पहले स्वदेशी मौसम पूर्वानुमान मॉडल के निर्माता

डॉ. वसंत रणछोड़ गोवारिकर के जन्मदिवस  25 मार्च पर विशेष

  • नवनीत कुमार गुप्ता

Twitter : @NavneetKumarGu8

आज भारत, मानूसन पूर्वानुमान और अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में विश्व के विकसित देशों की श्रेणी में खड़ा है। लेकिन, आजादी के समय हमारा देश इन दोनों क्षेत्रों में विदेशों पर निर्भर था। स्वतंत्रता के बाद से ही विज्ञान के प्रति भारत की इच्छाशक्ति ने धीरे-धीरे अनेक क्षेत्रों में अपना स्थान बनाया। कई वैज्ञानिकों के कठिन परिश्रम और सफल नेतृत्व ने भारत को अनेक क्षेत्रों में अग्रणी पंक्ति में खड़ा कर दिया। 25 मार्च, 1933 को पुणे में जन्में डॉ. वसंत रणछोड़ गोवारिकर भी ऐसे ही वैज्ञानिकों में थे, जिन्होंने मौसम विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डॉ. गोवारिकर की बचपन से यांत्रिकी में गहरी रुचि थी। 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने चरखा द्वारा उत्पादित धागे के लिए स्वचालित विधि का आविष्कार किया था। महात्मा गांधी के सचिव महादेवभाई देसाई ने इस आविष्कार के लिए उनकी प्रशंसा भी की थी। तब शायद किसी को पता नहीं था कि एक दिन यह बालक देश के प्रख्यात वैज्ञानिकों में शामिल होगा।

डॉ. गोवारिकर ने बर्मिंघम विश्वविद्यालय, इंग्लैंड से रासायनिक अभियांत्रिकी में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी। डॉक्टरेट के दौरान डॉ एफएच गार्नर के साथ किए गए कार्यों से गार्नर-गोवारिकर सिद्धांत का प्रतिपादन हुआ। इस प्रसिद्ध सिद्धांत की सहायता से ठोस और तरल पदार्थ के बीच ऊष्मा और द्रव्यमान हस्तांतरण की विशिष्ट व्याख्या की जा सकी।

वर्ष 1959 से 1967 तक इंग्लैंड में अपने प्रवास के दौरान उन्होंने पहले हार्वेल में स्थित (ब्रिटिश) परमाणु ऊर्जा अनुसंधान संस्थान में काम किया और फिर रॉकेट मोटर्स के उत्पादन में लगे एक संगठन समरफील्ड में कार्य किया। 28 वर्ष की आयु में उन्हें कैंब्रिज और ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट के लिए एक परीक्षक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने पेर्गमॉन के बाहरी संपादकीय स्टाफ के रूप में भी काम किया, जहां उन्होंने कई वैज्ञानिक पुस्तकों के संपादन में मदद की।

वर्ष 1965 में डॉ. गोवारिकर और विक्रम साराभाई ने टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान में उपग्रह प्रौद्योगिकी पर काम करना आरंभ किया गया। यहां काम करते हुए वह पॉलिमर केमिस्ट्री के क्षेत्र में प्रसिद्ध हो गए। आगे चलकर डॉ विक्रम साराभाई की प्रेरणा से डॉ. गोवारिकर वर्ष 1967 में तिरुवनंतपुरम स्थित थुम्बा के अंतरिक्ष केंद्र आ गए। जहां वह एक अभियंता के रूप में कार्य करने लगे। वर्ष 1972 में इस केंद्र सहित अंतरिक्ष अनुसंधान से संबंधित अन्य केंद्रों को विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी) के अंतर्गत लाया गया।  वर्ष 1973 में डॉ. गोवारिकर रसायन एवं सामग्री समूह के निदेशक बने और वर्ष 1979 में उन्हें केंद्र का निदेशक बनाया गया। इस पद पर उन्होंने 1985 तक अपनी सेवाएं दीं। वीएसएससी के निदेशक के रूप में उनके कार्यकाल में ही भारत का पहला प्रक्षेपण वाहन, एसएलवी3 सफलतापूर्वक तैयार किया गया, जिसके सफल प्रक्षेपण पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उनके नेतृत्व की तारीफ की थी।

डॉ. गोवारिकर ने भारत के प्रक्षेपण वाहनों के लिए महत्वपूर्ण ठोस ईंधन प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने प्रक्षेपण वाहनों को पूरी तरह से स्वदेशी और उन्नत देशों के स्तर का बनाने की दिशा में कार्य किया। उनके नेतृत्व में इसरो के ‘सॉलिड प्रोपेलेंट स्पेस बूस्टर प्लांट’ को 5,500 एकड़ जमीन पर स्थापित किया गया। डॉ. गोवारिकर 1986 से 1991 तक भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव के पद पर कार्यरत रहे। विज्ञान और प्रौद्योगिकी सचिव बनने के बाद, उन्होंने भारतीय मूल के वैज्ञानिकों को भारत वापस लाने के लिए अभियान शुरू किया। उन्होंने 1991 से 1993 तक प्रधान मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में भी कार्य किया।

उनके उल्लेखनीय योगदानों में से एक मानसून की भविष्यवाणी के लिए पहला स्वदेशी मौसम पूर्वानुमान मॉडल विकसित करना भी है। यह मानसून मॉडल 16 मानदंडों पर आधारित था। उनके कुशल नेतृत्व के तहत इसका उपयोग भी किया गया। इस मॉडल ने लगभग एक दशक तक मानसून के सटीक  पूर्वानुमान में मदद की। उन्हें  पुणे विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में नियुक्त किया गया था और वर्ष 1994-2000 के बीच वह मराठी विज्ञान परिषद के अध्यक्ष भी रहे। अपने सहयोगियों के साथ डॉ. गोवारिकर ने फर्टिलाइजर एन्साइक्लोपीडिया का संकलन किया, जिसमें 4,500 प्रकार के खादों की रासायनिक संरचना, उनकी उपयोगिता तथा निर्माण के विषय में जानकारी थी। इस कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ नॉर्मन बोरलॉग ने डॉ. गोवारिकर की प्रशंसा की थी। डॉ. गोवारिकर का निधन 2 जनवरी, 2015 को 81 वर्ष की आयु में हुआ। उन्हें वर्ष 1984 में पद्मश्री और वर्ष 2008 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

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