‘‘हिन्दी भाषा के संरक्षण में रंगमंच एक सशक्त माध्यम’’

श्री देवेन्द्र राज ‘अंकुर’ से डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे की बातचीत…..

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल के साथ, आधुनिक भारतीय रंगमंच में एक नई विधा ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता हैं, देवेन्द्र राज अंकुर। विभिन्न संस्थानों एवं रंगमंडलों के साथ अब तक 500 से अधिक कहानियों, 20 उपन्यासों और 60 से अधिक नाटकों की प्रस्तुति दे चुके हैं। बांग्ला, उडि़या, कन्नड़, पंजाबी, कुमाऊनी, तमिल, तेलगु, मलयालम, अंग्रेजी, धीवेही, सिंहली आदि अनेक भाषाओं में आपको रंगकर्म का अनुभव है। देवेन्द्र जी ने हांगकांग, चीन, डेनमार्क, मालद्वीप, श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल, जापान और रूस में रंग कार्यशालायें, प्रस्तुतियाँ और अध्यापन का कार्य भी बखूबी निभाया। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में स्वतंत्र रूप से अभिनय, आधुनिक भारतीय नाटक, रंग स्थापत्य, प्रस्तुति प्रक्रिया, दृश्य सज्जा और रंग भाषण के अध्यापन का भी आपको विशेष अनुभव है। आप कहते हैं कि, – ‘जिस कहानी का रंगमंच’ को सन् 1975 में शुरू किया था, अब उसके चालीस वर्ष पूरे हो रहे हैं।

मध्यप्रदेश नाट्य विद्यालय भोपाल में आपसे मिलने का सुअवसर मिला। बातों ही बातों में प्रश्न दर प्रश्न आपके उत्तर मिलते गये। प्रस्तुत है ‘देवेन्द्र राज ‘अंकुर’’ जी से बातचीत …….
1. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- मैं आपके बाल्यकाल के परिवेश के बारे में, तथा शुरूआती दौर के बारे में जानना चाहती हूँ।
देवेन्द्र राज अंकुर – मैं एक मध्यम वर्गीय परिवार से हूँं। हमारे पिताजी स्टैट बैंक ऑफ इण्डिया में नौकरी करते थे, और हर एक-दो साल में उनका ट्रान्सफर हो जाता था, इसलिए हमारी शिक्षा अलग-अलग शहरों एवं प्रांतों में हुई। मैंने नौवीं तक पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, इन चार प्रदेशों में पढ़ाई की। हमारा भरा पूरा परिवार है, जिसमें हम छः भाई एवं चार बहने हैं। उस ज़माने में बड़े परिवार में कोई परेशानी नही थी। हमारे पिताजी ने सभी को अच्छे से पढ़ाया, वो खुद भी स्नातक थे, एवं बैंक में नौकरी करते थे। हमंे किस फील्ड में जाना है, इस बात पर उन्होंने कभी कोई दबाव नहीं डाला। मेरे बड़े भाई एयरफोर्स में थे, उनसे छोटे टीचर हैं, उनसे छोटे इंजीनियर हैं, उनके बाद के भाई एयर इण्डिया में थे, उनके बाद मेरा नम्बर आता है। मैं खुद प्राध्यापक बनना चाहता था, मुझे साहित्य पढ़ने का शौक था। मैंने स्कूल स्तर से पढ़ना शुरू किया, नई-नई कविताएँ पत्रिकाएँ, पढ़ने का शौक बढ़ता गया। नई किताबों एवं पत्रिकाओं को पढ़ने के लिए हम भाई बहनों में झगड़ा होता था, कि कौन पहले पढ़ेगा! तत्पश्चात् मैंने स्थायी रूप से दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में बी.ए. ऑनर्स किया, एम.ए. किया। उन दिनों ज़्यादा नाटक नहीं होते थे। कॉलेज में जो भी नाटक होते थे, उनमें हमेशा भाग लिया। सन् 1967 में दिशान्तर नाट्य संस्था दिल्ली में बनी। ओमशिवपुरी, सुधा शिवपुरी, रामगोपाल बजाज, मोहन महर्षि द्वारा स्थापित नाट्य मण्डली के साथ काम करने का मौका मिला। इसके बाद मैंने सोचा क्यों न नाटक का विधिवत एवं पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जाए, इसलिए सन् 1969 में मैंने नाट्य विद्यालय में एडमिशन लिया। 3 वर्षाें तक नाटकों को पढ़ना, लिखना, खेलना, समझना आदि प्रक्रियाएँ चलती रहीं। सन् 1972 में नाट्य विद्यालय का कोर्स पूरा किया, उस समय रंगमंच का प्रचलन ज़्यादा नहीं था। तब मैंने तय किया, बिना नौकरी किये मैं स्वतंत्र कलाकार (फ्री लांसर) की तरह रंगमंच के माध्यम से आगे बढंूगा। रंगमंच के क्षेत्र में मैं अपनी पसंद के काम पर फोकस करूँगा। सन् 1972 से सन् 1988 तक 16 साल गुजर गये। अलग-अलग शहरों में मैंने काम किया, जिसमें भोपाल, लखनऊ, गोरखपुर और कई शहर शामिल हैं। इस बीच लोगों तक अपनी बात, रंगमंच के माध्यम से पहुँचाने की कोशिश की, फिर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने मुझे अपने यहाँ पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया। उन्हीं दिनांे मेरी शादी हुई, तथा मैं एक बच्ची का पिता बना। पत्नी नौकरी करती थीं, जिसके कारण परिवार में कोई आर्थिक समस्या नही थी। सन् 1988 में मुझे नाट्य विद्यालय में नौकरी के लिए आमंत्रण मिला तो उसे मैने स्थायी रूप से स्वीकार किया, फिर अगले 20-22 वर्षाें बाद सन् 2010 में मैं वहाँ से सेवानिवृत्त हुआ। आज मैं जो भी हँू, पत्नी तेजिन्दर कौर के सहयोग से हूँ, क्योंकि उन्होंने घर सम्भाल लिया और मैं स्वतंत्र होकर तब से आज तक रंगमंच में सक्रिय हूँ। मुझे हिन्दुस्तान के अलग-अलग शहरों और देश के बाहर 17-18 देशों में जाकर पढ़ाने का मौका मिला।
2. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे – रंगमंच के साथ ही साथ लेखन में भी आप अग्रसर हैं। कहते हैं – ‘आलोचना चाहते सब हैं, लेकिन पसंद कोई नही करता।’ लेखन में चुनौतिपूर्ण विधा, आलोचना को आपने कैसे और क्यों चुना?
