्ट हटा दीजिये कोई मृत्यु नहीं होगी । आगे कहते है कि गौहाटी में एक डॉक्टर कि मृत्यु हो गयी केवल कोरोना के डर से । जो खतरनाक किस्म की दवाइयाँ जिनका जानवरों पर ट्रायल किया जाता था वो आजकल इन्सानों पर किया जा रहा है । ये मौका जब लोगों की जान पर बनी हुयी है तब ये टेस्ट ये दवाइयाँ सब हिट एंड ट्रायल किया जा रहा है । लोगों को गिनी पिग बना दिया जा रहा है । गरीबो को क्वारंटाइन में डाल करके उन्हे शिकार बनाया जा रहा है । इसकी सत्यता क्या है यह तो हम बाद में समझ पाएंगे । अभी हम सब घरों के अंदर पैक है, लॉकडाउन हैं ,सारी यातायात सुविधाएं बंद है हम कहीं आ जा नहीं सकते , केवल फोन और वीडियो कॉल के जरिये ही बात कर रहे हैं अन्यथा हम यह कारण जल्दी ही पकड़ में ला सकते थे । लोग जो मर रहे हैं वो वायरस से नहीं मर रहे हैं वाइरस के खौफ से मर रहे है । सबके दिमागों में यह कीड़ा बैठ गया है कि जैसे ही मैं जाऊंगा डॉक्टर को दिखाऊँगा तुरंत पकड़ा जाऊँगा । और हमारे ऊपर सारे परीक्षण शुरू हो जाएंगे, हमारे शरीर में अजीबो गरीब दवाइयाँ डालने का सिलसिला  शुरू हो जाएगा जिससे हम मर जाएंगे ।”

संभवतः ये ही डर सभी मुस्लिमों के अंदर आ गया है कि हमको कोरोना वाइरस से तो खुद को बचाना है ही बल्कि डॉक्टर्स से भी खुद को बचाना पड़ेगा । वरना ये लोग ही हमें मार डालेंगे । मौलाना साद के वचनों को इस बात ने और अधिक हवा दे दी, सोने पर सुहागा हो गया। अब यदि मुस्लिम अपने मौलना के खिलाफ जाते हैं तो वे काफ़िर कहे जाएंगे ।

यहाँ मैं किसी मजहब या धर्म गुरु की खिलाफत कतई नहीं कर रही । किन्तु ये कहाँ तक उचित है कि आप बीमारी को छिपाएँ , किसी को बताएं नहीं क्योंकि आपको डर है कि कहीं आपको मार दिया गया या लोग आपको काफ़िर न कहने लगें । इसीलिए आप डॉक्टर्स, नर्सो, पुलिस ,मीडिया इत्यादि पर कातिलाना हमला कर रहे हैं। चाहे वह इंदौर का मामला हो, बिहार हो, मुजफ्फरपुर हो, मुरादाबाद हो । अब महिलाएं भी इसी अंधी दौड़ में शामिल हैं । क्या आप नहीं चाहते कि आप स्वस्थ रहें, आपका परिवार स्वस्थ रहे , आपकी कम्यूनिटी सुरक्षित रहे, देश सुरक्षित रहे । क्या यह देश आपका नहीं ? क्या आप इस देश के बाशिंदे नहीं ? क्या आपने अब तक यहाँ कोई सुख सुविधा नहीं उठाई? क्या आपने इस धरती में जन्म नहीं लिया? क्या आपको इन्ही डाक्टर्स ने कभी किसी भी बीमारी में आपकी चिकित्सा नहीं की ? क्या आपका इलाज इन डॉक्टर्स के द्वारा नही किया गया? क्या आप अपनी शिकायत लेकर इसी देश की पुलिस के पास नहीं गए ? क्या आपके लिए ये मीडिया कवर नहीं करती ? जिन पर आपको गर्व होना चाहिए था , जिन पर आपको पुष्प बरसाने चाहिए थे उन पर आपने पत्थर बरसा दिये ?? उन पर थूक रहे हैं !! शर्मनाक है ये आपका कृत्य !! आपको सोचना होगा ये देश आपका भी है । आप अपनी सोच के चलते पूरे देश का अहित नहीं कर सकते । कहीं न कहीं इस स्थिति में आपके आपने बच्चे, आपके अपने भी कष्ट को झेलेंगे ।

