निर्भया के बाद मीटू के समय में स्त्री की स्थिति!

सोनाली मिश्र

लीक पीटी जानी थी, लिक पिट गयी! निर्भया के जाने के बाद जितना कहा जाना था उतना कहा गया और फिर से एक शान्ति स्थापित हो गयी! कई बार कई आन्दोलनों को देखकर लगता है कि इनका अंत क्या हुआ और क्या हो सकता था? हमने सबने नम आँखों से निर्भया को याद किया और अपने अपने रस्ते चले गए! अंत क्या हुआ? क्या स्त्रियों पर होने वाली हिंसा की घटनाएं रुक गईं? क्या स्त्रियाँ सुरक्षित हुईं? आइये हम एक एक मुद्दे पर रोज़ बात करते हैं, आज बात करते हैं, कार्यस्थान पर होने वाले यौन उत्पीडन के बारे में! कार्यस्थान पर स्त्रियों के साथ होने वाला यौन उत्पीड़न आज की बात नहीं है, यह हमेशा से चलता चला आया है, परन्तु अब इसमें एक जो नई बात जुड़ गयी है वह है मीटू का दोतरफा शिकार होना!

सोनाली मिश्र, sonalitranslators@gmail.com

एक तरफ स्त्रियाँ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं तो दूसरी तरफ मीटू अभियान में अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के बारे में बताने के कारण नौकरी खोने के भय से भी दो चार हो रही हैं।  पिछले चार वर्षों में स्त्रियों के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के आंकड़ों में वृद्धि देखी गयी है।  उत्तर प्रदेश भारत का ऐसा राज्य है जहां पर कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न के सबसे अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। सरकार ने जो आंकड़े उपलब्ध कराए हैं, उसके अनुसार उत्तर प्रदेश में यौन उत्पीड़न के कुल 726 मामले दर्ज किए गए। यह देश भर में दर्ज ऐसे मामलों के 29 प्रतिशत के लगभग है। इसके बाद नंबर आता है दिल्ली का, जिसमें सत्ता में जो पार्टी है, वह महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे के आधार पर ही आई थी,  यहाँ पर 369 मामले दर्ज किए गए और उसके बाद महिलाओं के प्रति कट्टर मानसिकता के रूप में कुख्यात राज्य हरियाणा है, यहाँ 171 मामले दर्ज किए गए। पूर्वोत्तर में मेघालय और मणिपुर ऐसे राज्य हैं जहाँ पर कोई भी मामला दर्ज नहीं करा गया।

यह बात तो सच है कि स्त्रियों के साथ यौन उत्पीडन बंद नहीं हुआ है, यह कम भी नहीं हुआ है, हकीकत तो यह है कि आज स्त्रियाँ कुछ कारणों से अधिक प्रताड़ित हो रही हैं, कुछ महिलाओं ने #metoo अभियान का फायदा उठाते हुए दस बीस साल पुराने मामलों के बारे में मीडिया में शोर मचाया। हो सकता है कि वह सभी मामले सच हों, यह भी हो सकता है कि आधे सच हों! मगर शोबिज़ और मीडिया की स्त्रियों ने इस तरह से इस मुद्दे को उछाला कि ऐसा लगने लगा कि भारत का हर व्यक्ति बलात्कारी ही है।  कई मामले तो आपसी मतभेद के भी थे और उन्हें भी यौन उत्पीड़न की तरह प्रस्तुत कर दिया। जिनमें चेतन भगत के साथ वाला मामला काफी चर्चित रहा, और मीडिया कर्मियों के द्वारा चलाए गए अभियानों में एक और ख़ास बात रही कि अधिकतर शिकायतें महज़ मीडिया की सुर्खियाँ बनकर रह गईं!

जहां एक तरफ यह बहुत ही अच्छी बात है कि लडकियां आज अपने साथ होने वाले अपराधों के खिलाफ आवाज़ उठा रही हैं, वहीं यह भी है कि कुछ स्त्रियों द्वारा उठाए गए कुछ गलत क़दमों ने उन्हें चार कदम पीछे कर दिया है। कार्यस्थल पर होने वाले उत्पीड़न को कम करना भी स्त्रियों के हाथ में है।  जैसे ही उन्हें पहली बार आभास हो, वैसे ही इसके विरोध में आवाज़ उठानी चाहिए, हालांकि यह कहना बहुत ही आसान है क्योंकि कभी कभी उत्पीडन करने वाला व्यक्ति बड़े पद पर होता है, ऐसे में स्त्रियों को स्वयं में साहस बनाए रखने की आवश्यकता होती है।

स्त्री को अपनी अस्मिता के लिए हर कदम उठाना ही होगा, हर हाल में! कार्यस्थल पर वह कैसे इस दुधारी तलवार पर चलकर नया रास्ता बनाती है, सब कुछ उस पर ही निर्भर करता है। जरूरत है शिकायत करने के लिए लिए सही मंच का चुनाव करने की, सही प्रक्रिया की, और सही साथियों की।

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