देवेन्द्र राज अंकुर – लेखन का शौक तो मुझे शुरू से ही है। जब मैं 1988 में ‘नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा’ में आया, तब लेखन में थोड़ा स्थायित्व आया। मैंने जमकर लिखना शुरू किया। जो भी लिखा या अनुवाद किया, वे सारी पुस्तकें सन् 2010 तर्ब आइं। 20 वर्षाें तक राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में मुझे अध्यापन का अवसर मिला। तब समय सुलभता से मिल जाता था, और मैं लेखन में अग्रसर होता गया।
स्कूल और कॉलेज की मैग्ज़ीन में मैंने बच्चों के लिए कहानियाँ भी लिखी। आपने सही कहा – ‘आलोचना चाहते सब हैं लेकिन पसंद कोई नही करता।’ मैंने देखा और जाना कि रंगमंच की दुनिया में आलोचना पर बहुत कम काम हुआ है, और हम उस फील्ड में कॉलेज में पढ़ा भी रहे थे, इससे पहले जो भी आलोचना रंगमंच में आई वो प्राध्यापकों द्वारा की गईं। वो खास तौर से केवल नाटक की आलोचना होती थी, इसलिये मैंने इस दिशा में आलोचना को मुख्य विषय बनाया तथा लोगों को सरल-सहज शब्दावली के प्रयोग के द्वारा अपनी बात कहने की कोशिश की। इस प्रकार मेरे लेखन की विधा मूलतः आलोचना हो गई।
मेरी पहली किताब ‘पहला रंग’ जो 1997 में आई, फिर ‘रंग कोलाज’, उसके बाद ‘दर्शन-प्रदर्शन’, फिर ‘रंगमंच का सौन्दर्य शास्त्र’, ‘अंतरंग-बहिरंग’, ‘पढ़ते-सुनते-देखते’ इत्यादि। ‘दूसरे नाट्य शास्त्र की खोज’ पुस्तक में मैंने ‘भरतमुनि’ के ‘नाट्यशास्त्र’ की आधुनिक परिवेश में व्याख्या करने की कोशिश की है। इस प्रकार अबतक 8 किताबें, तथा 3 अनुवाद की पुस्तकंे प्रकाशित हो चुकी हैं। इसे अलावा ’रंगमंच के सिद्धांत’, ये सम्पादित पुस्तक है, जिसे मैंने अपने मित्र डॉ. महेश आनंद, जो कि स्वंय भी एक लेखक हैं, के साथ मिलकर लिखा। जिसमें आज तक पूरब और पश्चिम के जितने भी रंग सिद्धांत सामने आये हैं, उन सभी का समावेश करते हुए संस्करण का सम्पादन किया।
3. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- रंगमंच, फिल्म और टेलीविज़न इन तीनों में क्या विशेष अंतर है?
देवेन्द्र राज अंकुर – रंगमंच एक जीवंत अभिनय है, उसमें यदि कोई ग़लती हो गई तो आप उसे उस वक्त ठीक नहीं कर सकते। दूसरे शो में उसे सुधारा जा सकता है। फिल्म और टेलीविज़न की प्रक्रिया हम दर्शकों के सामने सीधे नहीं करते, उनके सामने तो फिनिश होने के बाद ही आता है। रंगमंच इसलिए अद्भुत और रोमांचक है, क्योंकि वो घटित होते हुए दर्शक के सामने होता है। यदि कोई कलाकार मंचन के दौरान अपने संवाद भूल गया तो उस समय स्वयं ही सम्भालना होता है, उसकी मदद के लिए स्टेज पर कोई नहीं आ सकता। फिल्म में ये समस्या नहीं है, फिल्म में रोल बदल जाता है। नाटक में लाइव ऑडिअन्स होती है, नाटक के दर्शक हर बार बदलते रहते हैं। रंगमंच को आप रोज़ बदल सकते हैं, जबकि फिल्म और टेलीविज़न हमंे ये सुविधा प्रदान नहीं करते, क्योंकि उनके तैयार होने की जो प्रक्रिया है उसमें आप आखरी सीन पहले कर लो, फिल्म को टुकड़ांे में तैयार कर सकते हो, क्योंकि बाद में आप उन सभी सीनों को जोड़ने का काम करते हैं। थियेटर में आपको शुरू से आखिर तक एक ही शो में चलना पड़ेगा, क्योंकि ये उसकी एक निरन्तरता की प्रक्रिया है। दोनों माध्यम अलग हैं, हम भी टुकड़ांे-टुकड़ांे में नाटक तैयार करते हैं, लेकिन जब नाटक शुरू हो जाता है तब हम उसे बीच मंे रोक नहीं सकते। फिल्म और टेलीविज़न में उसे रोक सकते हैं, जब कि रंगमंच में शुरू से आखिर तक आपको एक ही साथ एक ही सिटिंग में देखना पड़ता है, अन्य किसी विधा में ऐसा नहीं है। जब आप किताब पढ़ते हैं तब हो सकता है कि एक दिन आपने 10 पृष्ठ पढ़े, फिर उसके बाद कई दिनों तक किताब का एक भी पृष्ठ नहीं पढा़ तथा एक महीने बाद फिर उसे अगले पृष्ठ से पढ़ सकते हैं। इसके विपरीत नाटक और उसकी प्रस्तुति में ये सुविधा नहीं होती। इसके लिए काफी तैयारी की ज़रूरत होती है। 1-2 घण्टे नाटक चल रहा होता है तब आप पूरी तन्मयता से नाटक को प्रस्तुत करने में लगे रहते हैं, ताकि उसमें कोई गलती न हो जाए। अगर ग़लती हो गई तो नाटक कहीं से कहीं मुड़ जाता है। फिल्म, टेलीविज़न मंे आप लॉन्ग शॉट, मिडिल शॉट ले सकते हैं, लेकिन रंगमंच में ये सुविधा कम होती है। इस प्रकार यहीं आकर फिल्म, टेलीविज़न, और रंगमंच अलग-अलग हो जाते हैं।
मल्टीमीडिया के प्रचार-प्रसार के कारण नाटक में सभी कलाकारों को दर्शक मंच पर एक साथ देख सकते हैं। फिल्म एवं टेलीविज़न में हम वही देख सकते हैं जो निर्देशक हमंे दिखाना चाहता है, क्योंकि यह केमरे का माध्यम है, केमरा किस ऐंगल से किस चीज़ को दिखाता है, वो पहले से तय होकर चलता रहता है। रंगमंच में सब तय होने के बाद भी दर्शक के पास ये सुविधा होती है कि उस अभिनयकर्ता की आवाज को सुन एवं देख सके, इसलिए रंगमंच अन्य माध्यमों से अलग है।
4. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे – एक नाटक को तैयार करने में किन-किन पहलुओं से होकर गुज़रना पड़ता है, और कितना समय लगता है, नाटक की तैयारी करने में?
