केजरीवाल और जिग्नेश ……. : सामाजिक आन्दोलन के विफल राजनीतिक नेता

सोनाली मिश्रा

 जिग्नेश की कल की फ्लॉप रैली के चलते यह प्रश्न बार बार कौंधेगा ही कि क्या अरविन्द केजरीवाल ने आने वाले सभी वैकल्पिक नेताओं के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर दी है? प्रश्न कई हैं और उसके साथ प्रश्न यह भी होगा कि जब सामाजिक आन्दोलन से उभरे हुए नेता राजनीति में आते हैं तो उन्हें विफलता क्यों मिलती है? क्या बाबा भारती का यह डर सही साबित हो गया है कि, फिर अपाहिज पर कोई भरोसा नहीं करेगा? राजनीति में नए लोगों के लिए आना ये सब धोखे कठिन न कर दें, यह भी देखना ही होगा!

कहानी हार की जीत, बाबा भारती का खडग सिंह से यह कहना कि “घोड़ा ले जाओ, मगर किसी से इस घटना का ज़िक्र न करना, क्योंकि आज के बाद फिर कोई किसी अपाहिज पर विश्वास न करेगा.” और इस घटना के बाद डाकू खड़गसिंह का मन बदलता है और वह एक भारी संघर्ष के बाद बाबा भारती को घोडा वापस कर देता है. बाबा भारती को जितना आनंद उस घोड़े को पाकर होता है, उससे कहीं अधिक अपने विश्वास के विजयी होने का आनंद आता है. मगर हर बार ऐसा हो, यह नहीं कहा जा सकता है. कई बार ऐसा नहीं होता, बाबा भारती के लिए खड़गसिंह हर बार नहीं बदलता. उसे बदलना ही नहीं होता है क्योंकि उसने स्वार्थ के वशीभूत होकर ही भेष धरा होता है. यह बहुत ही विकट स्थिति होती है. और जब यह स्थिति राजनीति में हो, तब ऐसे डाकू आने वाले सभी नेताओं के लिए मार्ग अवरोधक का कार्य करते हैं.

राजनीति में धोखे की कहानी कुछ नई नहीं है, क्योंकि धोखे का नाम ही राजनीति है. मगर सामाजिक आन्दोलनों के नाम पर राजनीति जब की जाती है तो कहीं न कहीं न केवल सामाजिक आन्दोलन प्रभावित होते हैं, वहीं राजनीति भी प्रभावित होती है. ऐसे सामाजिक आन्दोलनों से उभरने वाले नेता कहीं न कहीं खो जाते हैं. या सामाजिक आन्दोलनों की सफलताओं से भ्रमित होकर वे स्वयं को एक ऐसा नेता या ऐसा सुधारक समझने की भूल कर बैठते हैं, जो श्रेष्ठ ही नहीं सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे में जब उनके सामने राजनीतिक जीवन की पहली सामाजिक आन्दोलन की असफलता आती है तब वे बेचैन हो जाते हैं. वे इस असफलता को पचाने में अक्षम होते हैं. ऐसे बुलबुले टाइप के नेताओं के लिए असफलता को पचाना बहुत ही आवश्यक होता है. नहीं तो इस असफलता की कुंठा किसी और पर निकालते हैं.  वे महिलाओं पर भद्दे भद्दे कमेन्ट करते हैं और देश की सत्ता और व्यवस्था को कोसते हैं.  और अंतत: किसी अँधेरे कोने में खोना ही उनकी नियति बन जाता है. ऐसा नहीं है कि उनका अस्तित्व नहीं रहता, उनका अस्तित्व तो रहता है, मगर उसकी महत्ता खो जाती है.

