कश्मीरी पंडितों से रोहिंग्याओं की तुलना गलत है

राकेश दुबे

सोशल मीडिया पर  लेखक जावेद अख्तर का एक टिप्पणी ट्रोल हो रही  है |  इस टिप्पणी की पुष्टि नहीं हुई है, पर इस टिप्पणी का में वर्णित तथ्य अगर कहे गये  हैं, तो वे बेहद घातक हैं | इस टिप्पणी में कश्मीरी पंडितों और रोहिंग्या मुसलमानों की तुलना की गई है | टिप्पणी में भारत के भू भाग पर दोनों का स्वत्व एक समान दर्शाया  गया है | वैसे भी सामान्य दृष्टि से देखने पर इस दोनों मामलों में स्वत्व की स्थिति अलग-अलग है | कश्मीरी पंडित भारत में जन्मे हैं, यही पले- बड़े हैं और रोहिंग्या शरणार्थी और घुसपैठिये हैं | भारत सदियों से शरण देता आया है, इस आड़ में घुसपैठ भी होती रही है |रोहिंग्या क्या हैं ? और समस्या क्या है ? इस पर कुछ मित्रों ने इस टिप्पणी के ट्रोल होने  बाद जानना चाहा |

 दरअसल रोहिंग्या म्यांमार के उत्तर पश्चिमी छोर पर बांग्लादेश की सीमा पर बसे रखाइन प्रांत के रहने वाले हैं। म्यांमार सरकार की २०१४  की जनगणना के अनुसार, रखाइन प्रांत की आबादी करीब २१  लाख है | । इस रिपोर्ट के अनुसार इनमें से  10 लाख लोग भी इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं और इन्हीं को रोहिंग्या मुसलमान कहा जाता है। अल जज़ीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार, १२ वीं – १३ वीं सदी से ये मुसलमान म्यांमार में रह रहे हैं। म्यांमार में १३५  आधिकारिक जातीय समूह रहते हैं जिनमें रोहिंग्या को शामिल नहीं किया गया है। अलजज़ीरा के अनुसार, १९८२ तक म्यांमार की सरकार इन्हें अपने देश का नागरिक मानती थी , लेकिन १९८२  में इनकी नागरिकता समाप्त कर दी गई। कुछ सालों से चल रही हिंसा के कारण हज़ारों रोहिंग्या ने म्यांमार छोड़ दिया है और वे पड़ोसी राज्यों में भाग रहे हैं या सालों से नावों पर ही रहे हैं। भारत में कई देशों के शरणार्थी रहते हैं, जिनकी  लाखों में है | १९४८  में जब म्यांमार को ब्रिटिश शासन से आज़ादी मिली तब यूनियन सिटिज़नशिप ऐक्ट पास हुआ, जिसमें ये परिभाषित किया गया कि कौन सी जातियां वहां नागरिकता हासिल कर सकती हैं। येल लॉ स्कूल में अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार क्लिनिक की २०१५  की रिपोर्ट के मुताबिक, इस ऐक्ट में रोहिंग्या को शामिल नहीं किया गया था।

 १९६२  में म्यांमार में सैन्य तख्तापलट के बाद, रोहिंग्याओं के लिए चीजें बदल गईं। यह ज़रूरी हो गया कि सारे नागरिकों के पास राष्ट्रीय पंजीकरण कार्ड हों। रोहिंग्या, जिनके पास सिर्फ विदेशी पहचान पत्र थे, जिसमें नौकरी और शिक्षा के सीमित अवसर दिए गये थे। १९८२  में म्यांमार में एक नया नागरिक कानून पास हुआ, जिससे प्रभावी रूप से रोहिंग्या को राज्यविहीन कर दिया गया। कानून के मुताबिक, इस बार भी रोहिंग्या को १३५ जाति समूहों में शामिल नहीं किया गया। इस कानून ने नागरिकता की तीन स्तरों की स्थापना की। सबसे बुनियादी स्तर (प्राकृतिक नागरिकता) की नागरिकता प्राप्त करने के लिए यह साबित करना ज़रूरी था कि व्यक्ति 1948 से म्यांमार में रह रहा हो, इसके साथ ही उसे एक राष्ट्रीय भाषा बोलनी आती हो। ज़्यादातर रोहिंग्या के पास ऐसा कोई सबूत नहीं था कि वे वहां १९४८  से रह रहे हैं। इस कानून के परिणाम के अनुसार, उनके शिक्षा, काम, यात्रा, विवाह, नौकरी, स्वास्थ्य सेवाएं और धार्मिक कार्यों के अधिकारों पर रोक लगा दी गई। रोहिंग्या वोट नहीं दे सकते थे। ये ही लोग भारत में शरण लेकर या घुसपैठ से दाखिल हो गये और अब भारत में नागरिकता पाने की हर सम्भव जुगाड़  कर रहे हैं |

 भारत्त सरकार भी इन्हें यहाँ कुछ कारणों से नहीं रखना चाहती | रोहिंग्या मुस्लिमों को वापस म्यांमार भेजने की योजना पर केंद्र सरकार ने १६  पन्नों का हलफनामा दायर किया है। इस हलफानामे में केंद्र ने कहा कि कुछ रोहिग्या शरणार्थियों के पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों से संपर्क का पता चला है। ऐसे में ये राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरा साबित हो सकते हैं। आतंकी कनेक्शन की खुफिया सूचना केंद्र ने अपने हलफनामे में साथ ही कहा, ‘जम्मू, दिल्ली, हैदराबाद और मेवात में सक्रिय रोहिंग्या शरणार्थियों के आतंकी कनेक्शन होने की भी खुफिया सूचना मिली है। वहीं कुछ रोहिंग्या हुंडी और हवाला के जरिये पैसों की हेरफेर सहित विभिन्न अवैध व भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल पाए गए।

इस हलफनामे के बाद अगर जावेद अख्तर ने कश्मीरी पंडितों से इनकी तुलना करते है तो यह तत्थ्यात्मक रूप से ही गलत है | कोई घुसपैठिया या शरणार्थी  इस देश में पैदा नागरिक के बराबर कभी हो ही नहीं सकता | रहा सवाल शरण देने का तो उसकी सीमा भारत सरकार को स्पष्ट रूप से फौरन तय करना चाहिए |

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