देवेन्द्र राज अंकुर – औसतन छः से आठ हफ्ते का समय लगता है। सबसे पहले तो आलेख जिसे हम स्क्रिप्ट कहते हैं, का चयन करना पड़ता है। नाटक के द्वारा हम दर्शक को क्या दिखाना चाहते हैं, क्या शेयर करना चाहते हैं, तथा नाटक के चयन की प्रक्रिया कितनी रिलेवेन्ट है, और नाटक के माध्यम से दर्शकों को क्या संदेश देती है। नाटक ऐसा हो जो दर्शकों को सोचने पर विवश कर दे तथा उनके मन मस्तिष्क में एक हलचल पैदा करे। जब नाटक में ऐसे तत्व समाहित होंगे तभी दर्शक वर्ग तल्लीनता से उस नाटक को देखने का प्रयास करेंगे। ये सारी बात यदि आलेख में है, तो एक टीम बनाकर काम शुरू किया जाता है।
सबसे पहले आलेख, फिर दूसरे क्रम में उसमें कौन-कौन अभिनेता होंगे और वो कहाँ से मिलेंगे, इस पर विचार किया जाता है। यदि आपका संबंध नाट्य मण्डली से है या आपके पास कोई नाट्य मण्डली है, तब तो सब ठीक है क्योंकि आपके पास जाने पहचाने लोग उपलब्ध हो जाते हैं। यदि आपको किसी दूसरी मण्डली ने नाट्य प्रस्तुति के लिए बुलाया है तब आपको उन लोगों के साथ काम करना पड़ता है जिन्हें आप पहले से नहीं जानते। इस स्थिति में उनके साथ बैठकर नाटक को बार-बार पढ़ना पड़ता है, भूमिकाओं को बदल बदलकर देखना पड़ता है, ये दूसरा चरण है। तीसरे चरण में अंतिम रूप से पात्र फाइनल कर लिए जाते हैं, तब नाटक की क्या शक्ल बनने वाली है उस पर विचार किया जाता है। पहले संवाद के स्तर पर अभिनेता एवं पात्र फाइनल किये जाते हैं, फिर एक साथ बैठकर एक रीडिंग का दौर चलता है। निर्देशक कलाकारांे से किस प्रकार के संवाद और अभिनय की अपेक्षा रखता है। चौथे दौर में वो फ्लोर पर जाते हैं, फिर वो ब्लॉकिंग करते हैं, सामग्री चयन करते हैं। शुरू में तो कुछ भी मिल जाए उसके साथ संवाद बोलते हुए मंच पर अभिनय और पोज़ीशन की प्रेक्टिस करते है। कभी एक सीन, कभी दो-चार सीन की प्रेक्टिस होती हैं। ऐसे ही नाटक के अन्त तक निर्देशक और अभिनेता आपस में मिलकर पूरा नाटक तैयार करते हैं, और फिर अन्त में पाँचवा दौर आता है, उस दौर में अभिनेता की वेश भूषा, रूप सज्जा, प्रॉप का चयन किया जाता है। मान लीजिए किसी अभिनेता को हाथ में कोई घड़ी, रूमाल या बैग लेेकर मंच पर आना है, या कोई और सामग्री (प्रॉप), इन सारी चीजों को सिलसिलेवार इक्ट्ठा करने की कोशिश होती है। व्यवसायिक संस्थाओं के पास नाटक में उपयोग होने वाली सामग्री को एकत्रित करने वाले लोग होते हैं, वे सब सम्भाल लेते हैं। आमतौर पर नाट्य संस्थाओं के लोग आपस में सभी कार्य मिल-जुल कर लेते हैं। अंतिम दिन सभी कलाकार हॉल में पहँुंचते हैं, यदि आर्थिक साधन अच्छे हैं तो हॉल एक-दो दिन पहले से बुक कर लिया जाता है, ताकि पूर्वाभ्यास करने का मौका मिल सके, साथ ही नाटक का सेट लगाकर दिनभर तैयारी की जा सके।
इसके विपरीत यदि ये सुविधा नहीं है तब उसी दिन सारे कलाकार हॉल में पहुँचते हैं, सारी चीजें भी जमा कर लेते हैं, और एक बार रिहर्सल भी कर लेते हैं। ये सारी व्यवस्थाएँ सभी नाट्य मण्डलियों की अपनी-अपनी सुविधाओं पर निर्भर करती है। उसके बाद शाम को जब नाटक शुरू होता है, तब दर्शक हो या निर्देशक बैठकर नाटक देख सकते हैं। यदि नाटक दर्शकों को पंसद आया तो वे आपसे मिलने आते हैं, और प्रतिक्रिया से अवगत कराते हैं, यदि नाटक दर्शकों को पसंद नहीं आता तो सभी लोग बिना मिले चले जाते हैं। बस वही दर्शक मिलने आते हैं जो आपको पहले से जानते हैं। सभी नाट्य मण्डलियों की लगभग यही प्रक्रिया रहती है।
5. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- नाटक के मंचन के बाद, सुधार की प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए, क्या आलोचना का सत्र भी होता है?
देवेन्द्र राज अंकुर – ये अलग-अलग संस्थाओं पर निर्भर करता है। इन दिनों कुछ संस्थाओं ने आलोचना सत्र की शुरूआत भी की है। भारतीय रंगमंच एंव विदेशी रंगमंच में ऐसा हुआ है। इलाहाबाद में डॉ. सत्यव्रत नाम के निर्देशक थे, वे हमेशा अपनी प्रस्तुतियों के बाद इस तरह का सत्र दर्शकों के साथ रखते थे। दर्शकों के साथ उनकी जो भी बातचीत होती थी उसे वे आगे के नाटक के प्रदर्शनों के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश करते थे। ज़ाहिर है दर्शक, निर्देशक और अभिनेता आमने-सामने होते हैं, तब दर्शकों की सकारात्मक – नकारात्मक प्र्रक्रिया के द्वारा एक फीडबैक मिलता है, जिससे नाटक और परिष्कृत हो जाता है। बस टाइम मैनेजमेन्ट की बात है। दर्शक दूर-दूर से नाटक देखने आते हैं, उन्हें नाटक के पश्चात् घर पहँुचने की जल्दी होती है। इस कारण कई बार आलोचना का सत्र नहीं हो पाता है। आलोचना की उपयोगिता को देखते हुए जब भी मौका मिलता है, इस प्रकार के सत्र का आयोजन किया जाता है, और किया जाना चाहिए। जब नाट्य समारोह चल रहा होता है, तब रंगकर्मियों की कोशिश होती है कि नाटक खत्म होने के अगले दिन आलोचना का सत्र रख लिया जाये।
विगत 17-18 वर्षाें से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा अन्तराष्ट्रीय भारत रंग महोत्सव का आयोजन किया जाता है। जिसमें नाटक के खत्म होने के बाद हम लोग दूसरे दिन एक कार्यक्रम करते हैं, जिसे ‘डायरेक्टर्स मीट’ कहते हैं। उसमें निर्देशक दर्शकों से रूबरू होता है, यदि दर्शक नहीं आते है तो नाटक के कलाकारों में से एक के साथ बैठकर निर्देशक उनको, उनकी गलतियों से अवगत कराते हुए सुधार की प्रक्रिया के बारे में भी बताता है। यह प्रक्रिया निरंतर रूप से चली आ रही है। अगर आलोचना का सत्र हमेशा होता रहा, तो इससे लाभ सभी को मिलेगा। दर्शक यह शिकायत करते हैं कि लोग ऐसा रंगमंच कर रहे हैं जो कि आम दर्शकों को समझ में नहीं आता, और हम लोग यह शिकायत करते हैं, कि दर्शक नहीं आते। आलोचना में इन सारे सवालों के जवाब आसानी से मिल जाते हैं।
6. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- आपने कई नाटकांे का निर्देशन किया है। कहानियों एवं उपन्यासों के मंचन मंें आपकी विशेष रूचि है। एक निर्देशक होने के नाते आप क्या तैयारी करते हैं?
