मैपकास्ट में बनेगी भारतीय वाङ्मय लैब- पीसी शर्मा

विश्व को शून्य और दशमलव भारतीय विज्ञान की देन

भोपाल। युवा पीढ़ी को भारतीय प्राचीन ज्ञान और विज्ञान के बारे में बताना जरूरी है। सभी शैक्षणिक संस्थाओं में हिंदुस्तान के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और इतिहास को सहेजकर प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिससे नई पीढ़ी को ऋषि मुनियों का ज्ञान और वैज्ञानिक सिद्धांत संबंधी जानकारी मिल सके। यह बात हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित दो दिवसीय संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य अतिथि जनसंपर्क, विधि विधायी और आध्यात्म विभाग के मंत्री पीसी शर्मा ने कही। संगोष्ठी की शुरूआत माँ सरस्वती की पूजा अर्चना और सरस्वती वंदना से हुई। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. प्रज्ञेश अग्रवाल ने सभी अतिथियों का परिचय कराया।
अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय वाङ्मय  में विज्ञान एवं तकनीकी :अनुसंधान एवं अनुशीलन विषय पर दो दिवसीय संगोष्ठी का रविवार को समापन हुआ। संगोष्ठी में मुख्य अतिथि श्री पीसी शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि भारतीय वाङ्मय विज्ञान एवं तकनीकी सबसे पुरानी और ऋषि मुनियों की देन है। हमारे वेदों में जो सुक्तियां लिखी हैं, वैज्ञानिक रूप से प्रासांगिक हैं। उन्होंने कहा कि हम नदियों के लिए न्यास बना रहे हैं,  जो स्वच्छता, उत्खनन के साथ उनके जीर्णोद्धार पर काम करेगा। उन्होंने बताया कि परमाणु परीक्षण सबसे पहले इंदिरा गांधी जी के समय हुआ था, उसके बाद अटल जी ने कराया था। जिसके बाद भारत दुनिया के सामने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी ताकत बनकर उभरा। उन्होंने मैपकास्ट को भारतीय वाङ्मय एवं प्राचीन तकनीकी अनुसंधान लैब के लिए दो कक्ष आरक्षित करने के निर्देश दिए। मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष एवं कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि भास्कर चौबे ने व्याख्यान में कहा कि महाभारत काल में कौरव वंशावली क्लोन का उदाहरण है। उन्होंने बताया कि अग्नि की खोज 6000 वर्ष पूर्व हुई थी। यह उदाहरण ऋग्वेद में मिलता है। सत्र के मुख्य वक्ता भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक प्रो. राकेश तिवारी ने बताया कि भारतीय सभ्यता 15 लाख वर्ष पुरानी है। इसके साक्ष्य तमिलनाडु राज्य में मिले। तकनीकी का उद्भव भारत में शालिग्राम पत्थर के रूप एवं कुल्हाणी का निर्माण 15 लाख वर्ष पूर्व भारत में हुआ। उन्होंने भारत को विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता बताया। भारत में मेहरगढ़ में 10 हजार वर्ष पूर्व धान और जौ की खेती होती थी, इसके प्रमाण प्राप्त हुये हैं। 5 हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा सभ्यता में जल प्रबंधन और भवन निर्माण व वास्तु शास्त्र के उच्चतम प्रमाण मिले हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री श्री पी.सी. शर्मा ने आज विज्ञान भवन में ‘भारतीय वांग्मय में विज्ञान एवं तकनीकी : अनुसंधान एवं अनुशीलन” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के समापन समारोह में कहा कि शून्य और दशमलव दुनिया को भारतीय विज्ञान की देन है। संगोष्ठी का आयोजन मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, अटल बिहारी वाजपेयी हिन्दी विश्वविद्यालय और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। मंत्री श्री शर्मा ने कहा कि भारतीय ऋषि-मुनियों द्वारा दिया गया ज्ञान पूर्णत: वैज्ञानिक पद्धतियों पर आधारित है। जल के शुद्धिकरण के लिये नदियों में सिक्के डालने की परम्परा हो या 24 घंटे ऑक्सीजन देने वाले पीपल के वृक्ष की पूजा करने का विधान हो। इस तरह के अनेकों उदाहरण हमारी संस्कृति की वैज्ञानिक सोच को साबित करते हैं। उन्होंने कहा कि चाहे यह सब प्रयोगशालाओं में नहीं हुआ हो, लेकिन ऋषि-मुनियों की सतत तपस्या और अनुभवों पर आधारित ज्ञान का मूल विज्ञान ही है। श्री शर्मा ने मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद संस्थान में संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में मौजूद वैज्ञानिक तथ्यों के शोध के लिये दो कक्ष आवंटित किये जाने के लिये कहा है। उन्होंने कहा कि पहले कहा जाता था, जिसकी संस्कृत भाषा जितनी अच्छी होगी, उसकी गणित भी उतनी अधिक अच्छी होगी। श्री शर्मा ने कहा कि राष्ट्रीय संगोष्ठी के निष्कर्ष समाज को आगे बढ़ने के लिये उपयोगी सिद्ध होंगे। मैपकास्ट के महानिदेशक डॉ. नवीन चंद्रा ने अपने उद्बोधन में शोधार्थियों से भारत सरकार की कई योजनाओं की जानकारियां साझा की। संगोष्ठी में 43 शोधार्थियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किया, जबकि 300 विद्वानों ने सहभागिता की।

 अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रामदेव भारद्वाज ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि  भारतीय वाङ्मय तकनीक को यदि समझना है तो संस्कृत भाषा का ज्ञान अनिवार्य है। वेद पुराण, ग्रंथ मूलत: संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं। भारतीय वाङ्मय समझने के लिये संस्कृत की महती आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों में भारतीय वाङ्मय अध्ययन के लिए पृथक लैब व पुस्तकालय होना चाहिए, जहां शोधाथी अनुसंधान व अनुशीलन कर सकें। संगोष्ठी के अंत में आभार कुलसचिव सुनील कुमार पारे ने किया। मंच संचालन संगोष्ठी के संयोजक डॉ. प्रज्ञेश अग्रवाल ने किया।

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