आदमियत के मिज़ाज में इतना ज़बरदस्त बदलाव !

रितु शर्मा

चिलचिलाती धूप में एक पेड़ की छांव तले बने प्याऊ मानवीय करुणा के प्रतीक से कम नहीं, लेकिन पीने के गिलासों को चेन में बँधा देखकर हैरानी होती है. शायद ठीक भी होगा, क्योंकि आदमी की नीयत का क्या भरोसा, पानी पीने के बाद बर्तन भी साथ रख ले जाये. तालों में भगवान, चोरी के फूल और  पैसे चुकाये पण्डित के श्लोकों  से पूजा करवाई जा सकती है तो बाकी कि बात ही क्या! अनार के फलों से लदा पेड़ उस पर ढके गये कपड़े में भीतर कसमसाता साँस लेने की गुहार अपने उस मालिक से करता है जो फसल खत्म होते ही इस बांझ पेड़ को आँगन से निश्चत ही उखाड़ फेकेगा एक दिन. आदमी की नीयत इस ‘मैं’ और ‘मेरे’ में उलझकर मर गयी है.

बच्चों के ललाट पर काले टीके तक तो बात समझ आती भी थी, लेकिन फूल पौधों पर भी मालकियत की चाह, बड़ी खतरनाक मालूम होती है. शायद कोई मौजी राह से गुज़रते हुए आनंद में भर उठता.पर वो हक़ भी नीयत ने छीन लिया है. और तो और ट्रेन में सफर करता आदमी भी अपने जूते सिरहाने रखकर सोता है, पता नहीं कौन पार कर ले जाये?! अपना घर साफ रखने की चाह रखने वाले खाली प्लॉट पर कूड़े का पहाड़ लगाये चले जाते हैं, और दुर्गंध को नाक सिकोड़कर पास से निकल जाते हैं. शहरों में बसने वाले सभ्य अपने घरों की दीवालें दूसरे से और ऊँची कर लेते हैं साफ संदेश है “डू नॉट डिस्टर्ब”. इंसान के विस्तार का स्वभाव इन ऊँची दीवारों में सीमेंट सा जम गया है. आनंद कहां से आये? अपने जीवन की व्यस्त दिनचर्या को शान से निभाते लोग एक दूसरे को देखकर मुस्कुराना ही भूल गये हैं. ओह! देखने का मौका मिलेगा तब ही तो मुस्कुरायेंगे न !

                  आदमियत के मिज़ाज में इतना ज़बरदस्त बदलाव ! किसी अनहोनी का संकेत तो नहीं? इतने मुखौटे हैं कि असली की पहचान के लिये शायद कभी ट्रेनिंग स्कूल खोले जा सकते हैं. स्वार्थ की महामारी की चपेट में आने वाले उस कुत्ते की कराह किसी ने न सुनी होगी जो गलती से उस सडक के किनारे सो गया था, जिस पर कोई सोया हुआ कर्मवीर गर्म डामर बिछा गया होगा. सह- अस्तित्व को भूलते लोग अपनी ही ज़मीन को खोखला करने में लगे हैं. ठीक ही कह गये हैं ग़ालिब , बस-कि दुश्वार है हर काम का आसां होनाआदमी को भी मयस्सर नहीं इन्साँ होना.

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