देवेन्द्र राज अंकुर – आपने ठीक कहा, एक निर्देशक के रूप में मैंने ज़्यादा काम तो कहानियों और उपन्यासों को मंचित करने का किया है, इनके साथ ही साथ कुछ नाटक भी किये हैं। ज़ाहिर सी बात है कि एक प्रस्तुति में निर्देशक की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। निर्देशक नाम का व्यक्ति नाट्य मण्डली या नाटक के मंचन का ऐसा कलाकार है, जो यह कहता है कि मुझे इस नाटक को मंचित करना है। किस रूप में मंचित करना है, वह कलाकार के माध्यम से उसे रूपान्तरित करने की कोशिश करता है। क्या वो एक व्यवस्थापक है? या वो भी एक विजिटिंग आर्टिस्ट है, या वो नाटक के आलेख का एक व्याख्याकार है, तीनों तरह से निर्देशक को लेकर हमेशा चर्चा चलती रहती है, कि निर्देशक का क्या काम होता है। अन्ततः एक बात सभी में कॉमन है, कि निर्देशक अभिनेताओं के माध्यम से अभिनय तथा दूसरे तथ्यों के माध्यम से परिवेश का निर्माण, वेशभूषा, प्रकाश योजना और गीत या ध्वनि प्रभाव आदि के माध्यम से वो एक आलेख को मंच पर जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। अपनी किसी सोच के साथ एक प्रश्न सामने लाता है। वह निश्चित रूप से निर्देशक नाम के व्यक्ति की सोच है। आज से लगभग 150 वर्ष पहले रंगमंच में निर्देशक नाम का व्यक्ति नही था। इससे पहले स्थिति यह थी कि जो मुख्य अभिनेता होता था, वही निर्देशक का काम भी करता था। परन्तु आज हम यह जानते हैं कि निर्देशक एक ऐसा व्यक्ति है जो प्रस्तुति के बाहर बैठकर नाटक को संचालित भी करता है और एक खाका तैयार करने का काम भी करता है। निर्देशकों की एक श्रेणी ऐसी है जो पूर्वाभ्यास की तैयारी करते हैं, अभिनेताओं के साथ सबकुछ पहले से तय करके आते हैं। फि़ल्मों में जिस प्रकार स्क्रिप्ट बनाते हैं, ऐसे ही नाटक के पूूर्वाभ्यास शुरू करने से पहले पूरा ग्राफ तैयार करते हैं। कौन अभिनेता कहाँ से कहाँ जाएगा, उस वक्त मंच पर और क्या हो रहा होगा, सेट का डिज़ाइन क्या होगा? ये एक तरीका है। दूसरी श्रेणी में वे निर्देशक हैं, जो एक इनवॉलविंग मैथड से गुज़रते हैं, जिसमें टेक्स्ट पढ़कर सारे अभिनेता आपस में ज़्यादा से ज़्यादा चर्चा करते हैं। उस चर्चा के बाद वो अभिनेताओं से अपेक्षा करता है कि टेक्स्ट को पढ़कर उनके दिमाग में क्या बिन्दु उभरते हैं, या क्या रूप सामने आता है, अभिनय के द्वारा दिखाईए। फिर निर्देशक उसको देखता है, यदि उसे लगता है कि वो सही दिशा में आगे बढ़़ रहे हैं, तो सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर उसी दिशा में नोट्स देता है। जिस रूप में वह प्रस्तुति का स्वरूप चाहतेे हैं, अगर उस ट्रेक पर नहीं हैं, तो उसे रिजेक्ट कर देता है, फिर उनसे डिमाण्ड करता है कि आप फिर से चर्चा के बाद एक ढ़ाँचा तैयार करें। आधुनिक रंगमंच के इतिहास में तीसरी पद्धति इन दो पद्धतियों का मिश्रण भी हो सकती है। इस पद्धति में निर्देशक स्वयं तय करके आए और अभिनेता को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे, अपने सुझाव उसमें शामिल करे, और आपस में मिल बैठकर उसे देखे। तत्पश्चात उसकी जो शक्ल बनेगी उसे सुनिश्चित किया जायेगा। इस प्रकार मैं समझता हूँ कि चाहे मैं निर्देशक हँू या दूसरा कोई और निर्देशक हो, प्रक्रिया लगभग ये ही तीन प्रकार की रहती है। निर्देशक बनने से पहले मुझे हिन्दुस्तान और हिन्दुस्तान के बाहर प्रसिद्ध निर्देशकों के साथ सीखने और काम करने का मौका मिला। इस दौरान मैंने सबके काम करने के तरीकों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया और सबको काम करते देखा।
संक्षेप में, मैंने जो तरीके देखे, उसमें दूसरे तरीके को मैंने अपनाया, क्योंकि मैं यह मानता हूँ कि रंगमंच अभिनेताओं का माध्यम है और निर्देशक का काम है, उनको ज़्यादा से ज़्यादा स्वतंत्रता देना। तभी तो पूरी तरह से सबकुछ तय हो जाने के बाद मैं नाटक या उपन्यास को मंचित करने का काम शुरू करता हँू। पहले दो-तीन दिन अभिनेता क्या सोच कर आए हैं और क्या तैयारी करके आए हैं, फिर हम आपस में बात करके तय करते हैं। इसमें अभिनेता से बार-बार संवाद सुनते हैं और अभिनय देखतें हैं। इस प्रकार की प्रक्रिया चलती रहती है। हम चीजों को छाँटते तथा तय करते हुए अंतिम रूप तक पहँुचने की कोशिश करते हैं।
मेरा मानना है कि जब हमने चुन लिया, आराम से पढ़ लिया, समझ लिया, और जितनी भी चर्चा होनी थी हो गई, फिर उसके बाद अभिनेता या कलाकार उसको किस तरह से रिस्पाण्ड करेंगे, वो पहली शुरूआत उनको करनी चाहिए। रंगमंच के कम से कम तत्वों का उपयोग करना, मेरी प्रक्रिया में पहले से ही शामिल है, जैसे कोई भारी-भरकम सेट नहीं हो, कम से कम प्रापर्टी हो, क्योंकि पैसे का अभाव भी होता है। मैं सीमित संसाधनों मंे नाटक करने की कोशिश करता हँू। दूसरी विधाओं विशेष रूप से नृत्य में एक डान्सर के पास अपनी मुद्राओं, कलाओं के अलावा मंच पर कुछ नहीं होता है, और वो अपनी कला से एक खाली मंच को भर सकता है, एक दृश्य प्रदान कर सकता है, तो फिर रंगमंच में इससे भी ज़्यादा सम्भावनाएँ हैं। यहाँ पर कोई अकेला अभिनेता नहीं है बल्कि पूरा ग्रुप रहता है। मैं समझता हँू कि सीमित साधनों का उपयोग कर पैसा बचाना चाहिए, वही पैसा अभिनेता को पारिश्रमिक रूप में दे देना चाहिए। ये सभी मेरी प्रक्रिया में शामिल है।
7. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे-पात्र चयन करते समय आप क्या ध्यान में रखते हैं, पात्रों की चयन प्रक्रिया कैसे होती है? मुख्य रोल के लिए किन-किन बिन्दुओं पर विचार करते हैं।
देवेन्द्र राज अंकुर – जब हम अपनी मण्डली में काम करते हैं तब इस प्रकार की कोई परेशानी हमें नही होती। नए लोगों के साथ हमंे ट्राय करना पड़ता है, क्योंकि हम उनसे परिचित या उनके काम से परिचित नहीं होते हैं। तब एक, दो, तीन दिन या एक हफ्ता अलग-अलग अभिनेताओं से डायलॉग पढ़वाते हैं। कई बार निर्देशक कह देता है कि जो इसे करना चाहता है वह उसका कोई पोरशन या हिस्सा तैयार कर के लाये, हम देखेंगे। इस प्रकार की भी पद्धतियाँ होती हैं, कि नये लोगों को हम पढ़वाकर देखते हैं, रोल बदलते रहते हैं या उन्हें रोल के लिए विषयवस्तु दे देते हैं, वे अपने आप कुछ तैयार करके लाते हैं। इस प्रक्रिया में नाटक की प्रस्तुति को अच्छे से अच्छा बनाने की हमेशा कोशिश होती है। अब निर्देशक को एक तरह के पात्र से अगर मिलते-जुलते चेहरे-मोहरे वाला अभिनेता मिल जाए तो निर्देशक सबसे पहले उसी को कास्ट करता है, क्योंकि उस अभिनेता के कारण काम करना और भी सरल हो जाता है। इस प्रकार उसकी आधी परेशानी तो वैसे ही खत्म हो जाती है और उस अभिनेता को निर्देशक तुरन्त रख लेता है। कभी-कभी इससे ठीक उल्टा भी होता है, जब ऐसा व्यक्ति नहीं मिलता है, तो जो इससे विपरीत मिलता है, उससे काम करवाना भी एक चुनौती होती है। कई बार हमारे रंगमंच के इतिहास में ऐसी प्रस्तुतियाँ हुई भी हैं। मुझे याद है कि तुगलक जैसे चरित्र को बंाग्ला में कोई निर्देशक कर रहे थे, उन्होंने बहुत ही छोटे कद के अभिनेता को तुगलक की भूमिका में रखा। हॉलाँकि वो वहाँ का एक बहुत प्रसिद्ध कलाकार था। उस छोटे क़द के कलाकार के जीवंत अभिनय और शानदार संवाद के कारण महज़ चार साढे़ चार फुट का अभिनेता तुगलक की भूमिका मंे उपयुक्त था। कहने का तात्पर्य ये है, कि उस ओर दर्शकों का ध्यान ही नही गया। कब क्या हो जाए? ये जादू रगंमंच का है। पहले से उपयुक्त कलाकार मिल जाएँ, तब तो बहुत ज़्यादा थ्रिल नहीं है। ज़्यादातर निर्देशक अलग-अलग तरीके से अपने रास्ते पर पहँुचने की कोशिश करते हैं, मैं समझता हूँ कि वो ही सही रास्ता भी है।
8. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- नाटक के मंचन में गीत-संगीत की क्या भूमिका रहती है?