रखिए अपने दिलों पर हाथ और कहिए, मैं गलत कह रही हूँ । फिर आप देश के लिए, अपनों के लिए, अपने लिए खतरा क्यों बन रहे? देश से, देश की सरकार के साथ लड़ने के लिए आपका जिंदा रहना भी तो जरूरी है। जीवित होंगे तभी तो लड़ेंगे। जीवित रहने के लिए उन सभी बातों का मानना बहुत जरूरी है जो सरकार द्वारा , डब्ल्यू एच ओ द्वारा और चिकित्सकों द्वारा बताई जा रही हैं या बताई गयी हैं । वो ही आपके हित में है।

कुछ ऐसी ही मिलती जुलती स्थितियाँ मजदूरों की भी हैं । बिना सोचे समझे किसी की भी बातों में आकर स्टेशनों , बस अड्डों पर भीड़ जमा करना या अपने मन की सुन कर पैदल ही चल देना कोई बुध्द्धिमानी है क्या ? हजारों की संख्या में मुंबई, दिल्ली, नौएडा, गुजरात , सूरत, अहमदाबाद इत्यादि बड़े-बड़े शहरों में काम के लिए गए हुये  मजदूर जो इन शहरों में ज़मानों से बसे हुये थे, पलायन कर गए क्योंकि उन्हे यह डर सता रहा था कि ये भयंकर बीमारी हमको लग गयी तो हम मर जायेंगे । हमारे पास पैसा नहीं है कोई घर वाला साथ नहीं है । वो तो आज भी नहीं हैं क्योंकि इन शहरों से भागे हुये मजदूर कहीं न कहीं रोक दिये गए। या जो अपने गांवों तक पहुँच भी गए उन्हे गाँव वालों ने नहीं घुसने दिया जब तक वह पूरी तरह से स्वस्थ घोषित न कर दिये गए ।

आइए अब जानते है इसके पीछे का कारण :-

  • वे निर्धन रेखा के नीचे गुजर बसर करने वाले दिहाड़ी मजदूर है जिन्हे अपनी व अपने परिवारों कि चिंता है । उनकी दुनिया बस आज की ही होती है । वे रोज टी वी, रेडियो , समाचार पत्रों, सोशल नेवर्किंग के माध्यम से ये जानकारी पा रहे है महामारी घोषित, अर्थव्यवस्था चरमराई। और तो और रोज कहीं न कहीं संक्रमित मरीज मिलते जा रहे है और उनमें से कुछ मर भी रहे है । मीडिया द्वारा खूब हाइलाइट कर के बताया भी जाता है । जिससे उनके मनों में भय व्याप्त हो गया है कि इस बीमारी का मरीज मरेगा ही ।
  • संक्रमित लोगों को यह डर भी सता रहा है कि यदि हमने अपने संक्रमित होने की बात उजागर कर दी तो लोग मुझे कोरोना पॉज़िटिव समझेंगे और मुझे हेय दृष्टि से देखेंगे । जैसा कि हम अभी देख भी रहे हैं कहीं किसी कॉलोनी में कोई कोरोना पॉज़िटिव पाया जाता है वहाँ के लोगों की प्रतिक्रिया कुछ इस तरह से होती है ; “हाय देखो-देखो उस कॉलोनी में पकड़ा गया एक और कोरोना ।” जैसे कि वह कोरोना पॉज़िटिव न होकर एक खूंखार मुजरिम हो । जिसे पकड़ा गया है ।
  • अधिक दयालुता दिखाना या अधिक सख्त रवैया भी आड़े आ रहा है । दयालुता का भी लोग गलत मतलब निकाल रहे हैं। सख्ती तो है ही सख्त ! अगर सख्ती न हो तो स्वयं वो निकलेंगे नहीं और जबरिया ढूंढ कर निकाले जाने पर तमाशे करेंगे ।

