भारतीय प्लाज्मा अनुसंधान के प्रतीक का चले जाना

नवनीत कुमार गुप्ता

@NavneetKumarGu8

नई दिल्‍ली, 21 जून (इंडिया साइंस वायर) : प्रसिद्ध भौतिक-विज्ञानी एवं भारतीय प्लाज्मा अनुसंधान के जनक प्रोफेसर पी.के. कॉव का हाल में निधन होने से देश ने एक प्रतिभाशाली वैज्ञानिक को खो दिया है। प्रोफेसर कॉव देश के उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में शुमार किए जाते थे, जो वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय में भारत की पहचान बन चुके थे।

18 जून, 2017 को भारत प्रोफेसर पी.के. कॉव का निधन हो गया था। प्रोफेसर पी.के. कॉव लंबे समय तक प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान के निदेशक रहे। वह इस संस्थान के संस्थापक निदेशक थे। गुजरात के गांधीनगर में स्थित प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान, भारत में प्लाज्मा से संबंधित शोध के लिए समर्पित देश का यह स्वायत्त संस्थान परमाणु उर्जा  विभाग के अंतर्गत कार्य करता है।

कॉव का जन्म आजादी के कुछ ही महीनों बाद 15 जनवरी, 1948 को हुआ था। कश्मीर में जन्मे कॉव की आरंभि​क पढ़ाई भी घाटी में ही हुई और कुछ समय बाद वह दिल्ली आ गए। 16 साल की उम्र में उन्होंने एमएससी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। आरंभ से ही मेधावी रहे कॉव ने 18 साल की उम्र में ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, नई दिल्ली से पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर ली थी।

उन्होंने अपना करियर वर्ष 1967 से प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी में पोस्ट डॉक्टरेट फेलो के रूप में शुरू किया था। 1971 में भारत लौटने पर उन्होंने अहमदाबाद में स्थित भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्य आरंभ किया। यहां अपने महत्वपूर्ण शोध कार्यों के चलते वह 1974 में प्रोफेसर बने। 1975 में एक बार फिर वह प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी चले गए, जहां उन्होंने सात साल तक खगोल-भौतिकी के क्षेत्र में कार्य किया।

इस दौरान उनका मन भारत में कार्य करने को उत्साहित था। इसीलिए उन्होंने वभारत लौटकर प्लाज्मा अनुसंधान के क्षेत्र में कार्य करना आरंभ किया। संस्थापक निदेशक के रूप में उन्होंने प्लाज्मा अनुसंधान संस्थान की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह लगभग 20 सालों तक इस संस्थान से जुड़े रहे और उन्होंने इस संस्थान को  अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई।

प्लाज्मा पदार्थ की चौथी अवस्था है, जिसके गुण अनूठे होते हैं। पदार्थ की यह अवस्था अन्य अवस्थाओं से अलग गुणधर्म रखती है। इसके अनेक औद्योगिक एवं वैज्ञानिक अनुप्रयोग हैं। जब किसी गैस को बाहरी ऊर्जा देकर आयनित किया जाता है तो वह प्लाज्मा अवस्था कहलाती है। वैसे तो हमारे ब्रह्मांड का लगभग 98 प्रतिशत प्लाज्मा अवस्था में है। लेकिन हम कृत्रिम रूप से भी प्लाज्मा का निर्माण कर सकते हैं।

प्लाज्मा का उपयोग सामाजिक उद्देशयों में भी किया जा रहा है। अस्पतालों के विषैले एवं संक्रमित कचरे को पर्यावरण हितैषी तकनीक द्वारा निपटान करने में प्लाज्मा तकनीक का उपयोग हो रहा है। प्रोफेसर पी.के. कॉव विश्व के सबसे बड़े वैज्ञानिक प्रयोगों में से एक अंतरराष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र से भी जुड़े रहे।

अंतरराष्ट्रीय ताप-नाभिकीय प्रायोगिक संयंत्र ऊर्जा की कमी की समस्या से निपटने के लिए भारत सहित विश्व के कई देशों द्वारा अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के सहयोग से मिलकर बनाया जा रहा संलयन नाभिकीय प्रक्रिया पर आधारित ऐसा विशाल रिएक्टर है, जो कम ईंधन की सहायता से ही अपार ऊर्जा उत्पन्न करेगा। सस्ती, प्रदूषण-विहीन और असीमित ऊर्जा पैदा करने की दिशा में हाइड्रोजन बम के सिद्धांत पर इस नाभिकीय परियोजना को प्रयोग के तौर पर शुरू किया गया है। संलयन से उसी प्रकार से ऊर्जा मिलेगी, जैसे पृथ्वी को सूर्य या अन्य तारों से मिलती है।

असल में प्रोफेसर कॉव जैसे वैज्ञानिकों की वैज्ञानिक क्षमताओं के मद्देनजर ही भारत को इस परियोजना में शामिल किया गया है। इस परियोजना के अंतर्गत पहला प्रायोगिक रिएक्टर वर्ष 2019 तक बनकर तैयार हो सकता है, जिससे 500 मेगावाट बिजली पैदा हो सकेगी। यह रिएक्‍टर कामयाब रहा, तो इसके आधार पर बड़ा ताप-नाभिकीय रिएक्टर बनाया जाएगा, जो व्यावसायिक स्तर पर विद्युत पैदा करेगा। यह रिएक्‍टर वर्ष 2038 तक बनने की उम्मीद है।

प्रोफेसर कॉव हमेशा नाभिकीय संलयन अभिक्रिया के शांतिपूर्ण उपयोग के पक्षधर थे। उन्होंने 300 से अधिक शोध लेख लिखे और टोकामक के निर्माण में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। टोकामक गरम प्लाज्मा को एक निश्चित आयतन में बनाए रखने के लिये डिजाइन की गई एक विशेष विधि एवं संयंत्र का नाम है। सबसे पहले इसका विकास वर्ष 1950 में रूस के वैज्ञानिकों ने किया था। असल में यह ‘संलयन रिएक्टर’ के निर्माण के लिए जरूरी होता है। इसकी सहायता से छल्लाकार चुम्बकीय क्षेत्र निर्मित होता है।

शोध कार्यों के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए गए। उन्हें युवा वैज्ञानिक पुरस्कार प्रदान किया गया था। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा था कि युवा वैज्ञानिक सम्मान मिलने से वह काफी उत्साहित हुए थे और विज्ञान के क्षेत्र में कार्य करने की उनकी प्रतिबद्धता और बढ़ गई थी। इसके बाद उन्‍होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके साथ ही पुरस्‍कारों और सम्मानों से नवाजे जाने का सिलसिला भी चलता रहा। वर्ष 1985 में उन्हें पद्मश्री सम्मान दिया गया। इससे पहले 1986 में शांतिरूवरूप भटनागर पुरस्कार एवं 2016 में लेसर-प्लाज्मा अंत:संबंधों के लिए प्लाज्मा भौतिकी का सुब्रमण्‍यन चंद्रशेखर पुरस्कार मिल चुका था। (इंडिया साइंस वायर)

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