देवेन्द्र राज अंकुर – गीत-संगीत की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है, वो कई तरीक़े के काम करती है। कई बार गीत का उपयोग नाटक की कथा एवं कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया जाता है। संगीत का उपयोग समय को बताने के लिए किया जाता है। अगले सीन और पुराने सीन को स्टेबलिश करने के लिए भी हम संगीत का उपयोग करते हैं। फिर पात्रों की मनः स्थिति, उनके अन्दर क्या चल रहा है, उसके मूड को भी स्टेबलिश करने के लिए, और कई बार गीत-संगीत के द्वारा एक टिप्पणी भी हो सकती हैं। दुनिया में ऐसे भी निर्देशक हुए हैं जिन्होंने संगीत का इस्तेमाल सिर्फ टिप्पणी करने के लिए किया। ऐसा करने वाले जर्मनी के एक कुशल नाटककार, निर्देशक ‘ब्रेस्ट’ थे। इस प्रकार से उन्होंने संगीत को एक आलोचनात्मक भूमिका में उतार दिया। उस नाटक का संगीत भी मधुर संगीत नहीं था। उस नाटक में संगीत को हार्श, रूड तरीके से पेश किया गया। यह कहा जा सकता है, कि ‘ब्रेस्ट’ ने संगीत को एक नए रूप मंे इस्तेमाल किया।यदि नाटक में गीत-संगीत आ रहा है, तो क्यों आ रहा है, ये कभी जानने की कोशिश की है? हमारे जीवन में गीत-संगीत तभी आता है, जब हम लोग खुश होते हैं। जब हम खुश होते है तो एक अलग प्रकार का गीत-संगीत झलकता है, और जब हमारा मूड ठीक नहीं होता है तब कोई बजता हुआ संगीत भी या कोई गाना गा भी रहा हो तो हम उसे रोक देते हैं। उस समय हमारा मूड अच्छा नहीं होता है। रेडियो पर गीत-संगीत के माध्यम से सुबह की शुरूआत चिडि़यों की चहचहाट से होती थी। आज हमारी जि़न्दगी में नया संगीत शामिल हो गया है। रेडियो-टीवी पर विज्ञापन को भी संगीत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। समय के साथ परिवर्तन होता रहता है। गीत-संगीत भी परिवर्तनशील है, और उसकी भूमिका में बदलाव की प्रक्रिया चलती रहती है। बिना रिद्म के गीत में भी संगीत होता है, यदि किसी नाटक में गाने नहीं हैं, उस नाटक में कोई बैकग्राउण्ड म्यूजि़क नहीं है, इसका अर्थ ये नहीं, कि उसमें संगीत नहीं है। संगीत बोल चाल की ध्वनि में भी होता है। उससे जो प्रभाव पड़ता है, उसमे संगीत है, कई बार बातचीत करते-करते हम हाई नोट पर चले जाते हैं, फिर मिडिल नोट पर आ जाते हैं, उसमें भी संगीत है। नाटक में जब चुप्पी छा जाती है, वो भी अपने आप में संगीत है। नाटक में जब विराम आ जाता है, उसमें भी संगीत है। दो लोग आपस में बात करते हैं, तो वे अपने आंतरिक भाव को जिस अंदाज़ में व्यक्त करते हैं उसमंे भी संगीत होता है। गीत-संगीत, ध्वनि, नाटक के मंचन का अनिवार्य, महत्वपूर्ण और उसी के भीतर समाहित हिस्सा है, उसे नाटक से अलग नहीं किया जा सकता।
9. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- सर, एक रचनाकार को उसकी रचित, मंचित प्रत्येक कृति बहुत प्रिय होती है। उनमंे से कोई एक या दो उनके दिल के क़रीब होती है। आप अपनी चुनिन्दा कृतियों एवं मंचित नाटकों में किन्हें शामिल करना चाहेंगे, और क्यों?
देवेन्द्र राज अंकुर – रंगमंच के क्षेत्र मंे 40 साल का लंबा सफर हो चुका है। उनमें से चुनिन्दा लेना है, तो सबसे पहले मैं ‘तीन एकांत’ नाम की प्रस्तुति को रखना चाहुँगा, वो इसलिए क्योंकि जिस तरह का काम मैं आज तक कर रहा हूँ कहानियों, उपन्यासों को लेकर, उनको बिना परिवर्तित किये, वैसा का वैसा मंच पर प्रस्तुत करने की कोशिश में वो मेरी पहली प्रस्तुुति थी। सन् 1975 में राष्टीय नाट्य विद्यालय के साथ मुझे काम करने का मौका मिला। इस प्रस्तुति ने हिन्दी रंगमंच जगत के दर्शकों के सामने, रंगमंच का नया अध्याय शुरू किया, जिसे हम ‘कहानी का रंगमंच’ के नाम से जानते हैं। ये हमेशा मेरी यादगार प्रस्तुतियों में से एक रहेगी। उसके बाद ‘मन्नू भण्डारी के उपन्यास को जब मैंने पहली बार मंचित किया तब एक बड़ी रचना को लेकर और जिस रूप में हमने उसकी प्रस्तुति, परिकल्पना तैयार की, उसकी सारे हिन्दुस्तान में जितनी भी प्रस्तुतियाँ हुईं उसे मैंने ही किया, महाभोज को सबसे ज़्यादा पंसद भी किया गया। उसके बाद ‘अजीत कौर’ पंजाबी कहानी लेखिका की तीन कहानियों को लेकर हिन्दी में ‘खानाबदोश’ नाटक तैयार किया। उसमें एक औरत और एक आदमी के रिश्तों को लेकर, लेखक ने स्वयं की कथा-व्यथा को आत्मकथा के रूप में रचा था। ‘अजीत कौर’ ने जितनी ईमानदारी से सब कुछ सामने रखा, वो क़ाबिले तारीफ है। नाटक के दोनों पात्रों का नाटक को सफ़ल बनाने में बहुत सहयोग रहा। नाटक के दोनों पात्र वास्तविक जीवन में भी पति-पत्नी थे, इसीलिए उन्होंने नाटक में पति-पत्नी के किरदार को जीवंतता से निभाया। परिणामस्वरूप नाटक में वास्तविकता होने के कारण प्रस्तुति बहुत सालों-साल पंसद की जाती रही। आज भी अगर मुझे मौक़ा मिले तो उस नाटक को मंचित-निर्देशित करना चाहूँगा। इस प्रकार से बहुत सी प्रस्तुतियाँ हैं, जिनको याद किया जा सकता है।
डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- आपने रंगमंच का भूत देखा है, वर्तमान देख रहे हैं। एक लम्बा सफर तय करने के बाद आप रंगमंच में क्या सम्भावनाएँ पाते हैं। क्या स्थितियाँ पहले से बेहतर हैं, या उनमें कुछ परिवर्तन आया है, और यदि आया है तो उसका क्या कारण है?