शब्दों का प्रयोग सोच समझ कर किया जाये खासकर आम जनता और मीडिया को ये अवश्य ही समझना होगा कि कोरोना पॉज़िटिव कोई मुजरिम नहीं है जिसके लिए पकड़ा गया जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाये । कल कोई भी पॉज़िटिव हो सकता है, आप भी ! तब सोचिए कैसा महसूस होगा । समझने की जरूरत है कोरोना संक्रामक बीमारी है जो छूने से फैल रही है, एक दूसरे के संपर्क में आने से फैल रही है । संक्रमित व्यक्ति के द्वारा छिंकने , खाँसने के द्वारा जो सूक्ष्म जल बिन्दु या कण (ड्रापलेट्स) किसी के ऊपर चले जाने से या उन छींटों के किसी वस्तु पर गिरने से वह तुरंत संक्रमण की चपेट में आ जाएगा । समझने की जरूरत है कि सामान्य व्यक्ति द्वारा उन संक्रमित वस्तुओं को छूये जाने से या संक्रमित व्यक्ति द्वारा सामान्य व्यक्तियों या वस्तुओं को छूये जाने पर तुरंत संक्रमण की चपेट में आ जाएंगे। और ऐसे संक्रमित व्यक्ति जिस-जिस वस्तु , व्यक्ति, जीव, जन्तु को छुएंगे वे उस सबको संक्रमित करते जाएंगे । यहाँ समझना होगा इस बीमारी की भयावहता । जैसा कि हम सभी जानते है कि चेचक , खसरा , तपेदिक तथा सामान्य फ्लू में भी संक्रमण का खतरा होता है । यद्यपि इन सभी बीमारियों का वैक्सीन मौजूद है । इसलिए इसको लेकर कोई भयभीत नहीं है । कोरोना की वैक्सीन अभी मिल नहीं पायी है क्योंकि यह हमारे देश में नयी है , चिकित्सक दल , वैज्ञानिक दल लगे हुये हैं ताकि अति शीघ्र वैक्सीन मिल जाये ।

नयी बीमारी है इस कारण हम सभी कहीं न कहीं इसके आंकड़े एकत्र करके उसको जान लेना चाहते है। इसके कारण पूरा दिन टीवी चैनलों पर , अखबारों में, सोशल मीडिया इत्यादि देख-देख कर अपना दिमाग खपा रहे हैं। ये सब भी मानसिक अवसाद का कारण बन रहा है, जो लोग घरों के अंदर बंद है वे पूरा- पूरा दिन टीवी के समक्ष बिता रहे हैं, सब आपस में झगड़े का कारण बन रहा है । मानसिक अवसाद में आप, अपनों पर भड़ास निकाल रहे है। खुद तो तनावग्रस्त हैं ही, अपना तनाव उन्हे दे रहे है । ये है इसकी भयावहता ।

डब्ल्यू एच ओ द्वारा बताये गये नियमों का पालन करते रहें मुँह और नाक को कवर करके निकलें । इसके लिए सर्जिकल मास्क लगाना कोई जरूरी नहीं है । क्योकि आप उसकी उतनी सफाई नहीं रख पाएंगे । बार-बार खरीदना मुश्किल होगा इसलिए घर पर बने मास्क का उपयोग करें । कई सारे मास्क बनवा लीजिये । अन्यथा अँगौछा, तौलिया , दुपट्टा, स्टोल जो जिसको सूट करता है अपने अनुसार लेकर मुँह और नाक को कवर करके निकलें । मास्क के विषय में एक मुख्य बात कह यह कि यदि लोगों ने मास्क उतार कर उनको तुरंत नष्ट नहीं किया और उनको खुला सड़क पर फेंक दिया, कोई न कोई जानवर भोजन कि अभिलाषा में इस पर मुँह मारेगा और तब परिणाम बेहद घातक होंगे । ये है इसकी भयावहता । ऐसी दशा में जबकि कोरोना का सुरूर सब पर हावी हो गया है यहाँ जरूरत है कि हम अपना सुरूर कम करें, टीवी कम देखें जितना जरूरी हो उतना ही देखें । जानकारी रखें । बचाव रखें क्योकि बचाव ही निदान है। भयभीत न हों भयावहता को समझें और लोगों को समझाएँ ।

डॉ अन्नपूर्णा बाजपेयी, वरिष्ठ साहित्यकार एवं समाजसेवी, कानपुर।  

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