कल नई दिल्ली में एक नए नए आन्दोलनकारी नेता की सभा दिल्ली में हुई थी. वह ऐसे राजनेता हैं, जिन्हें लोकतांत्रिक तरीके से चुने गए प्रधानमंत्री जी से कुछ प्रश्न पूछने थे और जो उन्हें दिल्ली के दिल में पूछने थे, और यह प्रश्न था कि आखिर देश किससे चलेगा, मनु स्मृति से या संविधान से. इन नए नए नेता से यह पूछना चाहिए कि वे एक भी प्रधानमंत्री के भाषण दिखाएं या सुनाएं जिसमें उन्होंने मनुस्मृति का हवाला दिया हो, जिसमें उन्होंने संविधान का अपमान किया हो? वे बार बार संविधान को ही सबसे बड़ी किताब कह रहे हैं. वैसे तो कहने और करने पर किसी का वश नहीं है, मगर इन नए नवेले अंकुरित हुए नेता से यह जरूर पूछना चाहिए कि इनकी बिरादरी वालों ने कब संविधान को माना है. कल की भी रैली में वही लोग शामिल थे, जो भारत तेरे टुकड़े होंगे, इंशा अल्लाह अल्लाह, गा आरहे थे. जो देश को बार बार धर्म और जाति के आधार पर बांटने का प्रयास कर रहे हैं. संविधान में स्पष्ट रूप से समान नागरिक संहिता की बात की गयी है, जबकि न केवल नए नवेले नेता बल्कि इसी आन्दोलन की धार पर चलकर अपनी एक राजनीतिक पार्टी बनाने वाले नेता श्री अरविन्द केजरीवाल भी इस मुद्दे पर मुंह नहीं खोलते हैं.  जब समान नागरिक संहिता की बात आती है तो सभी को सांप सूंघ जाता है, वे कुछ भी बोलने के स्थिति में नहीं होते हैं.

खैर, समस्या हमेशा ही इस दोहरेपन से होती रहेगी. मगर ऐसा क्या हुआ कि जिस नेता के एक भाषण ने केवल दो दिन में महाराष्ट्र जला दिया, उसी नेता की दिल्ली की कथित हुंकार रैली में बामुश्किल तीन सौ लोग आए? इस रैली का आयोजन गुजरात से विधायक और नए नवेले दलित नेता ने दलित नेता चंद्रशेखर रावण की आज़ादी के लिए और दलितों पर कथित अत्याचार के लिए किया था. हालाँकि दिल्ली में पुस्तक मेला चल रहा है, दिल्ली में लोग उस मेले के लिए निकल रहे हैं, कल भी हजारों की संख्या में लोग किताबें खरीदने पहुंचे. ऐसा भी नहीं था कि दिल्ली की जनता को यह नहीं पता था कि ऐसा कोई आयोजन हो रहा है, क्योंकि इस आयोजन के किस्से कई दिनों से मीडिया में थे. तो ऐसा क्या हुआ कि दिल्ली के लोग पुस्तक मेला में तो पहुंचे, मगर इस युवा हुंकार रैली में हुंकार करने नहीं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस तरह भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन करने वाले अरविन्द केजरीवाल नेता बनकर आज सबसे बड़े भ्रष्टाचारी बनकर उभरे हैं, वैसे ही दलितों के अत्याचार के नाम पर रैली करने वाले जिग्नेश कल सबसे बड़े जातिवादी बनकर उभरें या उन्हीं शक्तियों के साथ हाथ मिला लें, जिनका दलित उत्पीडन का इतिहास रहा है. नरेंद्र मोदी से सवाल पूछने वाले जिग्नेश कभी वाम दलों से यह पूछने का साहस करेंगे कि आखिर उन दलों में कितना दलित प्रतिनिधित्व है? क्या दलित अधिकारों के लिए लड़ने वाले कथित उदारपंथी कभी इस विषय में अपनी बात उठाएंगे कि दक्षिण में जो दलित युवा लाल आतंक के ध्वज वाहकों के द्वारा मारे जा रहे हैं, उन्हें कब न्याय मिलेगा? ये सब मौन हैं? यहाँ तक कि अरविन्द केजरीवाल मौन हैं. अरविन्द केजरीवाल को सत्ता मिल गयी है, और अब वे प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं, इसीलिए वे अपने आप को बड़ा नेता बनाने के लिए हर संभव कदम उठा रहे हैं. जिसमें राज्यसभा में स्वजातीय दो ऐसे नेताओं को भेजा जाना शामिल है जो कहीं से भी भ्रष्टाचार के इस यज्ञ से जुड़े हुए नहीं रहे थे.

जिग्नेश की कल की फ्लॉप रैली के चलते यह प्रश्न बार बार कौंधेगा ही कि क्या अरविन्द केजरीवाल ने आने वाले सभी वैकल्पिक नेताओं के मार्ग में बाधा उत्पन्न कर दी है? प्रश्न कई हैं और उसके साथ प्रश्न यह भी होगा कि जब सामाजिक आन्दोलन से उभरे हुए नेता राजनीति में आते हैं तो उन्हें विफलता क्यों मिलती है? क्या बाबा भारती का यह डर सही साबित हो गया है कि, फिर अपाहिज पर कोई भरोसा नहीं करेगा? राजनीति में नए लोगों के लिए आना ये सब धोखे कठिन न कर दें, यह भी देखना ही होगा!

 

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