देवेन्द्र राज अंकुर – मैं समझता हूँ कि 50-100 सालों का भी रंगमंच देखें तो उसमें मुख्य रूप से तीन तरह का रंगमंच दिखाई पड़ता है। सबसे पहले तो यर्थावादी रंगमंच का एक दौर रहा, जो पश्चिम से हमारे यहाँ आया। पश्चिम में यह 19वीं शताब्दी में आया और हमारे यहाँ 20वीं शताब्दी में पहुँंच पाया। आज़ादी मिलने तक का जो वक्त है, लगभग वही यथार्थवादी दौर चला। यथार्थवादी का मतलब होता है, जो जैसा है उसे हम मंच पर भी वैसा ही करने की कोशिश करते हैं, उसी तरह की अभिनय शैली तैयार करते हैं। आज़ादी के बाद हमारे बड़े-बड़े रंगकर्मियों, रंग चिंतकों ने एक नयी सोच को जन्म दिया। जब हम अपने ढ़ंग से आगे बढ़ सकते हैं, तो क्यों ना, हमारी कलाओं में, संस्कृतियांे में भी अपना मत होना चाहिए। इसके तहत एक यात्रा शुरू हुई, लोक नाट्य संस्थाओं से जुड़कर उस दौर में इस तरह का रंगमंच खूब हुआ। उस समय के नाटककारों में अग्रणी हैं, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का ‘बकरी’, विजय तेन्दुलकर का ‘घासीराम कोतवाल’, गिरीश कर्नाड का ‘हयवदन’, चन्द्रशेखर का ‘कम्बार जोकुमारस्वामी’, मणिमधुकर का ‘रसगन्धर्व’ इत्यादि। कहने का तात्पर्य यह है, कि पहले नाटककारों ने इस तरफ कदम बढ़ाया फिर उन पर आधारित कृतियों का दौर आया। एक के बाद एक ऐसे नाटक आये जो अपने कथ्य में तो आधुनिक थे ही, साथ ही साथ अपने कथ्य और शैली में लोक नाट्य परम्पराओं के तत्वों को इस्तेमाल कर रहे थे। इस तरह से इन दोनों का एक आपसी रिश्ता बनता चला गया। सन् 1980 के दशक तक ये प्रक्रिया जारी रही, तत्पश्चात् बदलाव दिखने लगा। भारत में दूरदर्शन बड़ी तेज़ी से आया। सन् 1984 में पहला धारावाहिक शुरू हुआ, ‘हम लोग’ तब रंगमंच से दूूरदर्शन की ओर भागने की अभिनेताओं की यात्रा शुरू हुई। चूँंकि दूरदर्शन और फिल्म एक तकनीकी एवं कैमरे का माध्यम है, इसलिए रंगमंच में भी इन दोनों तत्वों के माध्यमों से असर पैदा होना शुरू हुआ। 90 के दशक से लेकर आज तक पिछले 25-30 वर्षाें में जो भी रंगमंच आ रहा है, या आया है, उसमें भी वीडियो प्रोजेक्शन, इन्सटॉलेशन और टेलीविज़न, कम्प्यूटर जैसे कई उपकरण हैं, जिनसे परिवेश का निर्माण करने में सहायता मिली तथा ऐसे तत्वों का समावेश होना शुरू हो गया। समाज में भी नई तकनीक ‘मोबाइल’ कम्प्यूटर, टेलीविज़न का स्वागत हुआ। किसी ज़माने में ‘वीसीआर’ होता था, जो अब बन्द हो गया है। अब मोबाइल पर ही हम फिल्म देख लेते हैं, कहने का तात्पर्य ये है कि जो बदलाव आया है इसका प्रभाव सभी वर्गों पर पड़ा। फिर चाहे वो नाटक हो, फिल्म या टेलीविज़न। नाटक पर थोड़ा ज़्यादा प्रभाव पड़ा, क्योंकि नाटक देखने की कला है। फिल्मों में भी अभिनय होता है, अभिनय नाटक और रंगमंच में भी शामिल है, इन माध्यमों के साथ मनुष्यों ने अपने आप को जोड़ा। इनको करने वाले लोगों का मानना है कि फिल्म सबकुछ दिखा सकता है, तो रंगमंच में ये क्यों नहीं हो सकता? आज जो तकनीक चल रही है, हमें उसका उपयोग करना चाहिए तो दूसरी तरफ इसका नकारात्मक पहलू भी है। अगर सेट पर तकनीक ही तकनीक हावी हो जाए, तो अभिनेता पीछे चला जाएगा, तब रंगमंच जैसे जीवंत माध्यम की क्या सार्थकता रह जाएगी? जैसा मैं पहले से कहता आ रहा हँू, कि रंगमंच मुख्य रूप से और अनिवार्य रूप से अभिनय का माध्यम है, कोई भी तकनीक हो अगर वो अभिनेता को आगे बढ़ाने के लिए होती है तो उसका स्वागत है, अगर उसका असर अभिनेता पर हो रहा है, अभिनेता नाटक में अलग से दिखाई नहीं दे रहा है, तब इस दौर के बारे में एक प्रश्न चिन्ह लगाया जाना जरूरी है? अब तक का ये तीन तरफा इतिहास है। आज तक कोई भी अंतिम निर्णय लेने की स्थिति में नहीं है, उस पर चर्चा चल रही है कि आने वाले रंगमंच की क्या तस्वीर होगी! रंगमंच को अगले 10 साल और देने चाहिए। 21वीं शताब्दी के 25 साल हमारे सामने हैं। इस दौरान एक शक्ल निश्चित तौर से उभर कर आयेगी, जो रंगमंच का एक भावी स्वरूप तय करेगी।
11. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- आज जो लोग रंगमंच से जुडे़ हैं, अगर वो इसे व्यवसायिक तौर पर अपनाना चाहें, तो इसमें क्या सम्भावनाएँ हैं? और नहीं है तो क्यों नहीं है?
देवेन्द्र राज अंकुर – हमारे देश तथा अन्य देशों मंे हर तरह के विद्यालय हैं, जैसे चित्रकला के प्रशिक्षण, संगीत के, नृत्य इत्यादि। धीरे-धीरे रंगमंच प्रशिक्षण के भी विद्यालय शुरू हुए। रंगमंच को छोड़कर बाकी जो भी विषय हैं, वे स्कूल स्तर सेे ही शुरू हो जाते हैं। आज स्कूल में संगीत के शिक्षक, नृत्य के शिक्षक, चित्रकला के शिक्षक अनिवार्य रूप से होते हैं। लेकिन अभी तक ये संभव नहीं हो पाया है, कि रंगमंच का शिक्षक भी हर स्कूल में हो। जब भी 15 अगस्त 26 जनवरी या अन्य किसी भी आयोजन पर रंगमंच करना हो तो स्कूल वाले बाहर से एक्सपर्ट बुलाते हैं, इस प्रकार व्यावसायिक रूप से तो सम्भावनाएँ अपने आप बनना शुरू हो चुकी हैं, बस इसे स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता है। ज़ब रंगमंच के कलाकारों को मनपसंद व्यावसाय मिलेगा और स्कूल में बच्चों को शुरूआत से ही अभिनय कला में परिपक्वता हासिल हो जायेगी। तीन-चार साल पहले एन.सी.ई.आर.टी. ने रंगमंच का सिलेबस तैयार किया, जो 11वीं-12वीं कक्षा से शुरू होता है,। बच्चे हाईस्कूल के बाद एक विषय के तौर पर अध्ययन कर सकते हैं, फिर उसके बाद वे चाहें तो रंगमंच को विषय के रूप में ले सकते हैं, जैसे वो अन्य विषयों का चयन करते हैं। रंगमंच को व्यावासायिक रूप में लेने की प्रक्रिया की अब शुरूआत हो गई है। पिछले एक-दो साल से दिल्ली के विद्यार्थियों ने इसे विषय के तौर पर अपनाया है। एन.सी.ई.आर.टी. ने तो सिलेबस भी तैयार कर सीबीएससी को दे दिया। सी.बी.एस.सी. ने भी अपने सभी स्कूलों को निर्देशित कर दिया है, कि कोई भी स्कूल इस पाठ्यक्रम को अपनाना चाहता है तो बोर्ड उसे मान्यता देगा। अब स्कूल की अपनी व्यवस्था है। इसे सुचारू रूप से अपनाने के लिए स्पेस भी चाहिए, और यदि एक नया विषय आप शामिल कर रहे हैं, तो ज़ाहिर है जगह एवं शिक्षकों की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। इतने प्राध्यापक कहांँ से आयेगें? इन प्रश्नों के विकल्प भी तलाशने हांेगे। अभी तक जो लोग रंगमंच का प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं, वो बहुत कम हैं, जो प्राध्यापक बनना चाहते हैं। अधिकांश अभिनेता बनना चाहते हैं, अभिनेता के तौर पर व्यवसायिक रंगमंच का चयन करते हैं तो उन लोगों को रंगमंच के मण्डलों को ज्वाइन करना पड़ेगा। हमारे यहाँ मुख्य समस्या यही है, और इसका अभी तक कोई हल भी नहीं निकला है। रंगमंच के प्रशिक्षण के लिए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालयों ने कुछ विद्यालयों में रंगमंच का विभाग या अलग-अलग राज्यों में विद्यालय तो खोल दिये हैं, लेकिन उनके साथ रंगमण्डल की व्यवस्था नहीं की है, जो आवश्यक है। होना यह चाहिए था, कि अलग-अलग प्रदेशों से जब लोग प्रशिक्षण लेने आते हैं, तो उन विद्यालयों के साथ एक रंगमण्डल की भी स्थापना करनी चाहिए। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का एक रंगमण्डल है। मध्यप्रदेश भोपाल में पहले भारत भवन रंगमण्डल था, लेकिन वो भी अब बंद हो गया, उसकी दुबारा कोई शुरूआत नहीं की गई। इसी तरह हम दूसरे फील्ड में देखते हैं कि इंजीनियरिंग में प्रशिक्षण लेने के बाद बहुत सी इन्डस्ट्रीज़ या संस्थाएँ हैं, जहाँ आप व्यवसायिक तौर पर जा सकते है। कोई मेडिकल में जाना चाहता है, तो बहुत सारे हॉस्पिटल हैं, लेकिन रंगमंच जैसी विधा के लिए ऐसा कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। कोई भी स्टूडेन्ट भले ही वो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निकला हो, भोपाल म.प्र. ड्रामा स्कूल से निकला हो, उसके बाद वो कहाँ जाये? अंततः फिर उसे विवश होकर दूरदर्शन और फिल्मों में जाना पड़ता है, और वहाँ भी उसके सामने एक लम्बा संघर्ष है। अगर शुरू से ही विकल्प सरकार द्वारा तय किये या करवायें जायें तो आज हम जो बहस कर रहे हैं, वो खत्म हो जायेगी। इसके लिए सरकारी तौर पर सोचने और प्रयास करने की आवश्यकता है। अवसर मिलेंगे तो रंगमंच भी ज़्यादा तादाद में होगा।
इसी तरह व्यवसायिक रूप में लेने की पूरी सम्भावनाओं के बावजूद ज़्यादा लोगों को फ्री लॉसिंग करना पडता है। स्वतन्त्र रंगकर्मी के रूप मंे अभिनेता या कलाकारों को अपने रिस्क पर काम काना पड़ता है। इस अवस्था में कभी बहुत काम मिलता है तो कभी कोई काम नहीं होता। इन सारी स्थितियों के रहते हुए बहुत ही असमंजस एवं अनिश्चितता की स्थिति बनी रहती है जहाँ-जहाँ शुरूआत हुई, वहाँ लोग इसे व्यवसाय के रूप में अपनाते जा रहे हैं। मुम्बई विश्वविद्यालय में कई कलाकार पढ़ा रहे हैं। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के व्यक्ति हांे या और दूसरी संस्थाओं के प्रशिक्षित लोग हों, उन्हें अवसर उपलब्ध हैं और वे कार्यरत भी हैं। जहाँ कम से कम 30-40 विश्वविद्यालयों में रंगमंच विभाग हैं, वहाँ पर हमारे प्रशिक्षण प्राप्त स्नातक व्यक्ति पढ़ा रहे हैं, लेकिन वो कितने लोगों को नौकरी मंे ले सकते हैं? एक बेहतर शुरूआत के लिए हमारे देश के 29 राज्यों में 29 रंगमण्डल की स्थापना होनी चाहिए। सभी राज्यों मंे रंगमण्डल होते तो उनके राज्य के विद्यार्थियों को वहीं नौकरी मिल जाती, वे उसे ज्वाइन कर लेते। कुछ समय पूर्व मुझे सूचना मिली कि कर्नाटक सरकार ने 80 से 90 के दशक से चले आ रहे रंगमण्डल के चार भाग बना दिये हैं, और पूरे राज्य में अलग-अलग स्थानों पर उन्हें स्थापित कर दिया है। अब आप समझ सकते हैं कि थियेटर में काम करने वाले लोगों को इतनी बड़ी अपरचुनिटी प्राप्त होने जा रही है। इन सुविधाओं के मिलने से वे रंगमंच करते हुए, रंगमंच को व्यावसायिक रूप में अपनाते हुए, अपना जीवन-यापन कर सकते हैं। यही पहल करते हुए यदि प्रत्येक राज्य में कम से कम एक-एक ही रंगमण्डल बना लें, तो बहुत सारी सम्भावनायंे और बढ़ंेगी। एक राज्य के एक रंगमण्डल में कम से कम 25 व्यक्तियों को नौकरी मिल सकेगी। हर राज्य मंे रंगमण्डल की स्थापना होने से 29 राज्यों में हर साल 600-700 लोगों के रोज़गार की सम्भावनाएँ बढ़ेंगी। यह कार्य किसी अकेले के बस का नहीं है। इसके लिए सरकार को भी आगे आना होगा। सिर्फ विद्यालय बना देने से काम नहीं चलेगा, उस विषय की, या उसमें प्रशिक्षण लेने वाले विद्यार्थियों के बारे में भी सोचना एवं विचार करना होगा। इस प्रकार रंगमंच को एक व्यवसाय के रूप में लेने में कोई समस्या सामने नहीं आयेगी।
12. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- आज हिन्दी अपने अस्तित्व को खोने के कगार पर है। आप एक निर्देशक होने के साथ ही साथ लेखक भी हैं। आपने अपनी लेखनी के द्वारा साहित्य को भी समृद्ध किया है। मेरा प्रश्न ये है, कि क्या रंगमंच के द्वारा हिन्दी भाषा का संरक्षण एवं सवंर्धन संभव है। क्या भविष्य में हिन्दी अपने असतित्व को पा सकेगी?
देवेन्द्र राज अंकुर – भाषा के संवर्धन और संरक्षण में सबसे ज़्यादा अगर मदद मिल सकती है तो वह रंगमंच के माध्यम से ही मिल सकती है। ये आज की बात नहीं है। सन् 1923 में हिन्दी के सुप्रसिद्ध नाटककार जयशंकर प्रसाद ने अपने एक लेख में लिखा था कि ‘‘भाषा का प्रचार-प्रसार अगर किया जाना है तो वह नाटकों के माध्यम से ही किया जा सकता है, क्योंकि नाटक एक बोली जाने वाली विधा है, खेली जाने वाली विधा है। भाषा तभी आगे बढ़ सकती है, जब वह बोलचाल में, व्यवहार में, मौजूद हो।’’ हिन्दुस्तान में संस्कृत भाषा किसी समय बोलचाल की भाषा के रूप में प्रचलित थी, इसलिये संस्कृत भाषा का रंगमंच भी बहुत सक्रिय था। धीरे-धीरे यह सिर्फ लिखित भाषा के रूप में होकर रह गई। संस्कृत भाषा में होने वाला रंगमंच भी समाप्त होता चला गया। हमारे यहाँ पारसी रंगमंच इस बात का सशक्त उदाहरण है। 100 साल तक रहने वाले पारसी रंगमंच ने उर्दू भाषा को जन-जन तक पहुँचाया। उर्दू शेरो शायरी को नाटकों में हम सुनते हैं, वहाँ उसका प्रभाव तुरन्त हमारे ऊपर पड़ता है। इस प्रकार भाषा एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुँचती है। नाटक एक जगह पर होने वाली विधा नहीं है, यह तो घूम-घूम कर मंचित करने वाली विधा है। हम दूसरे राज्यों और शहरों में जाकर रंगमंच करते है, इससे प्रचार-प्रसार में बहुत मदद मिलती है। 10 से 12 सितम्बर के बीच भोपाल में विश्व हिन्दी सम्मेलन हुआ, जिसमें आई.सी.सी.आर. ने एक पत्रिका ‘गगनान्चल’ का विशेष अंक निकाला, तथा इस विषय पर एक लेख आमंत्रित किया। यह भी भाषा को समृद्ध करने का उत्तम प्रयास है। हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाने वाले सदाबहार नाटक जो शुरू से लेकर अब तक हुए, उन्होंने हिन्दी रंगमंच को तो आगे बढ़ाया ही, साथ ही साथ हिन्दी का प्रचार-प्रसार करने में भी मददगार साबित हुए। रंगमंच और हिन्दी ये दोनों आपस मंे जुडे हैं। इस बारे में तो कोई संदेह है ही नही, कि भाषा के प्रचार-प्रसार में एवं भाषा को सुरक्षित व जि़न्दा रखने में नाट्य विधा एक प्रर्दशनकारी और मददगार रही है, और सदैव रहेगी।
13. डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे- रंगमंच के सभी पक्षों में अभिरूचि रखने वाले कलाकारों, दर्शकों को आप क्या संदेश देना चाहेंगे?
देवेन्द्र राज अंकुर – मेरा संदेश यही है कि, रंगमंच में आने से पहले आपको यह तय करना चाहिए कि आपको इसी क्षेत्र मंे आगे बढ़ना है, या आप इसको एक विकल्प के तौर पर अपनाना चाहते हैं। यदि दूरदर्शन या फिल्मों में जाना चाहते हैं, तो मेरी सलाह यही है कि वे रंगमंच के प्रशिक्षण के बजाय सीधे वहीं जायें, तो अच्छा रहेगा। वो इसलिए कि जितना समय और मेहनत वे रंगमंच के क्षेत्र में खर्च करेंगे उसके बाद तो अंततः उन्हें वहीं जाना है। वहाँं फिर से उतना ही समय और मेहनत करनी होगी। इस हिसाब से दूरदर्शन और फिल्मों में जाने की चाह रखने वाले लोग सीधे वहीं जायें। इस क्षेत्र में आने वाले लोगों को यह तय करके आना होगा कि, हमें यहीं रहना है। इसको एक व्यवसाय के रूप में कैसे लिया जा सकता है। उन सारी सम्भावनाओं को तलाश करना होगा। आज निश्चित रूप से संभावनायें बढ़ी हैं। भारत सरकार द्वारा मिलने वाली जूनियर फेलोशिप, सीनियर फेलोशिप भी उपलब्ध है। इसके साथ ही प्रोडक्शन ग्राँट भी मिलती है। मैंने शुरू में कहा था, कि रंगमंच विद्यालयों में एक विषय के रूप में आ चुका है, तो एक अध्यापक के रूप में भी सम्भावनाएँ बढ़़ी हैं। रिसर्च करने की सम्भावनायंे हैं, नेट या पीएचडी की भी सम्भावनायें हैं। जब इतने सारे विकल्प हैं, तो क्यों न पूरी तरह से हम इसमें कॉन्सनट्रेट करें, तो उसके नतीजे भी अच्छे ही होंगे। सन् 1975 में मैं जब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से पास होकर निकला तब मेरे पास कोई विकल्प नहीं था। उस समय न तो दूरदर्शन था, न फिल्मों में मौका था, और न ही जगह-जगह वर्कशॉप होते थे। स्कूल-कॉलेजों मे तो इसे एक विषय के रूप में सोचना भी दूर की बात थी। मैंने 17-18 साल रंगमंच करते हुए ही अपने संसाधन जुटाने की कोशिश की, ताकि हमारे जीवन का गुज़ारा हो सके। उसके बाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने स्वयं मुझे बुलाया। इस प्रकार आज मैंने एक मुकाम हासिल किया, मुझे रंगमंच में एक पहचान मिली। आप का लक्ष्य अगर तय हो, और आप किसी कार्य को करने की ठान लंे तो मुझे नहीं लगता कि कोई परेशानी आयेगी। दिक्कत तब आती है, जब हम असमन्जस की स्थिति में होते हैं, और सोचते हैं कि किधर जायें! तब हम भटकते रहते हैं। आज पारिवारिक स्तर पर पूरा ढाँंचा बदल चुका है। हमंे इस बात को समझना चाहिए कि अब वो संयुक्त परिवार वाली प्रथा का समय नहीं रहा है। उस समय कोई बच्चा यदि बड़ा होकर भी कुछ नहीं करता था, तो भी चल जाता था, क्योंकि संयुक्त परिवार होता था, लोग मिलजुल कर उसकी जि़म्मेदारी उठा लेते थे। आज हमें अपने लिए तुरन्त जि़म्मेदार होना है। अगर हमने अपनी पूरी तैयारी नहीं की तो कौन हमें बिठाकर खिलाता रहेगा, और हमारी हर जरूरतों को पूरा करेगा। हम ऐसी नौबत ही क्यों आने दें! इस फील्ड में आने की इच्छा हर व्यक्ति की अपनी होती है। हर व्यक्ति अपनी इच्छा से इसे चुनता है, तो फिर उसके लिए जितनी कोशिश की जा सके करना होगा! जब हम दूसरे क्षेत्रों में कोशिश करते हैं, तो इस क्षेत्र में क्यों नहीं! मान लीजिए आप आई.ए.एस. में, इन्जीनियरिंग में, मेडिकल में, जाना चाहते हैं, तो क्या बिना मेहनत के जा पाते हैं? उसके लिए भी तो बहुत मेहनत करनी पड़ती है। केवल रंगमंच को हमने मान लिया है, कि इसमें कोई मेहनत नहीं करना है, हम पढ़ाई करके निकलेगें और हमारे लिए सामने सब कुछ तैयार, मौजूद होगा। ऐसा व्यावहारिक तौर पर किसी भी क्षेत्र में नहीं होता, और इस क्षेत्र में तो बिल्कुल भी नहीं, क्योंकि यहाँ नए विकल्प खुले हैं। जो व्यक्ति हर स्थिति के लिए पूरी तरह से तैयार हो वो ही इस क्षेत्र में आए।

सम्पर्कः श्री देवेन्द्र राज ‘अंकुर’
नई दिल्ली
मो.: 9810143606

सम्पर्कः डॉ. प्रीतिप्रवीण खरे
भोपाल (म.प्र.)
मो.: 9425014719

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